Monday, December 29, 2008

कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....

कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....



26/11 के एक महीने बाद हर टीवी चैनलों ने मुबंई पर पाकिस्तानी आंतवादियों के हमले का एक महीना मनाया ... ... क्या मकसद था ..क्यो उन चीज़ों को दोबारा दिखाया जा रहा था ... क्या चैनलों के पास कोई नई जानकारी थी .. क्या टीवी चैनलों को जो दिशा निर्देश सरकार की तरफ से मिले थे उनका वो पालन कर रहे थे
ये आप सब के ज़हन में बात आ रही होगी।
26/12 को जैसे ही घर में टीवी चला तो बच्चे सहम गये ।मां देखो फिर से मुबंई में आंतकवादियों ने हमला कर दिया ... मां भी भाग कर टीवी के पास पहुचीं टक टकी लगाये टीवी देखने लगी ...हे भगवान अब क्या होगा, क्यों इन आंतकवादियों को कोई पकड़ नहीं पा रहा ..।
वो समझ नहीं पा रही की हो क्या रहा है ..कभी दिन की तस्वीरें ,कभी रात की, उसे लगा की रात को हमला हुआ... .कभी उसे लगा दिन को हमला हुआ..फिर सोचा की दोबारा उन्ही जगह पर क्यों हमला हुआ.... फिर उसने सोचा ये तो वो ही और वैसी ही जगहाएं हैं , वो ही तस्वीरे हैं, जिन्हे वो पूरे एक महीने से देखती आ रही है । फिर उसे किसी ने बताया कि अरे टीवी वाले मुबंई पर हुये हमले का एक महीना बना रहे हैं..उसने 13वां.40वां तो सुना था महीना पहली बार सुन रही थी ..
अभी तक वो बच्चों को ये नहीं समझा पायी की आंतकवादी क्या होते हैं अब वो बच्चों को ये क्या बताये कि टीवी वाले हर चीज़ को गणित के पहाड़े की तरह याद क्यों करवाते हैं..
सब चैनलों से साफ साफ कहा गया था गोली बारी, खून, आंतकी हमला, आप एकदम सीधे नहीं दिखा सकते अगर आप पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं तो उस पर फाइल लिखना ज़रूरी है ..पर ऐसा कुछ नहीं हुआ .
अभी महीना भी नही गुज़रा ..जब हर टीवी चैनलों ने फिल्म निर्देशक रामगोपाल वर्मा की बड़ी आलोचना की थी और अब खुद उनसे खौफनाक ड्रामा,फिल्म न्यूज़ चैनल में दिखाया गया इसलिये न्यूज़ कहना ज़रूरी है ..यानी न्यूज़ दिखाई गयी..
अब बात उनकी शैली की भी हो जाये... टीआरपी की दौड़ में पूरा मसाला दर्शकों तक पहुचाने की कोशिश की गई..कलाकार बुलायेगये,ड्रामैटिक लाइटिंग की गयी..एंकर और रिपोट्रर ने India most wanted के एंकर की तरह चिलाना शुरू कर दिया ।नेताओं को गाली देने के लिये फिल्म अभिनेताओं का सहारा भी लिया गया। औरों की तो छोड़ो अपने को संजीदा चैनल कहलाने वाले लोग भी इस दौड़ में शरीक होगये .. हां भई कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....

Thursday, December 18, 2008

आज कल ब्लॉग में बहुत वाहवाही लूट रहे हैं...

त्याग पत्र-2
...... आज कल ब्लॉग में बहुत वाहवाही लूट रहे हैं...

आपको लगा होगा की भई ये साहब तो भाग मे बहुत विशवास करते हैं आधी बात करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं.. पर नहीं सर ऐसा हो नहीं सकता मैं कभी झूठ नहीं बोलता मुझे याद नही की मुझे बताया गया था अगर बता देते तो मैं वक्त पर ही आता .. और सब कुछ लिख देता है ..नरेश ऑफिस में सुबह सुबह... नये आये हुए बॉस के सामने बोल रहा था ..पर बॉस सुनने को तैयार नही था ...
क्योंकि बॉस वो ही सुनता है जो वो सुनना पंसद करता है और नरेश के मुंह से सुनना तो वो कुछ भी पंसद नही करता क्योंकि आप कैसे हैं ये इस बात पर निर्भर करता है की आपको दूसरे लोगों ने कैसा बनाया या बताया है..जी , और नरेश का रिकॉर्ड इस मामले में तो बहुत ही खराब है ...
नरेश की शुरूवात एक गांव से हुई ..बाप को दिल्ली में छोटी सी नौकरी और साउथ दिल्ली में छोटा सा घर मिला पर ये छोटा घर जहां था वहां चारों तरफ बड़े-बड़े घर थे । नरेश सरकारी स्कूल की ख़ाकी पैंट पहन कर इन बड़े बड़े घरों को देखता हुआ जाता था और उन घरों में रहने वालो को गाली देता रहता कभी घंटी भी बजा कर भागता तो कभी पत्थर मार कर भाग जाता । कोई समझाता तो उससे झगड़ा करता ..तभी से उसका मिजाज बदमिजाज होता गया ..और वो हर चीज़ को अपने ढंग से ही करना चाहता ..और जो उसे मिलता उससे वो कभी खुश न होता ...दिल्ली में वो गंगा का किनारा देखता.. बाग में आलू पाने की चाहत रखता... शहरों की सड़को पर गांव की गलिया खोजता... कोई कुछ बोलता तो उसे काटने दौड़ता... इस तरह से नौकरी कर पाना आसान न था
सब को यकीन था की नरेश की नौकरी एक दिन जायेगी इस देश मे वो ही ऐसा पत्रकार नहीं है जो सच जानता है और सच बताना चाहता है ... हर चैनल में हज़ारों हैं ।अगर आपको नौकरी करनी है तो आपको नियम मानने ही होगें .. और नियम बॉस के होते हैं आपके नहीं..नरेश के साथ ये हुआ कि वो मलाई तो चाहता था पर दूध से परहेज़ करता था ..
उस दिन नरेश लेट आया ऑफिस को जब उसकी ज़रूरत थी वो वहा नहीं था आपकी हर गलती बर्दाश कर सकते हैं अगर आप काम वक्त पर करते हैं .. इससे पहले भी नरेश की कई बार शिकायत बॉस तक पहुच चुकी थी .बॉस बस वक्त का इंतज़ार कर रहे थे ..और मुंबई हमले ने बॉस को भी हमला करने का मौका दे दिया ...

नरेश ने भी ताव में आकर कहे दिया मैं इस्तीफा देता हूं.. मंदी के दौर में जहां कम्पनी छटनी करने की सोच रही है ... वहां मोटी पगार और गाड़ी रखने वाले नरेश की ये पेशकश चैनल और बॉस के लिये मुंबई मिशन की कामयाबी से कम न था .. नरेश ने कहा मैं इस्तीफा देता हूं..बॉस ने कहा मैं स्वीकार करता हूं..

अब तो नरेश के काटे तो खून नहीं ..पर मुंह से शब्द निकल गये तो क्या करे .. त्याग पत्र स्वीकार हो गया... बैचेनी से नरेश को रात भर नींद नहीं आती इसलिये देर तक बिस्तर पर लेटे रहते हैं ।.कुछ करने को है नहीं तो बच्चो के साथ खेलते है.. और जिस तरह मुंबई में हर संघर्ष करने वाले से पुछो कि वो क्या कर रहा है तो वो यही कहता है कि लिख रहा हूं..वैसे ही नरेश भी अब किताब लिखने की सोच रहे हैं .. और टिकट न मिलने पर जिस तरह नेता कहता है उससे पैसों की मांग की और अब वो सारे राज़ खोल दे गा वैसे ही नरेश अब अपनी कम्पनी के कई राज़ जिसे वो हज़म कर चुके थे अब उगलने की कोशिश कर रहें. है... मतलब नरेश अभी भी नहीं सुधरे .. पर एक बात है वो आजकल ब्लॉग में उभरते हुये पत्रकारों के हीरो के रूप में देखे जा रहे है .. और कई उनके दुशमन रहे लोग अब दोस्त हो गये हैं... हमारी दुआ है कि नरेश को हीरो समझने वाले पत्रकारों का कभी दिल न टूटे...

आपकी खातिर

.... आज फिर ब्लैड प्रेशर 170-100 आया .शगूर भी बढ़ी हुई थी ..पर बन्तों ये मानने को तैयार नहीं थी की वो बिमार है .और उसे कोई परेशानी है ... क्योकि वो जिस समाज में रहती थी वहां औरत को हर वक्त जवान और सेहतमंद रहना ज़रूरी है नहीं तो पति उससे दूर चला जायेगा इसका डर उसे हर वक्त लगा रहता है...
तभी फोन बजता है वो फोन उठाती है ..और बोलती है .हां जी अभी डॉक्टर के पास से आ रहे हैं ..डॉक्टर ने कहा की कोई परेशानी नहीं है ..सब ठीक है .. कोई घबराने की बात नहीं ... दूसरी तरफ से आवाज़ आती हां तुझे तो ड्रामें का शौक है ..यूहीं नाटक करती रहती है.. बन्तों कुछ नहीं बोलती बस हंसतें हुए कहे देती है बस जी यूं ही,,,,
गाड़ी चलाते हुए उसका दमाद अपनी पत्नी को देखता है ..पत्नी बन्तों की तरफ देख कर बोलती है, मम्मी तुम्हे शगूर है, तुम्हे परहेज़ करना है और डॉक्टर ने कहा कि अगर बीपी ठीक नहीं हुआ तो जान का भी खतरा है ..तुम डैडी को सच क्यों नहीं बता देती .. बन्तों कहती है बस तू तो यूंही पीछे पड़ जाती है ..

