Friday, February 27, 2009

उसके साथ बलत्कार हुआ था .......

उसके साथ बलत्कार हुआ था .......

वो चीखती रही रोती रही बिलकती रही पर किसी ने नहीं सुनी उसकी सिसकियां..
बात हल्द्वानी शहर की है ॥जहां प्रीति नाम की लड़की एक प्राइवेट इंस्टियूट में पढाती थी ..एक दिन जब वो देर रात तक घर नहीं पहुची तो घर में हलचल मच गई..रिश्तेदार और दोस्तों ने ढूंढना शुरू किया पर काफी देर तक वो नहीं मिली तो पुलिस में रिपोर्ट लिखवा कर वापस घर आ गये और खुदा की महर रहे इसकी दुआ मांगने लगे ..पर ऐसा कुछ हुआ नही...

दूसरे दिन जब लोग खेतों में शौच के लिये गये तो एक लाश देख कर सब की चीख निकल गई ॥लाश बहुत बुरी हालत में थी .. एक लडकी नंग हालत में ..मुंह से खून ,टांगे इधर उधर ,पास में पर्स ,मोबाइल, गर्दन एक तरफ और बाकी शरीर एक तरफ...

देखते ही माजरा क्या था... साफ पता चल रहा था ..बात छोटे शहर की थी ..जल्दी फैल गई ,,तमाशबीनों का जमावड़ा लग गया .कोई कुछ कहे .कोई कुछ बोले ...लोगों का कहना और देख कर ये लग रहा था की सामुहिक बलत्कार का ही मामला है पर किसने किया इस पर कोई बोलने को तैयार नहीं था ...

उत्तराखण्ड का मामला था पुलिस को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका चाहिये था उसने जल्दी से कार्यवाही कर एक शख्स को गिरफ्तार कर लिया ... जानते हैं वो शख्स कोन था ..

प्रीति का एक पड़ोसी .. शयाद आप को यकीन हो जाये क्योंकि ऐसी कई वारदात होती रहती हैं जिसमें पडोसी इस तरह के काम करते हैं ..पर प्रीति के घर वालों को इस पर विश्वास नहीं हुआ क्यों....

क्योकि वो आदमी दिमागी रूप से बहुत कमज़ोर था और जिस्म से भी ... इसलिये सब को लग गया कि ज़रूर इस खेल में कई बड़ी मछलियां शामिल हैं ..जिन को बचाने की कोशिश की जा रही है ..

प्रीति को इंसाफ दिलाने के लिये पूरा हल्द्वानी एक हो गया ..शहर मे जन सैलाब उमड पड़ा ..सब की मांग थी इस मामले की सीबीआई जांच हो पहले तो सरकार नानकुर करती रही पर बाद मे प्रीति बलत्कार कांड की जांच सीबीआई को सौंप दी गई..

पर सीबीआई की भी असफलता की कहानी बहुत पुरानी है ... और लगता है इस कांड में बहुत ही रसूक वाले लोग फंसे हैं इसलिये सीबीआई की जांच बहुत सुस्त चल रही है .प्रीति इंसाफ के लिये तड़प रही है..आऔ दुआ करे की जिन्होने प्रीति के साथ ये काम किया है वो जल्द से जल्द पकडे जायें....उसके परिवार वालों के साथ हम भी हैं ये सब को बताये.....

Tuesday, February 24, 2009

दुनिया ने कहा हम कुत्ते हैं


हम ग़रीब हैं ,,गंदे हैं.. चोर हैं.. और कुत्ते हैं.. पर हम खुश है क्योंकि ये खिताब हम को अंग्रेज़ो ने दिया है ..भले ही आज़ादी के इतने साल बीत गये हों ..पर अंग्रेज़ो द्वारा दी गई कोई भी चीज़ हमें सर आंखों पर स्वीकार है ..भले ही गाली हो या फिर जूते पर लिपटी हुई कोई ट्रॉफी ..
हमे रहमान और गुलज़ार की प्रतिभाओं पर कोई शक नहीं उनकी योग्यता किसी भी ऑस्कर की महौताज नहीं..उनका जो हुनर है वो इस कायनात के हर उस ज़र्रे में बसा हुआ है जो हमारा अपना है हमारा सम्मान है...
हमें स्लमडॉग के निर्देशक ,राईटर से कोई दुशमनी नहीं वो लोग क्रेटीव हैं उन्होने
हर चीज़ को बखौबी दिखाया... और उनकी दिखाई हुई हर एक चीज़ पर हमने वाह वाह किया यानि वो सच है जो वो दिखा रहे हैं...
हमारे नेताओं ने बधाई दी पर किसी के मुहं से ये न निकला की बस बहुत हुआ अब आपको ऐसी कोई चीज नही दिखेगी जो गंदी हो अब आप हमें डॉग नही कहे पायेगें..
लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ होता भी कैसा उन्होने ही तो हमें कुत्ता बना कर छोड़ दिया है ..
आज रूबीना और अज़र को सरकारी माकान दिया जा रहा है । कोई इनसे पूछे क्यों किस लिये ऐसा क्या किया उन्होने ..इनाम देना है तो लवलीन टंडन को दो..जिसने इन बच्चों को ढूंढा ..अगर आप थोड़ी मेहनत करेगे तो इसी देश में आपको हर कोने में रूबीना और अज़र मिल जायेगें.. क्या उन सब को माकान देगे..अगर हां तो अब तक क्यों नही दिया ..और अगर नहीं तो इस लिये नहीं क्यों कि उन्होने किसी ऑस्कर जीतने वाली फिल्म मे काम नही किया ...ये तो कोई तर्क नहीं...
पर स्लमडॉग हमारी हकीकत है जिसे अंग्रेज़ो ने बहुत अच्छी तरीके से पेश किया...
क्या अब हम कुछ करेगें या फिर एक दूसरों को तौहमत लगाते रहेगे.. और कोई बाहर वाला हमको कुत्ता कहे कर और हड़डी डाल कर चला जायेगा ...और हम खुश होगे क्योंकि हमे विदेशी हड्डी मिली है इसलिये....हमारा मीडिया सुबह चार बजे से जय हो जय हो कहेगा ......

Saturday, February 21, 2009

क्या चीज़ महुब्बत है...

क्या चीज़ महुब्बत है...
वक्त के साथ मुहब्बत बदलती जा रही है ...इश्क नये रास्ते इख्तियार करता जा रहा है । जहां पहले मुहब्बत में जान दे दी जाती थी आज प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे की जान ले लेते हैं ... पहले जो इज़हार नज़रों और कलामों से हुआ करता था आज सीडी और डीवीडी से होता है..पहले तस्वीर निशानी होती थी आज तस्वीर बदनामी हो गई है ...
गुरू और शिक्षक में अदब था आज वासना है ..नियत खराब है ...पहले पढ़ने वाल अपने उस्ताद को देख कर खड़ा हो जाता था ...आज उस्ताद खड़ा है ....
आज प्रेम बाज़ार है ..पहले बाज़ार में प्रेम करने की कोई सोच नही सकता था आज बाज़ार के लिये ही प्रेम होता है ..महुब्बत बिकती है ..और मुनाफे के लिये प्यार कराया और किया जाता है ...
बंद कमरों कि बातें कोई सुन न ले ..ऐसा ख्याअल सब रखते थे आज बंद कमरे में क्या हुआ इसे सब को दिखाया जाता है.... वो भी दावा करते थे अपनी मुहब्बत का ये भी दावा करते हैं अपने इश्क का ....
बस हम तो ये ही कहेगें...
दिल ग़म का निशाना है दुनिया की इनायत है ।
तकदीर से क्या शिकवा क्या उनसे शिकायत है ।.
महफिल में कहां बैठे.देखें तो किधर देखे।
इस सिम्त कयामत है ,उस सिम्त कयामत है ।।
ख्वाखों के झरोखों से ,खामोश गुज़र जाना ।
किस उम्र का ये बदला है ,कैसी ये कमायत है ।।
नादां है अभी हम इतना भी नहीं समझे।
क्या चीज़ महुब्बत है ,क्या चीज़ इबादत है ।।

Wednesday, February 18, 2009

ब्लॉगर,संपादक,अविनाश का बयान....

ब्लॉगर,संपादक,अविनाश का बयान....

