Wednesday, November 26, 2008

वो

वो
वो मर गया मै इसलिये उदास नहीं हूं...
क्योकि मृत्यु तो मुक्ति है
और मुक्ति तो स्वंतत्रता होती है ।
स्वतत्रता के लिये उदास होना विद्रोह...
और मैं विद्रोही नही....

धरती तो बंधक है कर्म और कर्तव्य की ..
जो उसे जितना नोकों से कुरेदेगा ....
उसी को तो उसे फल देना है ...
नित दिन पीडा सहने के बाद भी
उसको तो मुसकराना है
मैं भी तो उसका एक कार्यकर्ता हूं
वो मर गया.. मैं इसलिये उदास नहीं हूं ।

अंबर भी तो सुचालक है आशाओं और कल्पनाओं का ..
दूर से ही सिमट आये आंखों मे हमारी ।
हर दिन हमको नये सपनो मे ले जाता है...
उसकी महानता और ऊचाई हमको कितनी छोटी लगती है ।
मैं भी तो उस छोटे से अंबर पर चढ़ना चाहता हूं..
वो मर गया... मै इसलिये उदास नहीं हूं...

कौन था वो... अपना था , पराया था या फिर मेरा अपना ही साया था
छटी उंगली ही सही, था वो मेरे शरीर का ही अंग
वो कटगया या मर गया ,मैने कितनी सरलता से बखान किया...

क्योकि देखता हूं मैं सुनता हूं, मैं हर तरफ अजीवित इंसानों को
मैं भी तो इन शवो के भंडार में एक शव हूं..

वो मर गया मैं इस लिये उदास नहीं हूं......

७१ साल

71 साल
भाग -2

रात ही रात में घर खाली कर दिया ।पहले किसी जान पहचान वाले के यहां रहे फिर एक कमरा किराये पर ले लिया।रामनेरश ने अपनी तीन बेटियो और पत्नी के साथ ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू किया ।स्कूल दूर था सुबह जल्दी निकलते रात को देर तक टूयशन पढ़ा कर घर वापस आते ।अभी बहुत कुछ करना है बच्चियों की पढ़ाई एक अपना घर ... यही उनका सपना था ।न अपने खाने की फिक्र न पहने का होश दो जोडी कपड़े, एक जोड़ी रबड़ की चप्पल और एक साइकिल.. यही था रामनरेश के पास ..बीवी की भी कमोबोश ऐसी ही हालत थी।
जहां टूयशन पढ़ाने जाते थे उन बच्चों के पिता प्रॉपर्टि डिलर थे ।उन्होने कहा मास्टर साहब एक जगह ज़मीन कट रही है एक प्लाट ले लो । रामनेरश ने कहा भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं की ज़मीन ले सकूं.. प्रॉपर्टि डिलर ने कहा चलिए कुछ दे दिये गा और बाकि बाद में दे देना ...शारीफ आदमी पैसे बाद में दे पर देगा ज़रूर ये बात डिलर जानता था ।
आज रामनरेश जल्दी जल्दी घर पहुचें पत्नी को ख़बर दी ।पत्नी भी खुश हो गयी । मां बाप के खिले हुए चेहेरे देख कर बच्चो में खुशियों की लहर दौड़ गई । और क्यो न हो आखिर कुछ अपना हां अपना घर होने वाला है उनका वो भी देश की राजधानी में । घर में दाल के साथ आज एक सब्ज़ी भी बनी और मीठे में खीर भी थी ..यही इनकी खुशी और पार्टी थी ।
कुछ पैसे दे दिये कुछ देने का वादा कर लिया .. लो रामनरेश को एक दो सौ गज का प्लाट मिल गया ।तब दिल्ली बस रही थी चारों तरफ जंगल थे या फिर खेत थे ।बिजली के लिए लकड़ी के पोल लगाए जाते थे और दूर से लाइन खीची जाती थी ।पानी के लिए हैंडपंम्प प्रयोग में आता था जिसमें मटमैला और बदबूदार पानी आया करता था ।सीवर तो बहुत दूर की बात है नाली तक नहीं होती थी .घरों आगे गड्डे खोदे जाते थे जिसमें पानी जमा होता था ।
रामनरेश और उनकी पत्नी ने जब जगह देखी तो एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर कुछ कहने की हिम्मत दोनो जुटा नहीं पाये... कैसे ,किस तरह से ,क्या होगा अभी तो चल जायेगा बच्चियां छोटी हैं पर जब बड़ी होगीं .कहां पढ़ेगी,कैसे वक्त कटेगा दोनो यही सोच रहे थे ।पर ये अपनी ज़मीन है हमारा अपना मकान बनेगा इस खुशी के आगे ,दोनो सब कुछ भूल गये थे ।