सब घर आजाते हैं बन्तों, नौकर और बच्चे को छोड कर दामाद और बेटी अपने दफ्तर चले जाते हैं ..बन्तो छह महीने के बच्चे को देख कर कहती है ये क्या जाने क्या सहा है मैनें और क्या क्या सह रही हूं मैं.. अभी दो महीने ही हुये थे बन्तों के जवान बेटे की मौत के ...कि उसके सुसराल वालों औऱ उसके पति ने शुरू कर दिया था कि भई हमें तो अपना वारिस चाहिये हम तो दूसरी शादी कर कर रहे हैं ..बन्तों के घरवालों ने सुसराल वालों को समझाया भी आपकी बेटी भी है दामाद भी है ..ये क्यों कर रहे हैं...पर किसी ने कुछ नहीं सुना आखिर में बन्तों ने ही कहां मैं ही दूंगी आपको वारिस ..सब चौके पर बात सही निकली 53 साल की उम्र में उसने दिल्ली में अपने दामाद औऱ बेटी घर आकर आईवीएफ के द्वारा एक बेटे को जन्म दिया..
इस दौरान उसे बहुत कुछ सुनना और सहना पड़ा और क्या क्या सुनना पड़ा होगा ये आप अच्छी तरह से समझ सकते होगे..पर उसने अपना घर अपनी पति को बचाने के लिये ये कदम उठाया ...तब भी डॉक्टरों ने मना किया था पर बन्तों की भले ही सेहत साथ नहीं थी पर हिम्मत हमेशा से साथ थी जिसके सहारे वो चल रही थी .. अब वापस अपने घर जाने का वक्त पास है पति लेने आ रहा तो उसे लगता है कि वारिस तो मैने दे दिया पर अगर अब उसके पति को पता चलेगा की वो बिमार है तो वो इस वारिस को पालने के लिये दूसरी न ले आये ..क्या क्या वो करे इस ज़िन्दगी की ख़ातिर ....आपकी खातिर...

Friday, December 12, 2008

71 साल

भाग -3
रामनरेश खुश था भले ही हम जितना कहते रहें कि लड़के लड़कियों में कोई फर्क नहीं होता सब बराबर होते हैं.. पर लड़के के जन्म से खुशी और लड़की के जन्म से दुख होना स्वभाविक है..जिसे नकारा नहीं जा सकता .. पर हां रामनरेश एक समझदार और अच्छे व्यक्ति थे उन्होने कभी भी अपनें बच्चों मे भेदभाव नही किया .ब्लकि अपनी लड़कियों को ज्यादा प्यार दिया.. एक बात याद दिला दूं ये फिल्म नहीं है ज़िन्दगी है तीनो बहनो को भी अपने भाई से बहुत प्यार था।
छहों की जिन्दगी बढ़ियां न सही ठीक से गुज़र रही थी घर में एक के बाद एक ईंट लगती जा रही थी एक कमरे से दो ,दो से तीन ,तीन से चार .. और इसी के साथ तन्खाह ,कर्ज़ और जिम्मेदारी भी बढ़ रही थी ...
बच्चों को पढाना,खिलाना आसान न था .. बच्चे जब बाहर निकलते हैं बाहर की दुनिया देखते हैं और दुनिया के साथ अपने को देखते हैं फिर उनको ये एहसास होने लगता है कि वो दुनिया मे कितने पीछे हैं .. फिर बच्चो को ये याद नहीं रहता कि उनके मां बाप ने अपनी और उनकी ज़िन्दगी के लिये कितनी मेहनत की ..वो अपने सपनो में खो जाते हैं ..वो ग़लत नहीं है पर हां नादान है ..
ये ही हुआ रामनरेश के बच्चों के साथ वो अपने मां बाप से प्यार तो करते थे प्यार के साथ एक दूरी भी बनने लगी .. उनकी कुछ पाने की इच्छा होती उसे वो अपने पिता माता से कहते वो उनसे कुछ बहाना बना देते कोई परेशानी गिना देते बच्चे समझदार थे ..धीरे धीरे हसरतों को दिल में दबाना सिख गये मां बाप से कहना छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी का नया रास्ता ढूढना शुरू कर दिया...
किस रास्ते पर चले रामनरेश के बच्चे बताउंगा अगली बारी तब तक अपने विचार भेजते रहिये...

Thursday, December 11, 2008

एक हिन्दू का दर्द

एक हिन्दू का दर्द

हमारे देश में जब भी दर्द का ज़िक्र होता है तब या तो गरीबो का नाम आता है या फिर मुस्लमान का हर भारतीय एक मोर्चा लेकर निकल पड़ता है ..बडे बडे नेता और बड़े बड़े पत्रकार अपनी अपनी दुकान खोल कर ज्ञान बांटना शुरू कर देते हैं ...उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुद्दा क्या मसला क्या है ..उन्हे तो अपने आपको देशभक्त दिखाना है और देशभक्त वो तभी कहेलायेगे जब वो मुस्लमानों के लिये बोले और आवाज़ उठायेगें....
आप ज़रूर सोच रहेगे कि आज मैं क्या कहे रहा हूं.. कौन सी कहानी बताने वाला हूं बात रविवार की है बकरीद से दो दिन पहले की... सुबह सो कर उठा तो पता चला दादी गुज़र गई.. मैं एकदम खामोश हो गया । घर मे रोने की आवाज़ भी मेरे भीतर की खामोशी नहीं तोड़ पा रही थी ।शायद इसलिये कि अभी 26/11 के आंतकवाद में इतनी मौतें देख चुका की आंसू सूख गये थे ...
पर मेरी दादी थी भले ही हमारी कम बात होती हो ..पर एक प्यार तो था ही दोनो के बीच वो भी मेरे लिये निस्वार्थ बहुत कुछ करती थी जिसके बारे में मैं आप को क्या बताऊं शायद आपको कोई रूचि न हो और मै अपने लेख को कमज़ोर नहीं करना चाहता .. मैने भले ही अपनी दादी के लिये कुछ किया हो बहुत कुछ या न किया हो पर आज ये सवाल है कि अब तो मेरा फर्ज़ है कि मै जो कर सकता हूं वो करूं .
दूसरे दिन पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे आने थे पर मैने छुट्टी ले ली ..और दादी की अस्थियां लेकर गढ़ गंगा चला गया वहां पहुच कर पूजा की .. पंडितजी ने बताया कि जब तक दादी की तेरवीं नहीं होती आप सुबह सुबह गाय को रोटी खिलाये .. मैंने कहा हां ज़रूर । मुझे नहीं पता और न ही मैं जानना चाहता हूं कि मरने के बाद इन सब कामों का क्या होता है .. मैं तो बस इतना जानता हूं मेरी दादी से जुड़ी बात है और मुझे ये करना है ...
पुरानी दिल्ली एक ऐसी जगह है हिन्दुस्तान में जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ये बात मैंने अपने पिताजी के दोस्तों के मुंह से कई बार सुनी थी और हर बार मैं इस बात को टाल जाता था ।..पर उस दिन मुझे एहसास हुआ जब मै गाय को रोटी खिलाने निकला .चौकी इंचार्ज मेरे पास आगया कहा कहां घूम रहे हो मैने उसे सारी बात बताई .. उसने मुझ से कहा आप घर चले जाईये.. अभी आप कुछ नहीं कर सकते ..6 से 10 नामाज़ के लिये सब बंद कर दिया जाता है .. मैने पूछा अगर मेरी दादी मर जाती तो भी आप मुझे नहीं जाने देते .. वो थोड़ा रुका और फिऱ बोला हां दस बजे के बाद ही जाने देता.. ....

