Friday, May 1, 2009

71 साल

71 साल.भाग-4
आप लोग सोच रहेगें होगे कि इतने दिनों के बाद 71 साल की कैसे आई याद .. ज़हन में कहानी पूरी है पर लिखने के लिये वक्त और शब्द तलाश कर रहा था ...बात रामनरेश के बच्चो की..
ज़िन्दगी हमारी धूमती है समाज औऱ उसके इर्द गिर्द.. और जब हम अपने दायरे से बाहर निकलते हैं तभी कहानी दूसरा मोड़ ले लेती..ये मोड़ या तो आपकी ज़िन्दगी को किसी मुकाम तक पहुचा देता हैं या फिर आपकी ज़िन्दगी मंजिल तलाशती रहती है ..ऐसे ही रामनरेश के बच्चों के साथ हुआ ।
हर चीज़ का अभाव ज़िन्दगी को भावहीन कर देते हैं और हम हर चमक की तरफ दौड पड़ते हैं जो हमे दिख रही होती है ...
जिन्दगी में रोशनी की लालसा हमें अकसर अंधेरे की तरफ ले जाती है ... और जब तक हम समझ पाते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है ..राम नरेश को , पड़ोसी ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी एक लड़के के साथ अकसर घूमती देखी गई ..
बाप की गैरत करवट पलटती है ..और पुरूष का पौरूष बाहर आजाता है ..पहली बार हां पहली बार रामनरेश की दिवारों ने राम नरेश की शयाद इतनी भंयकर आवाज़ सुनी थी .. घर में मौजूद सब लोग थर्रा गये.. राम नरेश अपने गुस्से को ज्यादा देर तक नहीं रख पाये और फूट फूट कर रोने लगे ..रामनरेश के साथ सब रोये .मां..दोनो छोटी बेटी और बेटा .. सब को देख कर बड़ी बेटी भी रो पड़ी और बोली पापा मैने ऐसा कुछ नहीं किया ..बस कुछ वक्त उसके साथ बिताया .. रामनरेश के आंसू नहीं रोके ..रोते- रोते बोले .बेटा जानता हूं.. मेरे अंदर कमी है ..तुम्हारा जो हक है शायद मैं वो नहीं दे पा रहा.. पर रहे रहा के एक इज्ज़त है वो अगर बची रहे ..तो तुम लोगों की बड़ी महरबानी ..उस रात रामनरेश के घर में किसी के आंसू रूक नहीं रहे थे .कुछ खाना नहीं बना ..
रात को रामनरेश ने अपनी पत्नी से कहा अपने भाई से बात करो ..बड़ी बिटिया के रिशते की ...
रामनरेश और उनके परिवार का जीवन किस राह चलेगा बताउंगा अगली पोस्ट में ..तब तक अपने विचार लिखते रहिये....

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