मकान बनना शुरू हुआ...भाई तक भी किसी ने ख़बर पहुचाई ..भई तु्म्हारे भाई रामनरेश ने ज़मीन ले ली अब मकान बनवा रहे हैं.. भाई से सुना न गया एकदम से ताना मारा ..अरे पागल हो गया है ..किसके लिये कर रहा है ..बनाने दो साले को इसके कौन सा लड़का है .. तीन तीन लड़कियां है सब कुछ मिलेगा तो हमारे ही लड़को को ...सुनने वाले ने सुना और कहने वाले ने रामनरेश को भी बता दिया..बात रामनरेश और उनकी बीवी के दिल पर लग गयी ।दोनो खामोश हो गये पर बेटियों ने देखा उस रात मां बाप दोनो को अकेले में रोते हुए ।
मकान बनना शुरू हो गया उन दिनों सिमेंट ब्लैक में मिलती थी ।..इसलिये लोग सिमेंट का कम इस्तमाल करते थे ज्यादा काम गारे यानि मिट्टी से ही होता था चुनाई गारे की ही कराई जाती थी । बड़ी दोनो लड़किया स्कूल जाने लगी थी रामनरेश दोनो को स्कूल छोड़ने के बाद खुद भी पढ़ाने चले जाते थे और उनकी पत्नी अपनी छोटी बेटी के साथ अपनी ज़मीन पर चली आती थी ... पर उनके ज़हन में हर बार अपने जेट की बात ध्यान आ जाती ..आंखे भर जाती है ..मन में कहती ऐ भगवान तुम ही इनको जवाब दो....
एक कमरा लैटरीन बाथरूम तैयार हो गया था। रामनरेश अपने घर शिफ्ट कर गये थे ।इस बीच इनकी बीवी भी गर्भवती हो गई थी । रामनरेश की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई थी ..घर, बच्चे,नौकरी,टूयशन और अब अस्पताल भी ।रामनरेश ने अपनी बहन की बेटी को बुलाना चाहा पर बड़े भाई का रौब ज्यादा था इसलिये बहन ने साफ साफ मना कर दिया ..पर रामनरेश को थोड़ी राहत ज़रूर मिली जब उनकी बीवी की बहन रहने आ गयी ।.चलो बच्चों को तो देख ही ले गी ।
मकान बनाने में काफी कर्ज़ चढ़ गया था । सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में ही बीवी को भर्ती कराया गया था ।सर्दी के दिन थे घर में इतनी ही रज़ाई थी की बच्चों को उढ़ाया जा सके ।इसलिये रामनरेश की पत्नी अस्पताल में बिछने वाली चादर से ही काम चला रही थी । नर्स ने उनको बात भी सुनाई क्यों बहन जब पैसे नही थे तो ये सब क्यो... रामनरेश की बीबी कुछ नहीं बोली बस चुप होकर रहे गयी और एक दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ ऊपर की तरफ देखा .. कुछ दिन के बाद उनके घर में एक लड़का हुआ जिसका नाम रखा नाम ...विजय... जो कभी भी न हारे....