Thursday, December 4, 2008

त्याग पत्र

आज ऑफिस पहुचां तो एक और विकेट गिर गया था ..यानि एक और सज्जन ने नोकरी छोड़ दी ।छोड़ी या उनसे से छोड़ने को कहा गया ..ये सभी समझते हैं पर सब उसी बात पर विशवास करने की कोशिश करते हैं जो उनको समझाई जा रही होती है।
यानि सच जानते हुये,झूठ पर यकीन करना ,झूठ सुनना, समझना दूसरों को झूठ बताना यही पेशा है ... औऱ इस पेशे में जो होता है, हो रहा है वो ही सच है ....
आज कल टीवी में एक शब्द चल रहा सूत्रों से .सूत्रों के हवाले से ..हमारे सूत्रों ने बताया,हमारे सूत्र कह रहे हैं.. ये सूत्र क्यां है ..सिर्फ और सिर्फ बॉस और पब्लिक को बेवाकूफ बनाने वाला वो शख्स जिसको किसी ने नहीं देखा पर जिसकी बातों को सबने सुना..जब टीवी में न्यूज़ आनी शुरू हुई थी तब ये साफ साफ कहा गया था कभी आप सूत्र जैसे शब्द का इस्तमाल नही करगे है। पर सब कुछ बदल गया नौकरी करनी है जो कैबीन से आने वाले सूत्र कहे वो लिख दो..वरना सूत्र उनको कुछ और बता देगें.....
खैर आप को इस ज्ञान से क्या लेना आपको मसाला चाहिये कि भाई आज कौन सा राज़ खोलेगें... आज कहानी नहीं लिखूं आपको नौकरी करने के गुण बतातऊं..ये बात भी सही है इन बताये गये नियमों में से मैं इन सब को मान रहा हूं या नहीं .ये मत पूछियेगा...तो सुनिये
पहला- जिसके पास कुर्सी है ,जो कुर्सी पर बैठा है वो ही आप का बॉस है ...यानि आप उसके आदमी होने चाहिये जो सत्ता में है ..
दूसरा- पहले नियम से जुड़ा हुआ है .. अगर आप के ऊपर की कुर्सी बदल गयी तो आप भी बदल जायें..नहीं तो आपको ही बदल दिया जायेगा...
तीसरा- देखिये जो आपके ऊपर बैठा है वो ही समझदार है ..ये बात गांठ बांघ लिजिये
आप उससे ज्यादा नहीं जानते इसपर विशवास किजिये...
चौथा- जी सही कहे रहें है.अभी कर देता हूं..हा जी ठीक बात है...बहुत अच्छा..ये आप को हरदम कहना है .हर वक्त कहना है ..
पंचवा- ये याद रखिये ,आप नौकरी कर रहे हैं आप नौकर है ..घर की किस्त देनी है बच्चों को पढाना है बीवी को घुमाना है .. अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास..हमेशा रहे याद...
छठा-सब से अहम बॉस के काम करना जैसे शाम को शराब ला कर देना ,टिकट बुक कराना ..
मिनिस्टर से काम कराना गांव से आम और अनाज पहुचाना.. सर के आते ही उनके बच्चे का हाल और कपड़ो की तारीफ और कल किए गए उनके निर्णय की वहावाही करना मत भूलियेगा....
जब इन नियमों का आप पालन नहीं करेगे तो आप को त्याग पत्र देना ही
होगा... उसने क्यों दिया मेरे सूत्रों ने बता दिया है मै आप को अगली पोस्ट में बताऊंगा....

Monday, December 1, 2008

सलाम

शहीदों के नाम

पसीना मौत के माथे पे आया आईना लाओ
हम अपनी ज़िन्दगी की आखरी तस्वीर देखेगें।।

क्या जाने खयाल आ गया किस बात का हमको
रोके से जो रूकती नहीं अशकों की रवानी ।।

दमे आखिर भी उनका ये अहतराम हुआ ।
उठे न हाथ तो आंखों ही से सलाम हुआ ।।

फरेब खाते रहे एतबार करते रहे
खिज़ा भी आई तो ज़िक्र बहार करते रहे ।।
बहार में भी तलाशे बहार करते रहे ।
तमाम उम्र तेरा इंन्तज़ार करते रहे।।

..... सलाम ... आपको हमारा ...

देखो बहुत हुआ

देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम...
अब जली है वो लौ
जिसको बुझने न देगें हम.
भुगत रहे कई बरसों से
तुम्हारे गुनाहों की सज़ा हम
हर पल हर दम
हिन्दू मुस्लमां बनाये गए हम.
खून बहा हमारा ही
घर जले हमारे ही
सुबक सुबक कर
सहम सहम कर
क्यों जीये अब हम
देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम
जब चाहा तुमने
जैसे चाहा तुमने
मारा हमको
रूलाया हमको
कभी बंदी तो कभी बंधक बनाया हमको
कभी मुसलमां भगवान तो
कभी हिन्दू अल्लाह याद दिलाया हमको
खुद सोये चैन से हमको खूब जगाया तुमने
देखो बहुत हुआ अब न होने देगे हम
हर बार लाशों के ढ़ेर से
सत्ता की सीढी चढ़ी तुमने
खुद पहना सफेद कुर्ता
हमको सफेद कफ़न पहनाया तुमने
जशन बनाया तुमने जीत का
जीत दिलाने वाले को खूब दुत्तकारा तुमने
पहुचें शहीद पर नोटों की सुगात लेकर
कोई एक लाख़ तो कोई एक करोड़ लेकर
पर अब न चलेगा तुम्हारा ये पडयंत्र
देखो बहुत हुआ.....

Wednesday, November 26, 2008

वो

वो
वो मर गया मै इसलिये उदास नहीं हूं...
क्योकि मृत्यु तो मुक्ति है
और मुक्ति तो स्वंतत्रता होती है ।
स्वतत्रता के लिये उदास होना विद्रोह...
और मैं विद्रोही नही....

धरती तो बंधक है कर्म और कर्तव्य की ..
जो उसे जितना नोकों से कुरेदेगा ....
उसी को तो उसे फल देना है ...
नित दिन पीडा सहने के बाद भी
उसको तो मुसकराना है
मैं भी तो उसका एक कार्यकर्ता हूं
वो मर गया.. मैं इसलिये उदास नहीं हूं ।

अंबर भी तो सुचालक है आशाओं और कल्पनाओं का ..
दूर से ही सिमट आये आंखों मे हमारी ।
हर दिन हमको नये सपनो मे ले जाता है...
उसकी महानता और ऊचाई हमको कितनी छोटी लगती है ।
मैं भी तो उस छोटे से अंबर पर चढ़ना चाहता हूं..
वो मर गया... मै इसलिये उदास नहीं हूं...

कौन था वो... अपना था , पराया था या फिर मेरा अपना ही साया था
छटी उंगली ही सही, था वो मेरे शरीर का ही अंग
वो कटगया या मर गया ,मैने कितनी सरलता से बखान किया...

क्योकि देखता हूं मैं सुनता हूं, मैं हर तरफ अजीवित इंसानों को
मैं भी तो इन शवो के भंडार में एक शव हूं..

वो मर गया मैं इस लिये उदास नहीं हूं......

७१ साल

71 साल
भाग -2

रात ही रात में घर खाली कर दिया ।पहले किसी जान पहचान वाले के यहां रहे फिर एक कमरा किराये पर ले लिया।रामनेरश ने अपनी तीन बेटियो और पत्नी के साथ ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू किया ।स्कूल दूर था सुबह जल्दी निकलते रात को देर तक टूयशन पढ़ा कर घर वापस आते ।अभी बहुत कुछ करना है बच्चियों की पढ़ाई एक अपना घर ... यही उनका सपना था ।न अपने खाने की फिक्र न पहने का होश दो जोडी कपड़े, एक जोड़ी रबड़ की चप्पल और एक साइकिल.. यही था रामनरेश के पास ..बीवी की भी कमोबोश ऐसी ही हालत थी।
जहां टूयशन पढ़ाने जाते थे उन बच्चों के पिता प्रॉपर्टि डिलर थे ।उन्होने कहा मास्टर साहब एक जगह ज़मीन कट रही है एक प्लाट ले लो । रामनेरश ने कहा भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं की ज़मीन ले सकूं.. प्रॉपर्टि डिलर ने कहा चलिए कुछ दे दिये गा और बाकि बाद में दे देना ...शारीफ आदमी पैसे बाद में दे पर देगा ज़रूर ये बात डिलर जानता था ।
आज रामनरेश जल्दी जल्दी घर पहुचें पत्नी को ख़बर दी ।पत्नी भी खुश हो गयी । मां बाप के खिले हुए चेहेरे देख कर बच्चो में खुशियों की लहर दौड़ गई । और क्यो न हो आखिर कुछ अपना हां अपना घर होने वाला है उनका वो भी देश की राजधानी में । घर में दाल के साथ आज एक सब्ज़ी भी बनी और मीठे में खीर भी थी ..यही इनकी खुशी और पार्टी थी ।
कुछ पैसे दे दिये कुछ देने का वादा कर लिया .. लो रामनरेश को एक दो सौ गज का प्लाट मिल गया ।तब दिल्ली बस रही थी चारों तरफ जंगल थे या फिर खेत थे ।बिजली के लिए लकड़ी के पोल लगाए जाते थे और दूर से लाइन खीची जाती थी ।पानी के लिए हैंडपंम्प प्रयोग में आता था जिसमें मटमैला और बदबूदार पानी आया करता था ।सीवर तो बहुत दूर की बात है नाली तक नहीं होती थी .घरों आगे गड्डे खोदे जाते थे जिसमें पानी जमा होता था ।
रामनरेश और उनकी पत्नी ने जब जगह देखी तो एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर कुछ कहने की हिम्मत दोनो जुटा नहीं पाये... कैसे ,किस तरह से ,क्या होगा अभी तो चल जायेगा बच्चियां छोटी हैं पर जब बड़ी होगीं .कहां पढ़ेगी,कैसे वक्त कटेगा दोनो यही सोच रहे थे ।पर ये अपनी ज़मीन है हमारा अपना मकान बनेगा इस खुशी के आगे ,दोनो सब कुछ भूल गये थे ।

मकान बनना शुरू हुआ...भाई तक भी किसी ने ख़बर पहुचाई ..भई तु्म्हारे भाई रामनरेश ने ज़मीन ले ली अब मकान बनवा रहे हैं.. भाई से सुना न गया एकदम से ताना मारा ..अरे पागल हो गया है ..किसके लिये कर रहा है ..बनाने दो साले को इसके कौन सा लड़का है .. तीन तीन लड़कियां है सब कुछ मिलेगा तो हमारे ही लड़को को ...सुनने वाले ने सुना और कहने वाले ने रामनरेश को भी बता दिया..बात रामनरेश और उनकी बीवी के दिल पर लग गयी ।दोनो खामोश हो गये पर बेटियों ने देखा उस रात मां बाप दोनो को अकेले में रोते हुए ।
मकान बनना शुरू हो गया उन दिनों सिमेंट ब्लैक में मिलती थी ।..इसलिये लोग सिमेंट का कम इस्तमाल करते थे ज्यादा काम गारे यानि मिट्टी से ही होता था चुनाई गारे की ही कराई जाती थी । बड़ी दोनो लड़किया स्कूल जाने लगी थी रामनरेश दोनो को स्कूल छोड़ने के बाद खुद भी पढ़ाने चले जाते थे और उनकी पत्नी अपनी छोटी बेटी के साथ अपनी ज़मीन पर चली आती थी ... पर उनके ज़हन में हर बार अपने जेट की बात ध्यान आ जाती ..आंखे भर जाती है ..मन में कहती ऐ भगवान तुम ही इनको जवाब दो....
एक कमरा लैटरीन बाथरूम तैयार हो गया था। रामनरेश अपने घर शिफ्ट कर गये थे ।इस बीच इनकी बीवी भी गर्भवती हो गई थी । रामनरेश की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई थी ..घर, बच्चे,नौकरी,टूयशन और अब अस्पताल भी ।रामनरेश ने अपनी बहन की बेटी को बुलाना चाहा पर बड़े भाई का रौब ज्यादा था इसलिये बहन ने साफ साफ मना कर दिया ..पर रामनरेश को थोड़ी राहत ज़रूर मिली जब उनकी बीवी की बहन रहने आ गयी ।.चलो बच्चों को तो देख ही ले गी ।
मकान बनाने में काफी कर्ज़ चढ़ गया था । सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में ही बीवी को भर्ती कराया गया था ।सर्दी के दिन थे घर में इतनी ही रज़ाई थी की बच्चों को उढ़ाया जा सके ।इसलिये रामनरेश की पत्नी अस्पताल में बिछने वाली चादर से ही काम चला रही थी । नर्स ने उनको बात भी सुनाई क्यों बहन जब पैसे नही थे तो ये सब क्यो... रामनरेश की बीबी कुछ नहीं बोली बस चुप होकर रहे गयी और एक दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ ऊपर की तरफ देखा .. कुछ दिन के बाद उनके घर में एक लड़का हुआ जिसका नाम रखा नाम ...विजय... जो कभी भी न हारे....

क्या रामनरेश के ग़म विजय के बाद कुछ कम होगे.. कैसे कटेगी आगे की ज़िन्दगी.बताऊंगा ..अगले भाग मे.....तब तक अपने विचार भेजते रहिये.....

Friday, November 14, 2008

71 साल

भाग -1

रामनरेश अपने बेटे के साथ कार में बैठे एक रशितेदार के घर जा रहे थे..तभी बराबर से गुज़रते हुए एक ऑटो पर उनकी नज़र पड़ी, एक विवाहित जोड़ा उनके पास से गुज़रा .. और रामनरेश खो गये अतित में.. जब उनकी नई नई शादी हुई थी ।बहुत बड़ा कदम था .क्योकि वो अपने खानदान में पहले ऐसे शख्स थे जिन्होने अपने खानदान से अलग शादी की थी सब ने साथ छोड़ दिया था सिर्फ एक बहनोई ही उनके साथ थे
..इंगलिश में एम.ए किया था इस लिये अमरोह के मुस्लिम स्कूल में उन्हे नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नही हुई।प्रिसिपलसाहब अच्छे थे और उनको अच्छी सलाह दी और बीएड करने को कहा, मुरादाबाद के हिन्दू कालेज से बीएड किया ...उसी दौरान उनके घर में एक रोशनी आई बेटी के रूप में कहते हैं लड़की लक्ष्मी का रूप होती है ... पर रामनेरश के घर में खर्च बढ़ गया जिसके कारण उन्हे और मेहनत करनी पड़ी । देर रात तक टूयशन पढ़ाने पड़ रहे थे जिसकी वजह वो स्कूल रोज़ देर से पहुच रहे थे ।पसंद करने वाले प्रिंसिपल भी अमरोह छोड़ कर दिल्ली बस गये थे । इसलिये पहले उन्हे नोटिस मिला लेकिन पैसे की ज़रूरत ने नोटिस के डर को भगा दिया ..वो टूयशन बन्द न कर पाये और नौकरी खो बैठे ।
बीबी ने कहा क्यो नहीं दिल्ली जा कर प्रिसिपल से बात करते छोटे शहर से बड़े शहर में आना एक आम आदमी में वैसे ही खौफ पैदा कर देता ,लेकिन परिवार चलाने के लिए अपनी औलाद को पालने के लिए इंसान हर कदम उठाने को तैयार हो जाता है । रामनरेश भी दिल्ली आ गए सच सच प्रिंसिपल साहब को बताया ..उनके सरल स्वभाव से वो पहले से प्रभावित थे ....इसलिए कहा की देखता हूं रामनरेश ने कहा उनके पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि वो वापस जा सके ... प्रिसिपल साहब ने पैसे दिये और कहा जल्दी सूचित करेगें..
घर में टूयशन से जो पैसे आते वो इतने नहीं थे कि ज़िन्दगी चल सके... घर का किराया ,राशन, बच्ची का दूघ..ज़िन्दगी में दुख भरने के लिए काफी थे ।...और जब दुख शुरू होते है ...तो वो बस आने शुरू ही हो जाते है ... पत्नी को ब्लड प्रेशर हो गया लो दवाई का खर्च और ..साथ ही मदद करने वाले जीजा ने अपने बच्चे भी भेज दिये, एक खत के साथ भाई रामनरेश ये यहां पढ़ नही पा रहे कृप्या कर के साथ रख लो .तुम्हारे साथ रहे कर पढ़ लेगें ... पढ़ तो लेगे पर खायेगे क्या ...रामनरेश ने सोचा.....
लेकिन अगर आपकी नियत सही है तो अल्लाह भगवान आपकी मदद ज़रूर करता है ...दिल्ली से प्रिसिपल साहब ने सूचना भेज दी ..जल्दी से दिल्ली पहुचे एक सरकारी ऐडीड स्कूल मे नौकरी मिली अमरोह मे काफी कर्ज़दार हो गए थे ...शुरू की पगार उसी में चली गई...दिल्ली में एक भाई भी आ गया..मिल कर एक माकान ले लिया.. काफी समय गुज़र गया था इस दौरान रामनरेश के घर दो और बेटियों ने जन्म ले लिया था ... ज़िन्दगी तो बहुत कुछ दिखाती है ,सपनो से आस, गैरों से उम्मीद ,खून से दगा और घर में औरतो का झगड़ा ..
आये दिन रामनरेश की बीबी और भाभी का झगड़ा होने लगा ..हर बात से बात बढ़ने लगी ... अंदर इतनी खटास भर गई की दोनो को एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा न रहा ।..बीच बचाव के लिए बिरादरी को बुलाया गया भाई के पास पैसा था, मकान भी उसी के नाम पर था भले ही उसमें पैसे रामनरेश के लगे थे पर मकान रामनरेश को ही खाली करना पड़ा ...साथ ही खाली हो गया विश्वास ... यहीं से शुरू हुई राम नरेश की एक नई जंग...ये बात 1974 की है.....

इस जंग से कैसे जीते राम नरेश ..और क्या हाल है राम नरेश का बताऊंगा दूसरी पोस्ट में.. तब तक अपने विचार भेजते रहिए...

कुछ यादे...शायरों के नाम...

कुछ यादे....

बेहतरीन शायरी....

