Monday, July 27, 2009

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

एक और सच का सामना......हेड ऑफ चैनल

सुबह सुबह ऑफिस पहुंचा तो दाढ़ी वाला बॉस अर्विन्द पर चिल्ला रहा था... बाहर जो आवाज़े आ रही थी उससे ये ही सुना जा रहा था की आप को बिल्कुल लिखना नहीं आता है..ऐसे नहीं लिखा जाता.. सब कुछ मैं ही बताऊं आपको... कैसे चलेगा, मुझे ये पसन्द नहीं....
ये बाते पढ़ कर आपको लग रहा होगा की अर्विन्द कोई नया लड़का होगा और उसने कोई स्टोरी लिखी होगी जिसे बॉस ने खारिज कर दिया ..ऐसा कुछ नहीं है...
हम लोग अर्विन्द को (जी’) यानि अर्विन्दजी कहे कर बुलाते हैं... टीवी में लिखने की समझ उन्हे जितनी है..शायद ही किसी को हो या बहुत कम को हो...तस्वीरों और आवाज़ों के साथ किस तरह शब्दों को पिरोना है उसमें उनकी महारत है ....पर बॉस को नहीं पंसद...
अब कुछ बॉस का भी परिचय हो जाए.. बिहार की ट्रेन पर चढ़ कर आ गए.. अपने भाईया के पास जो आई ऐ एस की तैयारी कर रहे थे ।बस सलाह मिल गी ऐ जी आप पत्रकार क्यों नहीं बन जाते है सुरेश भईया मोतिहारी वाले है न चैनल में वो रख लेगें या कही रखवा देगे... बस बॉस ने पत्रकारिता किसी तरह कर ली दाढ़ी रख ली और बन गए पत्रकार .....
किस्मत के तो पहले ही बुलंद थे और दिल्ली में पत्रकारिता का क्षेत्र देखें तो पूरा बिहार ही दिखता है हर तरफ उन्ही की भाषा और उन्ही की तरह दिखने और बोलने वाले और उन जैसे ही तौर तरीके वाले आप को दिख ही जाएगें ....
बॉस के बड़े भाई हर जगह थे कोई किसी ज़िले का तो कोई किसी और ज़िले का ..बस पहुच गए बॉस की कुर्सी तक...
और जब बॉस बन गए तो बॉस के हाव भाव कैसे होने चाहिए वो भी सीख गए..
आज अर्विन्दजी को कहे रहे हैं ..आप भले ही अच्छा लिखते हों पर मुझे पसंद नही...बात आगे बढ़ाने से पहले मैं एक बात और बताता चलूं पत्रकारिता की शुरूआत में बॉस अपना लिखा हुआ लेख अर्विन्दजी से ही चेक करवाते थे ...
खैर छोडिए अब मुद्दे की बात करते हैं की ये सब बताने के पीछे कारण क्या है...
आज गिरते हुए न्यूज़ चैनल के स्तर की वजह क्या है ....ये ही है....कि मुझे नहीं पसंद .. जी मुझे... चैनल में लोगों को क्या पसंद क्या सही है क्या ग़लत है किस तरह से क्या पेश करना चाहिए..कुछ मायने नही रखता जो मायने रखता है वो ये की आप का बॉस क्या चाहता है...और बॉस को क्या पसन्द है...
बस ये (मैं) ले डूब रहा चैनलों को इतनी जल्दी जो न्यूज़ चैनलों का बुरा हाल हो रहा उसकी वजह यही है । क्योंकि यहां मौजूद कोई भी टीवी का आदमी नहीं सब एक दूसरे के आदमी है और उन्ही को खुश करने के लिए यहां काम चल रहा है ...
जो लिखा जाता जो दिखाया जाता वो किसी न किसी दाढ़ी या सफेद बाल वाले की पसंद होता है..न की टीवी में क्या दिखाया जा सकता है क्या दिखाना चाहिए .
.इस पर विचार नहीं होता किसी की हिम्मत नहीं होती की ऐसे लोगों को काटे क्योंकि ये लोग इतने असुरक्षित है की किसी को सुनना इन्हे बर्दाशत ही नही
बस अपने अहम के साथ सीमित... कुएं के मेढ़क की तरह...और घीरे हुए अपने चापलूसो और चम्चों से.
...ये एक सच है जिसे हम सब को स्वीकार कर लेना चाहिए...जब तक बदलाव नहीं होगा तब तक दर्शक खबरों के मतलब ही खोजते रहेगे......और न्यूज़ चैनल के हेड अपनी जेब भरते रहेगें.....।।

1 comment:

anil yadav said...
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