Thursday, December 31, 2009

इस बार

इस बार
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल
जिसने दर्द दिया
उसे दवा दे
जिसने ज़ख्म दिया
उसे मरहम दे
जिसने आंसू दिए
उसे सब्र दे
जिसने बाण छोड़ा
उसे बांह दे
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल।।
इस बार बदले गी सूरत
इस बार बदले गी मुर्त
इस बार बदले गी तस्वीर
इस बार बदले गी तकदीर
जो बुरा हुआ उसे भूल जा
जो है उस के साथ चल ।।

शान....

Tuesday, December 29, 2009

मैं अपनी भतीजी से क्या कहूं।..एक दुखियारी

लड़कियों के लिए क्या बदला

जन्म दिल्ली में हुआ और यहीं पर मैं पढ़ी बड़ी ..शहर के साथ मैने औऱ मेरे परिवार दोनो ने तरक्की की ..जैसा आप सब जानते है जो हाल नौकरी पेशे में होता है वो ही हमारे परिवार का था ना बहुत अच्छा कहेंगे ना बहुत बुरा । ठीक ठीक जिंदगी गुज़र बसर हुई। पर शहर में रहते और बड़े होते मैने यहां अपने साथ बहुत बदसलूकी और बदतमिजी सही।
कभी किसी का विरोध किया तो वहां मौजूद लोगों ने मेरा मज़ाक ऊड़ाया। यहां तक की दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी कहा क्यों बात को बढ़ावा देती हो क्या होगा उल्टे बदनामी होगी। मैं खून के घूंट पीकर सब्र कर लेती कि वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। मेरी दिल्ली सही हो जाएगी।
बसों में मर्दों जिनमें छिछोरे नौजवान हो या पढ़े लिखे या फिर मनचले बुजुर्ग जो मेरे दादा कि उम्र के हुआ करते थे अक्सर मेरे पीछे चिपक जाया करते थे। जब मैं कहती ज़रा ठीक से खडे हो तो उनका जवाब आता अगर बस मे इतनी परेशानी हैं तो टैक्सी में चलाकर उनकी बात सुनकर पूरी बस हंसती । और मैं बिना गल्ती के शर्मिंदा हो जाती।
बाज़ार में कोई सामान लेने जाऊं और दुकानदार बेईमानी करें और मैं उसे टोक दूं तो वो उल्टा मुझसे इस लहजे में बात करना शूरु कर दे कि आंखों से आंसू निकल पड़े। वो ज़ोर से चिल्लाने लगता जानता हूं में तुम जैसी लड़कियों को । मैं क्या मतलब कहूं तो आगे बढ़कर बोलने लगे बताऊं.....मैं फिर चुप हो कर घर आजाती भाई और पिता को नहीं बताती ......जानती थी कि वो उन लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते और कहीं उनको मेरी वजह से परेशानी ना हो कोई मुसिबत ना खड़ी हो जाएं। पुलिस के पास जाकर शिकायत करना तो मुमकिन ही नहीं था। हर दिन मरती और ज़िल्लत सहती मैं बड़ी हुई।
फिर शादी हो गई दिल्ली छोड़क दूसरे शहर चली गई। वक्त के साथ पति के प्यार के सहारे सब कुछ भूल गई जैसे शायद बाकि मेरी बहने भूल चुकी थी. बहुत बरसों के बाद दिल्ली आना हुआ पूरा नक्शा बदल चुका था। बडी बड़ी गाडियां लो फ्लोर बस मेट्रो और ना जाने क्या क्या । मुझे खुशी हुई कि मेरी दिल्ली बदल गई और मैं इस खुमार में आ गई कि शायद लोगों का रवैयय भी बदल गया होगा। पर आज मैने अपनी भतीजी को रोते देखा। तो रहा ना गया। उसके कमरे में जाकर पूछा क्या हुआ बेटा ...तो वो मुझसे लिपट कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और अपने साथ लगातार हो रही दिल्ली के मरदों की हरकतों के बारे में बताने लगी। वो जो जो बता रही थी मुझे उके हर हादसे और वाक्ए में अपने ऊपर गुज़रा हर मंजर नज़र आ रहा था। मैने क्हा लड़कियों के लिए क्या कुछ बदला। आप लोग मेरे सवाल का जवाब देंगे । मैं अपनी भतीजी से क्या कहूं।
आपके जवाब के इंतज़ार में ...........
एक दुखियारी

Monday, December 28, 2009

ऱूख्सत

ऱूख्सत

मुझ को दर्द है ज़माने से
मैं यूही ग़मगीन रहता हूं
तुझसे मिलना है हसरत मेरी
हर शाम ये सोच कर सोता हूं।।

दर्द का रिशता पुराना है
अश्कों का दरिया बहाना है
मैं कई बार टूटा यूही
इस बार टूट के बिखर जाना..।।

न संभालो मुझको
न दो सहारा
दूर कर दो साहिल को
अब की बार मुझको डूब ही जाना है।।

कई बार चढा, कई बार उतरा
रंग हिना का हाथो से
इस बार खून- ने- रंग को भी आज़माना है ।।

मुझसे नफरत करो तो कर ले ऐ दोस्त
मुझसे गिरया करे तो न कर ऐ दोस्त
मुझसे रश्क करे तो कर ले ऐ दोस्त..
मुझसे गमोरंज करे तो न कर ऐ दोस्त..