क्या रामनरेश के ग़म विजय के बाद कुछ कम होगे.. कैसे कटेगी आगे की ज़िन्दगी.बताऊंगा ..अगले भाग मे.....तब तक अपने विचार भेजते रहिये.....

Friday, November 14, 2008

71 साल

भाग -1

रामनरेश अपने बेटे के साथ कार में बैठे एक रशितेदार के घर जा रहे थे..तभी बराबर से गुज़रते हुए एक ऑटो पर उनकी नज़र पड़ी, एक विवाहित जोड़ा उनके पास से गुज़रा .. और रामनरेश खो गये अतित में.. जब उनकी नई नई शादी हुई थी ।बहुत बड़ा कदम था .क्योकि वो अपने खानदान में पहले ऐसे शख्स थे जिन्होने अपने खानदान से अलग शादी की थी सब ने साथ छोड़ दिया था सिर्फ एक बहनोई ही उनके साथ थे
..इंगलिश में एम.ए किया था इस लिये अमरोह के मुस्लिम स्कूल में उन्हे नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नही हुई।प्रिसिपलसाहब अच्छे थे और उनको अच्छी सलाह दी और बीएड करने को कहा, मुरादाबाद के हिन्दू कालेज से बीएड किया ...उसी दौरान उनके घर में एक रोशनी आई बेटी के रूप में कहते हैं लड़की लक्ष्मी का रूप होती है ... पर रामनेरश के घर में खर्च बढ़ गया जिसके कारण उन्हे और मेहनत करनी पड़ी । देर रात तक टूयशन पढ़ाने पड़ रहे थे जिसकी वजह वो स्कूल रोज़ देर से पहुच रहे थे ।पसंद करने वाले प्रिंसिपल भी अमरोह छोड़ कर दिल्ली बस गये थे । इसलिये पहले उन्हे नोटिस मिला लेकिन पैसे की ज़रूरत ने नोटिस के डर को भगा दिया ..वो टूयशन बन्द न कर पाये और नौकरी खो बैठे ।
बीबी ने कहा क्यो नहीं दिल्ली जा कर प्रिसिपल से बात करते छोटे शहर से बड़े शहर में आना एक आम आदमी में वैसे ही खौफ पैदा कर देता ,लेकिन परिवार चलाने के लिए अपनी औलाद को पालने के लिए इंसान हर कदम उठाने को तैयार हो जाता है । रामनरेश भी दिल्ली आ गए सच सच प्रिंसिपल साहब को बताया ..उनके सरल स्वभाव से वो पहले से प्रभावित थे ....इसलिए कहा की देखता हूं रामनरेश ने कहा उनके पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि वो वापस जा सके ... प्रिसिपल साहब ने पैसे दिये और कहा जल्दी सूचित करेगें..
घर में टूयशन से जो पैसे आते वो इतने नहीं थे कि ज़िन्दगी चल सके... घर का किराया ,राशन, बच्ची का दूघ..ज़िन्दगी में दुख भरने के लिए काफी थे ।...और जब दुख शुरू होते है ...तो वो बस आने शुरू ही हो जाते है ... पत्नी को ब्लड प्रेशर हो गया लो दवाई का खर्च और ..साथ ही मदद करने वाले जीजा ने अपने बच्चे भी भेज दिये, एक खत के साथ भाई रामनरेश ये यहां पढ़ नही पा रहे कृप्या कर के साथ रख लो .तुम्हारे साथ रहे कर पढ़ लेगें ... पढ़ तो लेगे पर खायेगे क्या ...रामनरेश ने सोचा.....
लेकिन अगर आपकी नियत सही है तो अल्लाह भगवान आपकी मदद ज़रूर करता है ...दिल्ली से प्रिसिपल साहब ने सूचना भेज दी ..जल्दी से दिल्ली पहुचे एक सरकारी ऐडीड स्कूल मे नौकरी मिली अमरोह मे काफी कर्ज़दार हो गए थे ...शुरू की पगार उसी में चली गई...दिल्ली में एक भाई भी आ गया..मिल कर एक माकान ले लिया.. काफी समय गुज़र गया था इस दौरान रामनरेश के घर दो और बेटियों ने जन्म ले लिया था ... ज़िन्दगी तो बहुत कुछ दिखाती है ,सपनो से आस, गैरों से उम्मीद ,खून से दगा और घर में औरतो का झगड़ा ..
आये दिन रामनरेश की बीबी और भाभी का झगड़ा होने लगा ..हर बात से बात बढ़ने लगी ... अंदर इतनी खटास भर गई की दोनो को एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा न रहा ।..बीच बचाव के लिए बिरादरी को बुलाया गया भाई के पास पैसा था, मकान भी उसी के नाम पर था भले ही उसमें पैसे रामनरेश के लगे थे पर मकान रामनरेश को ही खाली करना पड़ा ...साथ ही खाली हो गया विश्वास ... यहीं से शुरू हुई राम नरेश की एक नई जंग...ये बात 1974 की है.....

