Friday, August 21, 2009

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ...

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ...
आज भी किसी सरकारी दफतर जाते वक्त रूह कांप जाती है ..एक डर और खौफ अंदर होता है न जाने क्या होगा ...
मुझे पता है इस लेख से कुछ नहीं होगा ... 62 साल से कुछ नहीं हुआ तो अभी कुछ होगा इसकी मुझे उम्मीद नहीं है पर मैं इसे अपना फर्ज़ समझता हूं की इस बात को आप सब के सामने लाया जाए..
शायद सरकारी महकमे में जाने से पहले हम मानसिक रूप से तैयार रहें.. यहां भाई कुछ भी काम एक बारी में बिना रिश्वत दिए बिना बहस और परेशानी लिए..और बिन ब्लड परेशर की गोली खाए नहीं हो सकता ।
आज ये बात मेरे अकंल ने मुझे बताई जिन की उम्र देश की आज़ादी के बराबार ही है...दुख की बात ये है..ये उस महकमें की बात है.. जो दावा करता है की वो आपकी परेशानी और दुख में आपके साथ है और रहेगा ..जी एलआईसी (LIC)..
अंकल ने रिटार्यरमेंट से पहले एलआईसी का यूलीप प्लान लिया था .15,000 हज़ार सलाना का .. जिसके भुगतान का आज आखिरी साल था और तारीख भी आखिरी थी ...
तो अंक्ल ठीक समय से घर से निकल पड़े .. दिल्ली के जगतपुरी के दफ्तर पहुचें तो पता चला की यहां से ऑफिस हटा दिया गया है ...जिसकी सूचना उन्होने अपने ग्राहकों को नहीं दी ...
वहा किसी को खबर भी नही की दफ्तर का अता पता क्या है ..पूछते –पूछते बारिश हो गई ..और बारिश के बाद दिल्ली का क्या हुआ ये आप सबने आज टीवी पर देख लिया होगा ..
अंक्ल की उम्र बारिश और मानसिक तनाव ..दफ्तर खोजते–खोजते तीन बज कर तीन मिनट हो गए ... जब वो उस खिड़की पर पहुचें जहां चेक जमा करना था उस बाबू ने तख्ती दिखा दी....की वक्त पूरा हुआ..
कई मिन्नतें की गुज़ारिश की पर बाबू अपनी कुर्सी से उठ गया ..शायद उसने दिन भर बहुत काम किया था .. ठीक टाइम पर आता है लंच वक्त से पहले कर लेता है .. और पूरे दिन ख़ाली नहीं बैठता सारे कायदे कानून का पूरा पालन करता है ..
इसलिए भीगे बुर्ज़ग की प्रार्थना भी उनको सुनाई नही दी ..
हर बार कोई न कोई कूढ़ कर सरकारी दफतर से वापस आ जाता है ... क्यो करते हैं ये लोग ऐसा ..अब तो सैलरी भी सरकार अच्छी देती है ..इनके घर में भी लोग होगे जो किसी न किसी दफतर में काम के लिए जाते होगे क्या उन्हे इसका ख्याल कभी आता है... काश कोई सरकारी नौकरी करने वाला इसे पढ़े और बताए.. क्या उनको ज़बरदस्ती कोई नौकरी करा रहा है .. जो वो ऐसा करते है ...
शायद ये अब भाषण हो रहा है ...जिसका कोई महत्व नहीं होता .....

Thursday, August 20, 2009

जंसवत शहीदे -आज़म

जंसवत शहीदे -आज़म

जसवंत सिंह की बीजेपी से विदाई हो गई है और विदाई भी ऐसी वैसी नही पार्टी ने बड़ा ही बेआबरू कर के उन्हे निकाला हैं । ऐसा सलूक तो आज के ज़माने में किसी स्कूली बच्चे के साथ भी नही किया जाता है। लेकिन जसवंत सिंह के साथ बीजेपी ने किया और जसवंत सिंह ने उसे बर्दाशत भी कर लिया, आप सोच रहे होंगे कि बर्दाशत ना करते तो और करते क्या , तो आप भी सही हैं। बीजेपी की मुख़ालफत करने वाले जसवंत सिंह के साथ हुए ऐसे सलूक पर बीजेपी को कोसने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे। अगर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान कि अगर बात की जाए तो वहा के मीडिया ने तो जसवंत को शहादत का दर्जा तक दिलवा दिया , एक ऐसा शहीद जिसे सच सामने लाने के लिए उसके अपनों ने ही बलि चढ़ा दी । ये बात भी खूब ज़ोर शोर से उठाई जा रही है कि जसवंत की संघ से नज़दीकी ना होना भी उनकी पार्टी से विदाई की वजह बनी । लेकिन एक बात जो कोई समझ नही रहा कि जसवंत को दरअसल उनका लालच ले डूबा।
..... ज़रा सोचिए, जसवंत सिंह क्या आपको इतनी कच्ची गोलियां खेले हुए लगते हैं कि जिस पार्टी और विचारधारा के लिए उन्होंने एक उम्र गुज़ार दी उसे समझने में उनसे इतनी बड़ी गल्ती हो गई कि , उसके बिल्कुल उल्ट जाकर उन्होंने अपनी किताब लिखी। या क्या आपको लगता हैं कि जसंवंत सिंह में इतना बूता हैं कि उन्होंने अपना राजनैतिक भविष्य दावं पर लगाने का फैसला लिया सिर्फ अपने विचारों के लिए । दरअसल इन दोनों ही तर्कों पर विश्वास करना मुश्किल हैं क्योंकि जसवंत सिंह एक मंझे हुए राजनेता हैं , एक ऐसे राजनितिज्ञ जो वित्त विदेश औऱ रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं और अपने राजनीतिक भविष्य पर तो वो बीजेपी से निकाले जाने के बाद भी विराम लगाना नहीं चाहते तो फिर एक किताब के लिए वो इतना बड़ा दांव कैंसे लगा सकते हैं आप खुद सोचिए।
.....सच तो ये हैं कि जसवंत के मन में अब पार्टी में अहम भूमिका में आने की इच्छा हिचकोले भर रही थी। लोकसभा चुनाव में जिस तरह पार्टी को हार मिली उस पर मंथन के लिए पत्र लिखकर आग्रह करने वाले जसवंत ही थे और तब भी मकसद उनका यही था कि हार पर मंथन से वो अपने लिए अमृत हासिल कर सके। जसवंत को उम्मीद थी हार कि वजहों में पार्टी की कट्टरवाद छवि का ज़िक्र ज़रुर आएगा। पार्टी का नेतृ्त्व बदलना भी तय ही मान रहे थे जसवंत । उन्हे लगा ऐसे में सबको तलाश एक ऐसे नेतृत्व की होगी जो धर्मनिर्पेक्ष हो। तो खुद को सबसे बड़ा धर्मनिर्पेक्ष साबित कर दिया जसवंत सिंह ने खुद को अपनी किताब..... जिन्ना, भारत विभाजन के आईने में। और किताब के विमोचन के लिए वक्त तय किया गया ठीक चिंतन बैठक से पहले का। अब समझ गए होंगे आप जसवंत सिंह का सारा खेल
दरअसल जसवंत सिंह ने अपनी तरफ से कौ़ड़ी तो बड़ी दूर की चली लेकिन उनका दांव उल्टा पड़ गया और अडवाणी कैंप ने उन्हे पार्टी से बाहर का रास्ता दिख दिया। जसवंत से भूल बस ये हुई कि जिस लालजी ( लालकृष्ण अडवाणी ) को वो अपना समझते थे उन्ही को वो सही से नहीं समझ पाए। जसवंत को नही पता था कि उनका यशवंत सिंहा और अरुण शौरी कैंप में जाना आडवाणी को नागवार गुज़रा है और ना ही जसवंत को इस बात का अंदाजा था कि पीएम इन वेटिंग अभी अपना इंतज़ार खत्म नही करना चाहते इसी लिए वो अपनी हर चुनौती को जड़ से मिटाने में देर नही करेगे।

Sunday, August 16, 2009

कुछ अधूरे काम बचें...

कुछ अधूरे काम बचें...

उम्र साठ साल ..
नौकरी से मुक्त
बच्चों की ज़िम्मेदारियों से रिहा..
न कर्ज़ न कोई फर्ज़..
जी लूं तो ठीक..
न रहूं तो भी सही..
कोई आए तो अच्छा
न मिले तो बेहतर..
भगवान की शरण में
तीर्थ स्थानों में
मंदिर में, दरगाहों में
इस से, उस से
जहा और जिससे वक्त गुज़र जाए
वो बेहतर
पर कुछ पूरा करने की चाहत में
कुछ हसरतों के एहसास में
उम्र के कुछ दिन बचें हैं..
कुछ अधूरे काम बचें हैं..
कभी किसी का दिल तोड़ा
कभी कोई रिश्ता छोड़ा
कभी इस फिराक में
कभी उस जुगाड़ में
इससे लिया उसको दिया
वहां अच्छा बना तो वहां बुरा बना
किसी का भला किया तो किसी की भुला दिय़ा ..
ज़िन्दगी के इस मुकाम पर
कुछ अधूरे काम पड़े हैं...
मां की गोद से कब ज़मी पर चला
बाप की उंगली से कब छूट गया
जाने किस रिश्तो से घीरा
किस बंधन में बंधा ..
सोचता हूं मैं
क्या मैने सब कुछ पूरा किया ..
सागर की लहरों में मोतियों की खोज से
ज़िन्दगी के इस पल में कुछ
अधूरे काम बचें है.......
शान.....

Friday, August 7, 2009

अमरनाथ यात्रा ..एक नज़र

अमरनाथ यात्रा ..एक नज़र
पिछले कुछ सालों से अमरनाथ यात्रा के साथ कोई न कोई विवाद जुडता रहा है ।कभी शिव लिंग पिघल जाता था तो कभी ज़मीन को लेकर खूनी संधर्ष शुरू हो जाता था ...पर शुक्र है इस बार आंतकवादियों की धमकियों के बावजूद अमरनाथ यात्रा बिना किसी विवाद और हिंसा के मुकम्मल हुई ।
दो महीने चली इस यात्रा को मौसम की वजह से श्रद्धालुओं को कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा और यात्रा को बीच में रोकना भी पड़ा पर अंत भला तो सब भला ..
सरकार ने कड़ी सुरक्षा का इंतज़ाम किया था 4लाख तीर्थ यात्रियों ने 3880 मीटर ऊंचाई पर शिवलिंग के दर्शन किए ।रास्ते काफी मुश्किल भरे थे दर्शन और कठीन हो जाता है जब वहां का लोकल आदमी अपनी मनमानी करने लगता है..
चलने और अपनी ज़रूरत की चीज़ों के लिए आम श्रद्धालु उन पर ही निर्भर करता है और वो अपनी मनमानी करने से बाज़ नहीं आते ..इस मुद्दे पर हर कोई खामोश है ..ज़ीमन विवाद की एक बड़ी वजह ये भी है तभी वहां का लोकल आदमी अमरनाथ ट्रस्ट को ज़मीन दे जाने का विरोध करता है क्योकि तब उनकी गुंडा गर्दी नहीं चल सकती ।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस के उपमहानिरीक्षक नलिन प्रभात ने पत्रकारों से कहा, "यात्रा के दौरान लश्कर-ए-तैयबा सहित कई आतंकी संगठनों से इस यात्रा पर हमले का खतरा बना हुआ था...लेकिन हमने तीर्थयात्रियों को निशाना बनाने की आतंकियों की सभी कोशिशों को सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया."
यात्रा के दौरान सेना ने चोटियों पर सुरक्षा का जिम्मा संभाल रखा था और सीमा सुरक्षा बल के पास यात्रा मार्ग की सुरक्षा का जिम्मा था.
ये तारीफ के काबिल है पर शिवलिंग तक पहुचते पहुचते जो श्रद्धालुओं को शोषण और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है उस पर भी हमें नज़र ज़रूर रखनी चाहिए... तभी हम कहे सकते हैं शुक्र है यात्रा सफल हुई......

What an idea सरजी.....

What an idea सरजी.....
इस विज्ञापन ने देश में क्रांती लाई हो या न लाई हो पर न्यूज़ चैनल वालों ने इसे अपना गुरूमंत्र मान लिया है । आज एक ऐसे ही आईडिए की तलाश में हर चैनल धूम रहा है..टीआरपी तो बेवफा है एक दिन ठुकरा ही देती है ..इसीलिए एक ऐसा कार्यक्रम चाहिए जिसे दर्शक गले लगा ले और चैनल बाज़ी मार जाए...
ज़ोर शोर से तैयारी है इस बार तो कुछ कर जाएगें अपने दिग्गजों को छोड़ा है वो कुछ नया लाएगें..अपने पास जितना दिमाग था उतना लगा दिया ..एक नया कार्यक्रम अपने चैनल पर ला दिया...सब ने बॉस की बहुत तारीफ की सर क्या बात है ,,ये तो हीट है...पर हफ्ते भर बाद नतीजा आया... मामला फिसससससस.....
क्या करें जनाब ये भी लोगों को पसंद नहीं आया ... कारण खोजने चले तो जिन्होने तारीफ की थी वो ही अब बुराई करने लगे ..सर ये हो जाता तो अच्छा था ,सर ये कर लेते तो ठीक था ... अबे उस वक्त क्या सांप सूंध गया था या लक्वा मार गया था जो मुंह से आवाज़ नहीं निकली ...
जी यही हाल कमोबेश हर चैनल का है ..एक नई चीज़ की तलाश ..अब तो स्टिंग आपरेशन भी नही रहे , साधू पंडित भी लगातर फ्लाप हो रहें है.. तर्क वितर्क में हमारा एंकर अपना ऐसा ज्ञान देता है की गेस्ट के साथ दर्शक भी पल्ला झाड लेते हैं...दूसरे चैनलों से चोरी की वो भी नहीं चली ...राखी सांवत की सगाई की भी खबर बना दी ...अब कहां से लाए और मसाला ...
लगातार लोगों की रूचि न्यूज़ से हटती जा रही है कारण जानने चले तो सब बोले भाई अब न्यूज़ रहीं कहां...अब सवाल है कहां गई न्यूज़...इस सवाल से बड़ा सवाल है की न्यूज़ होती क्या है ....
काली दाढी में सफेद बाल वाला पत्रकार ..कंधे पर खादी का झोला लटाकए रखने वाला पत्रकार ,ब्लैक बैरी फोन पर लिखता पत्रकार, या लैप टॉप लिए फिरता पत्रकार ..सब तलाशते दिख रहे हैं एक नए idea ... को...
पर आईडिया है की आता ही नहीं....मंदी की मार झेल रहे देश में सब से ज्यादा जो मंदी है वो नए idea की ही है...
इस ब्लाग को हर चैनल वाले पढ़ते हैं..इसलिए दोस्तों अगर आप के पास कोई IDEA हो तो ज़रूर लिखे शायद आपका IDEA पढ़ कर कोई चैनल वाला कहे दे WHAT AN IDEA SIRJI….