बहुत हुई नमाज़े शुक्रआना..
शुक्र अल्लाह का कर के जाता हूं..
फिर न आऊंगा इस दुनिया में ऐ शान”
पढ़ दो ऐ दोस्त मेरा नमाज़े जनाज़ा ।।


शान,,

Saturday, December 26, 2009

शान का प्रेम पत्र -3

शान का प्रेम पत्र -3
प्रिय काफी दिनों के बाद तुम को पत्र लिख रहा हूं । इस उम्मीद के साथ जहां हमारी बात और मुलाकात खत्म हुई थी..। वहा पर तुम आज भी रोज़ जाती होगी ..याद आता होगा तुम्हे हर गुज़रा हुआ वक्त ..मेरा भी वो ही हाल है ... उन जगहों और उन लम्हों को मैने समेट कर रखा हुआ है ..जब भी अकेला होता कुछ परेशान होता तो वो गुज़रे हुए पल को अपनी यादों से निकाल कर थोड़ा मुस्कुरा लेता ...अच्छा लगता, शायद ज़िन्दगी में वो जो पल बीत चुकें हैं..उन से अच्छा वक्त न जाने मैं कब देंखू...
कल कुछ अजीब हुआ..दिन रात मेरी आंखों से आसू बहते गए..ज़ोर ज़ोर और ज़ार ज़ार रोने का दिल करने लगा..चाहा रहा था बहुत से ज़ोर से रोऊं, चिल्लाऊं ,चीखूं..पर आवाज़ न जाने कहां दब गई औऱ दबी हुई आवाज़ दबी हुई भावनाओं ने अश्कों का दरिया बना दिया...
ज़हन कुछ काम नही कर रहा था ..बस मैं रोता जा रहा था ..क्यों.. मालुम नही
शायद मैने जीवन में सिर्फ सिर्फ खोया है ..औऱ लगातार खोता ही जा रहा हूं... बहुत कुछ पाने की चाहत है .पर जब दर्पण देखता हूं..तो अपने को अकेला पाता हूं..
सब अपनी अपनी ज़िन्दगी और दिनचर्या मे व्यस्त हो जाते हैं... सब के पास बहुत काम है ..अपने लिये अपनो के लिए। मैं अकेला, जो था उसे खो चुका और जो है वो छूट रहा है...
आज दिल किया तुम से बात करने का शब्दों से अपने दिल का हाल बताने का ...इस आशा के साथ तुम पढ़ कर कभी जवाब नहीं दूगी.. पर वादा करो दुखी भी नही होगी..तुम्हे दुख न हो इसलिये तो मैं तुम से दूर चल गया...

तुम्हारा
शान......

85 साल के तिवारी .... सेक्स के शहंशाह ( कुछ पुरानी बात)

85 साल के तिवारी .... सेक्स के शहंशाह ( कुछ पुरानी बात)


85 साल के एन डी तिवारी तीन जवान लड़कियों के साथ एक स्टिंग आपरेशन में पकडे गए.. कहा जा रहा है तीनो लड़किया देहरादून से आंध्र प्रदेश के राजभवन लायी गयी थी .. जो औरत उन्हे लायी थी उस को तिवारीजी से कुछ काम था ..काम के बदले तिवारी जी को शबाब चाहिये था ।

रात में सेक्स और दिन में मसाज तिवारीजी का शगल है और ये शगल आज का नहीं बहुत पुराना है.. और केवल तिवारी ही नहीं बाकि भी कई सफेद पोश है जिनका कमरे में अपना असली रूप में दिखता है....पर बात पहले 85 साल के सेक्स के शंहशाह एन डी तिवारी की...

बात 2002 की है उस दौरान रिपोर्टिंग के चलते उंत्तराचल का काफी दौरा रहता था स्थानीय पत्रकारों औऱ साथी पत्रकारों से तिवारीजी की रंगीन मिज़ाजी के किस्से सुनने को मिलते रहते थे ...

बाद में चुनाव हुए तिवारी जी उत्तरॉचल के मुख्यमंत्री बने ..तब तो मुख्यमंत्री निवास पर शाम और रगीन रातों की खबर आती ही रहती है..

