Wednesday, October 29, 2008

मां

एक सच्ची कहानी ....
ममता के कहानी किस्से आपने ज़रूर सुने होगें मां की मोहब्बत बयां करना शयाद बहुत मुशकिल है ।पर आज बात उस मां की जिसने अपनी सात साल से मरी बच्ची को अपने कलेजे से लगा रखा है ।ये कोई कहानी नहीं, फसाना नहीं ये हकीकत है ...वो भी उस देश की जिसे अपने नियम कानून और व्यवस्था पर बहुत घमंड है ...
तकरीबन दस साल पहेले मिसेज़ फिलोरिडा एक अच्छे मुस्तकबिल के लिये अपने परिवार के साथ ब्रिटेन के लिये रवाना हुईं..अपने देश में सब कुछ सही पर फिर भी बुहत कुछ होता है जिसे सही करने की ज़रूरत होती है ... पति के साथ अपनी ज़िन्दगी की एक अच्छी शुरआत वो भी एक अमीर देश में शायद सब के नसीब में नहीं होता ...
सब कुछ सही था ..भगवान की मेहर थी .. जल्द ही उनके आगन में एक फूल खिला ..... जिसका नाम था सुनैना... सोचा था की सब की नैनो का तारा बनेगी ...उसकी बोली सब सुनेगें पर कुदरत के आगे किसकी चली ...भगवान को क्या मंजूर किसे पता ....
न जाने कौन सी तारीख़ थी कौन सा दिन था .. सुनैना की तबीयत बिगड़ गई...कुछ सोचने समझने का वक्त नहीं था जल्द ही उसे अस्पताल पहुचाया गया .. डॉक्टरों ने जांच शुरू की ..उसे भर्ती किया गया पर सुनैना की तबीयत बद से बदतर होती जा रही थी ...और दस दिन बाद उसकी मौत हो गयी....
ऐसा क्या हुआ जो सुनैना की तबीयत सुधर न सकी .. परिवार अपना आपा खो बैठा .. देखते देखते सजे हुये सपने बिखर गये .. ज़िन्दगी थम गयी ..ज़ाहीर है ऐसे में मां की क्या हालत होगी ... ये खुद ही समझ में आ गया होगा ...मिसेज फिलोरिडा अपना आपा खो चुकीं थी ... अस्पताल जल्दी जल्दी खानापूर्ति करने में लग गया ...जल्द ही नन्ही सी लाश को ,उनके हवाले करने के लिये आमादा हो गया ....
सुनैना की मां जानना चाहती थी की आखिर क्या हुआ उनकी बच्ची को ... वो पोस्टमार्टम कराना चाहती थी ...उस हकीक़त को जानना चाहती थी जिस वजह से उनकी सुनैना दुनिया से रूखसत हो गई ... पर हर जगह के कानून और नियमों के आगे भावनाए बड़ी बेमानी लगती है अस्पताल राज़ी नहीं हुआ कई नियमों का पाठ पढ़ा दिया गया ... पर मां ने भी फैसला कर लिया था कि जब तक जांच नहीं होगी, वो सुनैना को नहीं दफनाए गी ... एक लम्बी लड़ाई के लिये अपने को तैयार किया ..समाज से ठकराने के लिये अपने को मज़बूत बनाया .....नन्ही सुनैना को कई कैमिकल के सहारे रखा गया... पर कहा जाता है जब मुसीबत आती है तो हर तरफ से आती है ..और बार बार आती है .. अस्पताल मान गया, पोस्टमार्टम के लिये .. ये कुछ पल की तो जीत थी पर एक लंबे ..... संघर्ष की पहल . ....
पोस्टमार्टम में समान्य मौत बताई गई जिस पर विशवास कर पाना और मुश्किल था ... पराए देश में न्याय मिलना मुश्किल लग रहा था विकसित देश पर भरोसा कर के परिवार ने इंसाफ के लिये गुहार लगाई ।दूसरा अस्पताल चुना गया पोस्टमार्टम के लिये। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के बाद भी मां को करार नहीं मिला ... हार कर रुख़ किया हिन्दुस्तान का ... साथ में नन्ही सुनैना की लाश भी हिन्दुस्तान पहुचीं...
हर विभाग ने उम्मीद जताई पर .सुनैना की लाश फाइलों में कैद हो कर.. दफ्तरों के चक्कर लगा रही है .....आज भी मां लाश को महफूज़ रखे हुये है ......और इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है .........

दर्पण... एक पत्रकार का सच

एक पत्रकार की चाहत......

दर्पण....
उस दर्पण पर सर्मपित मैं
जो है हर भाव से परिचित
देखे जो खिलखिलाते चेहेरे
जाने कितने किस के मन हैं मैले ।
क्या राजा ..... क्या रंक.......
बदल न पाये कोई भी दर्पण के ढ़ंग
मैं भी दर्पण बनना चाहू
सब को उनका रूप दिखांऊ
फिर ये विचार अपने मन मैं लाऊं
बोले सभी कि दर्पण...कभी झूठ न बोले
पर अब तक उसके सच से कौन भला डोले..

Monday, October 27, 2008

गोली का जवाब गोली से....... ....

गोली का जवाब गोली से.......

अंधेरी से कुर्ला....
बस नबंर-332..
दिन सोमवार
तारीख़ 27 अक्तूबर 2008
वक्त सुबह के पौने नौ बजे
मुंबई का अंधेरी इलाका..

332 नंबर की बस सुबह करीब पौने नौ बजे अंधेरी से रवाना हुई ... कम लोग, सुबह की हवा और हल्की हल्की सूरज की रोशनी छनती हुई बस के शीशे से अंदर पहुंच रही थी ।...करीब सवा नौ बजे बस साकीनाका पहुंची... यहीं से सवार हुआ 23 साल का एक खूबसूरत नौजवान देखने में किसी भी फिल्म अभिनेता को पीछे छोड दे ।

नौजवान बस की पहेली मंज़ील मे सब से आगे जाकर बैठ गया ...तकरीबन 15मिनट बाद यानी 9 बज कर 27 मिनट पर जब बस बैलबाज़ार ,कुर्ला के सिगनल पर पहुंची तभी इस नौजवान का कंडक्टर से झगड़ा हुआ बात बढ़ी ..नौजवान उत्तेजित हो गया, कंडक्टर को बांधक बनाना चाहा, लोगों को धमकाया और कहा मैं किसी का कोई नुकसान नहीं करुंगा .. मैं बिहार से आया हूं मेरी राज ठाकरे से बात कराओ..

नौजवान ने बस को रिवॉव्लर की नोंक पर बंधक बनाने की कोशिश की ...सवार लोगों से मोबाइल मांगा .. बाहर के लोगो को चिल्ला चिल्ला कर अपने बारे में बताया ..तभी करीब पौने दस बजे पुलिस वहां पहुंच गयी, सीन पूरा फिल्मी था ..पुलिस कहती है कि उसे सरेंडर के लिये कहा गया.. पर उसने हवा मे चार बार गोलियां चला दी ।
पुलिस कहना है –सरेंडर से इंकार करने के बाद मुसाफिरों की जान बचाने के लिये उसके पास नौजवान को मारने के अलावा कोई और चारा नहीं था ....एंकाउंटर ज़रूरी था
23साल का नौजवान मर गया ... ये नौजवान पटना का राहुल था । हां, राहुल राज । चार भाई बहनों में तीसरे नम्बर का । राहुल पटना के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजूकेशन से एक्सरे में डिप्लोमा कर, एक अच्छे भविष्य की तलाश में इस महीने की 24 तारीख को मुंबई आया था ... शांत और सब की बात मानने वाले राहुल को क्या हो गया जो इसने ये रास्ता अपना लिया...
इलाको की लड़ाई का दर्द शायद कम हो जाता अगर महाराष्ट्र के गृहमंत्री का बयान न आता ... कैसे आर आर पाटिल के मुंह से निकला की गोली का जवाब गोली है ...
क्या अब इसको नियम बना लिया जाये ...
नितिश कुमार कहते हैं कि राहुल को बचाया जा सकता था ।लालू यादव कहते हैं कि ये हत्या है।रामविलास कहते हैं कि सोते शेर को जगाया जा रहा है । लेकिन उस पीड़ा की बात कोई नहीं कर रहा है जो एक हिन्दुस्तानी अपने ही देश के अलग राज्यों में सहता है । कहीं हम फिर 84 और 92 के बाद जो नतीजे सामने आये उस ओर तो नहीं बढ़ रहे.. सब मराठी एक सी भाषा बोलते है चाहे ......बालठाकरे ,राजठाकरे ,राणे हो या फिर पाटिल
तो फिर पूरा देश एक भाषा बोलने के लिये क्यों नहीं उठता ..
कल फिर 332 नंबर की बस चलेगी, लेकिन उस पर सवार लोग हर चढ़ने वाले को देख कर यही सोचेगे की कहीं ये भी, राहुल राज तो नहीं ...

Friday, October 24, 2008

अच्छा हुआ … जो पिटे....

अच्छा हुआ … जो पिटे....
बिहार जाने वाली या बिहार से गुज़र के जो ट्रेन जाने वाली थी सब को रद्द कर दिया गया....। स्टेशन में भीड़, लोग बेहाल परेशान, कहां जायें, कैसे पहुचें कुछ पता नहीं .... रमेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ट्रेनें क्यों नहीं चल रही ... उसने झुंझलाते हुये पुछा क्या हुआ ट्रेनों को क्यों नही चलाया जा रहा ....किसी ने बताया अरे भई वहां आंदोलन चल रहा है ट्रक जाम हैं सड़कों पर लोग है सब तरफ अफरातफरी है ...दुकाने जलाई जा रही है सरकारी संपत्ति का नुकसान किया जा रहा है ... बहुत ज़बरदस्त आंदोलन है .....25 तारीख़ को पूरा बिहार बंद होगा ...
रमेश ने पुछा क्यों भई क्यों ... लोगो ने कहा अरे तुम कहा से आये हो, देश में कितना कुछ हो गया और तुम कहते हो क्यों ... राज .... राज ठाकरे के लोगों ने महाराष्ट्र में परीक्षा देने गये, बिहार के छात्रों को मार-मार कर भागया, बहुत पीटा ...उसी के विरोध में ये सब हो रहा है ...
रमेश के लिये ये सब नया था ... उसने कहा, पर अगर ये सब मुंबई में हुआ, वहां के लोगो ने किया तो उसका विरोध बिहार में प्रदर्शन कर के अपने ही लोगो की दुकाने जला के ..अपने ही प्रदेश का नुकसान करके कैसा आंदोलन, कैसा बदला ... लोग नाराज़ हो गए, बोले अरे तुम समझे नहीं ...ऐसे ही नेताओं की नींद टूटेगी ...कितनी उम्मीद से इतने सारे अलग अलग पार्टियों के बाशिंदों को संसद भेजा है हमने ...उनका कोई फर्ज़ है या नहीं ... बहस गंभीर होती जा रही थी ,,,, पर हर बार नींद तोड़ने के लिये अपना नुकसान करना कहां की समझदारी ... अगर आंदोलन करना है और हिम्मत है , तो क्यों नहीं महाराष्ट्र चले जाते हैं.. ट्रेनों में भर कर, वहां करे आंदोलन, अपने ही राज्य में करने का क्या फायदा ...और इनके मारे पूरा देश क्यों परेशान हो । राज ने किया उसे जेल हुई उसके कार्यकर्ता पकड़े गये .. सब ने निंदा की पर ये जो कर रहे हैं ये कौन सी समझदारी है ... मैं यही कहूगां, पिट के भी नहीं सुधरे बिहारी ... लोग भड़क गये पर दिल्ली था इसलिये रमेश बच कर निकल गया ... पर आंदोलन का मकसद वो समझ नहीं पाया ...

Tuesday, October 21, 2008

आस

आस

वो जो खुशियों का एक दीपक बन कर
मेरी ज़िन्दगी में आया था ।
शायद कल्पनाओं का एक साया था
भूल गया था मैं जिन्दगी के ....
हर दुख़ ,हर ग़म ,हर तंनहाई....
अंजान कर दिया था ....
उसने मुझे ग़मों से, परिचित कर दिया था
उसने मुझे गैरो से
कितना खुशनुमा झोका बन कर आया था ......

लेकिन जीवन केवल सुखों का पल थोड़ी है
जब चाहा मैने अपनाना उसे ....
मन के एक कोने चाहा बिठाना उसे
दूर बहुत दूर चला गया वो ....
मुस्कुराहट भी मेरी साथ ले गया वो ...
कितना रोया कितना छटपटाया था मैं...
शायद कभी तो हाथ आयेगा वो ...

लेकिन उसे न आना था न ही वो आया था
वो तो एक साया था ... हां वो तो एक साया था ....

मेरा मन ही पागल था जो उसे पकड़ने को भरमाया था
क्या कभी समुद्र की लहरों से रेत के घरौंदे बचे
या फिर कभी सपने भी हक़ीक़त हुये हैं
तो फिर साया कैसे हाथ आता ...
हां वो सिर्फ साया था .. सिर्फ साया था ... साया ही था



पर ज़िन्दगी नहीं मानती हम नहीं रुकते हम साये के साथ ही जीते है सपनों मे ही रहते हैं ... जानते हुये भी उसी ओर चलते है जिस तरफ मंज़िल का कोई नामोनिशान नहीं ... क्यो ...भला क्यों ....

शायद एक आस के लिये ... आस हां उम्मीद... यही ज़िन्दगी है ....
आज बस इतना ही .... कल शुरू करेगें एक नई कहानी.....

Thursday, October 9, 2008

कैसे जीतता है सच में सच.....

कैसे जीतता है सच में सच.....

इस बार न जाने क्यों जलते हुये रावण को देख कर मेरी आंखों से जो आंसू निकले तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे । एक के बाद एक घटना याद आने लगी कुछ लोग, कई पुराने साथी सब नज़रों के सामने थे ।जैसे जैसे रावण जल रहा था । वैसे वैसे मेरा मन डूब रहा था ।लोग जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे पर मेरे कानों में न जाने कौन सी आवाज़ आ रही थी ।आग की रोशनी मुझे डरा रही थी। मुझे दिख रहे थे वो लोग जो मेरे करीब थे पर अब मुझसे बहुत दूर हैं । मैं रावण को हमेशा दूर से ही देखता हूं शायद इसलिये कि सच को जीतते हुये देखना बहुत मुश्किल है ।

मुझे तो याद नहीं की सच पहली और आखिरी बार कब जीता था । हां बचपन से सुनता आ रहा हूं कि हमेशा सच बोलो सच का साथ दो सच ही जीतता है ... पर जब तक ये जीत आती है तो जीतने का दिल ही नहीं चाहता क्योकि ये जीत हमसे बहुत कुछ ले चुकी होती है ।

आज मै रोया इसलिये नहीं कि मुझे रावण से प्यार है ।प्यार मुझे कैसे हो सकता, किसी बुरे आदमी से कोई कैसे प्यार कर सकता है। चाहे वो रावण के रूप में हो या आतंक.... खैर छोडिये मुझे तकलीफ इस बात की मुझे कोई राम क्यों नही मिल रहा है क्योकि मेरा रावण रोज़ मुझ पर हंस रहा है और कह रहा है कि देखता हूं कैसे जीतता है सच में सच........