क्‍या सचमुच एक झूठ से सब कुछ ख़त्‍म हो जाता है?मुझ पर जो अशोभनीय लांछन लगे हैं, ये उनका जवाब नहीं है। इसलिए नहीं है, क्‍योंकि कोई जवाब चाह ही नहीं रहा है। दुख की कुछ क़तरने हैं, जिन्‍हें मैं अपने कुछ दोस्‍तों की सलाह पर आपके सामने रख रहा हूं - बस।मैं दुखी हूं। दुख का रिश्‍ता उन फफोलों से है, जो आपके मन में चाहे-अनचाहे उग आते हैं। इस वक्‍त सिर्फ मैं ये कह सकता हूं कि मैं निर्दोष हूं या सिर्फ वो लड़की, जिसने मुझ पर इतने संगीन आरोप लगाये। कठघरे में मैं हूं, इसलिए मेरे लिए ये कहना ज्‍यादा आसान होगा कि आरोप लगाने वाली लड़की के बारे में जितनी तफसील हमारे सामने है - वह उसे मोहरा साबित करते हैं और पारंपरिक शब्‍दावली में चरित्रहीन भी। लेकिन मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं और अभी भी पीड़‍िता की मन:स्थिति को समझने की कोशिश कर रहा हूं।मैं दोषी हूं, तो मुझे सलाखों के पीछे होना चाहिए। पीट पीट कर मुझसे सच उगलवाया जाना चाहिए। या लड़की के आरोपों से मिलान करते हुए मुझसे क्रॉस क्‍वेश्‍चन किये जाने चाहिए। या फिर मेरी दलील के आधार पर उसके आरोपों की सच्‍चाई परखनी चाहिए। लेकिन अब किसी को कुछ नहीं चाहिए। पी‍ड़‍िता को बस इतने भर से इंसाफ़ मिल गया कि डीबी स्‍टार का संपादन मेरे हाथों से निकल जाए।दुख इस बात का है कि अभी तक इस मामले में मुझे किसी ने भी तलब नहीं किया। न मुझसे कुछ भी पूछने की जरूरत समझी गयी। एक आरोप, जो हवा में उड़ रहा था और जिसकी चर्चा मेरे आस-पड़ोस के माहौल में घुली हुई थी - जिसकी भनक मिलने पर मैंने अपने प्रबंधन से इस बारे में बात करनी चाही। मैंने समय मांगा और जब मैंने अपनी बात रखी, वे मेरी मदद करने में अपनी असमर्थता जाहिर कर रहे थे। बल्कि ऐसी मन:स्थिति में मेरे काम पर असर पड़ने की बात छेड़ने पर मुझे छुट्टी पर जाने के लिए कह दिया गया।ख़ैर, इस पूरे मामले में जिस कथित क‍मेटी और उसकी जांच रिपोर्ट की चर्चा आ रही है, उस कमेटी तक ने मुझसे मिलने की ज़हमत नहीं उठायी।मैं बेचैन हूं। आरोप इतना बड़ा है कि इस वक्‍त मन में हजारों किस्‍म के बवंडर उमड़ रहे हैं। लेकिन मेरे साथ मुझको जानने वाले जिस तरह से खड़े हैं, वे मुझे किसी भी आत्‍मघाती कदम से अब तक रोके हुए हैं। एक ब्‍लॉग पर विष्‍णु बैरागी ने लिखा, ‘इस कि‍स्‍से के पीछे ‘पैसा और पावर’ हो तो कोई ताज्‍जुब नहीं...’, और इसी किस्‍म के ढाढ़स बंधाने वाले फोन कॉल्‍स मेरा संबल, मेरी ताक़त बने हुए हैं।मैं जानता हूं, इस एक आरोप ने मेरा सब कुछ छीन लिया है - मुझसे मेरा सारा आत्‍मविश्‍वास। साथ ही कपटपूर्ण वातावरण और हर मुश्किल में अब तक बचायी हुई वो निश्‍छलता भी, जिसकी वजह से बिना कुछ सोचे हुए एक बीमार लड़की को छोड़ने मैं उसके घर तक चला गया।मैं शून्‍य की सतह पर खड़ा हूं और मुझे सब कुछ अब ज़ीरो से शुरू करना होगा। मेरी परीक्षा अब इसी में है कि अब तक के सफ़र और कथित क़ामयाबी से इकट्ठा हुए अहंकार को उतार कर मैं कैसे अपना नया सफ़र शुरू करूं। जिसको आरोपों का एक झोंका तिनके की तरह उड़ा दे, उसकी औक़ात कुछ भी नहीं। कुछ नहीं होने के इस एहसास से सफ़र की शुरुआत ज़्यादा आसान समझी जाती है। लेकिन मैं जानता हूं कि मेरा नया सफ़र कितना कठिन होगा।एक नारीवादी होने के नाते इस प्रकरण में मेरी सहानुभूति स्‍त्री पक्ष के साथ है - इस वक्‍त मैं यही कह सकता हूं।

Tuesday, February 17, 2009

अविनाश विनाश की राह पर...

अविनाश विनाश की राह पर...

आज जब ये खबर मिली की अविनाश दाश ने एक लड़की के साथ बल्तकार किया है तो एक दम से झटका लगा ....फिर जा कर नेट पर देखा तो बात छेड़खानी की लिखी थी ...फिर किसी और का ब्लॉग पढा तो उसमें लिखा था कि उन्होने उसको पहले... दफ्तर बुलाया फिर उसे घर छोड़ने का ऑफर दिया ..फिर उससे चाय पीने को कहा ..फिर उसके कमरे मे घुसे ..फिर रेप की कोशिश की ...जब उसने विरोध किया तो उसे छोड़ कर चले गये बाद में एस एम एस का दौर शुरू हुआ...
कहने का मतलब ये है किसी के पास पूरी जानकारी नहीं है ..पर मुंह से बात निकल रही है और फैलती जा रही..हमें कुछ लिखने से पहले ,कुछ बोलने से पहले सच की पड़ताल कर लेनी चाहिये...
जहां तक मुझे पता है अविनाश एक बहुत ही गरीब परिवार से आते हैं..उनके पिता दिन रात शराब मे डूबे रहते हैं..उन्होने काफी संघर्ष किया और आगे बढ़े.. लिखते बढ़िया हैं इसमें कोई दो राय नहीं.
जब उन्हे टीवी चैनल में नौकरी मिली तो उन्होने अपने दोस्तों से कहा यार बहुत पैसा मिल रहा है .. जबकि उस वक्त उनकी सैलरी दफ्तर में दूसरे लोगों को मिलने वाली पगार से काफी कम थी ...
उन्होने डेस्क में क्राइम में काफी काम किया है ..इस लिये अगर ऐसी हरकत उन्होने की है तो इसके नतीजे के बारे में उन्हे पता होगा ..
बेटी ब्लॉग लिखने पर उन्हे ऑर्वड भी मिल चुका .जो लड़की के बारे इतने अच्छे विचार रखता हो ..वो इस तरह की हरकत करे ... बहुत शर्मनाक बात है ..
एक साल के करीब की उनकी बेटी भी है
पर अगर किसी लड़की ने उनकी शिकायत की है तो वो बेबुनियाद नहीं होगी ..
अगर संस्थान ने उन्हे निकाला है तो कोई कारण भी होगा..
आम आदमी की तरह शयाद अविनाश भी शौहरत के नशे में डूब तो नहीं गये .जिन बॉसों की वो आलोचना करते थे कहीं उनकी तरह खुद तो नहीं हो गये..
लेकिन फिर कहूंगा हमें किसी के चरित्र के बार में कहने से पहले सोच लेना चाहिये ..आप को याद दिला दू ..2003 या 04 में एक रावण की भूमिका अदा करने वाले अभिनेता की भांजी ने उस पर ऐसा ही आरोप लगाया था....वो बार बार कहता रहा कि उसने कुछ नहीं किया ...पर मीडिया ने उसे रावण मामा बना दिया था ..और सब ने उसे बल्तकारी बता दिया अंत में उसने खुदकुशी कर ली ...
जो सच है वो सामने आये ..अगर अविनाश दोषी हैं.... उनको कानूनी तौर पर जो सज़ा हो वो मिले..और अगर साज़िश है तो उन साज़िश करने वालो का पर्दाफाश हो ....

Saturday, February 14, 2009

Pub culture…

Pub culture…


काफी दोस्तों ने मुझसे pub culture क्या होता है पब में क्या होता है लिखने को कहा..मैं किसी को कोई दिशा नहीं देना चाहता । पर जो वहां होता है वो में साफ साफ लिख रहा हूं..सही ग़लत बताने वाला मैं कोई नहीं ..और pub culture का न मैं विरोध कर रहा हू और न समर्थन ..हमारी अपनी ज़िन्दगी है हम जिस राह चाहे चल सकते है ..

काम काज के लिये मैने कई साल मुंबई में बिताये है , इसी दौरान शाराब ,पब डांसिंग बार ..कार्ल गर्ल ,नशा और दौलत कमाने के रात के तरीकों को बहुत करीब से देखा और समझने कि कोशिश की है ..और उसी में से एक pub culture के बारे में और पब में आने वालों की ज़िन्दगी के बारे में लिखने जा रहा हूं... .

उस दौरान टीवी में थ्रीलर का काफी चलन शुरू हुआ था । और क्राईम लिखने के लिए प्लॉट की तलाश करते हुए रात को होने वाली गतिविधियों को देखने चल देते थे ।...

मुबंई एयरपोर्ट के पास एक डिस्को थीक ये एक ऐसी जगह थी जहां स्टैग एंटरी हो सकती है यानी अकेला आदमी भी जा सकता है ।वैसे ऐसे पबों में अकेले आना वर्जित होता है ..यानि अगर आपको आना है तो आपके साथ दूसरे लिंग का व्यक्ति होना ज़रूरी होता है ..लड़के के साथ लड़की और लड़की के साथ लड़का होना ज़रूरी होता है।

जैसे ही आप पहुचेंगे दरवाज़े पर आपको चार पांच लोग मिलेगे..जो आप के पैसों के बदले कुछ कोपन देगें और हाथ में मोहर लगायेंगें ये मोहर पहचान है कि आप कानूनी तौर से इस के अंदर आये हैं क्योंकि इस जगह के कई रास्ते होते हैं...औऱ ज्यादा रात होते ही मैंन दरवाज़ा बंद हो जाता है और दूसरे दरवाज़े खुल जाते हैं...।

मुस्कुराते हुए अंदर घूसिये.. और अंदर हल्की नीले, लाल रंग की रोशनी .. उत्तेजना वाले रंग अंधेरे में ..और तेज़ संगीत इतना , की किसी को कुछ बोलना हो तो एकदम नज़दीक जी एक- दूसरे को अपना शरीर एकदम जोड़ना पड़ जाता है अपनी बात सुनाने के लिये . ..

एक काउंटर होता है जिसके चारों तरफ स्टूल लगें होते हैं ..बीच में बार टैंडर, बहुत कम रोशनी, गिलासों की चमक, पानी का शोर, छम-छम करती बाहर आती शराब हवा में नशा जो आप सुनते हैं वो वहां आप महसूस कर सकते हैं ..
हर तरह की शराब हर किस्म का नशा ,विदेशी खाना ...


पब के चारों तरफ आपको काले लिबास में काफी ताकतवर नौजवान लड़के दिख जायेगें जिन का काम है की कही किसी का, नशे में झगड़ा न हो ..ये एक और काम भी करते हैं ।जिसके बारे में आप को मैं बाद में बताऊंगा ...

पब के एक कोने में बहुत बड़ा सा शीशा लगा होता है और उसी के पास प्लैटफार्म..जिसके नीचे भी लाइट लगी होती है जो संगीत की धुन के साथ कम और ज्यादा होती रहती है ।

सात आठ बजे से कार्यक्रम शुरू हो जाता है और घीरे घीरे लोग आने लगते हैं.. चमकीले ब्रांडिड कपडे हर तरह के फैशन ...छोटी,बड़ी ,सैकर्ट कमीज़ के बटन खुले हुये टी शर्ट थोड़ी फटी हुई .. हाथ में तरह तरह के बैंड, हर तरह के जैल बालों में .. एक दूसरे का हाथ हाथों में ....

पहले संगीत बार के लोग ही बजाते है फिर आता है डीजे.. जो लोगों की नव्ज़ के हिसाब से गाना बजाता है ..इसका दूसरा काम होता है वो ये इसके पास, पब में आने वाले हर आदमी की पूरी जानकारी होती है.. हां इसके पास हर नशे की पुड़ीया भी मिल जाये गी ..।

रात गहराते ही रंगीन होने लगती है छोटी सी जगह और उम्मीद से ज्यादा सैलाब..जवान लड़के लड़कियों हैं। एक दो बुर्ज़ग भी, जिन्दगी के गुज़रे हुए लम्हों का जाते हुए वक्त में मज़ा लूटने के लिये । अंग से अंग लग जाये तो आंनद आ जाये ।

संगीत के साथ कदम हिलने लगते है ,कदम के साथ हाथ ,हाथ के साथ कमर और कमर के साथ छाती ,छाती के साथ बाल और फिर सब एक साथ ..

सुनीता,अनीता,, रेखा ,अंजू,मंजू.. राकेश महेश रज़ा बॉबी कहां खो कर क्या बन जाते कुछ समझ नही आता ..


हर का शरीर एक दूसरे के इतने करीब की पहचान में ही न आये फिर दोनो के हाथ दूसरों के कपड़ों के अंदर ऐसे चले जायेंगे की किसी को होश ही न रहे ।ये सब देखते भी हैं और नहीं भी, कभी कोई तो कभी कोई..

टॉयलेट का भी यही हाल कोई उल्टी कर रहा होता है। कहीं लड़का लड़की बंद होते है क्या कर रहे होते हैं पता नहीं..
फिर कभी गिरती संभली कुछ लड़कियों को बांउसर सहरा देते हैं उनका मज़बूत शरीर इतना बढ़ीया लगता है कि वो उनके साथ ही चल देते हैं..

सब आते तो अपने पैरों पर फिर जाते हैं किसी के सहारे से ..और फिर आप सुबह खबर सुनते है ......एक कार ने इतनों को कुचल दिया...

Tuesday, February 10, 2009

HOSPITAL

दिल्ली का अपोलो अस्पताल और अस्पताल का आईसीयू वार्ड.. बेड पर एक बाप और शीशे से झाकते उसके दो लड़के रवि औऱ शशि... अब तक दो लाख का बिल बन चुका है बिमारी है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही ..और रकम दिन ब दिन खत्म होती जा रही है....
जिन्दगी अभी सही चल रही थी पर आचानक नरेंद्रपाल की तबीयत खराब हुई । पहले पडोस के डॉक्टर को दिखाया ,बात नहीं बनी तो नज़दीक के नर्सींग होम ले गए..तबीयत और बिगड़ गई...तो एक बड़े अस्पताल लेकर पहुचें .. जब सहेत नहीं संभली तो सब ने कहा अपोलो चलो...
अब तक टेस्ट मे पता चल चुका था की दोनो कि़डनी 90 प्रतिशत तक खराब हो चुकी है दिल की दो नसें पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं..
मंहगें टेस्ट ,मंहगी दवाई, और पांचतारा अस्पताल , दो लाख का कंपनी मेडिकल इंशोरेंस देती है जो पहले ही खत्म हो चुका , घर की जमा पूंजी भी लग गई ..।
पहले रिशतेदारों से मांगा जिनकी जो हैसीयत थी दिया..किसी ने अपना समझ कर ,किसी ने मजबूर समझ कर ,किसी ने मुहं बनाकर ,किसी ने एहसान जता कर.. बाप हैं बचाना है सब को और सब कुछ सहना है ..
रिशतेंदारों के बाद दोस्तों से मांगने का सिलसिला शुरू हुआ.. बहुतों ने मदद की पर ज्यादातर ने फोन नहीं उठाया..हां सब की मजबूरियां होती हैं..
आखिर में शुरू हुआ सलाह और मश्वरे का दौर जो हर हिन्दुस्तानी का जन्म सिद् अधिकार है किसी ने कहा सरकारी अस्पताल ले चलते है ..सरकारी अस्पताल.. क्या किसी की सिफारिश है .. जी सरकारी अस्पताल में जाना है तो आपके पास सिफारिश होना ज़रूरी है नहीं तो आप का दम लाइन , वार्ड बॉय और बाबू के पास घूमते घूमते ही निकल जायेगा....
यही सवाल है आज एक आम आदमी के लिये क्या कोई इलाज संभव है ..सरकारी अस्पताल क्या किसी काम के हैं.. अभी हम नेट में मदद की गुहार लगायेगें तो कई हमदर्दी के नाते कई 80 सी के कारण.. और कुछ के पास इतना पैसा है वो यूंही देता है..अपने घर के सदके के नाम पर...
पर हमें दूसरों के आगे अपनों की ज़िन्दगी की भीख क्यों मांगनी पड़ती है...रूपये न होने के कारण क्यों किसी की ज़िन्दगी खत्म हो जाती है ..
आज कलम की ताकत खत्म होगी है पत्रकार नेताओं के दलाल हो गए हैं ..अपना काम करा के चलते बनते हैं आम जनता का क्या किसे फिक्र...
नेता के लिये ये कोई मद्दा नहीं..पर सोचिये जो देश चांद पर पहुचने की हिम्मत करता है खेलों मे लाखों रूपये वारे निआरे करता है .. फिल्मों में अरबों कमाता है पर एक आम इंसान बिना इलाज के मर जाता है ..कब सुधरेगे हमारे अस्पताल. ये शहरों की हालत है गांव का तो इसे भी बुरा हाल है..

क्यों किसी पार्टी को मंदिर मस्जिद को छोड़ कर अस्पताल बनाने की याद नहीं आती जहां सारी सुविधायें हों.. रवि शशि जैसे लड़कों को अपने बाप को बचाने के लिये खुद को बैचना न पड़े...

Saturday, February 7, 2009

Just for you

आप के लिये.....

कितनी खामोश निगाहों ने बुलाआ मुझको ।
कितनी मगरूर अदाओ ने लुभाया मुझको ।।
कितने दिल थे जो मेरे वास्ते बेताब रहे ।
कितनी आंखों ने मेरे प्यार के सपने देखे ।।
नाज़नीनों ने मेरे प्यार में ,मरना सीखा।
कितनी ज़ुल्फों ने मेरे ,ग़म में बिखरना सीखा ।।
हर तरफ मेरे लिये हुस्न के नज़ारे थे ।
मेरे हमराह कभी चांद, कभी तारे थे ।।
फिर भी ठुकरा दी तेरे वास्ते दुनिया मैने ।
किसी जलवे की तरफ मुड़ के न देखा मैंने ।।
मैं तो बस तेरी निगाहों का तमन्नाई था।
तेरी जुल्फों की घनी छांव का शैदाई था ।।
मेरी आंखों में तेरे हुस्न की रा नाई थी ।
मेरे दिल में तेरी तस्वीर उतर आई थी ।।
मेरे होंठों पे मचलते थे तराने तेरे ।
मेरी आंखों से छलकते थे फ़साने तेरे ।।
मैं हमेशा तेरी जुल्फों का गिरफ्तार रहा ।
लबो-रूखसार की जन्नत का परस्तार रहा ।।
मैंने शादाब किए तेरी मुहब्बत का चलन छोड़ दिया।
मेरी उम्मीद का हर ताजमहल तोड़ दिया ।।
छीन के चैन मेरा ,तोड़ के पैमाने ए दिल ।
करके बरबाद मेरे प्यार की रंगी महफिल ।।
अब किसी औऱ की महफिल को सजाने के लिए ।
तूने जुल्फों को संवारा है ज़माने के लिये ।।
मेरी आंखों में तेरे ग़म की नमी आज भी है ।
कल भी थी तेरी कमी ,तेरी कमी आज भी है ।।
आज भी मैं हूं,तेरी याद है ,तन्हाई है ।
वही ग़म है ,वही धड़कन,वही रूसवाई है ।।
क्या खबर थी कि तू इस तरह बदल जायेगी ।
मेरी दुनिया से दबे पांव निकल जायेगी ।।
सोचता हूं कि ज़माने से किनारा कर लूं ।
और अब इसके सिवा दूसरा चारा भी नहीं ।।
क्या करूं जी के ज़माने में कि अब तेरे बगैर ।
एक नाकामे महुब्बत का गुज़ारा भी नहीं ।।

Friday, February 6, 2009

शराब मौत की घंटी

शराब मौत की घंटी

पिछले दो हफ्तों से हर शुक्रवार को फोन की घंटी बजती है तो किसी के मौत की ही खबर सुनने को मिलती है .. जिनकी लोगों की मौत की ख़बर मिली वो मेरे कुछ खास नहीं थे पर उनकी ज़िन्दगी को मैने बहुत करीब से देखा हर पल उनका संघर्ष हर वक्त जिन्दगी को जीने की आस ..कुछ करने का ज़ोर फिर निराशा हाथ...
महेश कालरा से मेरी मुलाकात एक प्रोडक्शन हाउस में हुई.. उस वक्त उनकी सेलरी हम सब से ज्यादा थी .. फ्रेंच कट, सिर एकदम साफ पठानी सूट और मुहं से हर वक्त अंग्रेज़ी के शब्द ...देखते ही हर आदमी प्रभावित..पर ये प्रभाव ज्यादा दिन तक नही रहे पाता ..दूसरे दिन हर आदमी उनका मज़ाक उड़ाता हुआ दिखता ...
मैं दूसरा प्रोग्राम देखता था इसलिये उनसे ज्याद वास्ता नहीं पड़ता पर जो कैमरामैन उनके साथ जाता वो ये ही बताता यार कालराजी ऐसा शॉट्स बताते है कि बस .एक ही शॉट्स में ऊपर नीचे राईट लेफ्ट पैन ज़ूम सब कुछ.. मै भी मुस्कुरा देता .. एक दिन हमारे बॉस ने बुलाया और कहा कुछ फैशन की ऐवी हैं आप और महेश साथ करेगें.मुझे बहुत चीढ़ सी हुई जिस आदमी की इतनी बुराई सुनी हो उसके साथ काम करना मुझे ठीक नहीं लग रहा था ..सुना था कि हर चीज़ का क्रेडीट वो ले जाते हैं..
लेकिन उनसे तारूफ होने के बाद वो सारी बाते मुझे ग़लत लगने लगी ..महेश बहुत आशिक मिज़ाज हंसमुख अपनी दुनिया में रहने वाले एक क्रेटीव आदमी थे ।उनकी कल्पना शक्ति काफी तेज़ थी जिसे समझ पाना एक आम आदमी के बस में नही था वो जो सोचते उसको मैं शब्द और शॉट्स दोनो देता ..और हमने टेलीवीजन को के लिये काफी अच्छे प्रोग्राम दिये...लेकिन
शाम होते ही शराब की बोतल खुल जाती ऑफिस में पांबंदी होती तो बाहर जा कर पी आते ..धीरे धीरे हिम्मत बढ़ने लगी कैंम्पा की बोतल मे शराब ऑफिस में आने लगी .मैने नौकरी छोड़ कर चैनल में नौकरी शुरू कर दी ..
एक दिन महेश जी कि उन्होने भी नौकरी छोड़ दी है औऱ शादी कर ली है ..कुछ काम हो तो बताऊ.बाद में पता चला कि शराब के मारे उन्हे हटा दिया गया था...
एक आद जगह उन्हे काम दिलाया लेकिन वहां भी शराब के चक्कर में काम नही चल पाया .. घर में भी जब पैसे कमा कर नही ला पा रहे थे..तो झगड़ा लाज़मी है ..एक बार वो मुझे दिखे तो मैं देख कर डर गया महेश एक दम गल गया था ..
कुछ दिन के बाद पता चला एक बच्ची के बाप बन गये .काम हो तो दिला दो बस यही कहते रहते .पर शराब नहीं छोड़ पाये.. काम की कई जगह कोशिश की पर सफलता कहीं नहीं मिली और शराब भी नहीं छोड़ पाये..


आखिर में 2 फरवरी 2009 को उनके मोबाइल से फोन आता है
मैं कहता हूं हां महेशजी बहुत दिनो के बाद .वहां से एक औरत की आवाज़ आती है महेश की 30 जनवरी को मृत्यु हो गई और आज उनका चौथा है ...

मै अपने और दोस्तों से कहना चाहता हूं कि और कोई महेश नहीं मरे इस तरह ......