Thursday, October 9, 2008

कैसे जीतता है सच में सच.....

कैसे जीतता है सच में सच.....

इस बार न जाने क्यों जलते हुये रावण को देख कर मेरी आंखों से जो आंसू निकले तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे । एक के बाद एक घटना याद आने लगी कुछ लोग, कई पुराने साथी सब नज़रों के सामने थे ।जैसे जैसे रावण जल रहा था । वैसे वैसे मेरा मन डूब रहा था ।लोग जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे पर मेरे कानों में न जाने कौन सी आवाज़ आ रही थी ।आग की रोशनी मुझे डरा रही थी। मुझे दिख रहे थे वो लोग जो मेरे करीब थे पर अब मुझसे बहुत दूर हैं । मैं रावण को हमेशा दूर से ही देखता हूं शायद इसलिये कि सच को जीतते हुये देखना बहुत मुश्किल है ।

मुझे तो याद नहीं की सच पहली और आखिरी बार कब जीता था । हां बचपन से सुनता आ रहा हूं कि हमेशा सच बोलो सच का साथ दो सच ही जीतता है ... पर जब तक ये जीत आती है तो जीतने का दिल ही नहीं चाहता क्योकि ये जीत हमसे बहुत कुछ ले चुकी होती है ।

आज मै रोया इसलिये नहीं कि मुझे रावण से प्यार है ।प्यार मुझे कैसे हो सकता, किसी बुरे आदमी से कोई कैसे प्यार कर सकता है। चाहे वो रावण के रूप में हो या आतंक.... खैर छोडिये मुझे तकलीफ इस बात की मुझे कोई राम क्यों नही मिल रहा है क्योकि मेरा रावण रोज़ मुझ पर हंस रहा है और कह रहा है कि देखता हूं कैसे जीतता है सच में सच........

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