Sunday, March 29, 2009

शक्ले बदलेगीं पर नज़रे नहीं

देखो उसने मुझे देखा
अच्छा लगा
फिर देखा तो
मैने कुछ सोचा
जब फिर देखा तो
कुछ अटपटा लगा
अब वो फिर देख रहा
और मुझसे बर्दाशत नही हो रहा
क्यो ये मुझे बार बार देखा रहा
देखने की भी हद होती है
हिम्मत कर के मैने भी उसे देखा
पर कुछ देर के बाद मैं न देख पाई
पर वो देखता जा रहा है
मुझे तो अब घबराहट हो रही है
कौन है ..क्यों देख रहा है
क्या कोई जान पहचान का है
आस पडोस का
कोई रिश्तेदार या कोई रिश्ते लाने वाला
पर ऐसे कैसे मुझे ये देख सकता है
पास जाऊं..नही नहीं बेकार की बात है
क्यों बात को बढ़ाऊं
पर अब भी मुझे वो देख रहा है
अब मुझे डर लगा रहा
क्या चाहता है
क्यों इस तरह..
बार-बार मेरी तरफ
मेरी तरफ मेरी तरफ
क्या मंशा है
क्या करूं ..क्या न करू
शोर करूं..ज़ोर से
नहीं नहीं नहीं
यहां से भागों पर कहा
क्या इन नज़रों से बच सकती हूं
या ये नज़र मेरा पीछा छोड़ सकती हैं
मुझे तो इन आंखों के साथ ही जीना है
इन्ही के साथ रहना
जहा भी पहुचना है वहां इन्ही को पाना
शक्ले बदलेगीं पर नज़रे नहीं
लोग बदलेगे पर सोच नहीं

No comments: