Thursday, December 31, 2009

इस बार

इस बार
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल
जिसने दर्द दिया
उसे दवा दे
जिसने ज़ख्म दिया
उसे मरहम दे
जिसने आंसू दिए
उसे सब्र दे
जिसने बाण छोड़ा
उसे बांह दे
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल।।
इस बार बदले गी सूरत
इस बार बदले गी मुर्त
इस बार बदले गी तस्वीर
इस बार बदले गी तकदीर
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल ।।

शान....

Tuesday, December 29, 2009

मैं अपनी भतीजी से क्या कहूं।..एक दुखियारी

लड़कियों के लिए क्या बदला

जन्म दिल्ली में हुआ और यहीं पर मैं पढ़ी बड़ी ..शहर के साथ मैने औऱ मेरे परिवार दोनो ने तरक्की की ..जैसा आप सब जानते है जो हाल नौकरी पेशे में होता है वो ही हमारे परिवार का था ना बहुत अच्छा कहेंगे ना बहुत बुरा । ठीक ठीक जिंदगी गुज़र बसर हुई। पर शहर में रहते और बड़े होते मैने यहां अपने साथ बहुत बदसलूकी और बदतमिजी सही।
कभी किसी का विरोध किया तो वहां मौजूद लोगों ने मेरा मज़ाक ऊड़ाया। यहां तक की दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी कहा क्यों बात को बढ़ावा देती हो क्या होगा उल्टे बदनामी होगी। मैं खून के घूंट पीकर सब्र कर लेती कि वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। मेरी दिल्ली सही हो जाएगी।
बसों में मर्दों जिनमें छिछोरे नौजवान हो या पढ़े लिखे या फिर मनचले बुजुर्ग जो मेरे दादा कि उम्र के हुआ करते थे अक्सर मेरे पीछे चिपक जाया करते थे। जब मैं कहती ज़रा ठीक से खडे हो तो उनका जवाब आता अगर बस मे इतनी परेशानी हैं तो टैक्सी में चलाकर उनकी बात सुनकर पूरी बस हंसती । और मैं बिना गल्ती के शर्मिंदा हो जाती।
बाज़ार में कोई सामान लेने जाऊं और दुकानदार बेईमानी करें और मैं उसे टोक दूं तो वो उल्टा मुझसे इस लहजे में बात करना शूरु कर दे कि आंखों से आंसू निकल पड़े। वो ज़ोर से चिल्लाने लगता जानता हूं में तुम जैसी लड़कियों को । मैं क्या मतलब कहूं तो आगे बढ़कर बोलने लगे बताऊं.....मैं फिर चुप हो कर घर आजाती भाई और पिता को नहीं बताती ......जानती थी कि वो उन लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते और कहीं उनको मेरी वजह से परेशानी ना हो कोई मुसिबत ना खड़ी हो जाएं। पुलिस के पास जाकर शिकायत करना तो मुमकिन ही नहीं था। हर दिन मरती और ज़िल्लत सहती मैं बड़ी हुई।
फिर शादी हो गई दिल्ली छोड़क दूसरे शहर चली गई। वक्त के साथ पति के प्यार के सहारे सब कुछ भूल गई जैसे शायद बाकि मेरी बहने भूल चुकी थी. बहुत बरसों के बाद दिल्ली आना हुआ पूरा नक्शा बदल चुका था। बडी बड़ी गाडियां लो फ्लोर बस मेट्रो और ना जाने क्या क्या । मुझे खुशी हुई कि मेरी दिल्ली बदल गई और मैं इस खुमार में आ गई कि शायद लोगों का रवैयय भी बदल गया होगा। पर आज मैने अपनी भतीजी को रोते देखा। तो रहा ना गया। उसके कमरे में जाकर पूछा क्या हुआ बेटा ...तो वो मुझसे लिपट कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और अपने साथ लगातार हो रही दिल्ली के मरदों की हरकतों के बारे में बताने लगी। वो जो जो बता रही थी मुझे उके हर हादसे और वाक्ए में अपने ऊपर गुज़रा हर मंजर नज़र आ रहा था। मैने क्हा लड़कियों के लिए क्या कुछ बदला। आप लोग मेरे सवाल का जवाब देंगे । मैं अपनी भतीजी से क्या कहूं।
आपके जवाब के इंतज़ार में ...........
एक दुखियारी

Monday, December 28, 2009

ऱूख्सत

ऱूख्सत

मुझ को दर्द है ज़माने से
मैं यूही ग़मगीन रहता हूं
तुझसे मिलना है हसरत मेरी
हर शाम ये सोच कर सोता हूं।।

दर्द का रिशता पुराना है
अश्कों का दरिया बहाना है
मैं कई बार टूटा यूही
इस बार टूट के बिखर जाना..।।

न संभालो मुझको
न दो सहारा
दूर कर दो साहिल को
अब की बार मुझको डूब ही जाना है।।

कई बार चढा, कई बार उतरा
रंग हिना का हाथो से
इस बार खून- ने- रंग को भी आज़माना है ।।

मुझसे नफरत करो तो कर ले ऐ दोस्त
मुझसे गिरया करे तो न कर ऐ दोस्त
मुझसे रश्क करे तो कर ले ऐ दोस्त..
मुझसे गमोरंज करे तो न कर ऐ दोस्त..

बहुत हुई नमाज़े शुक्रआना..
शुक्र अल्लाह का कर के जाता हूं..
फिर न आऊंगा इस दुनिया में ऐ शान”
पढ़ दो ऐ दोस्त मेरा नमाज़े जनाज़ा ।।


शान,,

Saturday, December 26, 2009

शान का प्रेम पत्र -3

शान का प्रेम पत्र -3
प्रिय काफी दिनों के बाद तुम को पत्र लिख रहा हूं । इस उम्मीद के साथ जहां हमारी बात और मुलाकात खत्म हुई थी..। वहा पर तुम आज भी रोज़ जाती होगी ..याद आता होगा तुम्हे हर गुज़रा हुआ वक्त ..मेरा भी वो ही हाल है ... उन जगहों और उन लम्हों को मैने समेट कर रखा हुआ है ..जब भी अकेला होता कुछ परेशान होता तो वो गुज़रे हुए पल को अपनी यादों से निकाल कर थोड़ा मुस्कुरा लेता ...अच्छा लगता, शायद ज़िन्दगी में वो जो पल बीत चुकें हैं..उन से अच्छा वक्त न जाने मैं कब देंखू...
कल कुछ अजीब हुआ..दिन रात मेरी आंखों से आसू बहते गए..ज़ोर ज़ोर और ज़ार ज़ार रोने का दिल करने लगा..चाहा रहा था बहुत से ज़ोर से रोऊं, चिल्लाऊं ,चीखूं..पर आवाज़ न जाने कहां दब गई औऱ दबी हुई आवाज़ दबी हुई भावनाओं ने अश्कों का दरिया बना दिया...
ज़हन कुछ काम नही कर रहा था ..बस मैं रोता जा रहा था ..क्यों.. मालुम नही
शायद मैने जीवन में सिर्फ सिर्फ खोया है ..औऱ लगातार खोता ही जा रहा हूं... बहुत कुछ पाने की चाहत है .पर जब दर्पण देखता हूं..तो अपने को अकेला पाता हूं..
सब अपनी अपनी ज़िन्दगी और दिनचर्या मे व्यस्त हो जाते हैं... सब के पास बहुत काम है ..अपने लिये अपनो के लिए। मैं अकेला, जो था उसे खो चुका और जो है वो छूट रहा है...
आज दिल किया तुम से बात करने का शब्दों से अपने दिल का हाल बताने का ...इस आशा के साथ तुम पढ़ कर कभी जवाब नहीं दूगी.. पर वादा करो दुखी भी नही होगी..तुम्हे दुख न हो इसलिये तो मैं तुम से दूर चल गया...

तुम्हारा
शान......

85 साल के तिवारी .... सेक्स के शहंशाह ( कुछ पुरानी बात)

85 साल के तिवारी .... सेक्स के शहंशाह ( कुछ पुरानी बात)


85 साल के एन डी तिवारी तीन जवान लड़कियों के साथ एक स्टिंग आपरेशन में पकडे गए.. कहा जा रहा है तीनो लड़किया देहरादून से आंध्र प्रदेश के राजभवन लायी गयी थी .. जो औरत उन्हे लायी थी उस को तिवारीजी से कुछ काम था ..काम के बदले तिवारी जी को शबाब चाहिये था ।

रात में सेक्स और दिन में मसाज तिवारीजी का शगल है और ये शगल आज का नहीं बहुत पुराना है.. और केवल तिवारी ही नहीं बाकि भी कई सफेद पोश है जिनका कमरे में अपना असली रूप में दिखता है....पर बात पहले 85 साल के सेक्स के शंहशाह एन डी तिवारी की...

बात 2002 की है उस दौरान रिपोर्टिंग के चलते उंत्तराचल का काफी दौरा रहता था स्थानीय पत्रकारों औऱ साथी पत्रकारों से तिवारीजी की रंगीन मिज़ाजी के किस्से सुनने को मिलते रहते थे ...

बाद में चुनाव हुए तिवारी जी उत्तरॉचल के मुख्यमंत्री बने ..तब तो मुख्यमंत्री निवास पर शाम और रगीन रातों की खबर आती ही रहती है..

उन के मंत्रीमंडल का संचालन जो मंत्री जी करती थी .. उनके साथ उनके संबध को शायद ही कोई ऐसा पहाडी हो जो जानता न हो ..उन महिला मंत्री का नाम फिर कभी ..
कहते है तिवारीजी को कम उम्र की लड़किया बहुत भाहती है...और ये शौक उन्हे आज से नही तब से जब कभी वो य़ूपी के मुख्यमंत्री थे..ये बात सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो को मालुम है.....और हां आला कमान को इससी भनक न हों ऐसा क्या हो सकता है...
कितनी लडकियों का उनके दौरा शोषण किया जा चुका होगा ...85 साल के हैं और 50साल से ज्यादा राजनीति में हैं...

हर रात को तीन लड़किया... अब हिसाब आप खुद कर सकते हैं...
रूचिका मामले में राठौर और तिवारीजी में क्या कोई अंतर है...
क्या कांग्रेस उनके खिलाफ भी कोई कार्यवाई करेगी...

इस्तिफा क्या उन लड़कियां को इंसाफ दिला पाएगा..जो तिवारी के डर और रूतबे के कारण कहीं गुम हो चुकी है..

नहीं क्योंकि भ्रष्टचार और बेमानी है हमारे राजनेता के खून में ही है...

सारी पार्टी एक ही थाली में रोटी खाती है ..स्व.प्रमोद महाजन का किस्सा भी सब को याद होगा... औऱ आज भी हमारे मंत्री मंडल में कौन कौन लड़कियों के शौकिन है उनके बारे में क्या हमें मामुल नहीं..लेकिन न कोई कहे सकता है न कोई लिख सकता है..

सोनिया मैडम आज तिवारी का राज़ सब के सामने आ गया क्या बाकियों पर कार्यवाई तब होगी जब उनका कोई स्टिग आपरेशन सामने आएगा...आप से उम्मीद है आप कोई सख्त कदम उठायेगी....।।

Saturday, December 19, 2009

71साल (भाग-८)8

71साल (भाग-8)

घर में खामोशी का माहौल था ...रामनरेश दिल पर हाथ रखे बैठे थे... पास में दोनो लड़कियां मां..बेटा थे। बड़ी लड़की दूसरे कमरे की चौखट पर खड़ी थी .उस जगह जहां से उस कमरे की सारी आवाज़े आसानी से सुनी जा सके जहा परिवारवाले बैठे थे।

कुछ देर तक घर मे सांसे, जलती बुझती टूयब लाइट और पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था... किसी की हिम्मत नही हो रही थी की रामनरेश से कुछ पुछें...धीरे से रामनरेश की पत्नी बोली अरे बताऊ क्या कहा भाई ने ... कुछ देर तक रामनरेश चुप रहे फिर बोले लड़के वालों ने मना कर दिया .... सब के मुंह से एक साथ निकला मना कर दिया ....पर क्यों.... रामनरेश से सारी बात बताई....

शादी हमारे समाज मे कितनी अहमियत रखती है ..हर एक संबध जोडने के लिए हम कितने उतावले होते हैं ..हर खुशी हमारी उसी के आसपास रहती है ..हर पल हम उसी सपने के साथ जीते है... औऱ लडकी का ब्याह मानो एक पहाड अपने सिर में लादे हुए हो ... फिर रिश्ता टूट जाना तो किसी अपऱाध से कम नही.. वो सज़ा जिसमें आंसू और मातम से ही पुरसा दिया जा सके..

न आसू और न ही मातम रामनरेश के घर वालों के लिए नये नहीं थे ..क्यों कुछ पल की खुशी औऱ ज़रा सी हंसी भगवान को मंज़ूर नहीं ।कहते हैं अगर आपने किसी के साथ बुरा नहीं किया तो भगवान आपके साथ कभी बुरा नहीं करेगे..पर ये सब सिर्फ कहावतें हैं..जिनका असल जीवन से कोई सरोकार नहीं.. कोई लेना देना नही...

मुझे तो लगता भगवान ने ग़म और दुख के लिए कुछ लोगों को चुन लिया है ..जिन्हे उसे पीडा ,दर्द, तकलीफ सज़ा देनी ही है ..जैसे कुछ लोगों को सुख सुविधा धन दौलत देना ही है .. और रामनरेश पहले क्रम मे आते है..जहा खुशी और खुशी का पल वो अधूरा खव्वाब है जो पूरा होने से पहले हमारी आंख खोल जाती है नींद टूट जाती है ..और हम पाते है अपने शरीर पर फटी हुई रज़ाई के सिवा कुछ नहीं...

सब उदास थे ज़ाहीर है आप सोच रहे होगे ..की बड़ी लडकी पर पहाड टूट पडा होगा ..कोई खाना नहीं खायेगा..हां किसी ने खाना नहीं खाया ..पर बड़ी लडकी जिसका रिशता टूटा वो किचन में गई और आज उसने रोटी में खूब घी लगाया चीनी डाली और आंसू पोछती हुई ..दिल में कोई निर्णय लेती हुई रोटी चबा रही थी....

आंखे गीली थी पर दिमाग कहीं चल रहा था .. हर चीज़ तो उसने वो ही की जो उसके घरवालो ने कहा..किसी के साथ ज़रा बात क्या कर ली की बात का बतंगड बन गया ।
उसका रिश्ता करवाया जाने लगा..उसके लिए भी उसने मना नहीं किया ..ताया जिन्होने अपने भतीजी भतीजे को कभी प्यार नहीं किया हमेशा उनका अपमान किया उन्होने तो और बुराई का मौका मिल गया ..हममे किढे निकालने और हमारा अपमान करने का।
हर बात तो सुनी अपने पिता की ,,मां की घर की .ऐसा नही ऐसा करो ये सही है ये गलत है .. यूं न करो यूं करो....क्या मतलब क्या फायदा ..नतीजा क्या निकला ..मना कर गए लडके वाले... निकाल गए मुझ में कमी ..अब मैं वो ही करूगी जो मुझे सही लगे लगा ..जो मेरे लिए सही है...
सुष्मा रामनरेश की बड़ी बेटी ..आज कोई फैसला ले रही..इस फैसले से कहां खत्म होगी इसकी मंजिल ..बताऊंगा अगली पोस्ट में तब तक अपने विचार भेजते रहिए...

Friday, December 18, 2009

71 साल (भाग-7)

71 साल (भाग-7)

रामनेऱश अपने भाई के पास जा कर बैठ गए... भाई लेटा रहा वो उनके सिरहाने बैठे रहे..दोनो में काफी देर तक कोई बात नहीं हुई... फिर कुछ देर बाद भाई की पत्नी नीता रामनरेश के लिए चाय ले आई... चाय रखते हुए बोली
भाभी-भई वो मना कर गए....
रामनरेश-मना कर गए..
भाभी-हां उन्हे पसंद नही आया न तुम्हारा घर न तुम्हारे बच्चे और न ही लड़की ... रामनरेश ने भाई से पुछा ..भाई क्या कहे रहीं है भाभी...भाई ने अब जा कर मुंह खोला ..ठीक कहे रही हैं...
रामनरेश – आपको मुझे बताना चाहिए था..
भाई – क्या करता तू ..और मैं..
रामनरेश – पर फिर भी..
भाई- ठीक है और देखेगे..
रामनरेश – पर क्या कहा
भाई-बता तो दिया तेरी भाभी ने...उन्हे पसंद न आई..लड़की..देख रामनरेश ये रिश्ते तो सब भगवान की मर्जी से होते हैं...
रामनरेश को चक्कर आने लगा..आंखे बंद होने लगी ज़िन्दगी फिर वही चली गई जहां से शुरू हुई थी...चाय वही रखी रही ...रामनरेश उठे..बोलते हुए....मैं घर में क्या कहूंगा...भाई और भाभी ..दोनो ने रामनरेश की तरफ देखा ... रामनरेश ने अपने घर की राह ली...
रामनरेश से साइकिल नही चल पा रही थी... क्या क्या ज़हन में विचार आ रहे थे ...क्या जवाब दूंगा..कैसे क्या बोलूंगा...रामनरेश और उनके भाई का घर मुशिक्ल से 3 कि.मी पर होगा। लेकि तीन कि.मी आज 300 कि.ली दूर लग रहे थे ..रामनरेश से चला ही नहीं...जा रहा था... बेटी के रिश्ते टूटने का दुख ..क्या होता है ...
ये कोई भी समझ जायेगा....जो रामनरेश को देखेगा ..

उधर घर में रामनरेश की बीवी बच्चों के साथ बैठी बाते कर रहीं थी।..चलो सही हुआ लड़का अच्छा है भगवान सब ठीक कर देगे.।.इसके बात दूसरी बेटियों का ब्याह भी कर देगें और फिर बहू लायेगें..
.लगता है बात पक्की हो गई...तुम्हारे पिता जी मिठाई लेने चलेंगे होगे..या फिर लड़के वालों के घर ...अरे पैसों का भी तो इंतज़ाम करना है सारी तैयारी भी तो करनी है.।

.नहीं ,नहीं वो सब को बताने लगे होगे..कि हमारी लड़की का रिश्ता तय हो गया बस अगले महीने शादी है...
ये शायद रामनरेश की बीवी की घबराहट थी जो आने वाले डर को शब्दों की तसल्ली दे रही थी ।..उसे लग गया था कि कुछ बात बिगड गई है ..नहीं तो ऐसा कैसे होता की रामनरेश इतनी देर लगाते ...

बाते करते करते सब लोग घर से बाहर निकल आए और गली में रामनरेश का इंतज़ार करने लगे...हाय रे ये समाज लडकी का ब्याह कितनी बड़ी बात ..और रिश्ते का टूट जाना कितना बड़ा अपराध.. ये कोई सदियों पुरानी, किसी कस्बे और ज़िले की बात नहीं है। न ही कोई गांव का हाल ।.ये 21 सदी का भारत और उसकी राजधानी में रहने वालों की सोच है,,,
खैर, रामनरेश गली में पहुच गए.सब की नज़रे रामनरेश पर थी उनका उतरा हुआ चेहरा बता रहा था ..की माजरा क्या है..पर रामनरेश ने परिवार वालों को देख कर मुस्कुराना चाहा..घरवालों को थोडी शांति मिली .रामनरेश पास पहुचे.. लडके ने हाथ से साइकिल ले ली....
.सब रामनरेश की शक्ल देख रहे ..बड़ी बेटी अंदर कमरे में चली गई... रामनरेश दूसरे कमरे ...सब घर वाले बड़ी बेटी को छोड कर रामनरेश के पास पहुचे ..रामनरेश चुप थे ..सब चुप थे... पत्नी ने पुछा क्या हुआ...

क्या हुआ .... क्या था रामनरेश का जवाब और क्या होगी रामनरेश की आगे की ज़िन्दगी का हाल..अब कहानी रहेगी बड़ी बेटी के ईर्द गिर्द... पढते रहिए..और भेजिए अपने विचार...

काश.....

दिल में ग़म
आंखे नम
किससे बयां करूं अपना हाल
कौन सुने मेरी
कौन है मेरा
अपनो को मैने छोड़ा
औरों ने मुझको को छोड़ा
कैसे चलूं मैं इस पथ
जिसमे बसी है तेरी याद
वो याद जो रहती हर पल मेरे साथ
काश तो होती मेरी और मै होता तेरा...
काश..काश ...काश...

Thursday, December 17, 2009

लुटरों ,चोरों औऱ हत्यारों की दिल्ली.....thanks to bihar

लुटरों ,चोरों औऱ हत्यारों की दिल्ली.....thanks to bihar

कहते हैं दिल्ली कई बार लुटी औऱ बसी ..ये बात पहले भी सही थी आज भी सही है .आज भी दिल्ली रोज़ लुट रही है ..रोज़ यहां डाका डाला जा रहा है रोज़ यहां हत्याए और वारदाते हो रही हैं... क्या मैं क्या वो सब एक खौफ के साये में जी रहे हैं...आए दिन यहां अवैध कब्ज़े हो रहे हैं... मुबंई की तरह दिल्ली में भी बिहारियों का बोल बाला होता जा रहा है..नतीजा बिहार में अपराधिरक आकडे कम हो रहे हैं ... और दिल्ली के आकडे बढ़ते जा रहे हैं...

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साफ साफ बिहारियों का नाम भी लिया था पर राजनीति के चलते माफी मागनी पड़ी ... जितनी तेज़ी से आबादी बढ़ रही है उतनी हमारे पास फोर्स नही है जिसके कारण इन पर लगाम लगाना मुश्किल होता जा रहा है,,,,

आइये पिछले कुछ दिनो में दिल्ली मे हुई वारदातों के बारे में आपको बताए...घर सड़क,बाज़ार,ट्रेन कहीं भी दिल्ली वाला सुरक्षित नहीं है ..कोई है जो उन्हे देख रहा है उनके समान पर नज़र रखे हुए है...

16 दिसंबर 2009 दिल्ली का आशोक विहार इलाका.. जौहरी पूरणचंद बंसल के डेढ़ करोड रूपये का बैग लेकर बदमाश फरार हो गए.. उन पर, उनकी कार पर बदमाशो की नज़र पहले से थी जैसे ही वो कार में बैठे बदमाशों ने पिस्तौल दिखा कर बैग छीन लिया।

15दिसंबर2009 –सहित्यकार निर्मल वर्मा का घर निशाने पर था ..उनके यहां से गहने और साथ ही उनका पद्मभूषण सम्मान को भी चोर ले गए ये वारदात दिल्ली के पूर्वी इलाके पटपडगंज की है..शक घर के नौकर पर है ।

2नवम्बर2009- आजादपुर मंडी..करोडों का कारोबार होता है ..और कई बिहारी काम करते हैं.. पर 2नंवम्बर को बदमाशों ने रूपए ले जा रहे दो लोगो को गोली मार दी एक की मौके पर मौत हो गई और दूसरा ज़खमी है ..और ऐसे हादसे मंडी में रोज़ की बात है । ये दिल्ली का उतरी इलाका है ....

27 सिंतबर 2009 को ऐसा हुआ जो पहले सिर्फ फिल्मों में होता है ..शाम को कालका से दिल्ली आ रही ट्रेन पर 6 -7 हथियारबंद लोग चढ़ गये और लोगों को बंधक बना कर लूट लिया..ये ट्रेन हिमालयन क्वीन थी...

इस साल नंवबर तक दिल्ली में लूटपाट की 440 वारदात ,बलात्कार के 400 केस
हत्या के 478 झपटमारी के 711 और डकैती के 26 मामले दर्ज हुए हैं....

जब तक दूसरों राज्यों से लोग यहा आ आ कर बसना बंद नहीं करेगे। उनका ट्रेक रिक़ॉर्ड नहीं रखा जाएगा ...तब तक ऐसी वारदातों को रोक पाना पुलिस के बस की बात नहीं..अगले साल खेलों का आयोजन है विदेशी और देशी सैलानियों को बड़े पैमाने पर आना है।
ऐसे में यही हाल रहा तो दिल्ली के साथ देश का भविष्य भी खतरे में है ।पुलिस पूरी तरह नाकाम हो चुकी है । अगली बार आप दिल्ली आये है तो ज़रा संभल के....ये दिल्ली है मेरी जान .लूट, झपटमारी,चाकू ,बंदूक किसी के भी आप हो सकते हैं शिकार...

Wednesday, December 16, 2009

दंगों के लिए तैयार रहिए....मुस्लमानों को आरक्षण मिलने वाला है....(RANGNATH COMMISSION)

दंगों के लिए तैयार रहिए....मुस्लमानों को आरक्षण मिलने वाला है....(रंगनाथ मिश्रा आयोग)

2006 में रंगनाथ मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी थी.... जिसमें अल्पंसंख्यक समुदायो की भागेदारी पढ़ाई लिखाई और रोज़गार में बढाने के लिए सिफारिश की गई है....
अब क्या क्या सिफारिशे है इसको भी पढ़ ले....
ओवीसी कोटे में अल्पसंख्यक पिछड़े भी शामिल किए जाए...
मौजूदा 27 फीसदी कोटे में 6 फीसदी मुस्लिम पिछड़े हो...
2.4 फीसदी कोटा दूसरे अल्पसंखयक पिछड़ो को दिया जाए....
रंगनाथ मिश्रा कहते हैं ...
हर धर्म और नस्ल के पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए
जिन पैमानो पर हिन्दुओ पिछड़ों को आरक्षण मिलता है उसी तरह मुस्लमानों और इसाईयो के पिछड़ो को आरक्षण मिलना चाहिए..
गैरमुस्लिम और इसाई शैक्षणिक संस्थानों मे अल्पसंख्यक पिछड़ो का 15 फीसदी कोटा (आरक्षण ) होना चाहिए...जिसमे 10 फीसदी मुस्लिम और 5 फीसदी दूसरे अल्पसंख्यक हों...
सरकार इसे संसद में रखने की हिम्मत नही जुटा पा रही है क्योंकि जो हाल वीपी सिंह का हुआ वो इस सरकार का न हो जाए... और फिर से मंडल कमंडल की राजनीति का दौर शुरू हो जाएगा..क्योंकि मंडल आयोग ने जो 27 फीसदी पिछड़ो को दिए है उसी में से 8.4 फीसदी अल्पसंख्यक पिछड़ो को जाएगें...यानि गरीब की रोटी गरीब ही छीन कर खायेगा...जो साफ तौर पर तुष्टीकरण ही है...
सरकार के गले की हड्डी बन गई है ये रिपोर्ट ..क्योंकि इसको पेश और लागू करने के लिए संविधान में भी कई बदलाव करने होगें
रिपोर्ट कहती है
मु्स्लिम और दलितों को आरक्षण का लाभ हो पर हमारा संविधान केवल हिन्दु ,सिख और बौद्ध धर्म में ही दलित हैं कहता है..तो क्या सरकार संविधान में संशोधन करे गई।
15 फीसदी शैक्षणिक संस्थानों मे आरक्षण आएगा कहां से ..क्योंकि साधरण अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे से उल्पसंख्यको को ये फायदा नहीं दिया जा सकता
अगर ओबीसी के 27 फीसदी से ये फायदा दिया जाएगा तो देश में दंगा हो कर ही रहेगा।
और अगर अलग से आरक्षण दिया जाएगा तो आरक्षण का कुल कोटा 50 फीसदी से पार चला जाएगा..तो क्या दूसरे लोग खामोश बैठे गे..और इसकी इजाज़त भी हमारा संविधान नहीं देता ...
अब सरकार टालमटोल करेगी तो जिनके वोटों से जीती है यानि अल्पसंख्यक विरोधी कहे लाएगी...जो उसे बर्दाश नही होगा...
मनमोहन सिंह के वादे के मुताबिक इस सत्र में ही ये रिपोर्ट पेश होगी और संसद तय करेगी कि इस पर आगे क्या कार्यवाई हो...
तय है आने वाले दिन ज्यादा गर्म और खतरनाक हो सकते हैं हम सब के लिए ।।

Monday, December 14, 2009

71 साल (भाग-6)

71 साल (भाग-6)

बाहर राम नरेश के भाई मेहमनों के साथ खड़े थे ..रामनरेश ने सब को अंदर बुलाया औरतों को औरतों के साथ भेज दिया आदमियों को मुख्य कमरे में ले गए... आने वालों में लड़का था ,लड़के का भाई , और लड़के का मामा... औरतों में लड़के की भाभी और मामी थी ।
कुछ इधर ऊधर की बाते हुई..पुछा मम्मी पापा नहीं आए .रामनरेश के भाई बोले भई बस मामा जी हैं जो सब फाइनल करेगें.. इन्ही पर सब छोडा है..एक हंसी ने माहौल को थोड़ा अच्छा किया .. फिर बातों का दौर शुरू हो गया...

लड़का काम काज ठीक ठाक करता है ..किसी एम्बेसी में सही जगह पर नियुक्त है... देखने में उसका भाई भी सही था ... वो भी किसी आफिस मे काम करता है..दो भाई है ..एक बहन जो दोनो भाईय़ों से छोटी है ..पिता खेती बाढ़ी से जुडे हुए है...कहने का अर्थ है ..एक अच्छा नही तो खराब भी नहीं, ऐसा परिवार .पर रामनरेश और उसके परिवार के लिए एक अच्छा रिश्ता ...और वो भी ऐसा रिश्ता जो रामनरेश के भाई की तरफ से आया हो .. जिससे उनके संबध सही नहीं चल रहे थे ... तभी धर में आया छोटा बच्चा जो अंदर औरतों के साथ था, दौड़ता दौड़ता आया और बोला चाचा चाचा चाची बहुत सुंदर है।... फिर ज़ोर दार ठहाका लगा... रामनरेश के भाई बोले लो भी छोटे साहब ने भी मंज़ूरी दे दी ..मामा जी ने कहा हां जी, ..लड़के के भाई ने सिर हिलाया ,..और लड़के ने भी मुस्कुराहट दे कर सहमति दी ।
नाशता लग गया था ...खाने की तैयारी हो रही थी ...।।

आज अच्छा दिन है ..रामनरेश खुश थे बार बार अपने भाई के हाथ जोड़ कर धन्यवाद दे रहे थे .. आंखे नम थी मन ही मन में भगवान का भी शुक्रिया अदा कर रहे थे ...
लड़के को लड़की भी दिखाई गई.. उसमें भी दोनो की रजामंदी नज़र आई... रामनरेश का परिवार खुश है ... पैसे कहां से आएगें शादी के लिए .य़े भी रामनरेश ने पूरा सोच लिया है...
अब चलने का वक्त हुआ ...लड़के और आने वालों को शगुन के लिफाफे भी दिए .. राम राम कर के और खुशी से सब चल दिए..जाते जाते भी रामनरेश ने अपने भाई का हाथ जोड़ कर धन्यवाद किया ।

मेहमानो के जाने के बाद रामनरेश के परिवार वालों में, आने वाले लोगो की बात हुई हम लोग हर बात अपने हिसाब से करते हैं ... जो हम देखना चाहते हैं वो ही देखते है .
सही भी है खुशी कहीं से भी आए औऱ जितनी देऱ के लिए भी आए ..उसे स्वीकार कर लेना चाहिए...रामनरेश के परिवार ने भी यही किया

लड़की भी खुश थी बहने भी और भाई भी ... कैसे शादी होगी , कहा होगी . सोने का सेट, हर तरह की रस्म , रिश्तेदारों को बुलावा, अभी तो बहुत कुछ करना है ।

रामनरेश ने अपनी पत्नी से कहा देखो हमारे भाई ने ही मदद की ..बीवी ने भी सिर हिला दिया.. बस अब वो लोग अपने मां बाप से बात कर ले और जल्दी से तारीख़ रख ले.... भगवान का बहुत बहुत शुक्रिया ।

ज़िन्दगी में बदलाव अचानक आ जाए तो उसके लिए भगवान का आप पर विशेष ध्यान होना चाहिए... पर इतनी आबादी और इतने भगवान को मानने वाले लोगों में आप का नम्बर कब आएगा ..पता नही ..पर जो पता है वो ये कि रामनरेश का नम्बर नहीं आया है ।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन.. एक हफ्ता और पन्द्रहा दिन ... क्या हुआ, क्यों नहीं कोई जवाब आया ..धीरे धीरे धरवालों के चेहरे ग़मगीन होने लगे ।

रामनरेश के भाई भी लौट कर नहीं आए.... पत्नी ने कहा जा कर भाई से तो पुछो..क्या हुआ..सब यहां से खुशी खुशी गए ...पता तो करो....

शाम को रामनरेश अपने भाई के घर जाते हैं...छत से उनकी भाभी देख लेती पर दरवाज़ा खोलने में बहुत वक्त लगा,,, दरवाज़ा खुला तो भाभी के चेहरे में नाराज़गी सी दिखी ... भाई अंदर कमरे में लेटे हुए थे ... रामनरेश अंदर कमरे में जाते हैं ...भाई के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ जाते हैं ..दोनो के बीच खमोशी थी.....

आखिर क्या हुआ ... जो रामनरेश का भाई खामोश था ..और लड़के वालों की तरफ से क्यों नही कोई जवाब आया ..बताऊंगा.. अगली पोस्ट में तब तक आप अपने विचार भेजते रहिए...

Friday, December 11, 2009

मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही क्यों होते है फरेबी लोग...

मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही क्यों होते है फरेबी लोग...

माजिद मियां पांच वक्त के नमाज़ी हैं..और जुम्मे की नमाज़ तो उन्होने शायद ही कभी न पढी हो ..ऐसा मुम्किन नहीं....सिगेरिट पीने का शौक है और वो क्लासिक सिगेरिट पीते हैं जिसकी कीमत पांच रूपए है...
एक बार उनका एक हिन्दु दोस्त अजमेर शरीफ से लौटा तो दरगाह में और आसपास के ठगों के बारे में बताने लगा ..कि कैसे ठगों ने अजमेर स्टेशन से ही उनका पीछा ले लिया ..बड़ी मुशिक्ल से बच कर वो दरगाह के अंदर पहुचा तो देखा की अंदर तो बहुत बडे बडे ठग और लूटरे मौजूद थे ..हर शख्स उन्हे चिश्ती साहब के आज़ाब का डर दिखा कर नोट ऐठने को तैयार था..
एक दरवाज़े जिसे जन्नत का दरवाज़ा कहा जाता है ..उस पर तो बहुत ही बड़ा शातिर लूटेरा हाथों में लठ और ज़मीन पर चादर बिछाए खड़ा था ..चादर पर रूपए पड़े हुए थे .. और लोगों को वो उस चादर पर ही रूपए डालने को कहे रहा था ..
सरकारं ने वहा हिदायत लिख रखी है की आने वाले लोग सरकारी पेटी में ही चढावा डालें.. किसी और को न दे.. दान पेटी में डाला गया पैसा दरगाह की देख रेख में लगाया जाएगा...
तो उसने 100 रूपए निकाले और दान पेटी में डालने लगा...तभी दरवाज़े पर खड़ा आदमी मना करने लगा लेकिन वो तब तक रूपया डाल चुका था पर उसने सोचा की ये इतना कहे रहा तो उसने उस आदमी की चादर पर भी दस रूपए डाल दिए..
बस क्या था ..उसने उसके दस रूपए फेकं दिए और कौसने देने लगा ..और जा कर सरकारी पेटी में आग लगा दी ..
सब ठग जमा हो गए..आदमी उन्हे और तेज़ चिल्ला चिल्ला कर कौसने देने लगा... बुरा भला अपशब्द बोलने लगा..इनके साथ बच्चा था जो डर के मारे रोने लगा बीवी ने जल्दी से निकलने को कहा ..सारे ठग चिश्ती साहब की कब्र छोड कर उनके पीछे लग गए... ऐसा लगा की दंगों में वो फंस गए हो...
माजिद मियां के दोस्त ने उन्हे ये बताया तो वो नहीं माने कहा मियां तुम ऐसे ही बदनाम करते हो ..ऐसी जगह के आसपास तो दुकान दार भी बेइमानी नहीं करते अल्लाह के खौफ से.. उन्हे उसका डर लगता है...
बात आनी जानी हुई ...और माजिद मियां अपनी दुनिया में और अल्लाह की इबादत में गुम हो गए..
जिस मस्जिद में वो जुम्मे की नामाज़ पढ़ने जाते थे ..उसके नीचे ही सिगेरिट की दुकान थी .लेकिन माजिद मियां वहां से सिगरिट नहीं पीते... एक शुक्रवार के दिन नमाज़ पढ़ने के बाद,उनका सिगेरिट पीने का दिल हुआ तो मस्जिद के नीचे की दुकान पर गए और क्लासिक मांगी ..सिगेरिट का एक कश लेने के बाद उन्होने दुकानदार को पांच रूपये दिए ..तो दुकान दार बोला ...एक रूपया और छह की हो गई है..माजिद मियां ने एक रूपया तो दे दिया पर आपा खो बैठे .. तू तू मैं मैं शुरू हो गई... दुकानदार भी कुछ कम नही था ,,पहुचा हुआ था ...बहुत तेज़ तेज़ बोलने लगा ... माजिद मियां जानते थे वो झूठ बोल रहा .पर क्या करते ... कहां तुम्हे पैसे चाहिए थे ऐसे ही मांग लेते ..पर वो हाथापाई में उतारू हो गया..क्लासिक का नया रेट के बारें में बताने लगे .. भीड जमा हो गई ... माजिद मियां ने कहा अल्लाह तुम्हे बरकत दे औऱ य़े.कहे कर घर के लिए चल दिये ..पर उन्हे याद आया.अपने दोस्त .की बात जिसने कहा था....मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही बसते हैं सब से ज्यादा फरेबी लोग.....

71 साल

71 साल
(भाग-5)
सब कुछ जल्दी जल्दी हुआ ... रामनरेश ने अपनी इज्ज़त बचाने के लिए अपनी बड़ी बेटी की शादी की तैयारी शुरू कर दी ..पर ज़िन्दगी इतनी आसान होती तो ... भगवान और अल्लहा की दुकानों पर इतनी रौनक कभी नहीं होती ,,,,,।

आज रिश्तेवालों को आना हैं रामनरेश के बड़े भाई ने रिश्ता करवाया है ..रामनरेश की बीवी को जब रात मे रामनरेश ने ये बात बताई थी ..तभी से वो बहुत परेशान थी।.क्योकि जिस भाई से कभी न बनी जिसने ..रात ही रात को अपना माकान खाली करा लिया वो इतना कैसे मेहरबान की अपने भाई की बेटी के लिए कोई अच्छा रिश्ता लाए...।
पर घर का माहौल ऐसा था की कोई कुछ नही बोल रहा था .. खामोश ज़बा..आंखे नम , दिल भारी .. पर हो रही थी मेहमानों के आने की तैयारी ...।
पैसे जो़ड़ जोड़ कर अपने बच्चों का पेट काट काट कर रामनरेश की पत्नी ने घर की चीज़े जोडी और बनाई थी .. नई चादरें ,पर्दे.खाने के बर्तन ... और भी मेहमानो की खातीर दारी के लिए बाकी सामान....।
नाशते और खाने का प्रबंध किया गया था ...बाथरूम और टायलेट को भी अच्छी तरह से साफ कर दिया गया, नया तौलिया, नया साबुन... शीशे से लेकर फर्श और खिड़की दरवाज़े सब चमक रहे थे...
सुबह के दस बजे तक सब कुछ तैयार ... अब हो रहा था मेहमानों का इंतज़ार ..बड़ी बेटी को भी तैयार कर दिया गया था ..छोटी बेटी और लड़के को भी खामोश रहने की हिदायत दे दी गई....न जाने कौन सा डर सब को सता रहा था ... पर किसी की हिम्मत नही थी की कोई कुछ बोले ..
तभी बाहर के दरवाज़े से आवाज़ आती है ,,,रामनरेश... ये आवाज़ रामनरेश के भाई थी ..उनके साथ कुछ लोग थे .दो औरते ..तीन मर्द और एक बच्चा...
क्या होगा आगे बताउंगा ..अगले अंक में तब तक अपने विचार भेजते रहिए. जो नए पाठको के लिए बाकी अंक इस के नीचे पोस्ट कर रहा हूं.......
भाग -1रामनरेश अपने बेटे के साथ कार में बैठे एक रशितेदार के घर जा रहे थे..तभी बराबर से गुज़रते हुए एक ऑटो पर उनकी नज़र पड़ी, एक विवाहित जोड़ा उनके पास से गुज़रा .. और रामनरेश खो गये अतित में.. जब उनकी नई नई शादी हुई थी ।बहुत बड़ा कदम था .क्योकि वो अपने खानदान में पहले ऐसे शख्स थे जिन्होने अपने खानदान से अलग शादी की थी सब ने साथ छोड़ दिया था सिर्फ एक बहनोई ही उनके साथ थे ..इंगलिश में एम.ए किया था इस लिये अमरोह के मुस्लिम स्कूल में उन्हे नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नही हुई।प्रिसिपलसाहब अच्छे थे और उनको अच्छी सलाह दी और बीएड करने को कहा, मुरादाबाद के हिन्दू कालेज से बीएड किया ...उसी दौरान उनके घर में एक रोशनी आई बेटी के रूप में कहते हैं लड़की लक्ष्मी का रूप होती है ... पर रामनेरश के घर में खर्च बढ़ गया जिसके कारण उन्हे और मेहनत करनी पड़ी । देर रात तक टूयशन पढ़ाने पड़ रहे थे जिसकी वजह वो स्कूल रोज़ देर से पहुच रहे थे ।पसंद करने वाले प्रिंसिपल भी अमरोह छोड़ कर दिल्ली बस गये थे । इसलिये पहले उन्हे नोटिस मिला लेकिन पैसे की ज़रूरत ने नोटिस के डर को भगा दिया ..वो टूयशन बन्द न कर पाये और नौकरी खो बैठे ।बीबी ने कहा क्यो नहीं दिल्ली जा कर प्रिसिपल से बात करते छोटे शहर से बड़े शहर में आना एक आम आदमी में वैसे ही खौफ पैदा कर देता ,लेकिन परिवार चलाने के लिए अपनी औलाद को पालने के लिए इंसान हर कदम उठाने को तैयार हो जाता है । रामनरेश भी दिल्ली आ गए सच सच प्रिंसिपल साहब को बताया ..उनके सरल स्वभाव से वो पहले से प्रभावित थे ....इसलिए कहा की देखता हूं रामनरेश ने कहा उनके पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि वो वापस जा सके ... प्रिसिपल साहब ने पैसे दिये और कहा जल्दी सूचित करेगें.. घर में टूयशन से जो पैसे आते वो इतने नहीं थे कि ज़िन्दगी चल सके... घर का किराया ,राशन, बच्ची का दूघ..ज़िन्दगी में दुख भरने के लिए काफी थे ।...और जब दुख शुरू होते है ...तो वो बस आने शुरू ही हो जाते है ... पत्नी को ब्लड प्रेशर हो गया लो दवाई का खर्च और ..साथ ही मदद करने वाले जीजा ने अपने बच्चे भी भेज दिये, एक खत के साथ भाई रामनरेश ये यहां पढ़ नही पा रहे कृप्या कर के साथ रख लो .तुम्हारे साथ रहे कर पढ़ लेगें ... पढ़ तो लेगे पर खायेगे क्या ...रामनरेश ने सोचा.....लेकिन अगर आपकी नियत सही है तो अल्लाह भगवान आपकी मदद ज़रूर करता है ...दिल्ली से प्रिसिपल साहब ने सूचना भेज दी ..जल्दी से दिल्ली पहुचे एक सरकारी ऐडीड स्कूल मे नौकरी मिली अमरोह मे काफी कर्ज़दार हो गए थे ...शुरू की पगार उसी में चली गई...दिल्ली में एक भाई भी आ गया..मिल कर एक माकान ले लिया.. काफी समय गुज़र गया था इस दौरान रामनरेश के घर दो और बेटियों ने जन्म ले लिया था ... ज़िन्दगी तो बहुत कुछ दिखाती है ,सपनो से आस, गैरों से उम्मीद ,खून से दगा और घर में औरतो का झगड़ा ..आये दिन रामनरेश की बीबी और भाभी का झगड़ा होने लगा ..हर बात से बात बढ़ने लगी ... अंदर इतनी खटास भर गई की दोनो को एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा न रहा ।..बीच बचाव के लिए बिरादरी को बुलाया गया भाई के पास पैसा था, मकान भी उसी के नाम पर था भले ही उसमें पैसे रामनरेश के लगे थे पर मकान रामनरेश को ही खाली करना पड़ा ...साथ ही खाली हो गया विश्वास ... यहीं से शुरू हुई राम नरेश की एक नई जंग...ये बात 1974 की है.....इस जंग से कैसे जीते राम नरेश ..और क्या हाल है राम नरेश का बताऊंगा दूसरी पोस्ट में.. तब तक अपने विचार भेजते रहिए...
71 साल
भाग -2

रात ही रात में घर खाली कर दिया ।पहले किसी जान पहचान वाले के यहां रहे फिर एक कमरा किराये पर ले लिया।रामनेरश ने अपनी तीन बेटियो और पत्नी के साथ ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू किया ।स्कूल दूर था सुबह जल्दी निकलते रात को देर तक टूयशन पढ़ा कर घर वापस आते ।अभी बहुत कुछ करना है बच्चियों की पढ़ाई एक अपना घर ... यही उनका सपना था ।न अपने खाने की फिक्र न पहने का होश दो जोडी कपड़े, एक जोड़ी रबड़ की चप्पल और एक साइकिल.. यही था रामनरेश के पास ..बीवी की भी कमोबोश ऐसी ही हालत थी।
जहां टूयशन पढ़ाने जाते थे उन बच्चों के पिता प्रॉपर्टि डिलर थे ।उन्होने कहा मास्टर साहब एक जगह ज़मीन कट रही है एक प्लाट ले लो । रामनेरश ने कहा भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं की ज़मीन ले सकूं.. प्रॉपर्टि डिलर ने कहा चलिए कुछ दे दिये गा और बाकि बाद में दे देना ...शारीफ आदमी पैसे बाद में दे पर देगा ज़रूर ये बात डिलर जानता था ।
आज रामनरेश जल्दी जल्दी घर पहुचें पत्नी को ख़बर दी ।पत्नी भी खुश हो गयी । मां बाप के खिले हुए चेहेरे देख कर बच्चो में खुशियों की लहर दौड़ गई । और क्यो न हो आखिर कुछ अपना हां अपना घर होने वाला है उनका वो भी देश की राजधानी में । घर में दाल के साथ आजएक सब्ज़ी भी बनी और मीठे में खीर भी थी ..यही इनकी खुशी और पार्टी थी ।
कुछ पैसे दे दिये कुछ देने का वादा कर लिया .. लो रामनरेश को एक दो सौ गज का प्लाट मिल गया ।तब दिल्ली बस रही थी चारों तरफ जंगल थे या फिर खेत थे ।बिजली के लिए लकड़ी के पोल लगाए जाते थे और दूर से लाइन खीची जाती थी ।पानी के लिए हैंडपंम्प प्रयोग में आता था जिसमें मटमैला और बदबूदार पानी आया करता था ।सीवर तो बहुत दूर की बात है नाली तक नहीं होती थी .घरों आगे गड्डे खोदे जाते थे जिसमें पानी जमा होता था ।
रामनरेश और उनकी पत्नी ने जब जगह देखी तो एक दसरे का मुंह देखने लगे पर कुछ कहने की हिम्मत दोनो जुटा नहीं पाये... कैसे ,किस तरह से ,क्या होगा अभी तो चल जायेगा बच्चियां छोटी हैं पर जब बड़ी होगीं .कहां पढ़ेगी,कैसे वक्त कटेगा दोनो यही सोच रहे थे ।पर ये अपनी ज़मीन है हमारा अपना माकान बनेगा इस खुशी के आगे दोनो सब कुछ भूल गये थे ।
माकान बनना शुरू हुआ...भाई तक भी किसी ने ख़बर पहुचाई ..भई तु्म्हारे भाई रामनरेश ने ज़मीन ले ली अब माकान बनवा रहे हैं.. भाई से सुना न गया एकदम से ताना मारा ..अरे पागल हो गया है ..किसके लिये कर रहा है ..बनाने दो साले को इसके कौन सा लड़का है .. तीन तीन लड़कियां है सब कुछ मिलेगा तो हमारे ही लड़को को ...सुनने वाले ने सुना और कहने वाले ने रामनरेश को भी तबा दिया..बात रामनरेश और उनकी बीवी के दिल पर लग गयी ।दोनो खामोश हो गये पर बेटियों ने देखा उस रात मां बाप दोनो को अकेले में रोते हुए ।
माकान बनना शुरू हो गया उन दिनों सिमेंट ब्लैक में मिलती थी ।..इसलिये लोग सिमेंट का कम इस्तमाल करते थे ज्यादा काम गारे यानि मिट्टी से ही होता था चुनाई गारे की ही कराई जाती थी । बड़ी दोनो लड़किया स्कूल जाने लगी थी रामनरेश दोनो को स्कूल छोड़ने के बाद खुद भी पढ़ाने चले जाते थे और उनकी पत्नी अपनी छोटी बेटी के साथ अपनी ज़मीन पर चली आती थी ... पर उनके ज़हन में हर बार अपने जेट की बात ध्यान आ जाती ..आंखे भर जाती है ..मन में कहती ऐ भगवान तुम ही इनको जवाब दो....
एक कमरा लैटरीन बाथरूम तैयार हो गया था। रामनरेश अपने घर शिफ्ट कर गये थे ।इस बीच इनकी बीवी भी गर्भवती हो गई थी । रामनरेश की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई थी ..घर, बच्चे,नौकरी,टूयशन और अब अस्पताल भी ।रामनरेश ने अपनी बहन की बेटी को बुलाना चाहा पर बड़े भाई का रौब ज्यादा था इसलिये बहन ने साफ साफ मना कर दिया ..पर रामनरेश को थोड़ी राहत ज़रूर मिली जब उनकी बीवी की बहन रहने आ गयी ।.चलो बच्चों को तो देख ही ले गी ।
मकान बनाने में काफी कर्ज़ चढ़ गया था । सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में ही बीवी को भर्ती कराया गया था ।सर्दी के दिन थे घर में इतनी ही रज़ाई थी की बच्चों को उढ़ाया जा सके ।इसलिये रामनरेश की पत्नी अस्पताल में बिछने वाली चादर से ही काम चला रही थी । नर्स ने उनको बात भी सुनाई क्यों बहन जब पैसे नही थे तो ये सब क्यो... रामनरेश की बीबी कुछ नहीं बोली बस चुप होकर रहे गयी और एक दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ ऊपर की तरफ देखा .. कुछ दिन के बाद उनके घर में एक लड़का हुआ जिसका नाम रखा नाम ...विजय... जो कभी भी न हारे....

क्या रामनरेश के ग़म विजय के बाद कुछ कम होगे.. कैसे कटेगी आगे की ज़िन्दगी.बताऊंगा ..अगले भाग मे.....तब तक अपने विचार भेजते रहिये.....
भाग -3रामनरेश खुश था भले ही हम जितना कहते रहें कि लड़के लड़कियों में कोई फर्क नहीं होता सब बराबर होते हैं.. पर लड़के के जन्म से खुशी और लड़की के जन्म से दुख होना स्वभाविक है..जिसे नकारा नहीं जा सकता .. पर हां रामनरेश एक समझदार और अच्छे व्यक्ति थे उन्होने कभी भी अपनें बच्चों मे भेदभाव नही किया .ब्लकि अपनी लड़कियों को ज्यादा प्यार दिया.. एक बात याद दिला दूं ये फिल्म नहीं है ज़िन्दगी है तीनो बहनो को भी अपने भाई से बहुत प्यार था।छहों की जिन्दगी बढ़ियां न सही ठीक से गुज़र रही थी घर में एक के बाद एक ईंट लगती जा रही थी एक कमरे से दो ,दो से तीन ,तीन से चार .. और इसी के साथ तन्खाह ,कर्ज़ और जिम्मेदारी भी बढ़ रही थी ...बच्चों को पढाना,खिलाना आसान न था .. बच्चे जब बाहर निकलते हैं बाहर की दुनिया देखते हैं और दुनिया के साथ अपने को देखते हैं फिर उनको ये एहसास होने लगता है कि वो दुनिया मे कितने पीछे हैं .. फिर बच्चो को ये याद नहीं रहता कि उनके मां बाप ने अपनी और उनकी ज़िन्दगी के लिये कितनी मेहनत की ..वो अपने सपनो में खो जाते हैं ..वो ग़लत नहीं है पर हां नादान है .. ये ही हुआ रामनरेश के बच्चों के साथ वो अपने मां बाप से प्यार तो करते थे प्यार के साथ एक दूरी भी बनने लगी .. उनकी कुछ पाने की इच्छा होती उसे वो अपने पिता माता से कहते वो उनसे कुछ बहाना बना देते कोई परेशानी गिना देते बच्चे समझदार थे ..धीरे धीरे हसरतों को दिल में दबाना सीख गये मां बाप से कहना छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी का नया रास्ता ढूढना शुरू कर दिया...किस रास्ते पर चले रामनरेश के बच्चे बताउंगा अगली बारी तब तक अपने विचार भेजते रहिये...

71 साल.भाग-4आप लोग सोच रहेगें होगे कि इतने दिनों के बाद 71 साल की कैसे आई याद .. ज़हन में कहानी पूरी है पर लिखने के लिये वक्त और शब्द तलाश कर रहा था ...बात रामनरेश के बच्चो की..ज़िन्दगी हमारी धूमती है समाज औऱ उसके इर्द गिर्द.. और जब हम अपने दायरे से बाहर निकलते हैं तभी कहानी दूसरा मोड़ ले लेती..ये मोड़ या तो आपकी ज़िन्दगी को किसी मुकाम तक पहुचा देता हैं या फिर आपकी ज़िन्दगी मंजिल तलाशती रहती है ..ऐसे ही रामनरेश के बच्चों के साथ हुआ ।हर चीज़ का अभाव ज़िन्दगी को भावहीन कर देते हैं और हम हर चमक की तरफ दौड पड़ते हैं जो हमे दिख रही होती है ...जिन्दगी में रोशनी की लालसा हमें अकसर अंधेरे की तरफ ले जाती है ... और जब तक हम समझ पाते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है ..राम नरेश को , पड़ोसी ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी एक लड़के के साथ अकसर घूमती देखी गई ..बाप की गैरत करवट पलटती है ..और पुरूष का पौरूष बाहर आजाता है ..पहली बार हां पहली बार रामनरेश की दिवारों ने राम नरेश की शयाद इतनी भंयकर आवाज़ सुनी थी .. घर में मौजूद सब लोग थर्रा गये.. राम नरेश अपने गुस्से को ज्यादा देर तक नहीं रख पाये और फूट फूट कर रोने लगे ..रामनरेश के साथ सब रोये .मां..दोनो छोटी बेटी और बेटा .. सब को देख कर बड़ी बेटी भी रो पड़ी और बोली पापा मैने ऐसा कुछ नहीं किया ..बस कुछ वक्त उसके साथ बिताया .. रामनरेश के आंसू नहीं रोके ..रोते- रोते बोले .बेटा जानता हूं.. मेरे अंदर कमी है ..तुम्हारा जो हक है शायद मैं वो नहीं दे पा रहा.. पर रहे रहा के एक इज्ज़त है वो अगर बची रहे ..तो तुम लोगों की बड़ी महरबानी ..उस रात रामनरेश के घर में किसी के आंसू रूक नहीं रहे थे .कुछ खाना नहीं बना ..रात को रामनरेश ने अपनी पत्नी से कहा अपने भाई से बात करो ..बड़ी बिटिया के रिशते की ...रामनरेश और उनके परिवार का जीवन किस राह चलेगा बताउंगा अगली पोस्ट में ..तब तक अपने विचार लिखते रहिये....

Wednesday, November 25, 2009

बरसी की तैयारी

बरसी की तैयारी
26\11 को पूरा एक साल हो जाएगा .. मुझे याद है जब तकरीबन दस बजे मैने टीवी खोला तो मुंबई के कैफे में किसी लड़कों का ज़िक्र हो रहा था .. शायद कोई दिवाने या नशे में लड़के कैफे में गोली चला रहें है ऐसी खबर थी..फिर धीरे धीरे बात खुलती गई ..और वो बुधवार 26\11 के नाम से दर्ज हो गया..
अब पूरा एक साल होने को है ..26\11 के बाद देश का क्या हाल है और खबर दिखाने वाले चैनलों का क्या हाल है ये बात किसी से छुपी नहीं..
एक साल के बाद हमारे देश का गृह मंत्री सिर्फ माफी मांग रहा है .. सॉरी बोल रहा है...छगन भुजबल आरआर पाटिल पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं ।ये सच है की इस के बाद कोई आंतकी हमला नहीं हुआ ..पर हमारी सींमाएं असुरक्षित हो गईं..इंसानों के अंदर खौफ बैठ गया है ...
इस के लिए नेता और सुरक्षा ऐजेंसिया जितनी ज़िम्मेदार है उतने ही टीवी चैनल .क्योंकि इस हमले के बाद हर चैनल में एतिहासिक बदलाव आया है ..आंतकवाद एक बीट हो गई .. इसके लिए पत्रकार और लोगों को अलग से रखा जाने लगा या सिर्फ इस पर ध्यान देने को कहा जाने लगा.
टीवी चैनलों ने देश में एक क्रांति लाने का काम किया ... तालिबान, पाकिस्तान , लश्करे तैयव्बा हाफिज़ सईद मौलाना महसूद हकीमउल्ला ज़रार शाह बैतुल्ला जैसे नांम देश के बच्चों की ज़बा पर रट गए..
चैनलों ने तो ये भी बता दिया कितनी दूरी पर तालिबान है और भारत में कितनी देर में बस घुस जाएगा ....
अब बरसी मनाने लगे हैं.. उस मंज़र को दिखा कर बार बार याद दिला कर दिला वो उन लोगों को थोड़ी शांति देगे .. और दूसरों को रोचक दृश्य दिखाएगे...
बहुत उमंदा बरसी मनाई जाएगी...
...

Wednesday, November 4, 2009

अब नही रहा जाता खामोश

अब नही रहा जाता खामोश
दरिया भर गया है ..
तूफान बस रूका है
बरस जाए गा बादल
गिर जाएगी बिजली
छलक जाएगा पैमाना
बंद जंबा खुलने वाली है
शायद प्रलय आने वाली ..
क्यों सहूं ज़िल्लत
क्यों सुनु उसकी
इस पेट के खातिर
ये भी अब मुझ को समझ गया है..
बस बुहत हुआ अब खमोश नही रहा जाता ....
शान....

Sunday, October 25, 2009

लो फिर बात चली

लो फिर बात चली
एक हल्की हवा फिर चली
लो तेरी बात फिर चली ।।
हर झोका एक एहसास जगाता है
हर बार एक तमन्ना फिर जग जाती है
कोई कुछ कहता है
पर मन तेरे बारे मे ही सोचता है।।
चलता हूं गुज़रता हूं
जब उन बीते रास्तों से
हर तरफ वो पल नज़र आता है।।
सादगी थी, मसूमियत थी
हम में न जाने कौन सी रौनक थी ..।।
वो ही तारीख वो ही दिन, पर साल बदलते देखे
हमने वक्त के साथ सारे, रिश्ते बदलते देखते ..।।
फिर जब भी कोई ज़िक्र हो जाता है ...
एक एहसास फिर उठ जाता है...
शायद तू भी वो ही सोचता होगा
शायद तुझ को भी वो ही याद आता होगा...।।
लो फिर बात चली
एक हल्की हवा फिर चली
लो तेरी बात फिर चली ....।।

Saturday, October 3, 2009

मां.....

मां.....
क्यों चली गई
बहुत याद आती है
आंख अक्सर भर जाती है
कुछ कहूं ,कुछ करूं
तेरी शबी नज़र आती है
आज मलाल है तेरे जाने का
तेरे लिए कुछ न कर पाने का
मैं नाकारा रहा निक्मा रहा
फिर भी तेरा दुलारा रहा..
वो शब्द अब भी गूंजते है
मैं चली जाऊंगी जब पता चलेगा
वो शायद तब मज़ाक था पर
उस हकीक़त का एहसास अब हो रहा है...
सच मैं मां बहुत याद आती है
शान....

Friday, October 2, 2009

तेरे जाने के बाद

तेरे जाने के बाद
बदल गए हम
बदल दी हर तस्वीर
बदल दी हर याद
बदल दी हर बात
बदल दिए रास्ते
बदल दिए चौहराए
बदल दी हर गली
बदल दिए हर नुक्कड
बदल दी हर पसंद
बदल दिए जो थे संग
बदल दिया अपना रंग
बदल दिया अपना ढंग
बदल दी महफिल
बदल दिए उसूल
बदल दिया इमान
बदल दिया फरमान
बदल दिया माकान
बदल दिया भगवान
फिर भी रहे गया अरमान
काश तुम होते
तो मै न बदलता
तेरे जाने के बाद
शान....

Friday, September 25, 2009

सीवीआई सरकार की रखेल (भाग-1)

सीवीआई सरकार की रखेल
(भाग-1)
शायद कई लोगों को मेरी भाषा पर गुस्सा आए ..मेरे शब्दों से एतराज़ हो ... ये शब्द सख्त ज़रूर हैं लेकिन हैं सच...
सीबीआई बनी थी सरकार के काम काज पर नज़र रखने के लिए..उसमें हो रहे भ्रष्टाचार को रोकन के लिए ..पर सीबीआई की हालत देख कर यही लगता है की सरकार तय करती है सीबीआई कैसे और किस तरह से काम करे...सीबीआई की ऑटोनॉमी की बातें खोखली और बेमानी लगती है.. आईये उदाहरणों से अपनी बात को पेश करते हैं...औऱ चलते हैं 6दिंसबर 1992 बाबरी मस्जिद गिरा दी गई...और बीजेपी और वीएचपी के कई बड़े नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज हुआ.
जिनमे लाल कृष्ण आडवाणी ,मुरली मनोहर जोशी ,उमा भारती और विनय कटियार के नाम सामने आए..
विशेष सीबीआई अदालत में मामले चलते रहे,एनडीए की सरकार बनी और आडवाणी जी गृह मंत्री बन गए ...और फिर शुरू हुआ खेल ..
जब आरोप तय होने थे उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहे दिया अगर मुझ पर आरोप तय हुए तो मैं इस्तीफा दे दूंगा..ये बात आडवाणी पर दबाव बनाने के तौर पर कही गई..अगले दिन आडवाणी जी छूट गए और बाकी सब नप गए...।
पूरे देश में आडवाणी के छूटने पर हाय तौबा मची ..बतौर गृह मंत्री उनपर सीबीआई का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का आरोप लगा..
ये आरोप बेबुनियाद नहीं था क्योकि उससे कुछ महीने पहले कुछ घंटों के लिए सीबीआई को गृह मंत्रालय के अधीन कर दिया गया था लेकिन बाद में इसे कैबीनेट सचिवालय के अधीन किया गया ।
इस के खिलाफ इलाहबाद हाई कोर्ट में अपील की गई । हाई कोर्ट ने सीबीआई द्वारा आडवाणी को दी गई क्लीन चीट पर सीबीआई की आलोचना भी की बाद में यूपीए की सरकार बनी इसने भी सीबीआई के कामकाज में दखल दिया
पहली बार 2004 में जब प्रधान मंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव ने कर्मिक मंत्रालय के सचिव को चिट्ठी लिख कर पूछा कि आडवाणी के मामले में क्या हो रहा है ।।
दूसरी बार सीधे सीबीआई निदेशक को चिट्ठी लिखी गई और पूछा गया कि आडवाणी के मामले में विशेष कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील क्यों नही गई..
सीबीआई कैसे बनी रखेल और किन किन लोगों ने की दलाली भाग दो में पता चले गा।।।।।

Friday, August 21, 2009

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ...

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ...
आज भी किसी सरकारी दफतर जाते वक्त रूह कांप जाती है ..एक डर और खौफ अंदर होता है न जाने क्या होगा ...
मुझे पता है इस लेख से कुछ नहीं होगा ... 62 साल से कुछ नहीं हुआ तो अभी कुछ होगा इसकी मुझे उम्मीद नहीं है पर मैं इसे अपना फर्ज़ समझता हूं की इस बात को आप सब के सामने लाया जाए..
शायद सरकारी महकमे में जाने से पहले हम मानसिक रूप से तैयार रहें.. यहां भाई कुछ भी काम एक बारी में बिना रिश्वत दिए बिना बहस और परेशानी लिए..और बिन ब्लड परेशर की गोली खाए नहीं हो सकता ।
आज ये बात मेरे अकंल ने मुझे बताई जिन की उम्र देश की आज़ादी के बराबार ही है...दुख की बात ये है..ये उस महकमें की बात है.. जो दावा करता है की वो आपकी परेशानी और दुख में आपके साथ है और रहेगा ..जी एलआईसी (LIC)..
अंकल ने रिटार्यरमेंट से पहले एलआईसी का यूलीप प्लान लिया था .15,000 हज़ार सलाना का .. जिसके भुगतान का आज आखिरी साल था और तारीख भी आखिरी थी ...
तो अंक्ल ठीक समय से घर से निकल पड़े .. दिल्ली के जगतपुरी के दफ्तर पहुचें तो पता चला की यहां से ऑफिस हटा दिया गया है ...जिसकी सूचना उन्होने अपने ग्राहकों को नहीं दी ...
वहा किसी को खबर भी नही की दफ्तर का अता पता क्या है ..पूछते –पूछते बारिश हो गई ..और बारिश के बाद दिल्ली का क्या हुआ ये आप सबने आज टीवी पर देख लिया होगा ..
अंक्ल की उम्र बारिश और मानसिक तनाव ..दफ्तर खोजते–खोजते तीन बज कर तीन मिनट हो गए ... जब वो उस खिड़की पर पहुचें जहां चेक जमा करना था उस बाबू ने तख्ती दिखा दी....की वक्त पूरा हुआ..
कई मिन्नतें की गुज़ारिश की पर बाबू अपनी कुर्सी से उठ गया ..शायद उसने दिन भर बहुत काम किया था .. ठीक टाइम पर आता है लंच वक्त से पहले कर लेता है .. और पूरे दिन ख़ाली नहीं बैठता सारे कायदे कानून का पूरा पालन करता है ..
इसलिए भीगे बुर्ज़ग की प्रार्थना भी उनको सुनाई नही दी ..
हर बार कोई न कोई कूढ़ कर सरकारी दफतर से वापस आ जाता है ... क्यो करते हैं ये लोग ऐसा ..अब तो सैलरी भी सरकार अच्छी देती है ..इनके घर में भी लोग होगे जो किसी न किसी दफतर में काम के लिए जाते होगे क्या उन्हे इसका ख्याल कभी आता है... काश कोई सरकारी नौकरी करने वाला इसे पढ़े और बताए.. क्या उनको ज़बरदस्ती कोई नौकरी करा रहा है .. जो वो ऐसा करते है ...
शायद ये अब भाषण हो रहा है ...जिसका कोई महत्व नहीं होता .....

Thursday, August 20, 2009

जंसवत शहीदे -आज़म

जंसवत शहीदे -आज़म

जसवंत सिंह की बीजेपी से विदाई हो गई है और विदाई भी ऐसी वैसी नही पार्टी ने बड़ा ही बेआबरू कर के उन्हे निकाला हैं । ऐसा सलूक तो आज के ज़माने में किसी स्कूली बच्चे के साथ भी नही किया जाता है। लेकिन जसवंत सिंह के साथ बीजेपी ने किया और जसवंत सिंह ने उसे बर्दाशत भी कर लिया, आप सोच रहे होंगे कि बर्दाशत ना करते तो और करते क्या , तो आप भी सही हैं। बीजेपी की मुख़ालफत करने वाले जसवंत सिंह के साथ हुए ऐसे सलूक पर बीजेपी को कोसने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे। अगर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान कि अगर बात की जाए तो वहा के मीडिया ने तो जसवंत को शहादत का दर्जा तक दिलवा दिया , एक ऐसा शहीद जिसे सच सामने लाने के लिए उसके अपनों ने ही बलि चढ़ा दी । ये बात भी खूब ज़ोर शोर से उठाई जा रही है कि जसवंत की संघ से नज़दीकी ना होना भी उनकी पार्टी से विदाई की वजह बनी । लेकिन एक बात जो कोई समझ नही रहा कि जसवंत को दरअसल उनका लालच ले डूबा।
..... ज़रा सोचिए, जसवंत सिंह क्या आपको इतनी कच्ची गोलियां खेले हुए लगते हैं कि जिस पार्टी और विचारधारा के लिए उन्होंने एक उम्र गुज़ार दी उसे समझने में उनसे इतनी बड़ी गल्ती हो गई कि , उसके बिल्कुल उल्ट जाकर उन्होंने अपनी किताब लिखी। या क्या आपको लगता हैं कि जसंवंत सिंह में इतना बूता हैं कि उन्होंने अपना राजनैतिक भविष्य दावं पर लगाने का फैसला लिया सिर्फ अपने विचारों के लिए । दरअसल इन दोनों ही तर्कों पर विश्वास करना मुश्किल हैं क्योंकि जसवंत सिंह एक मंझे हुए राजनेता हैं , एक ऐसे राजनितिज्ञ जो वित्त विदेश औऱ रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं और अपने राजनीतिक भविष्य पर तो वो बीजेपी से निकाले जाने के बाद भी विराम लगाना नहीं चाहते तो फिर एक किताब के लिए वो इतना बड़ा दांव कैंसे लगा सकते हैं आप खुद सोचिए।
.....सच तो ये हैं कि जसवंत के मन में अब पार्टी में अहम भूमिका में आने की इच्छा हिचकोले भर रही थी। लोकसभा चुनाव में जिस तरह पार्टी को हार मिली उस पर मंथन के लिए पत्र लिखकर आग्रह करने वाले जसवंत ही थे और तब भी मकसद उनका यही था कि हार पर मंथन से वो अपने लिए अमृत हासिल कर सके। जसवंत को उम्मीद थी हार कि वजहों में पार्टी की कट्टरवाद छवि का ज़िक्र ज़रुर आएगा। पार्टी का नेतृ्त्व बदलना भी तय ही मान रहे थे जसवंत । उन्हे लगा ऐसे में सबको तलाश एक ऐसे नेतृत्व की होगी जो धर्मनिर्पेक्ष हो। तो खुद को सबसे बड़ा धर्मनिर्पेक्ष साबित कर दिया जसवंत सिंह ने खुद को अपनी किताब..... जिन्ना, भारत विभाजन के आईने में। और किताब के विमोचन के लिए वक्त तय किया गया ठीक चिंतन बैठक से पहले का। अब समझ गए होंगे आप जसवंत सिंह का सारा खेल
दरअसल जसवंत सिंह ने अपनी तरफ से कौ़ड़ी तो बड़ी दूर की चली लेकिन उनका दांव उल्टा पड़ गया और अडवाणी कैंप ने उन्हे पार्टी से बाहर का रास्ता दिख दिया। जसवंत से भूल बस ये हुई कि जिस लालजी ( लालकृष्ण अडवाणी ) को वो अपना समझते थे उन्ही को वो सही से नहीं समझ पाए। जसवंत को नही पता था कि उनका यशवंत सिंहा और अरुण शौरी कैंप में जाना आडवाणी को नागवार गुज़रा है और ना ही जसवंत को इस बात का अंदाजा था कि पीएम इन वेटिंग अभी अपना इंतज़ार खत्म नही करना चाहते इसी लिए वो अपनी हर चुनौती को जड़ से मिटाने में देर नही करेगे।

Sunday, August 16, 2009

कुछ अधूरे काम बचें...

कुछ अधूरे काम बचें...

उम्र साठ साल ..
नौकरी से मुक्त
बच्चों की ज़िम्मेदारियों से रिहा..
न कर्ज़ न कोई फर्ज़..
जी लूं तो ठीक..
न रहूं तो भी सही..
कोई आए तो अच्छा
न मिले तो बेहतर..
भगवान की शरण में
तीर्थ स्थानों में
मंदिर में, दरगाहों में
इस से, उस से
जहा और जिससे वक्त गुज़र जाए
वो बेहतर
पर कुछ पूरा करने की चाहत में
कुछ हसरतों के एहसास में
उम्र के कुछ दिन बचें हैं..
कुछ अधूरे काम बचें हैं..
कभी किसी का दिल तोड़ा
कभी कोई रिश्ता छोड़ा
कभी इस फिराक में
कभी उस जुगाड़ में
इससे लिया उसको दिया
वहां अच्छा बना तो वहां बुरा बना
किसी का भला किया तो किसी की भुला दिय़ा ..
ज़िन्दगी के इस मुकाम पर
कुछ अधूरे काम पड़े हैं...
मां की गोद से कब ज़मी पर चला
बाप की उंगली से कब छूट गया
जाने किस रिश्तो से घीरा
किस बंधन में बंधा ..
सोचता हूं मैं
क्या मैने सब कुछ पूरा किया ..
सागर की लहरों में मोतियों की खोज से
ज़िन्दगी के इस पल में कुछ
अधूरे काम बचें है.......
शान.....

Friday, August 7, 2009

अमरनाथ यात्रा ..एक नज़र

अमरनाथ यात्रा ..एक नज़र
पिछले कुछ सालों से अमरनाथ यात्रा के साथ कोई न कोई विवाद जुडता रहा है ।कभी शिव लिंग पिघल जाता था तो कभी ज़मीन को लेकर खूनी संधर्ष शुरू हो जाता था ...पर शुक्र है इस बार आंतकवादियों की धमकियों के बावजूद अमरनाथ यात्रा बिना किसी विवाद और हिंसा के मुकम्मल हुई ।
दो महीने चली इस यात्रा को मौसम की वजह से श्रद्धालुओं को कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा और यात्रा को बीच में रोकना भी पड़ा पर अंत भला तो सब भला ..
सरकार ने कड़ी सुरक्षा का इंतज़ाम किया था 4लाख तीर्थ यात्रियों ने 3880 मीटर ऊंचाई पर शिवलिंग के दर्शन किए ।रास्ते काफी मुश्किल भरे थे दर्शन और कठीन हो जाता है जब वहां का लोकल आदमी अपनी मनमानी करने लगता है..
चलने और अपनी ज़रूरत की चीज़ों के लिए आम श्रद्धालु उन पर ही निर्भर करता है और वो अपनी मनमानी करने से बाज़ नहीं आते ..इस मुद्दे पर हर कोई खामोश है ..ज़ीमन विवाद की एक बड़ी वजह ये भी है तभी वहां का लोकल आदमी अमरनाथ ट्रस्ट को ज़मीन दे जाने का विरोध करता है क्योकि तब उनकी गुंडा गर्दी नहीं चल सकती ।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस के उपमहानिरीक्षक नलिन प्रभात ने पत्रकारों से कहा, "यात्रा के दौरान लश्कर-ए-तैयबा सहित कई आतंकी संगठनों से इस यात्रा पर हमले का खतरा बना हुआ था...लेकिन हमने तीर्थयात्रियों को निशाना बनाने की आतंकियों की सभी कोशिशों को सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया."
यात्रा के दौरान सेना ने चोटियों पर सुरक्षा का जिम्मा संभाल रखा था और सीमा सुरक्षा बल के पास यात्रा मार्ग की सुरक्षा का जिम्मा था.
ये तारीफ के काबिल है पर शिवलिंग तक पहुचते पहुचते जो श्रद्धालुओं को शोषण और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है उस पर भी हमें नज़र ज़रूर रखनी चाहिए... तभी हम कहे सकते हैं शुक्र है यात्रा सफल हुई......

What an idea सरजी.....

What an idea सरजी.....
इस विज्ञापन ने देश में क्रांती लाई हो या न लाई हो पर न्यूज़ चैनल वालों ने इसे अपना गुरूमंत्र मान लिया है । आज एक ऐसे ही आईडिए की तलाश में हर चैनल धूम रहा है..टीआरपी तो बेवफा है एक दिन ठुकरा ही देती है ..इसीलिए एक ऐसा कार्यक्रम चाहिए जिसे दर्शक गले लगा ले और चैनल बाज़ी मार जाए...
ज़ोर शोर से तैयारी है इस बार तो कुछ कर जाएगें अपने दिग्गजों को छोड़ा है वो कुछ नया लाएगें..अपने पास जितना दिमाग था उतना लगा दिया ..एक नया कार्यक्रम अपने चैनल पर ला दिया...सब ने बॉस की बहुत तारीफ की सर क्या बात है ,,ये तो हीट है...पर हफ्ते भर बाद नतीजा आया... मामला फिसससससस.....
क्या करें जनाब ये भी लोगों को पसंद नहीं आया ... कारण खोजने चले तो जिन्होने तारीफ की थी वो ही अब बुराई करने लगे ..सर ये हो जाता तो अच्छा था ,सर ये कर लेते तो ठीक था ... अबे उस वक्त क्या सांप सूंध गया था या लक्वा मार गया था जो मुंह से आवाज़ नहीं निकली ...
जी यही हाल कमोबेश हर चैनल का है ..एक नई चीज़ की तलाश ..अब तो स्टिंग आपरेशन भी नही रहे , साधू पंडित भी लगातर फ्लाप हो रहें है.. तर्क वितर्क में हमारा एंकर अपना ऐसा ज्ञान देता है की गेस्ट के साथ दर्शक भी पल्ला झाड लेते हैं...दूसरे चैनलों से चोरी की वो भी नहीं चली ...राखी सांवत की सगाई की भी खबर बना दी ...अब कहां से लाए और मसाला ...
लगातार लोगों की रूचि न्यूज़ से हटती जा रही है कारण जानने चले तो सब बोले भाई अब न्यूज़ रहीं कहां...अब सवाल है कहां गई न्यूज़...इस सवाल से बड़ा सवाल है की न्यूज़ होती क्या है ....
काली दाढी में सफेद बाल वाला पत्रकार ..कंधे पर खादी का झोला लटाकए रखने वाला पत्रकार ,ब्लैक बैरी फोन पर लिखता पत्रकार, या लैप टॉप लिए फिरता पत्रकार ..सब तलाशते दिख रहे हैं एक नए idea ... को...
पर आईडिया है की आता ही नहीं....मंदी की मार झेल रहे देश में सब से ज्यादा जो मंदी है वो नए idea की ही है...
इस ब्लाग को हर चैनल वाले पढ़ते हैं..इसलिए दोस्तों अगर आप के पास कोई IDEA हो तो ज़रूर लिखे शायद आपका IDEA पढ़ कर कोई चैनल वाला कहे दे WHAT AN IDEA SIRJI….

Friday, July 31, 2009

इमरान हाशमी को घर नहीं क्योकि वो मुस्लमान हैं....

इमरान हाशमी को घर नहीं क्योकि वो मुस्लमान हैं....

आज सुबह से खबर चली की इमरान हाशमी को बांद्रा की एक सोसायटी मकान नहीं दे रही है क्योंकि वो मुसलमान है।
इमरान हाशमी किस तरह के मुस्लमान हैं ये दुनिया जानती है पर ये मुद्दा बहुत संवेदनशील है ..
आज से कुछ अरसे पहले एक टीवी चैनल ने भी कई प्रॉपर्टी डीलरों और सोसायटियों मे जाकर ये पता किया था की क्या सच में मुस्लमान या अल्पसंखकों को माकान आप लोग नहीं देते है..आप सच मानिए वहां से जवाब हां ही आया था...
इमारन हाशमी ने आज जो मुद्दा उठाया उससे शायद लोगों की सोच में परिवर्तन आए..पर ऐसा होगा ये मुमकिन नहीं लगता ..
बात सन 2,000 की है, मुबंई के आधुनिकता की बातें मैने बहुत पढ़ी थी ,,,और मुबंई जाना एक सपना था और सपना मेरी पहली नौकरी ने पूरा किया ... मेरा और मेरे एक सीनियर का ट्रासफर मुंबई हो गया ।..
कुछ दिन हम कंपनी के गेस्ट हाउस में रहे फिर तलाश जारी हो गयी माकान की ... हर जगह अलग बातें दोनो के नाम पूछे जाते फिर एक से अच्छे से बात की जाती और दूसरे को हीकारत की नज़र से देखा जाता .. हम लोग मीडिया में थे तो ये बात कभी ज़हन में नहीं आती की हम भी हिन्दु या मुस्लमान हैं.. पर देश की आर्थिक राजधानी ने हमे ये बता दिया की हर धर्म के लिए यहां नज़र अलग है ..
पहले कंपनी से लेटर हेड पर लिखाने को कहा, वो हो गया ..पुलिस से एनओसी लाने को कहा, वो आ गई.. फिर पैसे जितने लेने चाहिए उससे ज्यादा मांगे ,,वो दे दिए.. फिर आखिर में उसने कहे ही दिया की आपके के साथ ये मुस्लमान है इसलिए आपको माकान नहीं मिलेगा...
कई बार सोसायटी ने मिटिंग के लिए बुलाया ...फिर साफ साफ कहे दिया कि हम सरदार और मुस्लमान को माकान नहीं देते और हम ही क्या मुंबई की 70 से 80 या ज्यादतर सभी सोसायटी का यही नियम है.... अगर आप अकेले रहना चाहे तो रहे लिजिए पर मुस्लमान के साथ नहीं....
मेरे सीनियर ने कहा मैं इसे नही छोड़ सकता... उन्होने कहा फिर आपको माकान नहीं मिल सकता... और हमे हिन्दु सोसायटी में माकान नहीं मिला .. ये उन जगह की बाते है जहां मुंबई को पढ़ा लिखा तबका रहता है । बाद में एक मुस्लमान के माकान में हम रहे..
2006 में मुंबई से दिल्ली आने पर भी यही सब का सामना करना पड़ा .. और इस बार दिल्ली का मयूर विहार और वसुंधरा इलाका था ..यहां पर भी वो ही सवाल और वो ही जिरहा....
बदलते वक्त के साथ हमारी सोच न बदल सकी ..कई बार ये मुद्दा उठाया गया शबाना आज़मी और जावेद अख्तर ने भी उठाया था पर कुछ न हो सका ।कई बड़े मुस्लिम पत्रकार भी इस स्थिति का सामना कर चुके फिर भी कुछ न हो सका .. शायद इमरान की बात और मुद्दा भी यूंही रहेकर रहे जाए.. पर एक बार फिर सवाल उठा है ..किसी जवाब के इंतज़ार में.......

Monday, July 27, 2009

नज़ीर बनारसी की नज़्म

नज़ीर बनारसी की नज़्म

किसने झलक पर्दे से दिखा दी।
आंख ने देखा दिल ने दुआ दी।।
होश की दौलत उनपे गवां दी।
कीमते जलवा हमने चुका दी।।
रात इक ऐसी रौशनी देखी।
मारे खुशी के शम्मा बुझा दी।।
तुमने दिखाए ऐसे सपने ।
नींद में सारी उम्र गवां दी।।
पूछें हैं वह भी वजहे –खमोशी।
जिसके लबों पर मोहर लगा दी।।
उनको न दे इल्ज़ाम ज़माना ।
खुद मेरे दिल ने मुझको दगा दी ।।
आंच नज़ीर आ जाए न उन पर।
दिल की लगी ने आग लगा दी ।।

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

सुबह सुबह ऑफिस पहुंचा तो दाढ़ी वाला बॉस अर्विन्द पर चिल्ला रहा था... बाहर जो आवाज़े आ रही थी उससे ये ही सुना जा रहा था की आप को बिल्कुल लिखना नहीं आता है..ऐसे नहीं लिखा जाता.. सब कुछ मैं ही बताऊं आपको... कैसे चलेगा, मुझे ये पसन्द नहीं....
ये बाते पढ़ कर आपको लग रहा होगा की अर्विन्द कोई नया लड़का होगा और उसने कोई स्टोरी लिखी होगी जिसे बॉस ने खारिज कर दिया ..ऐसा कुछ नहीं है...
हम लोग अर्विन्द को (जी’) यानि अर्विन्दजी कहे कर बुलाते हैं... टीवी में लिखने की समझ उन्हे जितनी है..शायद ही किसी को हो या बहुत कम को हो...तस्वीरों और आवाज़ों के साथ किस तरह शब्दों को पिरोना है उसमें उनकी महारत है ....पर बॉस को नहीं पंसद...
अब कुछ बॉस का भी परिचय हो जाए.. बिहार की ट्रेन पर चढ़ कर आ गए.. अपने भाईया के पास जो आई ऐ एस की तैयारी कर रहे थे ।बस सलाह मिल गी ऐ जी आप पत्रकार क्यों नहीं बन जाते है सुरेश भईया मोतिहारी वाले है न चैनल में वो रख लेगें या कही रखवा देगे... बस बॉस ने पत्रकारिता किसी तरह कर ली दाढ़ी रख ली और बन गए पत्रकार .....
किस्मत के तो पहले ही बुलंद थे और दिल्ली में पत्रकारिता का क्षेत्र देखें तो पूरा बिहार ही दिखता है हर तरफ उन्ही की भाषा और उन्ही की तरह दिखने और बोलने वाले और उन जैसे ही तौर तरीके वाले आप को दिख ही जाएगें ....
बॉस के बड़े भाई हर जगह थे कोई किसी ज़िले का तो कोई किसी और ज़िले का ..बस पहुच गए बॉस की कुर्सी तक...
और जब बॉस बन गए तो बॉस के हाव भाव कैसे होने चाहिए वो भी सीख गए..
आज अर्विन्दजी को कहे रहे हैं ..आप भले ही अच्छा लिखते हों पर मुझे पसंद नही...बात आगे बढ़ाने से पहले मैं एक बात और बताता चलूं पत्रकारिता की शुरूआत में बॉस अपना लिखा हुआ लेख अर्विन्दजी से ही चेक करवाते थे ...
खैर छोडिए अब मुद्दे की बात करते हैं की ये सब बताने के पीछे कारण क्या है...
आज गिरते हुए न्यूज़ चैनल के स्तर की वजह क्या है ....ये ही है....कि मुझे नहीं पसंद .. जी मुझे... चैनल में लोगों को क्या पसंद क्या सही है क्या ग़लत है किस तरह से क्या पेश करना चाहिए..कुछ मायने नही रखता जो मायने रखता है वो ये की आप का बॉस क्या चाहता है...और बॉस को क्या पसन्द है...
बस ये (मैं) ले डूब रहा चैनलों को इतनी जल्दी जो न्यूज़ चैनलों का बुरा हाल हो रहा उसकी वजह यही है । क्योंकि यहां मौजूद कोई भी टीवी का आदमी नहीं सब एक दूसरे के आदमी है और उन्ही को खुश करने के लिए यहां काम चल रहा है ...
जो लिखा जाता जो दिखाया जाता वो किसी न किसी दाढ़ी या सफेद बाल वाले की पसंद होता है..न की टीवी में क्या दिखाया जा सकता है क्या दिखाना चाहिए .
.इस पर विचार नहीं होता किसी की हिम्मत नहीं होती की ऐसे लोगों को काटे क्योंकि ये लोग इतने असुरक्षित है की किसी को सुनना इन्हे बर्दाशत ही नही
बस अपने अहम के साथ सीमित... कुएं के मेढ़क की तरह...और घीरे हुए अपने चापलूसो और चम्चों से.
...ये एक सच है जिसे हम सब को स्वीकार कर लेना चाहिए...जब तक बदलाव नहीं होगा तब तक दर्शक खबरों के मतलब ही खोजते रहेगे......और न्यूज़ चैनल के हेड अपनी जेब भरते रहेगें.....।।

Saturday, July 18, 2009

जिन्दगी चल नहीं रही दौ़ड़ रही है

जिन्दगी चल नहीं रही दौ़ड़ रही है

काफी दिनो के बाद लिखने बैठा तो जाना की ज़िन्दगी बहुत ते़ज़ दौ़ड रही है ..जब रूक कर देखा तो पाया बहुत कुछ आगे निकल गया है। आज अपनी पोस्ट में उन का ही ज़िक्र करूगां जो आगे निकल गये..
जब अपनी आखिरी पोस्ट लिखी थी तब फ्रांस में बुर्के पर पांबदी लगाई गई थी..उसके बाद ही ज़िन्दगी के चक्र में बहुत व्यस्त हो गया ऑफिस में बजट और घर में बेचैनी। इसी बीच ब्लॉग पर कुछ लिखने का मन तो बहुत किया पर थकान के मारे लिख ना सका। फिर कुछ दुनिया में और देश में ऐसे हादसे और वाक्ए गुज़रे कि ज़िंदगी सुन हो गई ।
इसी में से माइकल जैक्सन की दुखद मौत भी एक है। माइकल जैक्सन की मौत ने ये सोचने पर मजबूर किया कि इंसान एक लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ता है और उस मुकाम पर पहुंचने पर कितना बिखर जाता है । पैसा दौलत शौहरत सब हासिल हो जाता है पर सब मिलने पर फिर यही सवाल रहता है कि अब क्या , और क्या । माइकल की मौत भले ही दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी हो पर उसकी मौत एक बात ज़रूर पुख्ता कर देती है कि वाकई एक कलाकार की ही मौत थी, क्योंकि आज तक जितनी भी बड़ी हस्तियों की मौत हुई उन सब की मौत के बाद लोग विभाजित हुए हैं पीर हों पैग्मबर हों या फिर कोई अवतार पर जैक्सन की मौत पर दुनिया के हर शहर हर गली में उसके संगीत से लोगों की आंखें नम हो गई।
दूसरी बड़ी खबर मैं टी-20 विश्व कप में पाकिस्तान की विजय का भी जिक्र करूंगा क्योंकि जिस दौर से पाकिस्तान गुज़र रहा हैं वहां जीतना वाक्ई में काबिले तारीफ हैं। जहां दुनिया का हर शख्स पाकिस्तानियों को शक और नफरत की नज़र से देखता है वहां इस जीत से उनको मिली तारीफ उन्हे एक नई कुव्वत ज़रूर देगी ।
इसी बीच चैनल की टीआरपी में भी काफी उल्ट फेर हुए...एनडीटीवी अपनी बादशाहत कायम करने के लिए..पायदानों में बढौतरी कर रहा है..सहारा समय भी न्यूज़-24 को पीछे धकेल चुका है....
और साथ ही धब्बा लगा मोदी की साख पर भी आदर्श आचरण नैतिकता और भी बड़े बड़े शब्दों का बखान करने वाली बीजेपी और मोदी की सरकार का ही एक पार्षद नकली शराब से लोगो की जान लेने का आरोपी पाया गया । ये बात तो सब जानते है कि गांधी के राज्य में गांधी के विचारों पर मोदी सरकार नही चलती पर इतना गिर चुकी हैं इसका अंदाज़ा नही था। इसी के साथ में आपको एक वाक्या बताता चलूं पिछले विधानसभा चुनाव में मैं गुजरात के दौरे पर था वहां नवसारी जहां रतन टाटा का पुशतैनी घर हैं वहां पर भी जाना हुआ । नवसारी के लोगों से बात हुई तो उनका कहना था कि जो हमें शराब देगा उसी पर वोट पड़ेगा ।
शराबबंदी के राज में जहां खुलेआम लोग उसे वोट देने की बात कह रहे थे जो उन्हे शराब दे । जब हमने ये खबर आम की तो हमें इसका काफी विरोध झेलना पड़ा था। खुद मोदी ने हमारी इस रिपोर्ट पर सवाल खड़े किए थे और हमें काग्रेस का पिट्ठू करार दिया था। और आज उनकी खामोशी या शर्मिंदगी पूरे देश में जग ज़ाहिर है कि मोदी औऱ बीजेपी का असली चेहरा क्या है।
दिल्ली में मेट्रो का हादसा और देश में सूखा फिर कहीं बाढ़ ने भी मुझको बहुत दुखी किया ।
प्रधानमंत्री का नैम की बैठक में शामिल होने के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी से मिलना भी काफी अहम था। इस मुलाकात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज भारत पाकिस्तान की जगह खड़ा है। दरअसल पिछले करीब दो दशकों से पाकिस्तान भारत से कहता था कि पहले कश्मीर का मुद्दा सुलझाओं फिर कोई बातचीत होंगी , पर भारत का नज़रिया था कि कश्मीर मुद्दे को बातचीत से जोड़ना ठीक नही । अब वहीं हाल भारत का हैं , भारत चाहता था कि पहले 26-11 के गुनाहगारों को सज़ा हो फिर बातचीत बढ़ाई जाए लेकिन पाकिस्तान इस बार कामयाब रहा आतंक के मुद्दे को समग्र वार्ता के मुद्दे से अलग करवाने में । यानी अब जो बड़े मुद्दे है , चाहे आतंक हो , या कश्मीर उन्हे एक तरफ रखकर बातचीत जारी रहेगी ।

गुलाम नबी आज़ाद का परिवार नियोजन का नया तरीका भी पिछले दिनों चर्चा में रहा।
मायावती के हाथियों को अदालत ने सुरक्षित रखा । साथ ही रीता बहुगुणा पर दलित एक्ट और माया का ज्वालामुखी रुप भी दिखा।
अंत करता हूं अपने लेख का एक अच्छी खबर से आम आदमी का सपना साकार हुआ हैं. नैनों आम आदमी तक पहुंच गई . और सबसे पहले इसकी चाबी रतन टाटा ने खुद आकर दी आम से खास आदमी बन चुके अशोक विचारे को ।

Tuesday, June 23, 2009

कहीं बुर्के पर पाबंदी कहीं जीन्स...

कहीं बुर्के पर पाबंदी कहीं जीन्स...

आज खबर आई की फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोज़ी ने बुर्के पर पांबदी लगा दी है । सरकोज़ी का मानना है कि धर्म के नाम पर महिलाओं के बुर्का पहनने से फ्रांस में धर्मनिरपेक्षता पर असर पड़ता है और देश के लोगों पर ग़लत प्रभाव पड़ता है ।
इससे पहले फ्रांस में पगड़ी पर भी पांबदी लगाई थी ..आंतकवादियों की पोशक कहे कर ...जिसके बाद वहां के सिखों पर हमले भी हुए थे..
पश्चिम यूरोप में सबसे ज्यादा फ्रांस में ही मुस्लमान रहते है इसलिये ज़ाहिर है इसका विरोध भी काफी ज्यादा होगा...
इधर भारत में इंदोर शहर में कॉलेज और जैन मंदिर में जीन्स पर पांबदी कर दी गई..बाद में कॉलेज पर दबाव पड़ने के बाद उन्होने पाबंदी हटा ली । लेकिन जैन मंदिर की पांबन्दी लागू..। तर्क है हमारी संस्कृति पर ग़लत प्रभाव पड़ेगा...
कहने का अर्थ ये हैं की यूरोप हो या एशिया..फ्रांस हो या भारत या फिर तालिबान इंसान की सोच एक सी है...
जो संस्कृति और धर्म लिबास के पहने और उतारने से डमाडोल होता हो तो ऐसे कमज़ोर धर्म और संस्कृति को अपने साथ सजोय रखने का क्या फायदा ।
फ्रांस ने धर्मनिरपेक्षता को आधार बनाया है तो क्या वो चर्च में मौजूद नंनस की पोशक को बदला जाएगा अगर नहीं तो क्यो सिर्फ एक धर्म को ही निशाना बनाया जा रहा है।
अगर जीन्स और पैंटस से संस्कृति प्रभावित होती है तो क्या पुरूष को भी धोती कुर्ता पहन कर आने को कहा जाएगा अगर नहीं तो क्यो हम नारी को अपने आधीन रखने से अपने आप को रोक नहीं पाते ।..
बुर्का हो या फिर जीन्स ..हम किसी की आज़ादी में सिर्फ और सिर्फ वर्चस्व साबित करने के लिए खलल क्यों डालते हैं ।।

Monday, June 22, 2009

चार लड़कों वाली ख़ाला की मौत...

चार लड़कों वाली ख़ाला की मौत...

रविवार करीब सवा दो बजे घर से फोन आता है ..खबर मिलती है की पड़ोस में रहने वाली ख़ाला का इंत्तकाल हो गया...रात को उनको दफनाया जाएगा ,क्योकि उनका मुबंई में रहने वाला लड़का एतेशाम रात तक ही पहुंच पाएगा..मैने कहा ठीक है मेरी शिफ्ट भी खत्म हो जाएगी .....मैं पहुचा जाऊंगा...

आफिस में व्यस्त रहने के कारण मुझे एक बार भी उनका ध्यान नहीं आया....शिफ्ट के बाद घर जाते हुए एक -एक कर के उनसे जुडे सारी बाते नज़र के सामने धुमने लगी..

ख़ाला यानि नरगिस बेगम मुहल्ले में अच्छा रूतबा रखती थी क्योकि उन्होने ने चार लड़कों को जन्म दिया था ....इसलिए उन्हे बिरादरी में होने वाले हर कम में आगे रखा जाता था ...खालू यानि उनके पति भी ठीक ठाक कमा लेते थे ..एक बड़ा माकान उन्होने खरीद लिया था ।..

लड़को को स्कूल में तो डाला पर लड़को के गुरूर में उन पर ध्यान न दे पाईं...नतीजा बस छोटे लड़के को छोड़ कर कोई भी 10सीं तक न पहुच पाया ..ईधर उधर काम में लग गए.. ईधर उधर काम करने वालों को ऐसी वैसी आदतें भी पड़ जाती है ..बड़ा लड़का नशे से जुडा...बाकि दो भी छोटे मोटे काम में लग गए..बस छोटा लड़के को मुबंई में किसी रिश्तेदार ने नौकरी दिला दी...

मां का सपना होता है, उनकी औलाद कैसी भी हो पर अपने बेटों के सिर पर सहेरा देखे... बेटों की किसी तरह उन्होने शादी करावा दी..बाप की कमाई कब तक और कितनी चलती...आपसी झगडे बढ़ने लगे हर लड़का अपना हिस्सा मागने लगा ,.. बाप बिमार पड़ गये..इलाज के लिए पैसा नहीं था ...

सरकारी अस्पताल मे कितने दिन ज़िन्दगी खींचती ...एक दिन उनकी मौत हो गई..माकान का एक हिस्सा पहले ही बिक चुका..100 गज़ में तीनों भाई रहते थे..
कम खाना बहुओं का ताना, बेटों का नाकारापन .खाला को मौत के पास ले जा रहा था।

अभी दो दिन पहले ही उनके घर जा कर खाला से मिला बहुत कमज़ोर हो गई थी ...मुझे देख कर उनकी आंखों मे आंसू आ गए... और उनके आंसू ने मुझे सब कुछ बता दिया था ...

मैं कब्रिस्तान पहुच गया था ..नमाज़े जनाज़ा हो चुकी थी ..मुबंई से आने वाला लड़का अभी तक नहीं पहुचां थी .पर सब लोग तरस खाते हुए यही कहे रहे थे ...देखो चार चार लड़के होने बाद भी ..कैसी मौत हुई इनकी...

तभी लड़का पहुच जाता है ..उनको दफन कराया जाता ..अभी मज़दूर कब्र में मिट्टी ही डाल रहा था की उनके लड़कों की आपस में लड़ाई शुरू होगी..और लड़ाई कि वजह थी मौत पर होने वाले खर्च का बंटवारा..
खाला ने जिन्हे जन्म देकर मान सम्मान कमाया..उनकी कब्र पर ही उनके बेटों उसे उनके साथ ही दफन कर दिया..मेरी आंख भर आई..और मैं घर के लिए..चल दिया..................

Saturday, June 20, 2009

औलाद की ज़रूरत,चाहत या मजबूरी ...

औलाद की ज़रूरत,चाहत या मजबूरी ...

शादी के बाद कहीं भी जाना होता तो लोगों का एक ही सवाल होता.... औऱ बच्चे !... लगता की ज़िन्दगी कुछ नहीं, बस गिने चुने नियम हैं, जिसे सब को मानना है।
अगर आप इन नियमों के दायरे में नहीं रहेगे तो लोग आपको अजीबों गरीब ढ़ग से दिखेगें और बात करेगे...
जान पहचान वाले बुर्ज़ग आप को ढ़ेरों नसीहत दे डालेगें...ज़िन्दगी क्या होती है..जीवन कैसे चलता है ..और लाईफ की सच्चाई..सब बता दिया जाता है ।
बात शुरू करने से पहले आपको अपने दोस्त प्रोफेसर के बारे में बताता चलूं...
प्रोफेसर की शादी को 6 साल हो गए... एक परिवार को दो से तीन या तीन से चार करने का प्रयाप्त वक्त, पर ऐसा हो न सका ..
प्रोफेसर का काम भी, कभी चलता कभी नही चलता .कभी नौकरी रहती तो कभी मंदी की मार से नौकरी से बाहर कर दिया जाता है..शायद ऐसी आर्थिक स्थीति में बच्चे के बारे में सोचना ...किसी के बस में नहीं वो इसलिये जहां..बच्चे का जन्म किसी छोटी फैक्ट्री लगाने के खर्च से कम नहीं होता ...वहां बिना तंन्खाह के बच्चे को दुनिया में लाने पर सोचना शायद आसान नहीं था...
लेकिन प्रोफेसर और उसकी पत्नी पर समाज औऱ रिश्तेदारों का इतना दबाव पड़ा की वो आईवीएफ के द्वारा बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार हो गए...
आईवीएफ का कम से कम खर्चा लाख रूपए तो होता है..उसके साथ हाज़ारों की दवा ..वक्त वक्त पर इंजैक्शन ...और पूरे नौ महीने काफी मंहगा खर्चिला दौर....
ऐसे में प्रोफेसर की नौकरी भी नहीं । दोस्तों से कर्ज़ लेकर वो ये सारा ट्रीटमेंट करवा रहा है..यानि बच्चे की आने की खुशी... तो... पर क्या कर्ज़ का दर्द उसके जीवन को कैसे उभारेगा ये देखने वाली बात है...
अब ये सवाल उठता है की हम चाहे कितना अपने आपको आधुनिक कहे लेकिन हमारे समाज ने जो बरसों पहले नियम बना दिये हैं उसको ही हम पालते हैं...
आज भी शादी के बाद हमें बच्चा चाहिए ही होता है..हमें नही तो हमारे घर वालों या फिर रिश्तेदारों..
अगर पैसा है तो मॉडर्न विज्ञान में कई तरह के विकल्प हैं ....अगर नही तो साधु महात्माओं के कई डेरे भी मौजूद ..नहीं तो सब की सुनने वाला दाता तो है ही...
क्या हम ये कभी सोचेगें की हमें क्यो चाहिए औलाद ..हम किस के लिए बच्चे को दुनिया में लाना चाहते हैं..
आज हमारे देश 15 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जिनका दुनिया में कोई नहीं ..और 20 प्रतिशत ऐसे मां बाप है जो अपने बच्चों को सड़क पर छोड़ देते है ... जन्म देने के बाद ...अगर आपको बच्चों से प्यार है तो आप उन्हे ले सकते हैं... पर नहीं हमें आपना खून चाहिए..अपनी औलाद ... जिससे पाने के लिए हम कुछ भी करेगें कैसे भी करेगें । कई और वाक्य हैं..जिसमें अपनी औलाद पाने के लिए लोगों ने अपनी आखिरी सांस तक प्रयास किया...
हर बार ये ही सवाल ज़हन में आता है की औलाद चाहत है ,ज़रूरत है या फिर मजबूरी ......

Saturday, June 13, 2009

प्रेम पत्र- आज भी तुम्हारी ज़रूरत है

प्रेम पत्र-2
आज भी तुम्हारी ज़रूरत है

दोस्त

तुम्हारा एहसास आज भी है हर तरफ.. जब कभी ज़िन्दगी में अकेली हुई..न जाने क्यों कदम तुम्हारे तरफ चल दिये..ये सोचे बिना उस वक्त तुम क्या कर रहे होगे।कैसे होगे... वक्त होगा या नहीं..ये सब कभी सोचा ही नही, बस तुम्हारे पास पहुच गई..। तुमने दरवाज़ा खोला ऊपर से नीचे तक देखा और अपना हर काम छोड़ कर थोड़ा सा मुस्कराए और मुझे अंदर बुला लिया ।...

तभी न जाने कैसे सारी परेशानी दूर जाते दिखने लगती..बस फिर बैठते ही शुरू हो जाती ..क्या हुआ, कैसे हुआ.किसने किया .दुनिया कितनी खराब सब मेरे पीछे हैं..हर तरफ लोग खाने दौड रहे हैं..क्यों नही मुझे कोई समझता । सब कोई ग़लत बाते क्यों करते हैं..एक सांस मै बोलना शुरू करती ..आंखों में आंसू भर जाते ..धीरे धीरे आवाज़ तेज़ होती जाती .तुम चुप चाप सुनते रहते ..बीच मैं उठ कर पानी ला देते...

मैं आंसू पोछती ..पानी पीती ... फिर अपने आप को संभलता हुआ महसूस करती...
धीरे धीरे तुम कहते.. नहीं, तुम ठीक हो..तुम्हारी बात ठीक है,तुम्हारी सोच सही .. तुम ग़लत नहीं हो सकती..

तुम्हारी बाते मेरे अंदर शक्ति पैदा करती ,जीने की उम्मीद.. संसार फिर अच्छा लगने लगता ... अंधेरे में रोशनी न जाने कैसे पैदा हो जाती ..फिर उठती, तुम्हारा शुक्रिया अदा कर करती ..और चली जाती ..

कभी तुमने कोई गिला नहीं किया, कोई शिकवा नही किया,.कभी ये नहीं कहा... क्यों भई कभी मेरा हाल तो पुछो....कभी मेरे बारे में तो जानो..कुछ, बस.... हर वक्त मेरे लिए तुम्हारे दरवाज़े खुले रहते..

दोस्त आज भी तुम्हारी ज़रूरत महसूस करती हूं..पर क्या करू जब से दूर हुई..कोई डोर ही नहीं रही..जो तुम्हारे पास ले जाए...बस वो यादे हैं, जो तुम को भूलने नहीं देती...समाज की वो चोटें हैं.. जो तुम्हारे न होने का एहसास कराती रहती हैं..

न जाने तुम कहां होगे..पर मेरा ये पत्र पढ़ो तो जवाब ज़रूर देना ... तुम्हार जवाब मेरी ज़िन्दगी को आगे ले जाने में कुछ सहारा बनेगा ।।
जवाब की आस में
तुम्हारी दोस्त...

Friday, June 12, 2009

न्यूज़ चैनल ठगी के भागीदार...

न्यूज़ चैनल ठगी के भागीदार...
आज मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ने जडेजा मामले मे कहा कि लोग क्यों नहीं समझते कि वो बेवाकूफ बनाए जा रहे हैं और ऐसे लोगों की चपेट में कैसे आ जाते हैं।.मैने कहा लोगों को समझ में आता है पर क्या करे दिल नहीं मानता और इसका फायदा जडेजा और दूसरे महाराज तो उठाते ही हैं पर न्यूज़ चैनल भी लोगो को ठगने में पीछे नहीं.. जी मैं चैनलों में आने वाले भविष्यवाणी के कार्यक्रम की बात कर हूं ।
हम सब जानते हैं कि ये सब बकवास होता है लोग भी समझते हैं पर वो न देखना भूलते हैं और न हम दिखाना ..
चैनलों की लोगों के बीच गिरती हुई साख़ के साथ टीआरपी को कुछ सांस देते हैं ये कार्यक्रम ..पर कमज़ोर और नकली सांसे कब तक चैनलों को जीवत रखेंगी ये देखना होगा..
मुझे याद है इंडीया शाइनिंग के दौर पर कोई ऐसा चैनल और उस पर मौजूद कोई ज्योष्ति महाराज ऐसा नहीं था जो ये कहते न थकता कि वाजपेयी जी वापस आ रहे हैं..क्या हुआ नतीजा आपके सामने है वाजपेयी का राजनीतिक भविष्य एक घर में कैद हो कर रहे गया..
इसके बाद गांगुली ,सचिन और फिर भारत को व्लर्ड कप चैपियन बनने का वादा किया ज्योष्तियों ने पर हुआ... क्या... सब के समाने फिर आया ।
सूरज ग्रहण और चांद ग्रहण में होने वाले नुकसानों पर भी बोले पर फिर क्या हुआ सब ने देखा ..
इसके बाद आया 2009 का चुनाव आडवाणी को प्रधानमंत्री सबने बनवाया मनमोहन पर कोई राज़ी नहीं हुआ ..इसका भी क्या नतीजा निकला सबने देखा..
अपने तर्को को तो सब दिखाते हैं..उनकी खबरों का क्या असर होता है इस पर बार बार प्रोमो चलाते है पर अपने भविष्वाणी कार्यक्रम मे सब ग़लत बताया गया ये भी तो दिखा कर लोगों सचेत कर सकते हैं..पर नहीं, ऐसा करने की हिम्मत किसी में नहीं।
मुझे याद है एक नामी चैनल के एंकर ने कहा हमारे महाराज ने कहा था कि नई सरकार के आने के बाद बाज़ार में उछाल आएगा..और देखिये बाज़ार में उछाल आ गया..
उस समझदार एंकर ने शायद अपनी नौकरी के चलते ये कहा हो क्योंकि ये बात कोई बेवाकूफ आदमी भी जानता है जब नई सरकार आती है तो पहले दिन मार्किट ऊपर उठती ही है ।
उमा खुराना के स्टिंग आपरेशन के बाद जिस तरह से स्टिग आपरेशन होने कम हुए लगभग खत्म ही हो गए वैसे ही शायद जब तक कोई बड़ी खतरनाक घटना भविष्वाणियों के कार्यक्रमो से नही होगी तब तक इनका खत्म होना मुशिकल ही है।
एक बात और अगर लाला ने कमाने के लिए चैनल खोला है तो ऐसा कार्य़क्रम दिखाना जायज़ है पर जो लोग पत्रकारिता को समाज सेवा समझते हैं। खबर सही और सटीक दिखाने का दम भरते हैं...किसी मजबूरी के आगे झुकने को तैयार नहीं के किस्से सुनाते और लिखते रहते हैं .. वो लोग ऐसे कार्यक्रम को अपने चैनल में चलाने के लिए कैसे राज़ी हो जातें है.. या तो वो इस पर विश्वास करते हैं और अगर नहीं करते.. तो ..जिस चीज़ पर वो खुद ही विश्वास नहीं करते उस पर लोग विश्वास करें ऐसा वो कैसे कर सकते हैं.. साफ है लोगों को ठगने में चैनल की पूरी भागीदारी है...और अगर नहीं तो ऐसे कार्यक्रम से पहले लोगों को सचेत करें कि इनकी बातों से चैनल का कोई लेना देना नहीं।

Sunday, June 7, 2009

DR Allah Rakha Rahman ब्लाग पर

ब्लाग पर पहेली तस्वीरें डॉ रहमान मंच पर बोलते हुए

डॉ रहमान डिग्री लेते हुए


डॉ रहमान वीसी के साथ

डॉ रहमान डॉ बनने जाते हुए


डॉ रहमान अभी सिर्फ रहमान है

रहमान अलिगढ़ में

डॉ Allah Rakha Rahman का नाम पहले A. S. Dileep Kumar था । भारत चेन्नई तमिल में January 6, 1966 में जन्म हुआ ।वो एक प्रसीद्ध संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं आस्कर मिलने के बाद आज उन्हे अलिगढ मुस्लिम विशवविधालय ने डाक्टरेट डग्री से नवाज़ा ,कभी स्कूल जो शख्स न गया हो आज वो डाक्टर बन गया ..रहमान के हुनर को सलाम करते हैं और अपने और ब्लाग जगत की तरफ से बधाई देते हैं.. जय हो.....

Thursday, June 4, 2009

हिन्दुओं का अंतिम संस्कार पाकिस्तान में कितना दर्दनाक


हिन्दुओं का अंतिम संस्कार पाकिस्तान में कितना दर्दनाक

बात पुरानी है पर बात शुरू करने के लिये एकदम सटीक ..70 साल की राधा का देहांत 30 मई 2006 में पाकिस्तान के लाहोर शहर में होता है ...राधा का इस दुनिया में कोई नहीं था ..लिहाज़ा उसकी मृत्यु पर भी कोई नहीं आया ..पांच दिन तक उसकी लाश मृत्यु गृह में पड़ी रही ..कारण ये नहीं था कि उसका कोई रिश्तेदार नहीं आया, वज़ह थी कि लाहोर शहर में शमशानघाट है ही नहीं .. Daily News and Analysis(DNA)
पैसों का अभाव जगह की कमी और हिन्दु के मरने पर प्रशासन के कड़े नियम की वज़ह से लाहोर हिन्दु कमेटी ने भी अपने हाथ पीछे खीच लिये..आखिर में उसे मुस्लिम -मियानी साहेब क्रबिस्तान में दफन किया गया ..
इस के बाद वहां के हिन्दुओं ने फिर उठाई शहर में शमशान की मांग..जिसे वो काफी अरसे से कर रहे थे,
बंटवारे के बाद लाहोर में 11 शमशान घाट हुआ करते थे ,मुख्य शमशान घाट मॉडल टाउन,टक्साली गेट,और कृष्णा मंदिर के पास था पर आज कुछ भी नहीं है .ये बात पाकिस्तान की सरकार खुद मानती है । शमशान की ज़मीनों को मकानो में तबदील कर दिया गया ।कुछ में बड़ी बड़ी इमारते तामीर की गई या फिर गिरा दिया गया ।
बंटवारे के वक्त पाकिस्तान के हर शहर में शमशान घाट हुआ करते थे लेकिन ज्यादतर हिन्दु सिंध के इलाके में रूके इसलिये सिंध के तो शमसान घाट कायम हैं पर दूसरे शहरों में हिन्दुओं की कम तादाद होने के कारण शमशान घाट खत्म कर दिये गए हैं..
लाहोर में हिन्दुओं के पास तीन विकल्प बचते हैं अपने प्रियजनों के अंतीम संस्कार करने के
पहला-वो लाश को नानक साहब ले जाये जहां शमशान घाट मौजूद है पर बहुत कम हिन्दु ही ये कर पाते हैं .. क्योंकि पाकिस्तान मे हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति मज़बूत नहीं हैं ..नानक साहब ले जाने में बहुत खर्चा होता है ।
दूसरा-विक्लप है कि वो रवि नदी के पास अंतिम क्रिया को अंजाम दे..पर इसमे दो परेशानियां है पहली ये कि इसके लिये सरकार की अनुमति चाहिये होती है जो सरकार से मिलना बहुत मुश्किल होता है रसूक और रिश्वत चलती है जिसे पूरा करने में हिन्दु समर्थ नहीं ..दूसरी बात ये कि वहां आप मरने पर होने वाले क्रिया पाठ नहीं कर सकते जो शमशान में किये जा सकते हैं।
तीसरा- ये कि उन्हे दफना दिया जाये..जिसे वहां के ज्यादातर लोग अपनाते हैं.क्योंकि ये सबसे आसान तरीका है एक खर्चा कम दूसरा किसी अनुमित की ज़रूरत नहीं..
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ज्यादतर हिन्दु इसी का सहारा लेता हैं क्योकि दाह संस्कार में तकरीबन 20 टन लकड़ी और 2 कनस्तर घी की ज़रूरत पड़ती है और पाकिस्तान के हिन्दुओं के पास इतना पैसा नही है..भारत में कई संस्थान मदद के लिये आगे आ जाती हैं पर पाकिस्तान में ऐसा कुछ नहीं है..
दूसरी वजह दफनाने की ये है कि वहा हिन्दु अपनी पहचान छुपा कर रहते हैं ।
बाबरी मस्जिद के बाद तो ये सिलसिला खत्म ही नहीं हुआ।
बाल्मिक सभा के लोग इस के लिये संधर्ष कर रहे है उन्हे कुछ दिलासे भी मिले
1976 में लाहोर के बुंद रोड पर उन्हे ज़मीन दी गई थी पर ज़मीन विवादित थी।इसलिये वहां शमशान घाट नहीं बन पाया । बाद में मई99 में उन्हे 10 कनाल यानि 4,000sqmt कि ज़मीन बुंद रोड ही पर सागियान पुल के पास मुहिया कराई गई..लेकिन सरकारी दांव पेंच के कारण वो ज़मीन इन्हें नहीं सौंपी गई...
पहले पाकिस्तान के सदन में हिन्दु नुमाइंदगी होती पर अब अल्पसंख्यक सीट इसाईयों को दे दी जाती है । मौत के बाद भी पाकिस्तान के हिन्दुओं का दर्द कम नहीं होता ..तालिबान का जुल्म तो अभी चर्चा में आया हैं लेकिन पाकिस्तान के हिन्दु तो बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तानी हुक्मत के तालिबानों से डरे-सहमें, जी और मर रहे हैं।।।।
(क्राची में Old Golimar road में शमशान घाट है)

Tuesday, June 2, 2009

खुदा का क़हर या कुछ और-बरमूडा ट्रायएंगल..(bermuda)

खुदा का क़हर या कुछ और-बरमूडा ट्रायएंगल..(bermuda)
सोमवार को एयर फ्रांस का जहाज़ 447 ब्राज़ील से 7बजे उड़ा और अटलांटिक महासागर के ऊपर से गुज़रते हुए.. गायब हो गया ।
आज खबर आई कि उसके कुछ टुकड़े ब्राज़ील के समुद्र के किनारे पाए गए है..
इस हादसे ने लोगों के अंदर डर पैदा कर दिया और दुनिया को बरमूडा ट्रायएंगल के बारे में एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया..
आप में से ज्यादातर लोग बरमूडा त्रीकोण के बारे मे जानते होगे..पर जिन्हे नहीं मालुम उनको इसके बारे में जानना ज़रूरी है..ये दास्तान किसी जादुई कहानी से कम नहीं
कहते हैं सागर न जाने कितने राज़ अपने में दबाए हुए है और उसी में से एक राज़ है बरमुडा ट्रायएंगल ..ये एक ऐसा ब्लैक होल है, जिसकी चुबंक से बच कर निकलना बहुत मुश्किल है...जो भी इस के करीब पहुचता है उसको ये निगल लेता है..जब ये अपने असली रूप में होता है उस वक्त का मंज़र बहुत ही खौफनाक होता है ..तूफान का रूप ये ले लेता है और तकरीबन 55हज़ार फीट तक इसकी लहरे पहुच जाती है ..और कोई भी विमान ज्यादा से ज्यादा 33हज़ार फीट तक ही उड़ सकता है और इतने ताकतवर भंवर से पानी के जहाज़ का हाल क्या होगा खुद ही पता चल जाता है न जाने कितने जहाज़ और कितना ज़िन्दगियों को ये लील चुका है...
बरमूडा ट्राएंगल को शैतानी ट्रायएंगल भी कहा जाता है ..सब से पहले इसकी खबर आई दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब एक जहाज़ अचानक इसी इलाके से लापता हो गया तब लोगों का मानना था कि खुदा ने अपना कहर दिखाने के लिये ऐसा किया है क्योंकि इस दुनिया में बेकसूरों की जान जा रही है ..इस के बाद न जान क्यों ऐसा तभी होता जब दुनिया में ज़ुल्म और गुनाह बढ़ने लगते ।लगभग साठ साल से लगातार ऐसा ही हो रहा है ,,, ये कोई अंधविश्वास नहीं यहां सारे रिकॉर्ड मौजूद है।..वैज्ञानिकों ने इस मिथ को खत्म करने के लिये जहाज़ों और विमानों में कई सुधार भी किये गए पर..कोई फायदा नहीं हुआ...
नक्शे में ये इलाका उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर पर है .. इस त्रीकोण के रेखाए ज्यादा साफ नहीं दिखती पर जो दिखता है वो ये कि इसका एक कोना फ्लोरिडा से जुडता है दूसरा बरमूडा से और तीसरा कोना प्यूरटोरिका से इसकी सरहदें बाहामास और कैरेबियाई सागर के पास हैं..और इसी के पास के सुमद्री इलाके से कई जहाज़ और विमान गुज़रते है .. ज़रा सा भी उनका भटकाऊ उन्हे जाने और अंजाने इसकी ओर ले जाता है और वो इसकी चपेट में आ ही जाते है ...... फिर कभी वापस नहीं आ पाते ..
उम्मीद करते हैं हम कि ये मिथ टूटे और फ्रांस के विमान से इसके राज़ का पर्दाफाश हो...पर अभी तक बरमूडा ट्रायएंगल का राज़ बरकरार है.......





Wednesday, May 27, 2009

AWACS की पहली तस्वीरें

अवाक्स भारत में

पहली तस्वीरे


जामनगर में रखा जाएगा






ऐवक्स भारत की ज़मीन पर ..ऐवक्स यानि एयरबॉर्न वारनिंग एण्ड कंट्रोल सिस्टम..ये राडार है आसान भाषा में कहे तो एक प्रकार का सैटालाइट है जो लड़ाकू जहाज़ के ऊपर लगाया जायेगा जिसे दुशमन की हरकत पर नज़र रखी जा सके ।मिग-29 और जुगार की निगरानी में इसे गुजरात के जामनगर पहुचा दिया गया है ..इसराईल से खरीदा गया ऐवक्स भारतीय वायुसेना की ताकत में इज़ाफा करेगा.. ये हर मौसम में कारगर साबित होगा ..2010 तक दो और ऐवक्स भारत खरीदेगा...


Tuesday, May 26, 2009

मैं ब्लाग बेचना चाहता हूं

मैं ब्लाग बेचना चाहता हूं

बाबूजी मैं ब्लाग बेचना चाहता हूं.
बड़े अरमान से मैने अपना ब्लाग बनाया था..
ज़िन्दगी से जुडा काला रंग इसमे सजोया था
थका हुआ था मैं हारा हुआ था मैं...
ब्लाग मेरा सहारा बन कर आया था।
इसने मुझसे वादा किया था
जो तुम चाहते
जो तु्म्हे पसंद है
सब लाकर दूगां..
जो ग़म है उसको कम करने के लिए साथी भी ढ़ूढ़ दूगां
अरे बहुत अच्छी चीज़ है
यहां के लोग बहुत भले हैं
एक से पूछो सौ बताते हैं
हर दुख दर्द मिल कर दूर भगाते हैं
अच्छे को सरहाते हैं
बुरे को समझाते हैं
कोई अकेला नहीं रहे पाता
ये अपने को परिवार बताते हैं
मै इसकी बातों मैं आ गया..
देखो गरीब का बच्चा कैसे बर्बाद हुआ..
बाबूजी नौकरी में मन की बात दबी रहती थी
घर में घरवाली काटने को दौड़ती थी ..
कुछ पल निकाल के अपने लिये
कुछ अपने पुराने दोस्तों के लिए
मैने ब्लाग लिखना शुरू कर दिया..
पर बाबूजी ये सब झूठ और फरेब निकला
ये भी दूसरी दुनिया कि तरह ही निकला
हर एक दूसरे की बुराई करता है
उसके ब्लाग में क्या होता है ये बताता है ।
जिसका सिक्का चलता है
जो बहार कि दुनिया में जाना जाता है
वो ही यहां पर भी राज करता है
हम तो दिल की बात लिखने आये थे
सो तो लिख दी.....जी
एक दिन हमने भी हिम्मत कर के सच लिखना शुरू कर डाला
फिर क्या था इस दुनिया ने भी हमको बुरा भला कहे डाला ..
अब तो हिम्मत टूटने लगी है..
बाबूजी खरीद लो ब्लाग,
एक ,दो, तीन ,आने में ही ले लो
पैसे न हो तो कल दे देना
पर कल ज़रूर आना
अगर तुम कल न आए
फिर कोई लाला बुरा मान जाएगा
क्योकि मैं फिर कल वक्त पर कुछ लिख दूगां..
हां वो भी सच ही होगा...बाबूजी...।।

Monday, May 25, 2009

धर्म क्यों जलाता है..

धर्म क्यों जलाता है..

विएयना में घटना हुई...दलित के गुरू को उच्च जाति के लोगों ने मार दिया ।खबर फैली, हिन्दुस्तान पंहुच,.फिर पहुच गई पंजाब..और एक बार फिर जला पंजाब का कस्बा कस्बा...
गुरू की मौत से उनके समर्थक भड़क गए..इतने रोश में आए कि गुरू का पढाया सारा पाठ भूल गए.. शांति का पाठ जिसने उम्र भर पढ़ाया उसी की मौत में खूनी हवा चल पड़ी।
कुछ सवाल मन को कुरेद रहे है ..अपने भारत की ज़मीन पर मैने न जाने कितनी बार धर्म के नाम पर खून की नदी बहती देखी है.
मेरा भारत जब भी तरक्की के कुछ कदम चलने की कोशिश करता है ,थोड़ा संभलता है ..अपने देश के असली गरीब और दलित को संभालने की कोशिश करता है ..तभी न जाने कहां से धर्म की आग उड़ती हुई उसकी छाती को जलाने लगती है और मेरा देश रूक जाता है सहम जाता है..खौफ के साये में फिर जीने लगता है ...और दुनिया की दौड़ में पीछे छूट जाता है ।
न जाने क्यों इस देश में रहने वालों को गुरू और पीरों की ज़रूरत पडती है..जब भगवान और अल्लाह कहता है कि ऐ बंदों मुझसे मांगो मुझसे कहो ..फिर ये गुरू कहा से आ जाते है .जो भगवान के बराबर का दर्जा पा जाते ..मेरे देश के मासूम लोग उनके कहने पर अपनों का ही खून बहाने लगते हैं...
पंजाब में देश के सब से ज्यादा दलित रहते हैं ..जिनको इसी देश के लोगों ने आगे बढ़ने नहीं दिया..और जब ये पिस रहे थे तभी इनसे किसी ने प्यार के शब्द बोले .कुछ हमदर्दी दिखाई.हिम्मत बढ़ाई.. और ये मज़लुम लोगों ने उन्हे ही अपना गुरू मान लिया और गुरू ने भी अपने आपको भगवान मान लिया...पर आपने जो माना वो आपका अपना मसला है मेरे देश ने तो सबको स्वीकार किया ..आपको भी आपके गुरू को भी जिन्होने आपके साथ बुरा किया उसको सज़ा भी दिलाई....फिर क्यों इस देश में रहे कर उसी का ही बुरा कर रहे हो ...अपनी ज़ाती दुश्मनी के मारे क्यों उसकी संपत्ति बरबाद कर रहे हो ...
जहा कुछ हुआ सरकारी संपत्ति को नष्ट करने सब निकल पड़ते है ..ट्रेन, बस, दुकानों ,दफतरों में आग लगाने का काम शुरू हो जाता है ..क्या इन जलाने वालों को पता ये ऐसा क्यों कर रहे हैं..अरे ये एक आम आदमी की चीज़े हैं...उसके अरमान है ..उसकी उम्मीदे है..ये उन लोगों की प्रापर्टी है जो इस देश को प्यार करते हैं उसको आगे ले जाने के हर प्रयास करते हैं । इसको बर्बाद करने का आपको कोई अधिकार नहीं है ।
अब शायद वक्त आ गया है कि हमारे देश में सख्त कानून होना चाहिए जो भी सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुचाए उसे सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए..आप अगर उग्र हुए..तो जवाब भी वैसे ही मिले गा..ये वोट बैंक, गुरू ,धर्म की राजनीति खत्म करनी चाहिये.. जी अगर धर्म और जाति के नाम पर ये आग का खेल बंद नही होगा तो याद रखिए आज आप जला रहे हैं कल कोई आपको जलाए..गुरू तो चले गये उनकी आत्मा की शांति घर बैठ कर मनाए...और विरोध करने के और भी कई तरीके हैं उसे अपनाए..क्या ये धर्म जलाता है ..इस पर विचार करें....

Sunday, May 24, 2009

RKB SHOW

RKB SHOW

काफी दिनों से टीवी में वो ही घिसे पिटे चेहरे शब्दों की कमी..विष्य का ज्ञान नहीं क्या बोलना है कितना बोलना है और किस से क्या कहना और उससे क्या कहलाना है कुछ पता नहीं पर अपने जुगाड़ से सबकी टीवी में आने की तमन्ना पूरी हो रही है।
पर एक दिन अपने कमरे में बैठा कुछ लिख रहा था तभी अचानक जानी पहचानी एक अच्छी आवाज़ और उमंदा शब्द कानो में गए...रुक नहीं पाया तुरंत टीवी के पास पहुच गया ..देखा तो राजीव कुवंर बजाज लेमन टीवी में मौजूद थे ..अपने पुराने शो आरकेबी लेकर ..जब आरकेबी सहारा समय एनसीआर में आता था उस दौर में चैनल की रेटींग अच्छी रहती थी खैर अच्छा शो रेटिंग नही कंटेंट से जाना जाता और इसमें कोई दो राय नही की राजीव के पास इसकी कोई कमी नहीं..
नए लोग जो पत्रकारिता में आना चाहते हैं और ख़ासकर वो जो कैमरे के सामने अपने को देखना चाहते हैं उन लोगो को ये शो ज़रूर देखना चाहिए..खबरों की समझ और सबसे बड़ी बात ख़बर है क्या इसकी समझ जो आपको इस शो में मिले गी..
राजीव का लुक टीवी के लिये है ये कहना ग़लत नही होगा लुक के साथ टीवी में आपका अंदाज़ बहुत मायने रखता है ..इसमे बजाज को पूरे नम्बर मिलते हैं..
फिर जिस तरह वो खबर को उठाते हैं और एक मुकाम तक ले जाते है वो काबिले तारीफ है..टीवी में जब कोई खबरिया चैनल लगाता है तो खबर और पूरी खबर को जानना चाहता है ...जो आजकल उसे कोई चैनल परोस नही पा रहा ..राजीव शो को अच्छी तरह कैरी करते हैं...
पर प्रोडक्शन की तरफ शो में काफी कमी थी ..जो शायद वक्त के साथ सुधार ले ..नहीं तो जुड़ने वाले दर्शक नही जुड पाएगें.. हम दुआ करते है कि उबाऊ खबरों को खत्म करके टीवी में एक क्राति लाने के लिए कैसी खबरे लाई जाए और उन्हे कैसे पेश किया जाये इसके लिए आरकेबी शो आने वाले दिनों में ज़रूर माइल स्टोन बनेगा....हम राजीव और उनकी टीम को बधाई देते हैं...

Friday, May 22, 2009

बोल तेरे लब आज़ाद हैं...

कमज़ोर आदमी की जीत
डॉक्टर मनमोहन सिंह ने आज प्रधानंमंत्री पद की शपथ ले ली ..और दुनिया ने कहा सब से कमज़ोर कहे जाने वाले आदमी की जीत हो गई।.आज हम बहस मनमोहन सिंह की नीतियों और उन पर नहीं करेगे आज हम जो बात करेगे वो ये कि क्या सच में कभी कमज़ोर आदमी की जीत हो सकती है .... इस के लिये पहले मनमोहन और उनकी जीत पर ज़रा नज़र डालते औऱ पीछे चलते 2004 में जब न जाने कहां से एक ताकतवर शक्तिशाली महिला एक शख्स को लेकर आती है और कहती है आज से ये हमारे मुल्क की बागडोर संभाले गे ..और करोड़ो की तदाद मे रहने वाले लोगों ने सिर झुका कर कहा हां..आज से हम इनके सहारे ही जीयेगें...
कहने का मतलब ये कि कमज़ोर आदमी तभी आगे चल सकता है जब उसको किसी ताकतवर आदमी का साथ हो और उसके पीछे हाथ हो...
प्रधानमंत्री के जैसी किसी कि किस्सत शायद ही हो ..बॉलीबुड में ज़रूर ऐसी कहानी कई बार लिखी गई जब किसी मज़लूम को कोई शहंशाह मिल जाता है ...
हां कॉलेज में एक कमज़ोर लड़के को पीटने के बाद जब वो अपने भाई को दोबारा लेकर आता है तो उसका भाई कहता है .. मार.. इसके मुंह पर थप्पड़ मार वो कमज़ोर लड़का जो पहले जिनसे पिटा था उन्ही लड़को को मारने लगता है..किसी कमज़ोर के ज़मीर को जगाने के लिये भी.उसे किसी ताकतवर का सहारा चाहिये होता .मतलब ये कि कमज़ोर आदमी को हमेशा बेसाखी चाहिये होती है...
यही हाल नौकरी और दूसरे पेशों का है आप अपने विचार भी नहीं प्रकट कर सकते क्योकि आप के पास कोई शक्तिशाली आदमी का साथ नही है ..इसलिये यहां कमज़ोर आदमी की हार हो जाती है ..और याद रखिये पत्रकारिता में कभी भी कमज़ोर कलम नही चलता कुछ देर के लिये उसकी चमक भले ही आपको प्रभावित करे लेकिन बाद में उसकी सियाही फिकी हो ही जायेगी.... अगर आप कमज़ोर है आपका कोई मा बाप नही तो आपकी हार निश्चित है ..कुछ कदम भले आप अपनी हिम्मत से चल ले लेकिन अंत में आपको हरा ही दिया जाएगा...क्योकि कमज़ोर आदमी की कभी जीत नहीं हुई है और न होगी ..और लोग खामोशी को भी कमज़ोरी समझते है..इसलिये ऐ दोस्तों अब बदलने का वक्त आ गया आवाज़ बुलंद करने वक्त आ गया ..किस का डर और काहे का डर जिसने पेट दिया है वो ही परवरदिगार पेट भरेगा ..जो मन में है दिल खोल कर कहो .वक्त है आज नही कहो गे तो कल कभी नही मिलेगा कुछ कहने को....और जब तुम कहना सिखोगे .तभी कुछ करना ..और जब तुम कुछ करोगे तो तुम खुद सक्षम होगे .. और सक्षम आदमी कमज़ोर नही होता .. और तभी वो जीतता ..मनमोहनसिंह ने जब आडवाणी को जवाब देना शुरू किया अपने ऊपर लेगे कमज़ोरी के दाग को मिटाना शुरू किया बीच महफिल में आडवाणी को नज़रअंदाज़ कर दिया एक मज़बूत नेता को मुह की खिलाई....और फिर बोले खुल के बोले ..नतीजा एक कमज़ोर आदमी जीत गया .......

Tuesday, May 19, 2009

टीवी चैनलों से इतनी बड़ी गलती ..

टीवी चैनलों से इतनी बड़ी गलती ..

कानून के हिदायत आने के बाद भी टीवी चैनलों पर इसका कोई असर नहीं हुआ ।सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ गया कि आप कोई ऐसी तस्वीर या फूटेज नहीं दिखायेगे जिससे लोगों में भय हो..खौफ पैदा हो..लेकिन आज जब से प्रभाकरण की तस्वीर श्रीलंका सरकार ने जैसे पेश की वैसे ही हिन्दुस्तान के टीवी चैनल ने दिखा दी ..।टीवी में एक इफैक्ट होता है बिलर जिससे तस्वीर को धुंधला कर दिया जाता है ..और ऐसी तस्वीरों पर इस्तमाल करने के लिये होता । पर हमारे चैनल अपनी तेज़ी सच्ची तस्वीर,संजीदगी,सबसे पहले,24x7..और भी तरह तरह के वादे करने वाले भूल गये सारी हदें..साफ-साफ उसकी लाश को दिखाया जाता रहा पूरे दिन। किसी ने उसकी खुली हुई आंखें कितनी खतरनाक लग रही थी उसकी खोपड़ी में छेद कितना डरावना दिख रहा था इसपर ध्यान ही नहीं दिया और ये टीआरपी के चक्कर मे सब भूल गये...
शयाद हमारे चैनल ज्यादतर हिन्दी भाषा के लोगो देखते हैं ..और दक्षिण भारत को हमारे चैनल से कोई टीआरपी नहीं आती ..इसलिये उनसे जूडे हुये लोगों को हम दिखा सकते हैं..क्या टीवी चैनल को इसका एहसास होगा ।या जो एजेंसी इसपर नज़र रखेगी वो चैनलों को नोटिस भेजी गी..पता नही चुनाव की साफ साफ तस्वीर दिखाते दिखाते हम को क्या दिखाना है और कैसे दिखाना चाहिये सब बराबर कर दिया। दूसरों को नसीयत देने वालों को नसीयत की ज्यादा ज़रूरत है ।।

कुछ ख़ास लोगों के कहने पर ......

कुछ ख़ास लोगों के कहने पर ......

हज़रत अब्बास की शान में....
( हज़रत अब्बास इमाम हुसैन के भाई थे जो करबाला में उनके साथ शहीद हुये थे .
अब्बास को वफादारी की मिसाल माना जाता है जब वफा का ज़िक्र होता है .उनका नाम आता है ..)

गाज़ी तेरी मिसाल नहीं दो जहां में
जहरा ने खुद कसीदे पढ़े तेरी शान में
पानी तेरी सबील का कैसे पीये गा वो
बुगज़े अली के कांटे हैं जिसकी जुबान में

अब्बास फातमा की तमन्ना का नाम है
अब्बास का जहां मे निराला मुकाम है
बारह इमाम मज़हबे इस्लाम में हुये
ये मज़हबे वफा का अकेला इमाम है

नामे गाज़ी से खुशबू-ए वफा आती है
उनके रौज़े से हुसैना की सदा आती है
जब भी हम बैठे हैं अब्बास के परचम के तले
ऐसा लगा है जन्नत से हवा आती है।.

पार कर पाया न लशकर एक हल्की सी लकीर
थीं तो हल्की मगर खीची हुई अब्बास की....

Sunday, May 17, 2009

ब्लाग वक्त है ने पेश की एकदम सही तस्वीर...

ब्लाग वक्त है ने पेश की एकदम सही तस्वीर...
जी हां 2009 के चुनाव पर हमने जो लिखा वो सच हुआ । हमने हर एक पार्टी पर पैनी नज़र ऱखी ..हर राजनेता किस मुकाम तक पहुचेगा..आप लोगों को वक्त से पहले बताया ।कई वरिष्ठ पत्रकारों के ब्लाग होने के बावजूद किस प्रकार की सरकार इस 15वीं लोकसभा में होने वाली है ..कोई भी पत्रकार अपने ब्लाग पर नहीं लिख पाया ..पर वक्त है ने आपको को सारे और सही समीकरण वक्त पर पेश किये ।
हमने इसका विरोध भी सहा लोगों की प्रतिक्रिया हमारे खिलाफ भी थी लेकिन हमारा मकसद सही तस्वीर पेश करना था जो हमने किया ..
· हम ही थे जिसने कहा था देश में राज गांधी ही करेगा..।
· हम ही थे जिसने कहा था आडवाणी बाय बाय..।
· हम ही थे जिसेने कहा था डरे होये मोदी ...।
· हम ही थे जिसने कहा था आज़म खान की छुट्टी...।
· हम ही थे जिसने कहा था जया के आसू रंग लायेगे..।
· हम ही थे जिसने कहा था अब बदलेगी तस्वीर..।
· हम ही थे जिसने कहा था ब्लू फिल्म वाले समाजवाद को मतदाता नाकारे गें..।
ये इसलिये हुआ की वक्त है को समझ है वक्त की और कदर है वक्त की ...शुक्रिया आप लोगों का,जिसने वक्त है को हमेशा पढा.. कहते है ब्लाग में पाठक कम हो रहे हैं पर शुक्र है आप लोगो का, की हमें इसका सामना नहीं करा पड़ा । आगे भी आपका प्रेम हमें इसी तरह मिलता रहेगा और हम वक्त पर समाज का आइना दिखाते रहेगें ।।
धन्यवाद...

Monday, May 11, 2009

जयाप्रदा की नंगी तस्वीर ..

जयाप्रदा की नंगी तस्वीर ..

अब तो हद हो गई ..नया समाजवाद और नई समाजवादी पार्टी... पिछले कुछ वक्त से रामपुर में अमर आज़म और मुलायम की शब्दों की जंग चल रही थी ... मुलायम बीच बचाव करते दिख रहे थे ...
दोनो के कई बयान आये..आज़म खान ने अमरसिंह को दलाल कहा फिर कुछ दिन के बाद जयाप्रदा का दलाल कहा...
जया की आंखों में आसू आये और अमर ने कहा वो किसी आज़म खान को नहीं जानते ..चुनाव की तारीख़ पास आती गई और लड़ाई आगे बढ़ती गई ...
बोलचाल की बोली ..गंदे शब्दों पर पहुच गई ..हर आदमी एक दूसरे पर किचड़ उछालने लगा..
मुबंई से अबू आज़मी आये उन पर भी हमला हो गया..बाण पर बाण .हर बार.समाजवाद तार –तार हो रहा था ..रामपुर जो सभ्यता का गढ़ कहा जाता है वहां की इज़्जत हर तऱफ उछल रही थी ..
आखिर में मुलायम ने आज़म को नोटिस दे दिया –13 के बाद फैसला होगा .. आज़म भी खुल कर बोले अपने सारे समर्थकों से की नूरबानो कांग्रेस की उम्मीदवार को वोट दे...
अमर ने भी आखिरी तीर फेंका कहा अगर जया नहीं जीतेगी तो खुदकुशी कर लेगीं...
फिर बारी थी जयाप्रदा की ..कहतें है हर एकशन फिल्म में सेक्स न हो तो मज़ा नहीं आता फिल्म अधूरी सी लगती है ..इसलिये जया अपनी फिल्म को पूरी तरह कामयाब करना चाहती थी ..
रामपुर की सरज़मीन को गवाह बनाते हुये उन्होने आचारसंहिता के दिये वक्त के अंदर अपने आखिरी संवाद बोले... कहा मेरी अशलील तस्वीरें बांटी जा रही है गंदी फिल्म दिखाई जा रही है..
और आप यकीन किजिये इस बयान के एक घण्टे के बाद सारी मीडिया के पास जया प्रदा की वो तस्वीरे थी ..
अब ये तस्वीरे कौन बांट रहा है ये सीडी कौन बनवा रहा है ..अमरसिंह के अलावा औरतों और सीड़ी से किस को प्यार है कौन इतना हाईटेक समाजवादी है ..कौन है जिसने आम आदमी के समाजवाद को सितारों और पैसों का समाजवाद बना दिया है जो हर घटना के बाद एक सीडी पेश कर देता है .चाहे संजयदत्त द्वारा भारद्वाज की हो या फिर नोट लेन देन की ..और फिर जया खुद जिस्म की नुमाइश के लिये तैयार हों तो किसे क्या हर्ज होगा...
लोहिया का समाजवाद आज ब्लूफिल्म का समाजवाद हो गया वहा रे मुलायम अब तो आंखें खुलों..

Sunday, May 10, 2009

क्यो रोती हैं ..बार बार जयाप्रदा

क्यो रोती हैं ..बार बार जयाप्रदा
कैमरे पर क्या करना है इसका इस्तेमाल किस तरह किया जाये उसे कैसे अपना बनाया जाये ...ये अगर किसी को सीखना है तो वो जयाप्रदा से सीखे ...
एक बार आज़म ख़ान ने मंच पर बयान दिया कि किसी खूबसूरत चेहरे पर न जाये ..जो करना है सोच समझ कर करें... उस वक्त जयाप्रदा आंखे मलती देखी गईं.. आंखें जब आप मलते हैं तो पानी निकलना लाज़मी हैं.. ऐसा ही उनके साथ हुआ...पर हम चैनल वालों को तो मासला चाहिये..पुरानी खबर में नया एंगिल ..पुरानी तस्वीरों पर नई कहानी ..एडलाइन बन गई..आज़म की बात से जया आहत.. आंसू बहे जया के..
बस फिर क्या था ..औरतों के प्रेमी अमर सिंह कूद आये मैदान में आर-पार की लड़ाई के लिये..
पर जया जी ने भी इसका फायदा ढ़ू़ढ निकाला ..उनको भी रामपुर के नवाबों के खिलाफ ..उनको शर्मींदा करने का मुद्दा मिल गया..बस अब जहां आज़मखान का ज़िक्र हुआ नहीं जयाप्रदा कि आंखें नम होगीं..
पत्रकार औऱ कैमरामेन को भी पता चल गया ..रिपोर्टर ने जहां आज़म खान का ज़िक्र किया वहीं कैमरा मैन ने अपना फोक्स जया प्रदा की आंखों पर कर दिया ...भले ही इस सवाल से पहले जया धूप का चशमा लगायें हो पर ..ये सवाल पूछते ही वो अपना चशमा उतार देती और आंसूं .या पानी ले आती .. बस पत्रकार का आना भी सफल और जया का मिशन भी सफल..
जब उनके रोने की बात एक पत्रकार ने आज़म खान को बताई..तो उन्होने उस का जवाब इस तरह से दिया भई वो अभिनेत्री हैं ..उन्हे पता है किस वक्त कौन सा रीएक्शन देना है..वो तो एक वक्त में कई भाव दे सकती हैं..
पहले ये बात अजीब सी लगी पर जब हर चैनल में हर पत्रकार को जवाब देते जया इसी मुद्रा में दिखी तो लगा की बात में दम है..बार बार तो इंसान अपने सगे के मरने पर भी नहीं रोता ..जया जी कुछ तो नया करों..जीतो या हारों अपने इमान में तो सच्ची रखो..अभिनय ही करना है तो फिल्मों में वापस चली जाऊ..आपके लिये तो साउथ के भी दरवाज़े खुले हैं.. क्यों गरीब जनता को अपने आंसूओं में डूबा रही हो

Friday, May 8, 2009

चुनाव के बाद आज़म ख़ान की छुट्टी.. मुलायम किस ओर...?

चुनाव के बाद आज़म ख़ान की छुट्टी.. मुलायम एनडीए के साथ...?

पिछले कुछ वक्त से आज़म और अमर का झगड़ा बढ़ता जा रहा है ..। हर प्रयास के बाद मुलायसिंह को असफलता मिल रही है.. पर 13 तारीख के बाद इसका रूझान मिलेगा और 16 के बाद नतीजा निकल आयेगा...
अब तक जो राजनीति गलयारों में खबर फैल रही है वो ये है कि आज़म खान की छुट्टी होनी तय है.. इसके पीछे जो वजह बताई जा रही है वो ये
1) आज़म खान समाजवादी पार्टी में एक मुस्लिम चेहरे के रूप में प्रस्तुत किये जाते है ...उनका इस्तमाल मुस्लिम वोट बटोरने के काम आता है ..पर इस बार ऐसा नहीं हुआ मुलायम ने ऐढी चोटी का ज़ोर लगा दिया..पर आज़म असली पठान निकले ..अड़ गये तो अड़ गये..
2) ऐसा नहीं की मुलायम ने उनका विकल्प नहीं ढूढ़ा.. मुलायम ने हर ठुचपुंजीया मुस्लिम नेता से संर्पक किया..इसका फायदा भी उनके कार्यकर्ताओं ने खूब उठाया.. उनके कुछ करीबी लोग, किसी भी दाढ़ी वाले को मुलायमसिंह के पास ले जाते औऱ कहते नेता जी ये वहां के है और इनके पास इतने वोट हैं ।नेता जी उनको झुक कर नमस्ते करते और एक से पाच लाख तक का चेक काट कर दे देते.
3) नेता जी के नोट भी गये और वोट भी ।कल्याण सिंह से दोस्ती के बाद मुल्ला मुलायम का तंबका भी छीन गया । क्योकि हिन्दुस्तान का मुस्लमान सब माफ कर सकता है पर बाबरी मस्जिद को शहीद करने वालों को कभी नही।अगर कल्याण को ही भूलना है तो आडवाणी को बक्शने में उसे क्या परहेज़...
4) कल्याण को लाने का मकसद था की मायावती के पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाना पर रामपुर से बगावत के चलते नया वोट तो अपना हो नहीं सका हां पुराना वोट ज़रूर रूठ गया ...जिसका श्रय सीधे तौर पर आज़म खान को जाता है ।
5) आज़म खान से पत्रकार ने पूछा आपकी बगावत रामपुर में समाजवादी को नुकसान पहुचाये गी ..इस पर आज़म खान ने कहा आप मेरा कद छोटा कर रहे हैं... मैं पूरे उतर प्रदेश में नुकसान पहुचाऊगां...और ये बात मुलायम भी समझ गए हैं ..और उनके अनुमान से काफी कम इस बार उन्हे सीटे मिल रही है...
6) जिन मुस्लमान के मारे सारा संघर्ष किया जब वो ही उनके साथ नहीं रहे ..जैसे काग्रेस के साथ हुआ वैसा अब उनके साथ होने वाला है ..तो फिर मुल्ला मुलायम की छवी साथ रख कर और आज़म ख़ान जैसों को पालने का क्या फायदा ...
7) इसलिये अमरसिह ने आखरी पासा फेंक दिया .कहा 13 के बाद फैसला होगा ..अमरसिंह बोले है तो फैसला ज़रूर होगा ,,साथ ही मुलायम को धमकी भी दे डाली की कुछ करें ,,मुलायम का भी जवाब आगया ..की फैसला ज़रूर होगा ..
8) सब जानते है कि लाल लगोट वाले मुलायम की न अब लगोंट टाइट रही और न अब इतना दम बचा की सीडी मास्टर अमर सिंह के खिलाफ कोई फैसला ले सके..।इसलिये आज़मखान की छुट्टी तय है ...
9) दूसरी बात मुलायम का बयांन आया जो सरकार मायावती की सरकार को बर्खास्त कर दे उसको वो समर्थन देगें..भले आडवाणी ने इसका विरोध किया पर चुनाव के बाद हरफंनमौला अमर सिंह किसी के भी बयां बदलवाने में माहिर है.
10) जब चुनाव में मुसलमान वोट ही नही मिला तो अगर नेताजी को एनडीए से फायदा मिले तो हर्ज ही क्या ...
इसलिये एक बात तो तय है रामपुर में जया प्रदा ही रहेगी समाजवादी की पंसद आज़मखान रूठे तो रूठते रहें..उनको कर दिया जायेगा गुडबाय ..और नये साथी की होगी तलाश ..क्योकि चन्द्रबाबू और जया का जो रिशता था वो जग ज़ाहीर है .और चन्द्रबाबू और एनडीए का रिशता भी सब को पता है ..तो एक पुराने रिश्ते के सहारे नये रिशते की शुरूआत हो सकती .. पंडित अमरसिंह कोई भी गोटी बिठा सकते हैं... ।।

Tuesday, May 5, 2009

प्रेम पत्र

प्रेम पत्र
आपने आखिरी बार बार पत्र कब लिखा था क्या कभी प्रेम पत्र लिखा था ... अगर हां तो आईये याद ताज़ा करें...

प्रिय ,
वक्त कैसे बीत रहा हैं ..क्या बताऊं ..हर तरफ हर जगह तुम्ही दिख रहे हो .. तुम्हारी मुस्कुराहट.. तुम्हारी आहट बन कर सताती है ..तुम्हारी नज़रे .कोई ग़मज़ादा नज्म याद दिलाती है . तुम्हारा रंग रोशनी बन कर, हर बार आखों को चकाचौंध कर देती है.....सुबह उठें तो तुम.. दोपहर में देखें तो तुम ..शाम में तुम . और रात को भी तुम्ही तुम.. कैसे कट रहा है एक एक पल..तुम्हारे बिन.. पर तुम्हे क्या मालुम ..अगर पता भी हो तो तुम क्या कर सकते हो ... और हमने कुछ चाहा भी नहीं...तुमसे..सिर्फ आरज़ू कई तुम्हारी .. बिना किसी चाहत के ..बडे दिनो के बाद कलम उठाई है .चाहा है कि अपने दिल की बात लिखूं..जो गुज़रा वो सब बयान कर दूं.. पर अब तुमसे बहुत दूरी है ..दूरी संकोच की डोरी होती है ... संकोच से मन की बात नहीं होती ...और जब मन की बात ही न हो तो प्रेम वहां कहा रहता है .. सोच था प्रेंम पत्र लिखूं ..कोई ऐसा ख़त लिखूं.. जिंसमें प्यार का इज़हार हो..एक नया संसार हो ..पर नही हां नहीं ..अब प्रेम की जगह जलन है ..एक दर्द है ....जो टीस बन कर सताता है मुझे गुज़रा वक्त याद दिलाता है .. आज नहीं कल लिखूं गा..पर मैं प्रेम पत्र ज़रूर लिखूंगा...

तुम्हारा
शान...