हर दर्द,हर मरज़ की दवा है तुम्हारे पास ।
आते हैं सब यहीं कि शफा है तुम्हारे पास ।।
बीमारे ग़म हैं,दूर से आये हैं सुनके नाम ।
कहते हैं दर्दे-दिल की दवा है तुम्हारे पास।।
.....
वो अक्स अपना आईने में देखते हैं ।
सितम आज उन पर नया हो रहा है ।।
मैं खामोश बैठा हूं उस बुत के आगे ।
निगाहों में मतलब अदा हो रहा है ।।
.....
ज़ाहिदों को किसी का खौफ नहीं ।
सिर्फ काली घटा से डरते हैं ।.
चाहे तुम हो या नसीब अपना ...
हम हर एक बेवफा से डरते हैं....
....
क्या खबर कैसे मौसम बदलते रहे ।
धूप में हमको चलता था चलते रहे ।।
शमा तो सिर्फ रातों को जलती है ।
औऱ हम हैं कि दिन रात जलते रहे ।।
....
तुम न आये तो क्या सहर न हुई ।
हां मगर चैन से बसर न हुई ।.
तुम भी अच्छे ,रक़ीब भी अच्छे ।
मैं बुरा था ,मेरी गुज़र न हुई ।।

Friday, November 7, 2008

मै सीख गया...

सीख गया.....
सुबह सुबह उठ कर जब दात मांज रहा था ।तभी शीशे पर नज़र पड़ी एक चेहरा दिखा ध्यान से देखा तो समझ में आया की ये तो मैं ही हूं... आज मेरी हल्की सी दाढ़ी बड़ी थी और उसमें मुझे तीन चार सफेद बाल दिखे... एकदम सन हो गया मै... क्या ज़िन्दगी का इतना लंबा सफर तय कर लिया मैने...

कल की बात लग रही है.... जब घर में आया एक मेहमान अपनी शेविंग किट भूल गया .और मैने स्कूल से आते ही उसकी सारी क्रिम लगा कर शेव करने की कोशिश की थी । तब मेरे चेहेरे पर एक बाल नही था उस वक्त उम्र भी तो 10 साल की थी। .. सब कितना हंसे थे .. उस शीशे के चेहरे से इस शीशे के चेहरे तक आने में 23 साल गुज़र गये ..बदल गया बहुत कुछ ,छूट गये बहुत से लोग.टूट गये कई रिश्ते ...हर बात सुनने वाली मां नही रही ,मोहब्बत करने वाली प्रेमिका भी चली गयी ... मुझको समझने वाले दोस्त भी व्यस्त और दूर हो गये.. रहा तो सिर्फ मै और मेरे सपने..

एक साधारण से परिवार में जन्म लेने के बाद हर लड़के का सपना होता है कि वो जल्दी से सैटल हो जाये थोड़ा पैसा आ जाये कुछ नाम हो जाये यही सोच कर मैने भी अपनी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाया ...

डॉक्टर ,इंजीनियर ,सी.ए ,सीएस सब में कोशिश की फिर रंग मंच से जुड़ा मीडिया का कोर्स किया ...सन 1999 आ चुका था ।दोस्त से एक नौकरी की अर्ज़ी लिखवाई .और फिर एक मीडिया हाउस में ट्रेनिंग शुरू की .. और साथ ही शुरू हुआ सपने और हकीक़त का सफर...
सुना था की टेलीविज़न में बहुत पैसा है .. घर वाले भी खुश थे और दोस्त भी अब हम और हमारा लड़का अमीर हो जायेगे ..घर में खुशियां, नौकरी मिल गयी है, अरे टीवी में बहुत पैसा है ..भई सही लाइन पकड़ी तुमने.. सारी बाते मैं सुनता था और एक दबी ख़िसयाई हुई हंसी हसता। क्योंकि मुझे अपनी हैसीयत के बारे में पता था मेरी पगार मात्र 12,00 रूपये थी जिसे दुनिया को मैने 3500 रूपये बताया ..झूठ बोलना, यही मेरा टीवी का पहला पाठ था जो जितनी कुशलता से इसे अदा करता है वो ही सफल होता है ये मैं सीख चुका था ।
पर राह आसान नहीं थी सर पर निर्देशक बनने का जुनून था जिसे क्रेटीव काम कहते हैं वो करना चाहता था । कॉलेज में कविता और नाटक करता था इसलिये लगता था की मझसे ज्यादा कौन क्रेटीव हो सकता है ... पर ज़मीनी सच्चाई कुछ और थी..आप से बेहतर यहां भरे पड़े हैं लोग... इसलिये प्रोडक्शन का काम करना शुरू किया.. प्रोडक्शन भी बहुत बड़ा क्षेत्र है .. एक संगीत के कार्यक्रम में लोगो का बुलाना प्रोग्राम के बैनर पोस्टर लगाना और प्रतियोगियो को ढूढ़ना.... चुनना नही...फिर जो जीत जाये उसके घर इनाम पहुचाना ... ये था पहला प्रोडक्शन का काम ...पर रिशतेदारों और दोस्तों में बड़ी लैट थी क्योंकि टीवी में नाम आता था। करता क्या हूं, मिलता क्या है क्रेडीट रोल में नाम देख कोई कुछ नही पुछता...
अपने को दिलासा देता रहा की अभी तो सीख रहा हूं..और ये सीखना कई साल तक जारी रहा ...जब भी पैसे बढ़ाने की बात होती तभी मैडम कहे देती अभी तो ये सीख रहा है .. कोई ज़िम्मेदारी की बात होती तब भी कहा जाता अभी नहीं आप को बहुत कुछ सीखना है ... मेरे एक दोस्त ने कहा यार कब तक सीखोगे बात दिल को लगी नौकरी छोड़ दी .. जब दूसरी जगह काम पर गया तो पता चला कि अब तक जो सीखा वो किसी काम का ही नहीं..अभी तो और बहुत कुछ सीखना है ... फिर जो सीखने का दौर शुरू हुआ वो अब तक खत्म ही नही हो रहा .. शेव करते हुए आफिस से फोन आगया ..आप कब तक आयेगें मैने बिना संकोच के कहा ,रास्ते में हूं ...जाम है.. जैसे ही खत्म हो गा पहुचता हूं.. फोन रखने के बाद मै मुस्कुराया और मन में कहा चलो ये तो मै सीख गया.....

Monday, November 3, 2008

या अल्लाह

थंब था मैं फिर भी थल पर न रूक सका
दिनकर था मैं फिर भी दाह से न बच सका
दुष्कर हो गया जीवन मेरा इन दिधार्थक बातों से
इस कलयुग के अंधकार में इन रण की रातों से.............

या अल्लाह….

शफीक मियां सुबह सुबह घर से उमदा कुर्ता पजामा पहन कर आफिस के लिये चल दिये । रास्ते में कई फोन आये... कोई बड़ा बदलाव आज होने वाला है इसकी उनको भनक पड़ चुकी थी ।लेकिन बदलाव क्या है इसका अंदाज़ा वो नहीं लगा पा रहे थे... शफीक मियां ने न्यूज़ चैनल में बहुत जल्दी तरक्की की ....
वैसे तो उनके पास पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था पर आजकल वो चैनल के कई दिग्गजो को पत्रकारिता के गुण सिखाते पाये जाते हैं.. क्योकि नौकरी में तरक्की इसलिये नहीं होती की आप बहुत काबिल है ..... आप कितने अपने बॉस के करीब है ये महत्वपूर्ण बात होती है ..और अपने सीनियर को कैसे शीशे में उतारना इसमे वो बहुत माहिर हैं...
आज क्या होगा इसी पशोपेश में है वो... एक सही बात आप को बताते चले शफीक मियां को बहुत ज्यादा उम्मीद है कि इस बार इनको कोई बड़ी ज़िम्मेदारी मिलने वाली है .. आखिर क्यों न मिले, हर काम .. जी हां ,बॉस के काम की बात हो रही है सब टाइम पर करवाया.. कई बार पार्टी भी दी ... शराब भी पिलाई.. रेलवे टिकट भी करवाया.. रिशतेदारों के बच्चो का सांसद से कहे कर दाखिला भी कराया...और भी बहुत कुछ.. जी ...कभी बॉस की बुराई नहीं सुनी सब जानते है वो सर के कितने करीब हैं ...
इन्ही सपनो के साथ वो दफतर पहुंच गये पर माहौल काफी संजीदा था हर आदमी कुछ न कुछ कर रहा था ...बॉस लापता हैं शफीक ने फोन मिलाया पर फोन बज कर खामोश हो गया ... शफीक मियां का चेहरा उतर गया..आने वाले बुरे वक्त का आभास हो चुका था । सोचा, अगर कुछ पहले पता होता तो दिवाली का डिब्बा तो सही जगह पहुचा देता ।

तभी बिग बॉस यानी कंपनी के मालिक आते हैं, साथ में तीन नये चेहेरे भी हैं। सब लोगो को बुलाया जाता और कहा जाता है आज से ये लोग चैनल चलाए गे ...
सब ताली से स्वागत करते हैं .. खिसयानी ही सही पर मुस्कुराहट सब के चेहरे पर थी ...तभी ज़ोर ज़ोर से ताली बजाते हुए शफीक मिया उन लोगो के एकदम करीब पहुच गये ,..... बड़े सम्मान के साथ मिले और अपना परिचय दिया ... सब ने देखा और सब मन में बोले या अल्लाह शफीक मिया जैसा हम को भी बनाए..........

bachpan

बचपन

अंबा का आचल छूटा
अंबरूह से अंबू रूठा...
उजबक बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

उछल कूद सब हो गये दूर
अकधक-अकबक छूटे यूं
अक्रिय बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

कुप्रवति से मैं हूं भरपूर
ओछापन है मुझ में यूं
कठपुतली बन कर रहे गया मै
जब से मेरा बचपन छूटा

दोस्त यार अभी भी हैं साथ
अब न उनमे है वो प्यार
बेगाना बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा..