इस जंग से कैसे जीते राम नरेश ..और क्या हाल है राम नरेश का बताऊंगा दूसरी पोस्ट में.. तब तक अपने विचार भेजते रहिए...

कुछ यादे...शायरों के नाम...

कुछ यादे....

बेहतरीन शायरी....

हर दर्द,हर मरज़ की दवा है तुम्हारे पास ।
आते हैं सब यहीं कि शफा है तुम्हारे पास ।।
बीमारे ग़म हैं,दूर से आये हैं सुनके नाम ।
कहते हैं दर्दे-दिल की दवा है तुम्हारे पास।।
.....
वो अक्स अपना आईने में देखते हैं ।
सितम आज उन पर नया हो रहा है ।।
मैं खामोश बैठा हूं उस बुत के आगे ।
निगाहों में मतलब अदा हो रहा है ।।
.....
ज़ाहिदों को किसी का खौफ नहीं ।
सिर्फ काली घटा से डरते हैं ।.
चाहे तुम हो या नसीब अपना ...
हम हर एक बेवफा से डरते हैं....
....
क्या खबर कैसे मौसम बदलते रहे ।
धूप में हमको चलता था चलते रहे ।।
शमा तो सिर्फ रातों को जलती है ।
औऱ हम हैं कि दिन रात जलते रहे ।।
....
तुम न आये तो क्या सहर न हुई ।
हां मगर चैन से बसर न हुई ।.
तुम भी अच्छे ,रक़ीब भी अच्छे ।
मैं बुरा था ,मेरी गुज़र न हुई ।।

Friday, November 7, 2008

मै सीख गया...

सीख गया.....
सुबह सुबह उठ कर जब दात मांज रहा था ।तभी शीशे पर नज़र पड़ी एक चेहरा दिखा ध्यान से देखा तो समझ में आया की ये तो मैं ही हूं... आज मेरी हल्की सी दाढ़ी बड़ी थी और उसमें मुझे तीन चार सफेद बाल दिखे... एकदम सन हो गया मै... क्या ज़िन्दगी का इतना लंबा सफर तय कर लिया मैने...

कल की बात लग रही है.... जब घर में आया एक मेहमान अपनी शेविंग किट भूल गया .और मैने स्कूल से आते ही उसकी सारी क्रिम लगा कर शेव करने की कोशिश की थी । तब मेरे चेहेरे पर एक बाल नही था उस वक्त उम्र भी तो 10 साल की थी। .. सब कितना हंसे थे .. उस शीशे के चेहरे से इस शीशे के चेहरे तक आने में 23 साल गुज़र गये ..बदल गया बहुत कुछ ,छूट गये बहुत से लोग.टूट गये कई रिश्ते ...हर बात सुनने वाली मां नही रही ,मोहब्बत करने वाली प्रेमिका भी चली गयी ... मुझको समझने वाले दोस्त भी व्यस्त और दूर हो गये.. रहा तो सिर्फ मै और मेरे सपने..

