Friday, July 31, 2009

इमरान हाशमी को घर नहीं क्योकि वो मुस्लमान हैं....

इमरान हाशमी को घर नहीं क्योकि वो मुस्लमान हैं....

आज सुबह से खबर चली की इमरान हाशमी को बांद्रा की एक सोसायटी मकान नहीं दे रही है क्योंकि वो मुसलमान है।
इमरान हाशमी किस तरह के मुस्लमान हैं ये दुनिया जानती है पर ये मुद्दा बहुत संवेदनशील है ..
आज से कुछ अरसे पहले एक टीवी चैनल ने भी कई प्रॉपर्टी डीलरों और सोसायटियों मे जाकर ये पता किया था की क्या सच में मुस्लमान या अल्पसंखकों को माकान आप लोग नहीं देते है..आप सच मानिए वहां से जवाब हां ही आया था...
इमारन हाशमी ने आज जो मुद्दा उठाया उससे शायद लोगों की सोच में परिवर्तन आए..पर ऐसा होगा ये मुमकिन नहीं लगता ..
बात सन 2,000 की है, मुबंई के आधुनिकता की बातें मैने बहुत पढ़ी थी ,,,और मुबंई जाना एक सपना था और सपना मेरी पहली नौकरी ने पूरा किया ... मेरा और मेरे एक सीनियर का ट्रासफर मुंबई हो गया ।..
कुछ दिन हम कंपनी के गेस्ट हाउस में रहे फिर तलाश जारी हो गयी माकान की ... हर जगह अलग बातें दोनो के नाम पूछे जाते फिर एक से अच्छे से बात की जाती और दूसरे को हीकारत की नज़र से देखा जाता .. हम लोग मीडिया में थे तो ये बात कभी ज़हन में नहीं आती की हम भी हिन्दु या मुस्लमान हैं.. पर देश की आर्थिक राजधानी ने हमे ये बता दिया की हर धर्म के लिए यहां नज़र अलग है ..
पहले कंपनी से लेटर हेड पर लिखाने को कहा, वो हो गया ..पुलिस से एनओसी लाने को कहा, वो आ गई.. फिर पैसे जितने लेने चाहिए उससे ज्यादा मांगे ,,वो दे दिए.. फिर आखिर में उसने कहे ही दिया की आपके के साथ ये मुस्लमान है इसलिए आपको माकान नहीं मिलेगा...
कई बार सोसायटी ने मिटिंग के लिए बुलाया ...फिर साफ साफ कहे दिया कि हम सरदार और मुस्लमान को माकान नहीं देते और हम ही क्या मुंबई की 70 से 80 या ज्यादतर सभी सोसायटी का यही नियम है.... अगर आप अकेले रहना चाहे तो रहे लिजिए पर मुस्लमान के साथ नहीं....
मेरे सीनियर ने कहा मैं इसे नही छोड़ सकता... उन्होने कहा फिर आपको माकान नहीं मिल सकता... और हमे हिन्दु सोसायटी में माकान नहीं मिला .. ये उन जगह की बाते है जहां मुंबई को पढ़ा लिखा तबका रहता है । बाद में एक मुस्लमान के माकान में हम रहे..
2006 में मुंबई से दिल्ली आने पर भी यही सब का सामना करना पड़ा .. और इस बार दिल्ली का मयूर विहार और वसुंधरा इलाका था ..यहां पर भी वो ही सवाल और वो ही जिरहा....
बदलते वक्त के साथ हमारी सोच न बदल सकी ..कई बार ये मुद्दा उठाया गया शबाना आज़मी और जावेद अख्तर ने भी उठाया था पर कुछ न हो सका ।कई बड़े मुस्लिम पत्रकार भी इस स्थिति का सामना कर चुके फिर भी कुछ न हो सका .. शायद इमरान की बात और मुद्दा भी यूंही रहेकर रहे जाए.. पर एक बार फिर सवाल उठा है ..किसी जवाब के इंतज़ार में.......

Monday, July 27, 2009

नज़ीर बनारसी की नज़्म

नज़ीर बनारसी की नज़्म

किसने झलक पर्दे से दिखा दी।
आंख ने देखा दिल ने दुआ दी।।
होश की दौलत उनपे गवां दी।
कीमते जलवा हमने चुका दी।।
रात इक ऐसी रौशनी देखी।
मारे खुशी के शम्मा बुझा दी।।
तुमने दिखाए ऐसे सपने ।
नींद में सारी उम्र गवां दी।।
पूछें हैं वह भी वजहे –खमोशी।
जिसके लबों पर मोहर लगा दी।।
उनको न दे इल्ज़ाम ज़माना ।
खुद मेरे दिल ने मुझको दगा दी ।।
आंच नज़ीर आ जाए न उन पर।
दिल की लगी ने आग लगा दी ।।