Wednesday, October 29, 2008

मां

एक सच्ची कहानी ....
ममता के कहानी किस्से आपने ज़रूर सुने होगें मां की मोहब्बत बयां करना शयाद बहुत मुशकिल है ।पर आज बात उस मां की जिसने अपनी सात साल से मरी बच्ची को अपने कलेजे से लगा रखा है ।ये कोई कहानी नहीं, फसाना नहीं ये हकीकत है ...वो भी उस देश की जिसे अपने नियम कानून और व्यवस्था पर बहुत घमंड है ...
तकरीबन दस साल पहेले मिसेज़ फिलोरिडा एक अच्छे मुस्तकबिल के लिये अपने परिवार के साथ ब्रिटेन के लिये रवाना हुईं..अपने देश में सब कुछ सही पर फिर भी बुहत कुछ होता है जिसे सही करने की ज़रूरत होती है ... पति के साथ अपनी ज़िन्दगी की एक अच्छी शुरआत वो भी एक अमीर देश में शायद सब के नसीब में नहीं होता ...
सब कुछ सही था ..भगवान की मेहर थी .. जल्द ही उनके आगन में एक फूल खिला ..... जिसका नाम था सुनैना... सोचा था की सब की नैनो का तारा बनेगी ...उसकी बोली सब सुनेगें पर कुदरत के आगे किसकी चली ...भगवान को क्या मंजूर किसे पता ....
न जाने कौन सी तारीख़ थी कौन सा दिन था .. सुनैना की तबीयत बिगड़ गई...कुछ सोचने समझने का वक्त नहीं था जल्द ही उसे अस्पताल पहुचाया गया .. डॉक्टरों ने जांच शुरू की ..उसे भर्ती किया गया पर सुनैना की तबीयत बद से बदतर होती जा रही थी ...और दस दिन बाद उसकी मौत हो गयी....
ऐसा क्या हुआ जो सुनैना की तबीयत सुधर न सकी .. परिवार अपना आपा खो बैठा .. देखते देखते सजे हुये सपने बिखर गये .. ज़िन्दगी थम गयी ..ज़ाहीर है ऐसे में मां की क्या हालत होगी ... ये खुद ही समझ में आ गया होगा ...मिसेज फिलोरिडा अपना आपा खो चुकीं थी ... अस्पताल जल्दी जल्दी खानापूर्ति करने में लग गया ...जल्द ही नन्ही सी लाश को ,उनके हवाले करने के लिये आमादा हो गया ....
सुनैना की मां जानना चाहती थी की आखिर क्या हुआ उनकी बच्ची को ... वो पोस्टमार्टम कराना चाहती थी ...उस हकीक़त को जानना चाहती थी जिस वजह से उनकी सुनैना दुनिया से रूखसत हो गई ... पर हर जगह के कानून और नियमों के आगे भावनाए बड़ी बेमानी लगती है अस्पताल राज़ी नहीं हुआ कई नियमों का पाठ पढ़ा दिया गया ... पर मां ने भी फैसला कर लिया था कि जब तक जांच नहीं होगी, वो सुनैना को नहीं दफनाए गी ... एक लम्बी लड़ाई के लिये अपने को तैयार किया ..समाज से ठकराने के लिये अपने को मज़बूत बनाया .....नन्ही सुनैना को कई कैमिकल के सहारे रखा गया... पर कहा जाता है जब मुसीबत आती है तो हर तरफ से आती है ..और बार बार आती है .. अस्पताल मान गया, पोस्टमार्टम के लिये .. ये कुछ पल की तो जीत थी पर एक लंबे ..... संघर्ष की पहल . ....
पोस्टमार्टम में समान्य मौत बताई गई जिस पर विशवास कर पाना और मुश्किल था ... पराए देश में न्याय मिलना मुश्किल लग रहा था विकसित देश पर भरोसा कर के परिवार ने इंसाफ के लिये गुहार लगाई ।दूसरा अस्पताल चुना गया पोस्टमार्टम के लिये। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के बाद भी मां को करार नहीं मिला ... हार कर रुख़ किया हिन्दुस्तान का ... साथ में नन्ही सुनैना की लाश भी हिन्दुस्तान पहुचीं...
हर विभाग ने उम्मीद जताई पर .सुनैना की लाश फाइलों में कैद हो कर.. दफ्तरों के चक्कर लगा रही है .....आज भी मां लाश को महफूज़ रखे हुये है ......और इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है .........

दर्पण... एक पत्रकार का सच

एक पत्रकार की चाहत......

दर्पण....
उस दर्पण पर सर्मपित मैं
जो है हर भाव से परिचित
देखे जो खिलखिलाते चेहेरे
जाने कितने किस के मन हैं मैले ।
क्या राजा ..... क्या रंक.......
बदल न पाये कोई भी दर्पण के ढ़ंग
मैं भी दर्पण बनना चाहू
सब को उनका रूप दिखांऊ
फिर ये विचार अपने मन मैं लाऊं
बोले सभी कि दर्पण...कभी झूठ न बोले
पर अब तक उसके सच से कौन भला डोले..

Monday, October 27, 2008

गोली का जवाब गोली से....... ....

गोली का जवाब गोली से.......

अंधेरी से कुर्ला....
बस नबंर-332..
दिन सोमवार
तारीख़ 27 अक्तूबर 2008
वक्त सुबह के पौने नौ बजे
मुंबई का अंधेरी इलाका..

332 नंबर की बस सुबह करीब पौने नौ बजे अंधेरी से रवाना हुई ... कम लोग, सुबह की हवा और हल्की हल्की सूरज की रोशनी छनती हुई बस के शीशे से अंदर पहुंच रही थी ।...करीब सवा नौ बजे बस साकीनाका पहुंची... यहीं से सवार हुआ 23 साल का एक खूबसूरत नौजवान देखने में किसी भी फिल्म अभिनेता को पीछे छोड दे ।

नौजवान बस की पहेली मंज़ील मे सब से आगे जाकर बैठ गया ...तकरीबन 15मिनट बाद यानी 9 बज कर 27 मिनट पर जब बस बैलबाज़ार ,कुर्ला के सिगनल पर पहुंची तभी इस नौजवान का कंडक्टर से झगड़ा हुआ बात बढ़ी ..नौजवान उत्तेजित हो गया, कंडक्टर को बांधक बनाना चाहा, लोगों को धमकाया और कहा मैं किसी का कोई नुकसान नहीं करुंगा .. मैं बिहार से आया हूं मेरी राज ठाकरे से बात कराओ..

नौजवान ने बस को रिवॉव्लर की नोंक पर बंधक बनाने की कोशिश की ...सवार लोगों से मोबाइल मांगा .. बाहर के लोगो को चिल्ला चिल्ला कर अपने बारे में बताया ..तभी करीब पौने दस बजे पुलिस वहां पहुंच गयी, सीन पूरा फिल्मी था ..पुलिस कहती है कि उसे सरेंडर के लिये कहा गया.. पर उसने हवा मे चार बार गोलियां चला दी ।
पुलिस कहना है –सरेंडर से इंकार करने के बाद मुसाफिरों की जान बचाने के लिये उसके पास नौजवान को मारने के अलावा कोई और चारा नहीं था ....एंकाउंटर ज़रूरी था
23साल का नौजवान मर गया ... ये नौजवान पटना का राहुल था । हां, राहुल राज । चार भाई बहनों में तीसरे नम्बर का । राहुल पटना के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजूकेशन से एक्सरे में डिप्लोमा कर, एक अच्छे भविष्य की तलाश में इस महीने की 24 तारीख को मुंबई आया था ... शांत और सब की बात मानने वाले राहुल को क्या हो गया जो इसने ये रास्ता अपना लिया...
इलाको की लड़ाई का दर्द शायद कम हो जाता अगर महाराष्ट्र के गृहमंत्री का बयान न आता ... कैसे आर आर पाटिल के मुंह से निकला की गोली का जवाब गोली है ...
क्या अब इसको नियम बना लिया जाये ...
नितिश कुमार कहते हैं कि राहुल को बचाया जा सकता था ।लालू यादव कहते हैं कि ये हत्या है।रामविलास कहते हैं कि सोते शेर को जगाया जा रहा है । लेकिन उस पीड़ा की बात कोई नहीं कर रहा है जो एक हिन्दुस्तानी अपने ही देश के अलग राज्यों में सहता है । कहीं हम फिर 84 और 92 के बाद जो नतीजे सामने आये उस ओर तो नहीं बढ़ रहे.. सब मराठी एक सी भाषा बोलते है चाहे ......बालठाकरे ,राजठाकरे ,राणे हो या फिर पाटिल
तो फिर पूरा देश एक भाषा बोलने के लिये क्यों नहीं उठता ..
कल फिर 332 नंबर की बस चलेगी, लेकिन उस पर सवार लोग हर चढ़ने वाले को देख कर यही सोचेगे की कहीं ये भी, राहुल राज तो नहीं ...

Friday, October 24, 2008

अच्छा हुआ … जो पिटे....

अच्छा हुआ … जो पिटे....
बिहार जाने वाली या बिहार से गुज़र के जो ट्रेन जाने वाली थी सब को रद्द कर दिया गया....। स्टेशन में भीड़, लोग बेहाल परेशान, कहां जायें, कैसे पहुचें कुछ पता नहीं .... रमेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ट्रेनें क्यों नहीं चल रही ... उसने झुंझलाते हुये पुछा क्या हुआ ट्रेनों को क्यों नही चलाया जा रहा ....किसी ने बताया अरे भई वहां आंदोलन चल रहा है ट्रक जाम हैं सड़कों पर लोग है सब तरफ अफरातफरी है ...दुकाने जलाई जा रही है सरकारी संपत्ति का नुकसान किया जा रहा है ... बहुत ज़बरदस्त आंदोलन है .....25 तारीख़ को पूरा बिहार बंद होगा ...
रमेश ने पुछा क्यों भई क्यों ... लोगो ने कहा अरे तुम कहा से आये हो, देश में कितना कुछ हो गया और तुम कहते हो क्यों ... राज .... राज ठाकरे के लोगों ने महाराष्ट्र में परीक्षा देने गये, बिहार के छात्रों को मार-मार कर भागया, बहुत पीटा ...उसी के विरोध में ये सब हो रहा है ...
रमेश के लिये ये सब नया था ... उसने कहा, पर अगर ये सब मुंबई में हुआ, वहां के लोगो ने किया तो उसका विरोध बिहार में प्रदर्शन कर के अपने ही लोगो की दुकाने जला के ..अपने ही प्रदेश का नुकसान करके कैसा आंदोलन, कैसा बदला ... लोग नाराज़ हो गए, बोले अरे तुम समझे नहीं ...ऐसे ही नेताओं की नींद टूटेगी ...कितनी उम्मीद से इतने सारे अलग अलग पार्टियों के बाशिंदों को संसद भेजा है हमने ...उनका कोई फर्ज़ है या नहीं ... बहस गंभीर होती जा रही थी ,,,, पर हर बार नींद तोड़ने के लिये अपना नुकसान करना कहां की समझदारी ... अगर आंदोलन करना है और हिम्मत है , तो क्यों नहीं महाराष्ट्र चले जाते हैं.. ट्रेनों में भर कर, वहां करे आंदोलन, अपने ही राज्य में करने का क्या फायदा ...और इनके मारे पूरा देश क्यों परेशान हो । राज ने किया उसे जेल हुई उसके कार्यकर्ता पकड़े गये .. सब ने निंदा की पर ये जो कर रहे हैं ये कौन सी समझदारी है ... मैं यही कहूगां, पिट के भी नहीं सुधरे बिहारी ... लोग भड़क गये पर दिल्ली था इसलिये रमेश बच कर निकल गया ... पर आंदोलन का मकसद वो समझ नहीं पाया ...

Tuesday, October 21, 2008

आस

आस

वो जो खुशियों का एक दीपक बन कर
मेरी ज़िन्दगी में आया था ।
शायद कल्पनाओं का एक साया था
भूल गया था मैं जिन्दगी के ....
हर दुख़ ,हर ग़म ,हर तंनहाई....
अंजान कर दिया था ....
उसने मुझे ग़मों से, परिचित कर दिया था
उसने मुझे गैरो से
कितना खुशनुमा झोका बन कर आया था ......

लेकिन जीवन केवल सुखों का पल थोड़ी है
जब चाहा मैने अपनाना उसे ....
मन के एक कोने चाहा बिठाना उसे
दूर बहुत दूर चला गया वो ....
मुस्कुराहट भी मेरी साथ ले गया वो ...
कितना रोया कितना छटपटाया था मैं...
शायद कभी तो हाथ आयेगा वो ...

लेकिन उसे न आना था न ही वो आया था
वो तो एक साया था ... हां वो तो एक साया था ....

मेरा मन ही पागल था जो उसे पकड़ने को भरमाया था
क्या कभी समुद्र की लहरों से रेत के घरौंदे बचे
या फिर कभी सपने भी हक़ीक़त हुये हैं
तो फिर साया कैसे हाथ आता ...
हां वो सिर्फ साया था .. सिर्फ साया था ... साया ही था



पर ज़िन्दगी नहीं मानती हम नहीं रुकते हम साये के साथ ही जीते है सपनों मे ही रहते हैं ... जानते हुये भी उसी ओर चलते है जिस तरफ मंज़िल का कोई नामोनिशान नहीं ... क्यो ...भला क्यों ....

शायद एक आस के लिये ... आस हां उम्मीद... यही ज़िन्दगी है ....
आज बस इतना ही .... कल शुरू करेगें एक नई कहानी.....

Thursday, October 9, 2008

कैसे जीतता है सच में सच.....

कैसे जीतता है सच में सच.....

इस बार न जाने क्यों जलते हुये रावण को देख कर मेरी आंखों से जो आंसू निकले तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे । एक के बाद एक घटना याद आने लगी कुछ लोग, कई पुराने साथी सब नज़रों के सामने थे ।जैसे जैसे रावण जल रहा था । वैसे वैसे मेरा मन डूब रहा था ।लोग जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे पर मेरे कानों में न जाने कौन सी आवाज़ आ रही थी ।आग की रोशनी मुझे डरा रही थी। मुझे दिख रहे थे वो लोग जो मेरे करीब थे पर अब मुझसे बहुत दूर हैं । मैं रावण को हमेशा दूर से ही देखता हूं शायद इसलिये कि सच को जीतते हुये देखना बहुत मुश्किल है ।

मुझे तो याद नहीं की सच पहली और आखिरी बार कब जीता था । हां बचपन से सुनता आ रहा हूं कि हमेशा सच बोलो सच का साथ दो सच ही जीतता है ... पर जब तक ये जीत आती है तो जीतने का दिल ही नहीं चाहता क्योकि ये जीत हमसे बहुत कुछ ले चुकी होती है ।

आज मै रोया इसलिये नहीं कि मुझे रावण से प्यार है ।प्यार मुझे कैसे हो सकता, किसी बुरे आदमी से कोई कैसे प्यार कर सकता है। चाहे वो रावण के रूप में हो या आतंक.... खैर छोडिये मुझे तकलीफ इस बात की मुझे कोई राम क्यों नही मिल रहा है क्योकि मेरा रावण रोज़ मुझ पर हंस रहा है और कह रहा है कि देखता हूं कैसे जीतता है सच में सच........

Monday, September 29, 2008

this saturday

लो शनिवार है हम तैयार है

शुक्रवार की शाम से विनिता काम मे लग गई इस बार न जाने शनिवार को कहां बंब फटे। पिछली बार काफी बातें सुनने को मिली थी कि यार तुम ये कर देती शॉटस कुछ ज्यादा बड़े बनवा देती पीछे आने वाली एंम्बियंस को उठा देती ।इस बार कोई चूक नहीं होगी नई नौकरी है अपने को प्रुफ करने का आतंकवादियों ने सही मौका दिया है । उसने तैयारी पूरी कर ली थी उसने पता लगा लिया है शनिवार को कौन कौन से रिपोर्टर की शिफ्ट लगी है और कौन से एंकर आफिस के पास रहते हैं। उसे योगेश का बोलने का तरीका, शब्दों के उच्चारण से काफी अपत्ति थी सोचा की उसे बदलवा दूं फिर मन ने कहा क्यो किसी विवाद में पड़ना है वैसे भी हिन्दी चैनलों में किस की भाषा सही है पर एक बात माननी होगी कि योगेश बाइट सब से पहले लेकर आता है टीवी में तो जो दिखता है वो ही बिकता है । ज्यादातर ब्लास्ट के वक्त विसुवल आने मे देर लगती है इसलिये ग्राफिक्स की भूमिका काफी बड़ जाती है । अगर ग्राफिक्स दमदार हुये तो दर्शक आप के चैनल पर थोड़ी ज्यादा देर टिके रहेगे।
इस बार अनिमेतद ग्राफिक्स बनवाये गी बस एसे की उस पर ब्लास्ट की जगह लिख दी जाये दिल्ली हो, बनारस हो, जयपुर, इस्लामाबाद या फिर ग्लासगो सब में चल जायेगा । ब्रेकिग न्यूज़ के वक्त आप के पास कितनी ज्यादा जानकारी है इसका काफी महत्व पड़ता है जैसे ब्लास्ट मे मरने वाले लोग , घायलों की संख्या, किस अस्पताल में भर्ति कराया गया इसके बाद ब्लास्ट का तरीका किस संगठान का हाथ पुलिस कमिशनर और गृहमंत्री के ब्यान प्रधानंमंत्री ,मुख्यमंत्री ,विपक्ष के नेता का दौरा कुछ बात और फिर बात से विवाद बाद में विवाद का विस्तार और फिर पूरा देश हुआ शर्मसार ये सब इस बार इसने बनवा कर रख लिया था क्योकि वो समझ गयी थी इससे बाहर और कुछ नहीं है ये उसके सिनियर शुशांत जो पिछले काफी सालो से धमाके देख रहा है उसने बताया था ।सांउड इफैक्ट और म्युज़िक पर ज्यादा ध्यान देना होगा । ऐसी आवाज़ कि बाहर गुज़रने वाला आदमी एक बार तो रुक कर ख़बर पर रूख़ कर ही दे । विनिता को जो बात खटक रही है वो कल डेस्क पर असग़र और अमर की मौजूदगी दोनो लिखते तो अच्छा हैं पर सोचते एकदम जुदा है। उसने सुना है कि पत्रकार का कोई धर्म नहीं होता पर सुनी हुई बात पर कोई कैसे विश्वास करे.... खैर छोड़िये
इस बार बंब की पूरी तैयारी है तो आने दिजिये शनिवार हम हैं तैयार.....

Sunday, September 28, 2008

बोम्ब फटा

फिर क्यों नही फटा बम्ब

बम्ब फटा और धंधा शुरु हो गया हर तरफ से कलम काग़ज़ माइक कैमरा लेकर देश के सिपाही निकल पड़े सब एक से बड़ कर एक हर एक के पास अपनी दलील अपने विचार सब आतंकवाद के खिलाफ पर आंतकवादी के कारनामों से परिचित सब चाहते की कोई बेगुनाह को सज़ा न हो और कोई आंतकवादी भी न बचे आंतकवाद क्यो पंपा इस पर बहस हुई बटला हाउस मे क्या हुआ इस पर कहानी रची गई जामिया क्यों अपने बच्चों का बचाव कर रहा इस पर चर्चा हुई शिवराजपाटिल ने कितने सूट बदले सब को दिखाया गया लो फिर बंब फटा और धंधा शुरू हो गया
चम्चों का कभी काम चल गया सर क्या स्टोरी लिखी सर क्या ब्लाग में लिखा आप ही लिख सकते है साथ में अपनी भी एक थियोरी पेल दी बंब निरोधक दस्ते में लो वो शामिल हो गये आंतकवाद के खिलाफ उन्होने भी आवाज़ उठा दी
लो बंब फटा फिर धंधा शुरू हो गया
यही मौका था करियर की शुरूआत थी बंब से ज़ोरदार और कौन सी स्टोरी हो सकती है खून से ज्यादा और कौन छाप छोड़ सकता है रोती हुई औरतों से ज्यादा अच्छी तस्वीरे कौन पेश कर सकता है ... ये सब करना है क्यो कि आखिर में मुझे सुनना है वाह भाई ब्लास्ट क्या आपने दिखाया

फिर बम्ब फटा और धंधा शुरू हो गया ।

Saturday, September 27, 2008

लो वक्त आगया

रूपये 4200

रात भर की बैचेनी सुबह मुसीबत बन गई हीरा लाल सुबह पूजा से पहले ही ज़मीन पर गिर पड़े पड़ोस में रहने वाले आज़म को बुलाया गया जल्द ही कस्बे के अस्पताल मे ले जाया गया वहां से ज़िला अस्पताल पहुंचाया गया, दिल्ली में उनके बड़े भाई को भी इत्तिला कर दी गई सब पहुच गये ।बात आपरेशन की हुई ब्रेन हमरेज हुआ था खर्चे पर सबने एक दूसरे का मुंह देखा अगर हीरालाल ठीक होकर कर्ज़ा लौटने की हैसीयत रखते तो कोई भी पैसे लगा देता पर सब हकीक़त जानते थे इसी लिये सब ने पिंड छुड़ाया और दिल्ली के सरकारी अस्पताल में ले जाने को कहा बड़े भाई ने भी दुनियादारी में हां कहा एम्बुलेंस की गई ।हीरालाल की ज़िन्दगी से ज्यादा सब को अपना जीवन चलाने की चिंता हो गयी कहां से कैसे और किस तरह से क्या किया जाये गा यही सोच रहे थे हीरा लाल के भाई अपने साले को फोन किया कहा कुछ हो सकता है साले ने अपने दोस्तों को फोन किया क्या कुछ कर पाऊगे दोस्तों ने अपने जुगाड़ लगाये की सर कर दो हमारे दोस्त का अज़ीज़ है मैने कभी अपने लिये तो कुछ नहीं कहा .. हीरा लाल दिल्ली आ गये किस्मत से दाखिला भी हो गया .
रात को हीरा लाल के भाई का साला भी आगया तभी डाक्टर ने कुछ टेस्ट बता दिये फिर बात पैसो पर थी पर साथ ही रिश्तो की शर्म भी थी कैसे और किससे साले ने पर्चा ले लिया कैमिस्ट की दुकान पहुचा समान लिया बिल 4200 का बना बिल देते वक्त उसने कहा चलो इससे ज्यादा कोई और क्या करेगा ।

Sunday, September 21, 2008

ये मुजाहिदीन नहीं

ये मुजाहिदीन नहीं

आज दिल्ली में इंडिया गेट पर मुस्लिम संगठ हाथों में बैनर पोस्टर लिये खामोशी से आंतकवाद का विरोध करने के लिये इकठ्ठा होये। सब के लब बंद थे और ज़हन में कई सवाल धूम रहे थे। सोच रहे थे की ये दशहतगर्द किस इस्लाम और किस मुस्लमान की पैरवी कर रहे है ये वो मज़हब के मानने वाले तो नहीं जो कुरान पर इमान लाये थे। हमने वहां मौजूद फैजान नक़वी से पूछा की आंतकवादी अपने को मुजाहिदीन कहते है क्या ये सही है उन्होने बिना रुके कहा की मुजाहिदीन कभी भी बच्चे और औरतों को निशाना नहीं बनाते और इस्लाम को मानने और अपने को मुस्लमान कहने वालों को रमज़ान के महिने का भी ख्याल नहीं आया ।
आज चंद लोगों की वजह से एक पूरी कौम कटघरे में खड़ी है ये दाग जो लगा है न जाने कभी मिटेगा भी या नहीं... क्या ये मुजाहिदीन हैं ........

Saturday, September 20, 2008

समय दो

आज दफ्तर का माहौल कुछ अजीब सा था हर आदमी अपने में व्यस्त था
किसी के पास समय नही था हर काम वो समय से पहले करना चाह रहा था
तभी मुझे ....
अपनी एक पुरानी कविता याद आई
मुझे कुछ और समय़ दो , मुझे कुछ और समय दो
मेरे जीवन की लौ को य़ूं न बुझने दो मुझे कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरी आँख के आसू
आँख मे ही अटके हैं
उसको धरती पर तो गिरने दो
मुझे अभी कुछ और समय दो
कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरे कानो में आज़ान भी नही गई है
अभी तो मेरे मुंह से राम का नाम भी नही निकला है
मुझे राम और रहीम का कुछ तो जान ने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
अभी तो मुझे ममता की बांहे भी नही मिली हैं
अभी तो मैंने माँ के दूध का स्वाद भी नही लिया है
मुझे ममता की आगोश में कुछ पल तो रहने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
यह कविता थी इस लिए समय मांगने की हिम्मत जुटा ली
पर ज़िन्दगी में एक बार समय गुजर जाता है वो फिर कोई नही देता , ये मैंने इस कविता के लिखने के दस साल बाद जाना। शायद आपने भी अपने गुजरे हुए वक्त के पन्नो से ज़रूर कुछ समझा होगा। आज बस इतना ही.
मुझे कुछ औऱ समय दो

Friday, September 19, 2008

आज वक्त है

वक्त है

आज वक्त है तो इस लिये लिख रहा हूं और इसीलिये ही अपने ब्लॉग का नाम भी वक्त रखा है। अगर आप के पास वक्त हो तो पढ़ना और नहीं हो तो, जब हो तो ,तब पढ़ लेना हर काम जिन्दगी मे तब किया या ये कहूं की सारे काम तब हुये जब वक्त निकल गया स्कूल में पढाई समझ में नहीं आई, आई भी तो बस इतनी की पास होने के नम्बर मिल जाते जब धीरे धीरे नम्बर का महत्व समझता तब तक वक्त निकल चुका था। कॉलेज में गर्ल फ्रंड और बाईक पाने की इच्छा हुई जब तक इच्छा पूरी करने के लिये जोड़ तोड़ करता तब तक जवानी बस में गुज़र गई और गर्लफ्रंड के नाम पर बीवी आ गयी । ये अभी शुरूआत है मेरी तरह ज़रूर बहुत से लोग होगे जिन्होने ने वक्त पर कभी कोई काम नही किया होगा या जिनका कोई काम कभी वक्त पर नहीं हुआ होगा आज हम शुरू करेगें वक्त है तो करेगें.....