Saturday, September 20, 2008

समय दो

आज दफ्तर का माहौल कुछ अजीब सा था हर आदमी अपने में व्यस्त था
किसी के पास समय नही था हर काम वो समय से पहले करना चाह रहा था
तभी मुझे ....
अपनी एक पुरानी कविता याद आई
मुझे कुछ और समय़ दो , मुझे कुछ और समय दो
मेरे जीवन की लौ को य़ूं न बुझने दो मुझे कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरी आँख के आसू
आँख मे ही अटके हैं
उसको धरती पर तो गिरने दो
मुझे अभी कुछ और समय दो
कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरे कानो में आज़ान भी नही गई है
अभी तो मेरे मुंह से राम का नाम भी नही निकला है
मुझे राम और रहीम का कुछ तो जान ने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
अभी तो मुझे ममता की बांहे भी नही मिली हैं
अभी तो मैंने माँ के दूध का स्वाद भी नही लिया है
मुझे ममता की आगोश में कुछ पल तो रहने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
यह कविता थी इस लिए समय मांगने की हिम्मत जुटा ली
पर ज़िन्दगी में एक बार समय गुजर जाता है वो फिर कोई नही देता , ये मैंने इस कविता के लिखने के दस साल बाद जाना। शायद आपने भी अपने गुजरे हुए वक्त के पन्नो से ज़रूर कुछ समझा होगा। आज बस इतना ही.
मुझे कुछ औऱ समय दो

1 comment:

jyotirmay Tripathi said...

Hum Samay hi de kar rah ja rahe hai
kuch karne se bachne ka ek bahana ban gaya hai!
Good to realize the reader about the time and your one liability toward the society.
jyotirmay.tripathi@rsg.co.in