एक साधारण से परिवार में जन्म लेने के बाद हर लड़के का सपना होता है कि वो जल्दी से सैटल हो जाये थोड़ा पैसा आ जाये कुछ नाम हो जाये यही सोच कर मैने भी अपनी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाया ...

डॉक्टर ,इंजीनियर ,सी.ए ,सीएस सब में कोशिश की फिर रंग मंच से जुड़ा मीडिया का कोर्स किया ...सन 1999 आ चुका था ।दोस्त से एक नौकरी की अर्ज़ी लिखवाई .और फिर एक मीडिया हाउस में ट्रेनिंग शुरू की .. और साथ ही शुरू हुआ सपने और हकीक़त का सफर...
सुना था की टेलीविज़न में बहुत पैसा है .. घर वाले भी खुश थे और दोस्त भी अब हम और हमारा लड़का अमीर हो जायेगे ..घर में खुशियां, नौकरी मिल गयी है, अरे टीवी में बहुत पैसा है ..भई सही लाइन पकड़ी तुमने.. सारी बाते मैं सुनता था और एक दबी ख़िसयाई हुई हंसी हसता। क्योंकि मुझे अपनी हैसीयत के बारे में पता था मेरी पगार मात्र 12,00 रूपये थी जिसे दुनिया को मैने 3500 रूपये बताया ..झूठ बोलना, यही मेरा टीवी का पहला पाठ था जो जितनी कुशलता से इसे अदा करता है वो ही सफल होता है ये मैं सीख चुका था ।
पर राह आसान नहीं थी सर पर निर्देशक बनने का जुनून था जिसे क्रेटीव काम कहते हैं वो करना चाहता था । कॉलेज में कविता और नाटक करता था इसलिये लगता था की मझसे ज्यादा कौन क्रेटीव हो सकता है ... पर ज़मीनी सच्चाई कुछ और थी..आप से बेहतर यहां भरे पड़े हैं लोग... इसलिये प्रोडक्शन का काम करना शुरू किया.. प्रोडक्शन भी बहुत बड़ा क्षेत्र है .. एक संगीत के कार्यक्रम में लोगो का बुलाना प्रोग्राम के बैनर पोस्टर लगाना और प्रतियोगियो को ढूढ़ना.... चुनना नही...फिर जो जीत जाये उसके घर इनाम पहुचाना ... ये था पहला प्रोडक्शन का काम ...पर रिशतेदारों और दोस्तों में बड़ी लैट थी क्योंकि टीवी में नाम आता था। करता क्या हूं, मिलता क्या है क्रेडीट रोल में नाम देख कोई कुछ नही पुछता...
अपने को दिलासा देता रहा की अभी तो सीख रहा हूं..और ये सीखना कई साल तक जारी रहा ...जब भी पैसे बढ़ाने की बात होती तभी मैडम कहे देती अभी तो ये सीख रहा है .. कोई ज़िम्मेदारी की बात होती तब भी कहा जाता अभी नहीं आप को बहुत कुछ सीखना है ... मेरे एक दोस्त ने कहा यार कब तक सीखोगे बात दिल को लगी नौकरी छोड़ दी .. जब दूसरी जगह काम पर गया तो पता चला कि अब तक जो सीखा वो किसी काम का ही नहीं..अभी तो और बहुत कुछ सीखना है ... फिर जो सीखने का दौर शुरू हुआ वो अब तक खत्म ही नही हो रहा .. शेव करते हुए आफिस से फोन आगया ..आप कब तक आयेगें मैने बिना संकोच के कहा ,रास्ते में हूं ...जाम है.. जैसे ही खत्म हो गा पहुचता हूं.. फोन रखने के बाद मै मुस्कुराया और मन में कहा चलो ये तो मै सीख गया.....