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

सुबह सुबह ऑफिस पहुंचा तो दाढ़ी वाला बॉस अर्विन्द पर चिल्ला रहा था... बाहर जो आवाज़े आ रही थी उससे ये ही सुना जा रहा था की आप को बिल्कुल लिखना नहीं आता है..ऐसे नहीं लिखा जाता.. सब कुछ मैं ही बताऊं आपको... कैसे चलेगा, मुझे ये पसन्द नहीं....
ये बाते पढ़ कर आपको लग रहा होगा की अर्विन्द कोई नया लड़का होगा और उसने कोई स्टोरी लिखी होगी जिसे बॉस ने खारिज कर दिया ..ऐसा कुछ नहीं है...
हम लोग अर्विन्द को (जी’) यानि अर्विन्दजी कहे कर बुलाते हैं... टीवी में लिखने की समझ उन्हे जितनी है..शायद ही किसी को हो या बहुत कम को हो...तस्वीरों और आवाज़ों के साथ किस तरह शब्दों को पिरोना है उसमें उनकी महारत है ....पर बॉस को नहीं पंसद...
अब कुछ बॉस का भी परिचय हो जाए.. बिहार की ट्रेन पर चढ़ कर आ गए.. अपने भाईया के पास जो आई ऐ एस की तैयारी कर रहे थे ।बस सलाह मिल गी ऐ जी आप पत्रकार क्यों नहीं बन जाते है सुरेश भईया मोतिहारी वाले है न चैनल में वो रख लेगें या कही रखवा देगे... बस बॉस ने पत्रकारिता किसी तरह कर ली दाढ़ी रख ली और बन गए पत्रकार .....
किस्मत के तो पहले ही बुलंद थे और दिल्ली में पत्रकारिता का क्षेत्र देखें तो पूरा बिहार ही दिखता है हर तरफ उन्ही की भाषा और उन्ही की तरह दिखने और बोलने वाले और उन जैसे ही तौर तरीके वाले आप को दिख ही जाएगें ....
बॉस के बड़े भाई हर जगह थे कोई किसी ज़िले का तो कोई किसी और ज़िले का ..बस पहुच गए बॉस की कुर्सी तक...
और जब बॉस बन गए तो बॉस के हाव भाव कैसे होने चाहिए वो भी सीख गए..
आज अर्विन्दजी को कहे रहे हैं ..आप भले ही अच्छा लिखते हों पर मुझे पसंद नही...बात आगे बढ़ाने से पहले मैं एक बात और बताता चलूं पत्रकारिता की शुरूआत में बॉस अपना लिखा हुआ लेख अर्विन्दजी से ही चेक करवाते थे ...
खैर छोडिए अब मुद्दे की बात करते हैं की ये सब बताने के पीछे कारण क्या है...
आज गिरते हुए न्यूज़ चैनल के स्तर की वजह क्या है ....ये ही है....कि मुझे नहीं पसंद .. जी मुझे... चैनल में लोगों को क्या पसंद क्या सही है क्या ग़लत है किस तरह से क्या पेश करना चाहिए..कुछ मायने नही रखता जो मायने रखता है वो ये की आप का बॉस क्या चाहता है...और बॉस को क्या पसन्द है...
बस ये (मैं) ले डूब रहा चैनलों को इतनी जल्दी जो न्यूज़ चैनलों का बुरा हाल हो रहा उसकी वजह यही है । क्योंकि यहां मौजूद कोई भी टीवी का आदमी नहीं सब एक दूसरे के आदमी है और उन्ही को खुश करने के लिए यहां काम चल रहा है ...
जो लिखा जाता जो दिखाया जाता वो किसी न किसी दाढ़ी या सफेद बाल वाले की पसंद होता है..न की टीवी में क्या दिखाया जा सकता है क्या दिखाना चाहिए .
.इस पर विचार नहीं होता किसी की हिम्मत नहीं होती की ऐसे लोगों को काटे क्योंकि ये लोग इतने असुरक्षित है की किसी को सुनना इन्हे बर्दाशत ही नही
बस अपने अहम के साथ सीमित... कुएं के मेढ़क की तरह...और घीरे हुए अपने चापलूसो और चम्चों से.
...ये एक सच है जिसे हम सब को स्वीकार कर लेना चाहिए...जब तक बदलाव नहीं होगा तब तक दर्शक खबरों के मतलब ही खोजते रहेगे......और न्यूज़ चैनल के हेड अपनी जेब भरते रहेगें.....।।

Saturday, July 18, 2009

जिन्दगी चल नहीं रही दौ़ड़ रही है

जिन्दगी चल नहीं रही दौ़ड़ रही है

काफी दिनो के बाद लिखने बैठा तो जाना की ज़िन्दगी बहुत ते़ज़ दौ़ड रही है ..जब रूक कर देखा तो पाया बहुत कुछ आगे निकल गया है। आज अपनी पोस्ट में उन का ही ज़िक्र करूगां जो आगे निकल गये..
जब अपनी आखिरी पोस्ट लिखी थी तब फ्रांस में बुर्के पर पांबदी लगाई गई थी..उसके बाद ही ज़िन्दगी के चक्र में बहुत व्यस्त हो गया ऑफिस में बजट और घर में बेचैनी। इसी बीच ब्लॉग पर कुछ लिखने का मन तो बहुत किया पर थकान के मारे लिख ना सका। फिर कुछ दुनिया में और देश में ऐसे हादसे और वाक्ए गुज़रे कि ज़िंदगी सुन हो गई ।
इसी में से माइकल जैक्सन की दुखद मौत भी एक है। माइकल जैक्सन की मौत ने ये सोचने पर मजबूर किया कि इंसान एक लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ता है और उस मुकाम पर पहुंचने पर कितना बिखर जाता है । पैसा दौलत शौहरत सब हासिल हो जाता है पर सब मिलने पर फिर यही सवाल रहता है कि अब क्या , और क्या । माइकल की मौत भले ही दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी हो पर उसकी मौत एक बात ज़रूर पुख्ता कर देती है कि वाकई एक कलाकार की ही मौत थी, क्योंकि आज तक जितनी भी बड़ी हस्तियों की मौत हुई उन सब की मौत के बाद लोग विभाजित हुए हैं पीर हों पैग्मबर हों या फिर कोई अवतार पर जैक्सन की मौत पर दुनिया के हर शहर हर गली में उसके संगीत से लोगों की आंखें नम हो गई।
दूसरी बड़ी खबर मैं टी-20 विश्व कप में पाकिस्तान की विजय का भी जिक्र करूंगा क्योंकि जिस दौर से पाकिस्तान गुज़र रहा हैं वहां जीतना वाक्ई में काबिले तारीफ हैं। जहां दुनिया का हर शख्स पाकिस्तानियों को शक और नफरत की नज़र से देखता है वहां इस जीत से उनको मिली तारीफ उन्हे एक नई कुव्वत ज़रूर देगी ।
इसी बीच चैनल की टीआरपी में भी काफी उल्ट फेर हुए...एनडीटीवी अपनी बादशाहत कायम करने के लिए..पायदानों में बढौतरी कर रहा है..सहारा समय भी न्यूज़-24 को पीछे धकेल चुका है....
और साथ ही धब्बा लगा मोदी की साख पर भी आदर्श आचरण नैतिकता और भी बड़े बड़े शब्दों का बखान करने वाली बीजेपी और मोदी की सरकार का ही एक पार्षद नकली शराब से लोगो की जान लेने का आरोपी पाया गया । ये बात तो सब जानते है कि गांधी के राज्य में गांधी के विचारों पर मोदी सरकार नही चलती पर इतना गिर चुकी हैं इसका अंदाज़ा नही था। इसी के साथ में आपको एक वाक्या बताता चलूं पिछले विधानसभा चुनाव में मैं गुजरात के दौरे पर था वहां नवसारी जहां रतन टाटा का पुशतैनी घर हैं वहां पर भी जाना हुआ । नवसारी के लोगों से बात हुई तो उनका कहना था कि जो हमें शराब देगा उसी पर वोट पड़ेगा ।
शराबबंदी के राज में जहां खुलेआम लोग उसे वोट देने की बात कह रहे थे जो उन्हे शराब दे । जब हमने ये खबर आम की तो हमें इसका काफी विरोध झेलना पड़ा था। खुद मोदी ने हमारी इस रिपोर्ट पर सवाल खड़े किए थे और हमें काग्रेस का पिट्ठू करार दिया था। और आज उनकी खामोशी या शर्मिंदगी पूरे देश में जग ज़ाहिर है कि मोदी औऱ बीजेपी का असली चेहरा क्या है।
दिल्ली में मेट्रो का हादसा और देश में सूखा फिर कहीं बाढ़ ने भी मुझको बहुत दुखी किया ।
प्रधानमंत्री का नैम की बैठक में शामिल होने के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी से मिलना भी काफी अहम था। इस मुलाकात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज भारत पाकिस्तान की जगह खड़ा है। दरअसल पिछले करीब दो दशकों से पाकिस्तान भारत से कहता था कि पहले कश्मीर का मुद्दा सुलझाओं फिर कोई बातचीत होंगी , पर भारत का नज़रिया था कि कश्मीर मुद्दे को बातचीत से जोड़ना ठीक नही । अब वहीं हाल भारत का हैं , भारत चाहता था कि पहले 26-11 के गुनाहगारों को सज़ा हो फिर बातचीत बढ़ाई जाए लेकिन पाकिस्तान इस बार कामयाब रहा आतंक के मुद्दे को समग्र वार्ता के मुद्दे से अलग करवाने में । यानी अब जो बड़े मुद्दे है , चाहे आतंक हो , या कश्मीर उन्हे एक तरफ रखकर बातचीत जारी रहेगी ।

गुलाम नबी आज़ाद का परिवार नियोजन का नया तरीका भी पिछले दिनों चर्चा में रहा।
मायावती के हाथियों को अदालत ने सुरक्षित रखा । साथ ही रीता बहुगुणा पर दलित एक्ट और माया का ज्वालामुखी रुप भी दिखा।
अंत करता हूं अपने लेख का एक अच्छी खबर से आम आदमी का सपना साकार हुआ हैं. नैनों आम आदमी तक पहुंच गई . और सबसे पहले इसकी चाबी रतन टाटा ने खुद आकर दी आम से खास आदमी बन चुके अशोक विचारे को ।