Monday, September 29, 2008

this saturday

लो शनिवार है हम तैयार है

शुक्रवार की शाम से विनिता काम मे लग गई इस बार न जाने शनिवार को कहां बंब फटे। पिछली बार काफी बातें सुनने को मिली थी कि यार तुम ये कर देती शॉटस कुछ ज्यादा बड़े बनवा देती पीछे आने वाली एंम्बियंस को उठा देती ।इस बार कोई चूक नहीं होगी नई नौकरी है अपने को प्रुफ करने का आतंकवादियों ने सही मौका दिया है । उसने तैयारी पूरी कर ली थी उसने पता लगा लिया है शनिवार को कौन कौन से रिपोर्टर की शिफ्ट लगी है और कौन से एंकर आफिस के पास रहते हैं। उसे योगेश का बोलने का तरीका, शब्दों के उच्चारण से काफी अपत्ति थी सोचा की उसे बदलवा दूं फिर मन ने कहा क्यो किसी विवाद में पड़ना है वैसे भी हिन्दी चैनलों में किस की भाषा सही है पर एक बात माननी होगी कि योगेश बाइट सब से पहले लेकर आता है टीवी में तो जो दिखता है वो ही बिकता है । ज्यादातर ब्लास्ट के वक्त विसुवल आने मे देर लगती है इसलिये ग्राफिक्स की भूमिका काफी बड़ जाती है । अगर ग्राफिक्स दमदार हुये तो दर्शक आप के चैनल पर थोड़ी ज्यादा देर टिके रहेगे।
इस बार अनिमेतद ग्राफिक्स बनवाये गी बस एसे की उस पर ब्लास्ट की जगह लिख दी जाये दिल्ली हो, बनारस हो, जयपुर, इस्लामाबाद या फिर ग्लासगो सब में चल जायेगा । ब्रेकिग न्यूज़ के वक्त आप के पास कितनी ज्यादा जानकारी है इसका काफी महत्व पड़ता है जैसे ब्लास्ट मे मरने वाले लोग , घायलों की संख्या, किस अस्पताल में भर्ति कराया गया इसके बाद ब्लास्ट का तरीका किस संगठान का हाथ पुलिस कमिशनर और गृहमंत्री के ब्यान प्रधानंमंत्री ,मुख्यमंत्री ,विपक्ष के नेता का दौरा कुछ बात और फिर बात से विवाद बाद में विवाद का विस्तार और फिर पूरा देश हुआ शर्मसार ये सब इस बार इसने बनवा कर रख लिया था क्योकि वो समझ गयी थी इससे बाहर और कुछ नहीं है ये उसके सिनियर शुशांत जो पिछले काफी सालो से धमाके देख रहा है उसने बताया था ।सांउड इफैक्ट और म्युज़िक पर ज्यादा ध्यान देना होगा । ऐसी आवाज़ कि बाहर गुज़रने वाला आदमी एक बार तो रुक कर ख़बर पर रूख़ कर ही दे । विनिता को जो बात खटक रही है वो कल डेस्क पर असग़र और अमर की मौजूदगी दोनो लिखते तो अच्छा हैं पर सोचते एकदम जुदा है। उसने सुना है कि पत्रकार का कोई धर्म नहीं होता पर सुनी हुई बात पर कोई कैसे विश्वास करे.... खैर छोड़िये
इस बार बंब की पूरी तैयारी है तो आने दिजिये शनिवार हम हैं तैयार.....

Sunday, September 28, 2008

बोम्ब फटा

फिर क्यों नही फटा बम्ब

बम्ब फटा और धंधा शुरु हो गया हर तरफ से कलम काग़ज़ माइक कैमरा लेकर देश के सिपाही निकल पड़े सब एक से बड़ कर एक हर एक के पास अपनी दलील अपने विचार सब आतंकवाद के खिलाफ पर आंतकवादी के कारनामों से परिचित सब चाहते की कोई बेगुनाह को सज़ा न हो और कोई आंतकवादी भी न बचे आंतकवाद क्यो पंपा इस पर बहस हुई बटला हाउस मे क्या हुआ इस पर कहानी रची गई जामिया क्यों अपने बच्चों का बचाव कर रहा इस पर चर्चा हुई शिवराजपाटिल ने कितने सूट बदले सब को दिखाया गया लो फिर बंब फटा और धंधा शुरू हो गया
चम्चों का कभी काम चल गया सर क्या स्टोरी लिखी सर क्या ब्लाग में लिखा आप ही लिख सकते है साथ में अपनी भी एक थियोरी पेल दी बंब निरोधक दस्ते में लो वो शामिल हो गये आंतकवाद के खिलाफ उन्होने भी आवाज़ उठा दी
लो बंब फटा फिर धंधा शुरू हो गया
यही मौका था करियर की शुरूआत थी बंब से ज़ोरदार और कौन सी स्टोरी हो सकती है खून से ज्यादा और कौन छाप छोड़ सकता है रोती हुई औरतों से ज्यादा अच्छी तस्वीरे कौन पेश कर सकता है ... ये सब करना है क्यो कि आखिर में मुझे सुनना है वाह भाई ब्लास्ट क्या आपने दिखाया

फिर बम्ब फटा और धंधा शुरू हो गया ।

Saturday, September 27, 2008

लो वक्त आगया

रूपये 4200

रात भर की बैचेनी सुबह मुसीबत बन गई हीरा लाल सुबह पूजा से पहले ही ज़मीन पर गिर पड़े पड़ोस में रहने वाले आज़म को बुलाया गया जल्द ही कस्बे के अस्पताल मे ले जाया गया वहां से ज़िला अस्पताल पहुंचाया गया, दिल्ली में उनके बड़े भाई को भी इत्तिला कर दी गई सब पहुच गये ।बात आपरेशन की हुई ब्रेन हमरेज हुआ था खर्चे पर सबने एक दूसरे का मुंह देखा अगर हीरालाल ठीक होकर कर्ज़ा लौटने की हैसीयत रखते तो कोई भी पैसे लगा देता पर सब हकीक़त जानते थे इसी लिये सब ने पिंड छुड़ाया और दिल्ली के सरकारी अस्पताल में ले जाने को कहा बड़े भाई ने भी दुनियादारी में हां कहा एम्बुलेंस की गई ।हीरालाल की ज़िन्दगी से ज्यादा सब को अपना जीवन चलाने की चिंता हो गयी कहां से कैसे और किस तरह से क्या किया जाये गा यही सोच रहे थे हीरा लाल के भाई अपने साले को फोन किया कहा कुछ हो सकता है साले ने अपने दोस्तों को फोन किया क्या कुछ कर पाऊगे दोस्तों ने अपने जुगाड़ लगाये की सर कर दो हमारे दोस्त का अज़ीज़ है मैने कभी अपने लिये तो कुछ नहीं कहा .. हीरा लाल दिल्ली आ गये किस्मत से दाखिला भी हो गया .
रात को हीरा लाल के भाई का साला भी आगया तभी डाक्टर ने कुछ टेस्ट बता दिये फिर बात पैसो पर थी पर साथ ही रिश्तो की शर्म भी थी कैसे और किससे साले ने पर्चा ले लिया कैमिस्ट की दुकान पहुचा समान लिया बिल 4200 का बना बिल देते वक्त उसने कहा चलो इससे ज्यादा कोई और क्या करेगा ।

Sunday, September 21, 2008

ये मुजाहिदीन नहीं

ये मुजाहिदीन नहीं

आज दिल्ली में इंडिया गेट पर मुस्लिम संगठ हाथों में बैनर पोस्टर लिये खामोशी से आंतकवाद का विरोध करने के लिये इकठ्ठा होये। सब के लब बंद थे और ज़हन में कई सवाल धूम रहे थे। सोच रहे थे की ये दशहतगर्द किस इस्लाम और किस मुस्लमान की पैरवी कर रहे है ये वो मज़हब के मानने वाले तो नहीं जो कुरान पर इमान लाये थे। हमने वहां मौजूद फैजान नक़वी से पूछा की आंतकवादी अपने को मुजाहिदीन कहते है क्या ये सही है उन्होने बिना रुके कहा की मुजाहिदीन कभी भी बच्चे और औरतों को निशाना नहीं बनाते और इस्लाम को मानने और अपने को मुस्लमान कहने वालों को रमज़ान के महिने का भी ख्याल नहीं आया ।
आज चंद लोगों की वजह से एक पूरी कौम कटघरे में खड़ी है ये दाग जो लगा है न जाने कभी मिटेगा भी या नहीं... क्या ये मुजाहिदीन हैं ........

Saturday, September 20, 2008

समय दो

आज दफ्तर का माहौल कुछ अजीब सा था हर आदमी अपने में व्यस्त था
किसी के पास समय नही था हर काम वो समय से पहले करना चाह रहा था
तभी मुझे ....
अपनी एक पुरानी कविता याद आई
मुझे कुछ और समय़ दो , मुझे कुछ और समय दो
मेरे जीवन की लौ को य़ूं न बुझने दो मुझे कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरी आँख के आसू
आँख मे ही अटके हैं
उसको धरती पर तो गिरने दो
मुझे अभी कुछ और समय दो
कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरे कानो में आज़ान भी नही गई है
अभी तो मेरे मुंह से राम का नाम भी नही निकला है
मुझे राम और रहीम का कुछ तो जान ने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
अभी तो मुझे ममता की बांहे भी नही मिली हैं
अभी तो मैंने माँ के दूध का स्वाद भी नही लिया है
मुझे ममता की आगोश में कुछ पल तो रहने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
यह कविता थी इस लिए समय मांगने की हिम्मत जुटा ली
पर ज़िन्दगी में एक बार समय गुजर जाता है वो फिर कोई नही देता , ये मैंने इस कविता के लिखने के दस साल बाद जाना। शायद आपने भी अपने गुजरे हुए वक्त के पन्नो से ज़रूर कुछ समझा होगा। आज बस इतना ही.
मुझे कुछ औऱ समय दो

Friday, September 19, 2008

आज वक्त है

वक्त है

आज वक्त है तो इस लिये लिख रहा हूं और इसीलिये ही अपने ब्लॉग का नाम भी वक्त रखा है। अगर आप के पास वक्त हो तो पढ़ना और नहीं हो तो, जब हो तो ,तब पढ़ लेना हर काम जिन्दगी मे तब किया या ये कहूं की सारे काम तब हुये जब वक्त निकल गया स्कूल में पढाई समझ में नहीं आई, आई भी तो बस इतनी की पास होने के नम्बर मिल जाते जब धीरे धीरे नम्बर का महत्व समझता तब तक वक्त निकल चुका था। कॉलेज में गर्ल फ्रंड और बाईक पाने की इच्छा हुई जब तक इच्छा पूरी करने के लिये जोड़ तोड़ करता तब तक जवानी बस में गुज़र गई और गर्लफ्रंड के नाम पर बीवी आ गयी । ये अभी शुरूआत है मेरी तरह ज़रूर बहुत से लोग होगे जिन्होने ने वक्त पर कभी कोई काम नही किया होगा या जिनका कोई काम कभी वक्त पर नहीं हुआ होगा आज हम शुरू करेगें वक्त है तो करेगें.....