Monday, November 3, 2008

या अल्लाह

थंब था मैं फिर भी थल पर न रूक सका
दिनकर था मैं फिर भी दाह से न बच सका
दुष्कर हो गया जीवन मेरा इन दिधार्थक बातों से
इस कलयुग के अंधकार में इन रण की रातों से.............

या अल्लाह….

शफीक मियां सुबह सुबह घर से उमदा कुर्ता पजामा पहन कर आफिस के लिये चल दिये । रास्ते में कई फोन आये... कोई बड़ा बदलाव आज होने वाला है इसकी उनको भनक पड़ चुकी थी ।लेकिन बदलाव क्या है इसका अंदाज़ा वो नहीं लगा पा रहे थे... शफीक मियां ने न्यूज़ चैनल में बहुत जल्दी तरक्की की ....
वैसे तो उनके पास पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था पर आजकल वो चैनल के कई दिग्गजो को पत्रकारिता के गुण सिखाते पाये जाते हैं.. क्योकि नौकरी में तरक्की इसलिये नहीं होती की आप बहुत काबिल है ..... आप कितने अपने बॉस के करीब है ये महत्वपूर्ण बात होती है ..और अपने सीनियर को कैसे शीशे में उतारना इसमे वो बहुत माहिर हैं...
आज क्या होगा इसी पशोपेश में है वो... एक सही बात आप को बताते चले शफीक मियां को बहुत ज्यादा उम्मीद है कि इस बार इनको कोई बड़ी ज़िम्मेदारी मिलने वाली है .. आखिर क्यों न मिले, हर काम .. जी हां ,बॉस के काम की बात हो रही है सब टाइम पर करवाया.. कई बार पार्टी भी दी ... शराब भी पिलाई.. रेलवे टिकट भी करवाया.. रिशतेदारों के बच्चो का सांसद से कहे कर दाखिला भी कराया...और भी बहुत कुछ.. जी ...कभी बॉस की बुराई नहीं सुनी सब जानते है वो सर के कितने करीब हैं ...
इन्ही सपनो के साथ वो दफतर पहुंच गये पर माहौल काफी संजीदा था हर आदमी कुछ न कुछ कर रहा था ...बॉस लापता हैं शफीक ने फोन मिलाया पर फोन बज कर खामोश हो गया ... शफीक मियां का चेहरा उतर गया..आने वाले बुरे वक्त का आभास हो चुका था । सोचा, अगर कुछ पहले पता होता तो दिवाली का डिब्बा तो सही जगह पहुचा देता ।

तभी बिग बॉस यानी कंपनी के मालिक आते हैं, साथ में तीन नये चेहेरे भी हैं। सब लोगो को बुलाया जाता और कहा जाता है आज से ये लोग चैनल चलाए गे ...
सब ताली से स्वागत करते हैं .. खिसयानी ही सही पर मुस्कुराहट सब के चेहरे पर थी ...तभी ज़ोर ज़ोर से ताली बजाते हुए शफीक मिया उन लोगो के एकदम करीब पहुच गये ,..... बड़े सम्मान के साथ मिले और अपना परिचय दिया ... सब ने देखा और सब मन में बोले या अल्लाह शफीक मिया जैसा हम को भी बनाए..........

bachpan

बचपन

अंबा का आचल छूटा
अंबरूह से अंबू रूठा...
उजबक बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

उछल कूद सब हो गये दूर
अकधक-अकबक छूटे यूं
अक्रिय बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

कुप्रवति से मैं हूं भरपूर
ओछापन है मुझ में यूं
कठपुतली बन कर रहे गया मै
जब से मेरा बचपन छूटा

दोस्त यार अभी भी हैं साथ
अब न उनमे है वो प्यार
बेगाना बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा..