Monday, December 29, 2008

कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....

कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....



26/11 के एक महीने बाद हर टीवी चैनलों ने मुबंई पर पाकिस्तानी आंतवादियों के हमले का एक महीना मनाया ... ... क्या मकसद था ..क्यो उन चीज़ों को दोबारा दिखाया जा रहा था ... क्या चैनलों के पास कोई नई जानकारी थी .. क्या टीवी चैनलों को जो दिशा निर्देश सरकार की तरफ से मिले थे उनका वो पालन कर रहे थे
ये आप सब के ज़हन में बात आ रही होगी।
26/12 को जैसे ही घर में टीवी चला तो बच्चे सहम गये ।मां देखो फिर से मुबंई में आंतकवादियों ने हमला कर दिया ... मां भी भाग कर टीवी के पास पहुचीं टक टकी लगाये टीवी देखने लगी ...हे भगवान अब क्या होगा, क्यों इन आंतकवादियों को कोई पकड़ नहीं पा रहा ..।
वो समझ नहीं पा रही की हो क्या रहा है ..कभी दिन की तस्वीरें ,कभी रात की, उसे लगा की रात को हमला हुआ... .कभी उसे लगा दिन को हमला हुआ..फिर सोचा की दोबारा उन्ही जगह पर क्यों हमला हुआ.... फिर उसने सोचा ये तो वो ही और वैसी ही जगहाएं हैं , वो ही तस्वीरे हैं, जिन्हे वो पूरे एक महीने से देखती आ रही है । फिर उसे किसी ने बताया कि अरे टीवी वाले मुबंई पर हुये हमले का एक महीना बना रहे हैं..उसने 13वां.40वां तो सुना था महीना पहली बार सुन रही थी ..
अभी तक वो बच्चों को ये नहीं समझा पायी की आंतकवादी क्या होते हैं अब वो बच्चों को ये क्या बताये कि टीवी वाले हर चीज़ को गणित के पहाड़े की तरह याद क्यों करवाते हैं..
सब चैनलों से साफ साफ कहा गया था गोली बारी, खून, आंतकी हमला, आप एकदम सीधे नहीं दिखा सकते अगर आप पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं तो उस पर फाइल लिखना ज़रूरी है ..पर ऐसा कुछ नहीं हुआ .
अभी महीना भी नही गुज़रा ..जब हर टीवी चैनलों ने फिल्म निर्देशक रामगोपाल वर्मा की बड़ी आलोचना की थी और अब खुद उनसे खौफनाक ड्रामा,फिल्म न्यूज़ चैनल में दिखाया गया इसलिये न्यूज़ कहना ज़रूरी है ..यानी न्यूज़ दिखाई गयी..
अब बात उनकी शैली की भी हो जाये... टीआरपी की दौड़ में पूरा मसाला दर्शकों तक पहुचाने की कोशिश की गई..कलाकार बुलायेगये,ड्रामैटिक लाइटिंग की गयी..एंकर और रिपोट्रर ने India most wanted के एंकर की तरह चिलाना शुरू कर दिया ।नेताओं को गाली देने के लिये फिल्म अभिनेताओं का सहारा भी लिया गया। औरों की तो छोड़ो अपने को संजीदा चैनल कहलाने वाले लोग भी इस दौड़ में शरीक होगये .. हां भई कब तक टीआरपी से दूर भागे गे....

Thursday, December 18, 2008

आज कल ब्लॉग में बहुत वाहवाही लूट रहे हैं...

त्याग पत्र-2
...... आज कल ब्लॉग में बहुत वाहवाही लूट रहे हैं...

आपको लगा होगा की भई ये साहब तो भाग मे बहुत विशवास करते हैं आधी बात करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं.. पर नहीं सर ऐसा हो नहीं सकता मैं कभी झूठ नहीं बोलता मुझे याद नही की मुझे बताया गया था अगर बता देते तो मैं वक्त पर ही आता .. और सब कुछ लिख देता है ..नरेश ऑफिस में सुबह सुबह... नये आये हुए बॉस के सामने बोल रहा था ..पर बॉस सुनने को तैयार नही था ...
क्योंकि बॉस वो ही सुनता है जो वो सुनना पंसद करता है और नरेश के मुंह से सुनना तो वो कुछ भी पंसद नही करता क्योंकि आप कैसे हैं ये इस बात पर निर्भर करता है की आपको दूसरे लोगों ने कैसा बनाया या बताया है..जी , और नरेश का रिकॉर्ड इस मामले में तो बहुत ही खराब है ...
नरेश की शुरूवात एक गांव से हुई ..बाप को दिल्ली में छोटी सी नौकरी और साउथ दिल्ली में छोटा सा घर मिला पर ये छोटा घर जहां था वहां चारों तरफ बड़े-बड़े घर थे । नरेश सरकारी स्कूल की ख़ाकी पैंट पहन कर इन बड़े बड़े घरों को देखता हुआ जाता था और उन घरों में रहने वालो को गाली देता रहता कभी घंटी भी बजा कर भागता तो कभी पत्थर मार कर भाग जाता । कोई समझाता तो उससे झगड़ा करता ..तभी से उसका मिजाज बदमिजाज होता गया ..और वो हर चीज़ को अपने ढंग से ही करना चाहता ..और जो उसे मिलता उससे वो कभी खुश न होता ...दिल्ली में वो गंगा का किनारा देखता.. बाग में आलू पाने की चाहत रखता... शहरों की सड़को पर गांव की गलिया खोजता... कोई कुछ बोलता तो उसे काटने दौड़ता... इस तरह से नौकरी कर पाना आसान न था
सब को यकीन था की नरेश की नौकरी एक दिन जायेगी इस देश मे वो ही ऐसा पत्रकार नहीं है जो सच जानता है और सच बताना चाहता है ... हर चैनल में हज़ारों हैं ।अगर आपको नौकरी करनी है तो आपको नियम मानने ही होगें .. और नियम बॉस के होते हैं आपके नहीं..नरेश के साथ ये हुआ कि वो मलाई तो चाहता था पर दूध से परहेज़ करता था ..
उस दिन नरेश लेट आया ऑफिस को जब उसकी ज़रूरत थी वो वहा नहीं था आपकी हर गलती बर्दाश कर सकते हैं अगर आप काम वक्त पर करते हैं .. इससे पहले भी नरेश की कई बार शिकायत बॉस तक पहुच चुकी थी .बॉस बस वक्त का इंतज़ार कर रहे थे ..और मुंबई हमले ने बॉस को भी हमला करने का मौका दे दिया ...

नरेश ने भी ताव में आकर कहे दिया मैं इस्तीफा देता हूं.. मंदी के दौर में जहां कम्पनी छटनी करने की सोच रही है ... वहां मोटी पगार और गाड़ी रखने वाले नरेश की ये पेशकश चैनल और बॉस के लिये मुंबई मिशन की कामयाबी से कम न था .. नरेश ने कहा मैं इस्तीफा देता हूं..बॉस ने कहा मैं स्वीकार करता हूं..

अब तो नरेश के काटे तो खून नहीं ..पर मुंह से शब्द निकल गये तो क्या करे .. त्याग पत्र स्वीकार हो गया... बैचेनी से नरेश को रात भर नींद नहीं आती इसलिये देर तक बिस्तर पर लेटे रहते हैं ।.कुछ करने को है नहीं तो बच्चो के साथ खेलते है.. और जिस तरह मुंबई में हर संघर्ष करने वाले से पुछो कि वो क्या कर रहा है तो वो यही कहता है कि लिख रहा हूं..वैसे ही नरेश भी अब किताब लिखने की सोच रहे हैं .. और टिकट न मिलने पर जिस तरह नेता कहता है उससे पैसों की मांग की और अब वो सारे राज़ खोल दे गा वैसे ही नरेश अब अपनी कम्पनी के कई राज़ जिसे वो हज़म कर चुके थे अब उगलने की कोशिश कर रहें. है... मतलब नरेश अभी भी नहीं सुधरे .. पर एक बात है वो आजकल ब्लॉग में उभरते हुये पत्रकारों के हीरो के रूप में देखे जा रहे है .. और कई उनके दुशमन रहे लोग अब दोस्त हो गये हैं... हमारी दुआ है कि नरेश को हीरो समझने वाले पत्रकारों का कभी दिल न टूटे...

आपकी खातिर

.... आज फिर ब्लैड प्रेशर 170-100 आया .शगूर भी बढ़ी हुई थी ..पर बन्तों ये मानने को तैयार नहीं थी की वो बिमार है .और उसे कोई परेशानी है ... क्योकि वो जिस समाज में रहती थी वहां औरत को हर वक्त जवान और सेहतमंद रहना ज़रूरी है नहीं तो पति उससे दूर चला जायेगा इसका डर उसे हर वक्त लगा रहता है...
तभी फोन बजता है वो फोन उठाती है ..और बोलती है .हां जी अभी डॉक्टर के पास से आ रहे हैं ..डॉक्टर ने कहा की कोई परेशानी नहीं है ..सब ठीक है .. कोई घबराने की बात नहीं ... दूसरी तरफ से आवाज़ आती हां तुझे तो ड्रामें का शौक है ..यूहीं नाटक करती रहती है.. बन्तों कुछ नहीं बोलती बस हंसतें हुए कहे देती है बस जी यूं ही,,,,
गाड़ी चलाते हुए उसका दमाद अपनी पत्नी को देखता है ..पत्नी बन्तों की तरफ देख कर बोलती है, मम्मी तुम्हे शगूर है, तुम्हे परहेज़ करना है और डॉक्टर ने कहा कि अगर बीपी ठीक नहीं हुआ तो जान का भी खतरा है ..तुम डैडी को सच क्यों नहीं बता देती .. बन्तों कहती है बस तू तो यूंही पीछे पड़ जाती है ..

सब घर आजाते हैं बन्तों, नौकर और बच्चे को छोड कर दामाद और बेटी अपने दफ्तर चले जाते हैं ..बन्तो छह महीने के बच्चे को देख कर कहती है ये क्या जाने क्या सहा है मैनें और क्या क्या सह रही हूं मैं.. अभी दो महीने ही हुये थे बन्तों के जवान बेटे की मौत के ...कि उसके सुसराल वालों औऱ उसके पति ने शुरू कर दिया था कि भई हमें तो अपना वारिस चाहिये हम तो दूसरी शादी कर कर रहे हैं ..बन्तों के घरवालों ने सुसराल वालों को समझाया भी आपकी बेटी भी है दामाद भी है ..ये क्यों कर रहे हैं...पर किसी ने कुछ नहीं सुना आखिर में बन्तों ने ही कहां मैं ही दूंगी आपको वारिस ..सब चौके पर बात सही निकली 53 साल की उम्र में उसने दिल्ली में अपने दामाद औऱ बेटी घर आकर आईवीएफ के द्वारा एक बेटे को जन्म दिया..
इस दौरान उसे बहुत कुछ सुनना और सहना पड़ा और क्या क्या सुनना पड़ा होगा ये आप अच्छी तरह से समझ सकते होगे..पर उसने अपना घर अपनी पति को बचाने के लिये ये कदम उठाया ...तब भी डॉक्टरों ने मना किया था पर बन्तों की भले ही सेहत साथ नहीं थी पर हिम्मत हमेशा से साथ थी जिसके सहारे वो चल रही थी .. अब वापस अपने घर जाने का वक्त पास है पति लेने आ रहा तो उसे लगता है कि वारिस तो मैने दे दिया पर अगर अब उसके पति को पता चलेगा की वो बिमार है तो वो इस वारिस को पालने के लिये दूसरी न ले आये ..क्या क्या वो करे इस ज़िन्दगी की ख़ातिर ....आपकी खातिर...

Friday, December 12, 2008

71 साल

भाग -3
रामनरेश खुश था भले ही हम जितना कहते रहें कि लड़के लड़कियों में कोई फर्क नहीं होता सब बराबर होते हैं.. पर लड़के के जन्म से खुशी और लड़की के जन्म से दुख होना स्वभाविक है..जिसे नकारा नहीं जा सकता .. पर हां रामनरेश एक समझदार और अच्छे व्यक्ति थे उन्होने कभी भी अपनें बच्चों मे भेदभाव नही किया .ब्लकि अपनी लड़कियों को ज्यादा प्यार दिया.. एक बात याद दिला दूं ये फिल्म नहीं है ज़िन्दगी है तीनो बहनो को भी अपने भाई से बहुत प्यार था।
छहों की जिन्दगी बढ़ियां न सही ठीक से गुज़र रही थी घर में एक के बाद एक ईंट लगती जा रही थी एक कमरे से दो ,दो से तीन ,तीन से चार .. और इसी के साथ तन्खाह ,कर्ज़ और जिम्मेदारी भी बढ़ रही थी ...
बच्चों को पढाना,खिलाना आसान न था .. बच्चे जब बाहर निकलते हैं बाहर की दुनिया देखते हैं और दुनिया के साथ अपने को देखते हैं फिर उनको ये एहसास होने लगता है कि वो दुनिया मे कितने पीछे हैं .. फिर बच्चो को ये याद नहीं रहता कि उनके मां बाप ने अपनी और उनकी ज़िन्दगी के लिये कितनी मेहनत की ..वो अपने सपनो में खो जाते हैं ..वो ग़लत नहीं है पर हां नादान है ..
ये ही हुआ रामनरेश के बच्चों के साथ वो अपने मां बाप से प्यार तो करते थे प्यार के साथ एक दूरी भी बनने लगी .. उनकी कुछ पाने की इच्छा होती उसे वो अपने पिता माता से कहते वो उनसे कुछ बहाना बना देते कोई परेशानी गिना देते बच्चे समझदार थे ..धीरे धीरे हसरतों को दिल में दबाना सिख गये मां बाप से कहना छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी का नया रास्ता ढूढना शुरू कर दिया...
किस रास्ते पर चले रामनरेश के बच्चे बताउंगा अगली बारी तब तक अपने विचार भेजते रहिये...

Thursday, December 11, 2008

एक हिन्दू का दर्द

एक हिन्दू का दर्द

हमारे देश में जब भी दर्द का ज़िक्र होता है तब या तो गरीबो का नाम आता है या फिर मुस्लमान का हर भारतीय एक मोर्चा लेकर निकल पड़ता है ..बडे बडे नेता और बड़े बड़े पत्रकार अपनी अपनी दुकान खोल कर ज्ञान बांटना शुरू कर देते हैं ...उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुद्दा क्या मसला क्या है ..उन्हे तो अपने आपको देशभक्त दिखाना है और देशभक्त वो तभी कहेलायेगे जब वो मुस्लमानों के लिये बोले और आवाज़ उठायेगें....
आप ज़रूर सोच रहेगे कि आज मैं क्या कहे रहा हूं.. कौन सी कहानी बताने वाला हूं बात रविवार की है बकरीद से दो दिन पहले की... सुबह सो कर उठा तो पता चला दादी गुज़र गई.. मैं एकदम खामोश हो गया । घर मे रोने की आवाज़ भी मेरे भीतर की खामोशी नहीं तोड़ पा रही थी ।शायद इसलिये कि अभी 26/11 के आंतकवाद में इतनी मौतें देख चुका की आंसू सूख गये थे ...
पर मेरी दादी थी भले ही हमारी कम बात होती हो ..पर एक प्यार तो था ही दोनो के बीच वो भी मेरे लिये निस्वार्थ बहुत कुछ करती थी जिसके बारे में मैं आप को क्या बताऊं शायद आपको कोई रूचि न हो और मै अपने लेख को कमज़ोर नहीं करना चाहता .. मैने भले ही अपनी दादी के लिये कुछ किया हो बहुत कुछ या न किया हो पर आज ये सवाल है कि अब तो मेरा फर्ज़ है कि मै जो कर सकता हूं वो करूं .
दूसरे दिन पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे आने थे पर मैने छुट्टी ले ली ..और दादी की अस्थियां लेकर गढ़ गंगा चला गया वहां पहुच कर पूजा की .. पंडितजी ने बताया कि जब तक दादी की तेरवीं नहीं होती आप सुबह सुबह गाय को रोटी खिलाये .. मैंने कहा हां ज़रूर । मुझे नहीं पता और न ही मैं जानना चाहता हूं कि मरने के बाद इन सब कामों का क्या होता है .. मैं तो बस इतना जानता हूं मेरी दादी से जुड़ी बात है और मुझे ये करना है ...
पुरानी दिल्ली एक ऐसी जगह है हिन्दुस्तान में जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ये बात मैंने अपने पिताजी के दोस्तों के मुंह से कई बार सुनी थी और हर बार मैं इस बात को टाल जाता था ।..पर उस दिन मुझे एहसास हुआ जब मै गाय को रोटी खिलाने निकला .चौकी इंचार्ज मेरे पास आगया कहा कहां घूम रहे हो मैने उसे सारी बात बताई .. उसने मुझ से कहा आप घर चले जाईये.. अभी आप कुछ नहीं कर सकते ..6 से 10 नामाज़ के लिये सब बंद कर दिया जाता है .. मैने पूछा अगर मेरी दादी मर जाती तो भी आप मुझे नहीं जाने देते .. वो थोड़ा रुका और फिऱ बोला हां दस बजे के बाद ही जाने देता.. ....

Thursday, December 4, 2008

त्याग पत्र

आज ऑफिस पहुचां तो एक और विकेट गिर गया था ..यानि एक और सज्जन ने नोकरी छोड़ दी ।छोड़ी या उनसे से छोड़ने को कहा गया ..ये सभी समझते हैं पर सब उसी बात पर विशवास करने की कोशिश करते हैं जो उनको समझाई जा रही होती है।
यानि सच जानते हुये,झूठ पर यकीन करना ,झूठ सुनना, समझना दूसरों को झूठ बताना यही पेशा है ... औऱ इस पेशे में जो होता है, हो रहा है वो ही सच है ....
आज कल टीवी में एक शब्द चल रहा सूत्रों से .सूत्रों के हवाले से ..हमारे सूत्रों ने बताया,हमारे सूत्र कह रहे हैं.. ये सूत्र क्यां है ..सिर्फ और सिर्फ बॉस और पब्लिक को बेवाकूफ बनाने वाला वो शख्स जिसको किसी ने नहीं देखा पर जिसकी बातों को सबने सुना..जब टीवी में न्यूज़ आनी शुरू हुई थी तब ये साफ साफ कहा गया था कभी आप सूत्र जैसे शब्द का इस्तमाल नही करगे है। पर सब कुछ बदल गया नौकरी करनी है जो कैबीन से आने वाले सूत्र कहे वो लिख दो..वरना सूत्र उनको कुछ और बता देगें.....
खैर आप को इस ज्ञान से क्या लेना आपको मसाला चाहिये कि भाई आज कौन सा राज़ खोलेगें... आज कहानी नहीं लिखूं आपको नौकरी करने के गुण बतातऊं..ये बात भी सही है इन बताये गये नियमों में से मैं इन सब को मान रहा हूं या नहीं .ये मत पूछियेगा...तो सुनिये
पहला- जिसके पास कुर्सी है ,जो कुर्सी पर बैठा है वो ही आप का बॉस है ...यानि आप उसके आदमी होने चाहिये जो सत्ता में है ..
दूसरा- पहले नियम से जुड़ा हुआ है .. अगर आप के ऊपर की कुर्सी बदल गयी तो आप भी बदल जायें..नहीं तो आपको ही बदल दिया जायेगा...
तीसरा- देखिये जो आपके ऊपर बैठा है वो ही समझदार है ..ये बात गांठ बांघ लिजिये
आप उससे ज्यादा नहीं जानते इसपर विशवास किजिये...
चौथा- जी सही कहे रहें है.अभी कर देता हूं..हा जी ठीक बात है...बहुत अच्छा..ये आप को हरदम कहना है .हर वक्त कहना है ..
पंचवा- ये याद रखिये ,आप नौकरी कर रहे हैं आप नौकर है ..घर की किस्त देनी है बच्चों को पढाना है बीवी को घुमाना है .. अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास..हमेशा रहे याद...
छठा-सब से अहम बॉस के काम करना जैसे शाम को शराब ला कर देना ,टिकट बुक कराना ..
मिनिस्टर से काम कराना गांव से आम और अनाज पहुचाना.. सर के आते ही उनके बच्चे का हाल और कपड़ो की तारीफ और कल किए गए उनके निर्णय की वहावाही करना मत भूलियेगा....
जब इन नियमों का आप पालन नहीं करेगे तो आप को त्याग पत्र देना ही
होगा... उसने क्यों दिया मेरे सूत्रों ने बता दिया है मै आप को अगली पोस्ट में बताऊंगा....

Monday, December 1, 2008

सलाम

शहीदों के नाम

पसीना मौत के माथे पे आया आईना लाओ
हम अपनी ज़िन्दगी की आखरी तस्वीर देखेगें।।

क्या जाने खयाल आ गया किस बात का हमको
रोके से जो रूकती नहीं अशकों की रवानी ।।

दमे आखिर भी उनका ये अहतराम हुआ ।
उठे न हाथ तो आंखों ही से सलाम हुआ ।।

फरेब खाते रहे एतबार करते रहे
खिज़ा भी आई तो ज़िक्र बहार करते रहे ।।
बहार में भी तलाशे बहार करते रहे ।
तमाम उम्र तेरा इंन्तज़ार करते रहे।।

..... सलाम ... आपको हमारा ...

देखो बहुत हुआ

देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम...
अब जली है वो लौ
जिसको बुझने न देगें हम.
भुगत रहे कई बरसों से
तुम्हारे गुनाहों की सज़ा हम
हर पल हर दम
हिन्दू मुस्लमां बनाये गए हम.
खून बहा हमारा ही
घर जले हमारे ही
सुबक सुबक कर
सहम सहम कर
क्यों जीये अब हम
देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम
जब चाहा तुमने
जैसे चाहा तुमने
मारा हमको
रूलाया हमको
कभी बंदी तो कभी बंधक बनाया हमको
कभी मुसलमां भगवान तो
कभी हिन्दू अल्लाह याद दिलाया हमको
खुद सोये चैन से हमको खूब जगाया तुमने
देखो बहुत हुआ अब न होने देगे हम
हर बार लाशों के ढ़ेर से
सत्ता की सीढी चढ़ी तुमने
खुद पहना सफेद कुर्ता
हमको सफेद कफ़न पहनाया तुमने
जशन बनाया तुमने जीत का
जीत दिलाने वाले को खूब दुत्तकारा तुमने
पहुचें शहीद पर नोटों की सुगात लेकर
कोई एक लाख़ तो कोई एक करोड़ लेकर
पर अब न चलेगा तुम्हारा ये पडयंत्र
देखो बहुत हुआ.....