उन के मंत्रीमंडल का संचालन जो मंत्री जी करती थी .. उनके साथ उनके संबध को शायद ही कोई ऐसा पहाडी हो जो जानता न हो ..उन महिला मंत्री का नाम फिर कभी ..
कहते है तिवारीजी को कम उम्र की लड़किया बहुत भाहती है...और ये शौक उन्हे आज से नही तब से जब कभी वो य़ूपी के मुख्यमंत्री थे..ये बात सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो को मालुम है.....और हां आला कमान को इससी भनक न हों ऐसा क्या हो सकता है...
कितनी लडकियों का उनके दौरा शोषण किया जा चुका होगा ...85 साल के हैं और 50साल से ज्यादा राजनीति में हैं...

हर रात को तीन लड़किया... अब हिसाब आप खुद कर सकते हैं...
रूचिका मामले में राठौर और तिवारीजी में क्या कोई अंतर है...
क्या कांग्रेस उनके खिलाफ भी कोई कार्यवाई करेगी...

इस्तिफा क्या उन लड़कियां को इंसाफ दिला पाएगा..जो तिवारी के डर और रूतबे के कारण कहीं गुम हो चुकी है..

नहीं क्योंकि भ्रष्टचार और बेमानी है हमारे राजनेता के खून में ही है...

सारी पार्टी एक ही थाली में रोटी खाती है ..स्व.प्रमोद महाजन का किस्सा भी सब को याद होगा... औऱ आज भी हमारे मंत्री मंडल में कौन कौन लड़कियों के शौकिन है उनके बारे में क्या हमें मामुल नहीं..लेकिन न कोई कहे सकता है न कोई लिख सकता है..

सोनिया मैडम आज तिवारी का राज़ सब के सामने आ गया क्या बाकियों पर कार्यवाई तब होगी जब उनका कोई स्टिग आपरेशन सामने आएगा...आप से उम्मीद है आप कोई सख्त कदम उठायेगी....।।

Saturday, December 19, 2009

71साल (भाग-८)8

71साल (भाग-8)

घर में खामोशी का माहौल था ...रामनरेश दिल पर हाथ रखे बैठे थे... पास में दोनो लड़कियां मां..बेटा थे। बड़ी लड़की दूसरे कमरे की चौखट पर खड़ी थी .उस जगह जहां से उस कमरे की सारी आवाज़े आसानी से सुनी जा सके जहा परिवारवाले बैठे थे।

कुछ देर तक घर मे सांसे, जलती बुझती टूयब लाइट और पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था... किसी की हिम्मत नही हो रही थी की रामनरेश से कुछ पुछें...धीरे से रामनरेश की पत्नी बोली अरे बताऊ क्या कहा भाई ने ... कुछ देर तक रामनरेश चुप रहे फिर बोले लड़के वालों ने मना कर दिया .... सब के मुंह से एक साथ निकला मना कर दिया ....पर क्यों.... रामनरेश से सारी बात बताई....

शादी हमारे समाज मे कितनी अहमियत रखती है ..हर एक संबध जोडने के लिए हम कितने उतावले होते हैं ..हर खुशी हमारी उसी के आसपास रहती है ..हर पल हम उसी सपने के साथ जीते है... औऱ लडकी का ब्याह मानो एक पहाड अपने सिर में लादे हुए हो ... फिर रिश्ता टूट जाना तो किसी अपऱाध से कम नही.. वो सज़ा जिसमें आंसू और मातम से ही पुरसा दिया जा सके..

न आसू और न ही मातम रामनरेश के घर वालों के लिए नये नहीं थे ..क्यों कुछ पल की खुशी औऱ ज़रा सी हंसी भगवान को मंज़ूर नहीं ।कहते हैं अगर आपने किसी के साथ बुरा नहीं किया तो भगवान आपके साथ कभी बुरा नहीं करेगे..पर ये सब सिर्फ कहावतें हैं..जिनका असल जीवन से कोई सरोकार नहीं.. कोई लेना देना नही...

मुझे तो लगता भगवान ने ग़म और दुख के लिए कुछ लोगों को चुन लिया है ..जिन्हे उसे पीडा ,दर्द, तकलीफ सज़ा देनी ही है ..जैसे कुछ लोगों को सुख सुविधा धन दौलत देना ही है .. और रामनरेश पहले क्रम मे आते है..जहा खुशी और खुशी का पल वो अधूरा खव्वाब है जो पूरा होने से पहले हमारी आंख खोल जाती है नींद टूट जाती है ..और हम पाते है अपने शरीर पर फटी हुई रज़ाई के सिवा कुछ नहीं...

सब उदास थे ज़ाहीर है आप सोच रहे होगे ..की बड़ी लडकी पर पहाड टूट पडा होगा ..कोई खाना नहीं खायेगा..हां किसी ने खाना नहीं खाया ..पर बड़ी लडकी जिसका रिशता टूटा वो किचन में गई और आज उसने रोटी में खूब घी लगाया चीनी डाली और आंसू पोछती हुई ..दिल में कोई निर्णय लेती हुई रोटी चबा रही थी....

आंखे गीली थी पर दिमाग कहीं चल रहा था .. हर चीज़ तो उसने वो ही की जो उसके घरवालो ने कहा..किसी के साथ ज़रा बात क्या कर ली की बात का बतंगड बन गया ।
उसका रिश्ता करवाया जाने लगा..उसके लिए भी उसने मना नहीं किया ..ताया जिन्होने अपने भतीजी भतीजे को कभी प्यार नहीं किया हमेशा उनका अपमान किया उन्होने तो और बुराई का मौका मिल गया ..हममे किढे निकालने और हमारा अपमान करने का।
हर बात तो सुनी अपने पिता की ,,मां की घर की .ऐसा नही ऐसा करो ये सही है ये गलत है .. यूं न करो यूं करो....क्या मतलब क्या फायदा ..नतीजा क्या निकला ..मना कर गए लडके वाले... निकाल गए मुझ में कमी ..अब मैं वो ही करूगी जो मुझे सही लगे लगा ..जो मेरे लिए सही है...
सुष्मा रामनरेश की बड़ी बेटी ..आज कोई फैसला ले रही..इस फैसले से कहां खत्म होगी इसकी मंजिल ..बताऊंगा अगली पोस्ट में तब तक अपने विचार भेजते रहिए...

Friday, December 18, 2009

71 साल (भाग-7)

71 साल (भाग-7)

रामनेऱश अपने भाई के पास जा कर बैठ गए... भाई लेटा रहा वो उनके सिरहाने बैठे रहे..दोनो में काफी देर तक कोई बात नहीं हुई... फिर कुछ देर बाद भाई की पत्नी नीता रामनरेश के लिए चाय ले आई... चाय रखते हुए बोली
भाभी-भई वो मना कर गए....
रामनरेश-मना कर गए..
भाभी-हां उन्हे पसंद नही आया न तुम्हारा घर न तुम्हारे बच्चे और न ही लड़की ... रामनरेश ने भाई से पुछा ..भाई क्या कहे रहीं है भाभी...भाई ने अब जा कर मुंह खोला ..ठीक कहे रही हैं...
रामनरेश – आपको मुझे बताना चाहिए था..
भाई – क्या करता तू ..और मैं..
रामनरेश – पर फिर भी..
भाई- ठीक है और देखेगे..
रामनरेश – पर क्या कहा
भाई-बता तो दिया तेरी भाभी ने...उन्हे पसंद न आई..लड़की..देख रामनरेश ये रिश्ते तो सब भगवान की मर्जी से होते हैं...
रामनरेश को चक्कर आने लगा..आंखे बंद होने लगी ज़िन्दगी फिर वही चली गई जहां से शुरू हुई थी...चाय वही रखी रही ...रामनरेश उठे..बोलते हुए....मैं घर में क्या कहूंगा...भाई और भाभी ..दोनो ने रामनरेश की तरफ देखा ... रामनरेश ने अपने घर की राह ली...
रामनरेश से साइकिल नही चल पा रही थी... क्या क्या ज़हन में विचार आ रहे थे ...क्या जवाब दूंगा..कैसे क्या बोलूंगा...रामनरेश और उनके भाई का घर मुशिक्ल से 3 कि.मी पर होगा। लेकि तीन कि.मी आज 300 कि.ली दूर लग रहे थे ..रामनरेश से चला ही नहीं...जा रहा था... बेटी के रिश्ते टूटने का दुख ..क्या होता है ...
ये कोई भी समझ जायेगा....जो रामनरेश को देखेगा ..

उधर घर में रामनरेश की बीवी बच्चों के साथ बैठी बाते कर रहीं थी।..चलो सही हुआ लड़का अच्छा है भगवान सब ठीक कर देगे.।.इसके बात दूसरी बेटियों का ब्याह भी कर देगें और फिर बहू लायेगें..
.लगता है बात पक्की हो गई...तुम्हारे पिता जी मिठाई लेने चलेंगे होगे..या फिर लड़के वालों के घर ...अरे पैसों का भी तो इंतज़ाम करना है सारी तैयारी भी तो करनी है.।

.नहीं ,नहीं वो सब को बताने लगे होगे..कि हमारी लड़की का रिश्ता तय हो गया बस अगले महीने शादी है...
ये शायद रामनरेश की बीवी की घबराहट थी जो आने वाले डर को शब्दों की तसल्ली दे रही थी ।..उसे लग गया था कि कुछ बात बिगड गई है ..नहीं तो ऐसा कैसे होता की रामनरेश इतनी देर लगाते ...

बाते करते करते सब लोग घर से बाहर निकल आए और गली में रामनरेश का इंतज़ार करने लगे...हाय रे ये समाज लडकी का ब्याह कितनी बड़ी बात ..और रिश्ते का टूट जाना कितना बड़ा अपराध.. ये कोई सदियों पुरानी, किसी कस्बे और ज़िले की बात नहीं है। न ही कोई गांव का हाल ।.ये 21 सदी का भारत और उसकी राजधानी में रहने वालों की सोच है,,,
खैर, रामनरेश गली में पहुच गए.सब की नज़रे रामनरेश पर थी उनका उतरा हुआ चेहरा बता रहा था ..की माजरा क्या है..पर रामनरेश ने परिवार वालों को देख कर मुस्कुराना चाहा..घरवालों को थोडी शांति मिली .रामनरेश पास पहुचे.. लडके ने हाथ से साइकिल ले ली....
.सब रामनरेश की शक्ल देख रहे ..बड़ी बेटी अंदर कमरे में चली गई... रामनरेश दूसरे कमरे ...सब घर वाले बड़ी बेटी को छोड कर रामनरेश के पास पहुचे ..रामनरेश चुप थे ..सब चुप थे... पत्नी ने पुछा क्या हुआ...

क्या हुआ .... क्या था रामनरेश का जवाब और क्या होगी रामनरेश की आगे की ज़िन्दगी का हाल..अब कहानी रहेगी बड़ी बेटी के ईर्द गिर्द... पढते रहिए..और भेजिए अपने विचार...

काश.....

दिल में ग़म
आंखे नम
किससे बयां करूं अपना हाल
कौन सुने मेरी
कौन है मेरा
अपनो को मैने छोड़ा
औरों ने मुझको को छोड़ा
कैसे चलूं मैं इस पथ
जिसमे बसी है तेरी याद
वो याद जो रहती हर पल मेरे साथ
काश तो होती मेरी और मै होता तेरा...
काश..काश ...काश...

Thursday, December 17, 2009

लुटरों ,चोरों औऱ हत्यारों की दिल्ली.....thanks to bihar

लुटरों ,चोरों औऱ हत्यारों की दिल्ली.....thanks to bihar

कहते हैं दिल्ली कई बार लुटी औऱ बसी ..ये बात पहले भी सही थी आज भी सही है .आज भी दिल्ली रोज़ लुट रही है ..रोज़ यहां डाका डाला जा रहा है रोज़ यहां हत्याए और वारदाते हो रही हैं... क्या मैं क्या वो सब एक खौफ के साये में जी रहे हैं...आए दिन यहां अवैध कब्ज़े हो रहे हैं... मुबंई की तरह दिल्ली में भी बिहारियों का बोल बाला होता जा रहा है..नतीजा बिहार में अपराधिरक आकडे कम हो रहे हैं ... और दिल्ली के आकडे बढ़ते जा रहे हैं...

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साफ साफ बिहारियों का नाम भी लिया था पर राजनीति के चलते माफी मागनी पड़ी ... जितनी तेज़ी से आबादी बढ़ रही है उतनी हमारे पास फोर्स नही है जिसके कारण इन पर लगाम लगाना मुश्किल होता जा रहा है,,,,

आइये पिछले कुछ दिनो में दिल्ली मे हुई वारदातों के बारे में आपको बताए...घर सड़क,बाज़ार,ट्रेन कहीं भी दिल्ली वाला सुरक्षित नहीं है ..कोई है जो उन्हे देख रहा है उनके समान पर नज़र रखे हुए है...

16 दिसंबर 2009 दिल्ली का आशोक विहार इलाका.. जौहरी पूरणचंद बंसल के डेढ़ करोड रूपये का बैग लेकर बदमाश फरार हो गए.. उन पर, उनकी कार पर बदमाशो की नज़र पहले से थी जैसे ही वो कार में बैठे बदमाशों ने पिस्तौल दिखा कर बैग छीन लिया।

15दिसंबर2009 –सहित्यकार निर्मल वर्मा का घर निशाने पर था ..उनके यहां से गहने और साथ ही उनका पद्मभूषण सम्मान को भी चोर ले गए ये वारदात दिल्ली के पूर्वी इलाके पटपडगंज की है..शक घर के नौकर पर है ।

2नवम्बर2009- आजादपुर मंडी..करोडों का कारोबार होता है ..और कई बिहारी काम करते हैं.. पर 2नंवम्बर को बदमाशों ने रूपए ले जा रहे दो लोगो को गोली मार दी एक की मौके पर मौत हो गई और दूसरा ज़खमी है ..और ऐसे हादसे मंडी में रोज़ की बात है । ये दिल्ली का उतरी इलाका है ....

27 सिंतबर 2009 को ऐसा हुआ जो पहले सिर्फ फिल्मों में होता है ..शाम को कालका से दिल्ली आ रही ट्रेन पर 6 -7 हथियारबंद लोग चढ़ गये और लोगों को बंधक बना कर लूट लिया..ये ट्रेन हिमालयन क्वीन थी...

इस साल नंवबर तक दिल्ली में लूटपाट की 440 वारदात ,बलात्कार के 400 केस
हत्या के 478 झपटमारी के 711 और डकैती के 26 मामले दर्ज हुए हैं....

जब तक दूसरों राज्यों से लोग यहा आ आ कर बसना बंद नहीं करेगे। उनका ट्रेक रिक़ॉर्ड नहीं रखा जाएगा ...तब तक ऐसी वारदातों को रोक पाना पुलिस के बस की बात नहीं..अगले साल खेलों का आयोजन है विदेशी और देशी सैलानियों को बड़े पैमाने पर आना है।
ऐसे में यही हाल रहा तो दिल्ली के साथ देश का भविष्य भी खतरे में है ।पुलिस पूरी तरह नाकाम हो चुकी है । अगली बार आप दिल्ली आये है तो ज़रा संभल के....ये दिल्ली है मेरी जान .लूट, झपटमारी,चाकू ,बंदूक किसी के भी आप हो सकते हैं शिकार...

Wednesday, December 16, 2009

दंगों के लिए तैयार रहिए....मुस्लमानों को आरक्षण मिलने वाला है....(RANGNATH COMMISSION)

दंगों के लिए तैयार रहिए....मुस्लमानों को आरक्षण मिलने वाला है....(रंगनाथ मिश्रा आयोग)

2006 में रंगनाथ मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी थी.... जिसमें अल्पंसंख्यक समुदायो की भागेदारी पढ़ाई लिखाई और रोज़गार में बढाने के लिए सिफारिश की गई है....
अब क्या क्या सिफारिशे है इसको भी पढ़ ले....
ओवीसी कोटे में अल्पसंख्यक पिछड़े भी शामिल किए जाए...
मौजूदा 27 फीसदी कोटे में 6 फीसदी मुस्लिम पिछड़े हो...
2.4 फीसदी कोटा दूसरे अल्पसंखयक पिछड़ो को दिया जाए....
रंगनाथ मिश्रा कहते हैं ...
हर धर्म और नस्ल के पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए
जिन पैमानो पर हिन्दुओ पिछड़ों को आरक्षण मिलता है उसी तरह मुस्लमानों और इसाईयो के पिछड़ो को आरक्षण मिलना चाहिए..
गैरमुस्लिम और इसाई शैक्षणिक संस्थानों मे अल्पसंख्यक पिछड़ो का 15 फीसदी कोटा (आरक्षण ) होना चाहिए...जिसमे 10 फीसदी मुस्लिम और 5 फीसदी दूसरे अल्पसंख्यक हों...
सरकार इसे संसद में रखने की हिम्मत नही जुटा पा रही है क्योंकि जो हाल वीपी सिंह का हुआ वो इस सरकार का न हो जाए... और फिर से मंडल कमंडल की राजनीति का दौर शुरू हो जाएगा..क्योंकि मंडल आयोग ने जो 27 फीसदी पिछड़ो को दिए है उसी में से 8.4 फीसदी अल्पसंख्यक पिछड़ो को जाएगें...यानि गरीब की रोटी गरीब ही छीन कर खायेगा...जो साफ तौर पर तुष्टीकरण ही है...
सरकार के गले की हड्डी बन गई है ये रिपोर्ट ..क्योंकि इसको पेश और लागू करने के लिए संविधान में भी कई बदलाव करने होगें
रिपोर्ट कहती है
मु्स्लिम और दलितों को आरक्षण का लाभ हो पर हमारा संविधान केवल हिन्दु ,सिख और बौद्ध धर्म में ही दलित हैं कहता है..तो क्या सरकार संविधान में संशोधन करे गई।
15 फीसदी शैक्षणिक संस्थानों मे आरक्षण आएगा कहां से ..क्योंकि साधरण अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे से उल्पसंख्यको को ये फायदा नहीं दिया जा सकता
अगर ओबीसी के 27 फीसदी से ये फायदा दिया जाएगा तो देश में दंगा हो कर ही रहेगा।
और अगर अलग से आरक्षण दिया जाएगा तो आरक्षण का कुल कोटा 50 फीसदी से पार चला जाएगा..तो क्या दूसरे लोग खामोश बैठे गे..और इसकी इजाज़त भी हमारा संविधान नहीं देता ...
अब सरकार टालमटोल करेगी तो जिनके वोटों से जीती है यानि अल्पसंख्यक विरोधी कहे लाएगी...जो उसे बर्दाश नही होगा...
मनमोहन सिंह के वादे के मुताबिक इस सत्र में ही ये रिपोर्ट पेश होगी और संसद तय करेगी कि इस पर आगे क्या कार्यवाई हो...
तय है आने वाले दिन ज्यादा गर्म और खतरनाक हो सकते हैं हम सब के लिए ।।

Monday, December 14, 2009

71 साल (भाग-6)

71 साल (भाग-6)

बाहर राम नरेश के भाई मेहमनों के साथ खड़े थे ..रामनरेश ने सब को अंदर बुलाया औरतों को औरतों के साथ भेज दिया आदमियों को मुख्य कमरे में ले गए... आने वालों में लड़का था ,लड़के का भाई , और लड़के का मामा... औरतों में लड़के की भाभी और मामी थी ।
कुछ इधर ऊधर की बाते हुई..पुछा मम्मी पापा नहीं आए .रामनरेश के भाई बोले भई बस मामा जी हैं जो सब फाइनल करेगें.. इन्ही पर सब छोडा है..एक हंसी ने माहौल को थोड़ा अच्छा किया .. फिर बातों का दौर शुरू हो गया...

लड़का काम काज ठीक ठाक करता है ..किसी एम्बेसी में सही जगह पर नियुक्त है... देखने में उसका भाई भी सही था ... वो भी किसी आफिस मे काम करता है..दो भाई है ..एक बहन जो दोनो भाईय़ों से छोटी है ..पिता खेती बाढ़ी से जुडे हुए है...कहने का अर्थ है ..एक अच्छा नही तो खराब भी नहीं, ऐसा परिवार .पर रामनरेश और उसके परिवार के लिए एक अच्छा रिश्ता ...और वो भी ऐसा रिश्ता जो रामनरेश के भाई की तरफ से आया हो .. जिससे उनके संबध सही नहीं चल रहे थे ... तभी धर में आया छोटा बच्चा जो अंदर औरतों के साथ था, दौड़ता दौड़ता आया और बोला चाचा चाचा चाची बहुत सुंदर है।... फिर ज़ोर दार ठहाका लगा... रामनरेश के भाई बोले लो भी छोटे साहब ने भी मंज़ूरी दे दी ..मामा जी ने कहा हां जी, ..लड़के के भाई ने सिर हिलाया ,..और लड़के ने भी मुस्कुराहट दे कर सहमति दी ।
नाशता लग गया था ...खाने की तैयारी हो रही थी ...।।

आज अच्छा दिन है ..रामनरेश खुश थे बार बार अपने भाई के हाथ जोड़ कर धन्यवाद दे रहे थे .. आंखे नम थी मन ही मन में भगवान का भी शुक्रिया अदा कर रहे थे ...
लड़के को लड़की भी दिखाई गई.. उसमें भी दोनो की रजामंदी नज़र आई... रामनरेश का परिवार खुश है ... पैसे कहां से आएगें शादी के लिए .य़े भी रामनरेश ने पूरा सोच लिया है...
अब चलने का वक्त हुआ ...लड़के और आने वालों को शगुन के लिफाफे भी दिए .. राम राम कर के और खुशी से सब चल दिए..जाते जाते भी रामनरेश ने अपने भाई का हाथ जोड़ कर धन्यवाद किया ।

मेहमानो के जाने के बाद रामनरेश के परिवार वालों में, आने वाले लोगो की बात हुई हम लोग हर बात अपने हिसाब से करते हैं ... जो हम देखना चाहते हैं वो ही देखते है .
सही भी है खुशी कहीं से भी आए औऱ जितनी देऱ के लिए भी आए ..उसे स्वीकार कर लेना चाहिए...रामनरेश के परिवार ने भी यही किया

लड़की भी खुश थी बहने भी और भाई भी ... कैसे शादी होगी , कहा होगी . सोने का सेट, हर तरह की रस्म , रिश्तेदारों को बुलावा, अभी तो बहुत कुछ करना है ।

रामनरेश ने अपनी पत्नी से कहा देखो हमारे भाई ने ही मदद की ..बीवी ने भी सिर हिला दिया.. बस अब वो लोग अपने मां बाप से बात कर ले और जल्दी से तारीख़ रख ले.... भगवान का बहुत बहुत शुक्रिया ।

ज़िन्दगी में बदलाव अचानक आ जाए तो उसके लिए भगवान का आप पर विशेष ध्यान होना चाहिए... पर इतनी आबादी और इतने भगवान को मानने वाले लोगों में आप का नम्बर कब आएगा ..पता नही ..पर जो पता है वो ये कि रामनरेश का नम्बर नहीं आया है ।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन.. एक हफ्ता और पन्द्रहा दिन ... क्या हुआ, क्यों नहीं कोई जवाब आया ..धीरे धीरे धरवालों के चेहरे ग़मगीन होने लगे ।

रामनरेश के भाई भी लौट कर नहीं आए.... पत्नी ने कहा जा कर भाई से तो पुछो..क्या हुआ..सब यहां से खुशी खुशी गए ...पता तो करो....

शाम को रामनरेश अपने भाई के घर जाते हैं...छत से उनकी भाभी देख लेती पर दरवाज़ा खोलने में बहुत वक्त लगा,,, दरवाज़ा खुला तो भाभी के चेहरे में नाराज़गी सी दिखी ... भाई अंदर कमरे में लेटे हुए थे ... रामनरेश अंदर कमरे में जाते हैं ...भाई के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ जाते हैं ..दोनो के बीच खमोशी थी.....

आखिर क्या हुआ ... जो रामनरेश का भाई खामोश था ..और लड़के वालों की तरफ से क्यों नही कोई जवाब आया ..बताऊंगा.. अगली पोस्ट में तब तक आप अपने विचार भेजते रहिए...

Friday, December 11, 2009

मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही क्यों होते है फरेबी लोग...

मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही क्यों होते है फरेबी लोग...

माजिद मियां पांच वक्त के नमाज़ी हैं..और जुम्मे की नमाज़ तो उन्होने शायद ही कभी न पढी हो ..ऐसा मुम्किन नहीं....सिगेरिट पीने का शौक है और वो क्लासिक सिगेरिट पीते हैं जिसकी कीमत पांच रूपए है...
एक बार उनका एक हिन्दु दोस्त अजमेर शरीफ से लौटा तो दरगाह में और आसपास के ठगों के बारे में बताने लगा ..कि कैसे ठगों ने अजमेर स्टेशन से ही उनका पीछा ले लिया ..बड़ी मुशिक्ल से बच कर वो दरगाह के अंदर पहुचा तो देखा की अंदर तो बहुत बडे बडे ठग और लूटरे मौजूद थे ..हर शख्स उन्हे चिश्ती साहब के आज़ाब का डर दिखा कर नोट ऐठने को तैयार था..
एक दरवाज़े जिसे जन्नत का दरवाज़ा कहा जाता है ..उस पर तो बहुत ही बड़ा शातिर लूटेरा हाथों में लठ और ज़मीन पर चादर बिछाए खड़ा था ..चादर पर रूपए पड़े हुए थे .. और लोगों को वो उस चादर पर ही रूपए डालने को कहे रहा था ..
सरकारं ने वहा हिदायत लिख रखी है की आने वाले लोग सरकारी पेटी में ही चढावा डालें.. किसी और को न दे.. दान पेटी में डाला गया पैसा दरगाह की देख रेख में लगाया जाएगा...
तो उसने 100 रूपए निकाले और दान पेटी में डालने लगा...तभी दरवाज़े पर खड़ा आदमी मना करने लगा लेकिन वो तब तक रूपया डाल चुका था पर उसने सोचा की ये इतना कहे रहा तो उसने उस आदमी की चादर पर भी दस रूपए डाल दिए..
बस क्या था ..उसने उसके दस रूपए फेकं दिए और कौसने देने लगा ..और जा कर सरकारी पेटी में आग लगा दी ..
सब ठग जमा हो गए..आदमी उन्हे और तेज़ चिल्ला चिल्ला कर कौसने देने लगा... बुरा भला अपशब्द बोलने लगा..इनके साथ बच्चा था जो डर के मारे रोने लगा बीवी ने जल्दी से निकलने को कहा ..सारे ठग चिश्ती साहब की कब्र छोड कर उनके पीछे लग गए... ऐसा लगा की दंगों में वो फंस गए हो...
माजिद मियां के दोस्त ने उन्हे ये बताया तो वो नहीं माने कहा मियां तुम ऐसे ही बदनाम करते हो ..ऐसी जगह के आसपास तो दुकान दार भी बेइमानी नहीं करते अल्लाह के खौफ से.. उन्हे उसका डर लगता है...
बात आनी जानी हुई ...और माजिद मियां अपनी दुनिया में और अल्लाह की इबादत में गुम हो गए..
जिस मस्जिद में वो जुम्मे की नामाज़ पढ़ने जाते थे ..उसके नीचे ही सिगेरिट की दुकान थी .लेकिन माजिद मियां वहां से सिगरिट नहीं पीते... एक शुक्रवार के दिन नमाज़ पढ़ने के बाद,उनका सिगेरिट पीने का दिल हुआ तो मस्जिद के नीचे की दुकान पर गए और क्लासिक मांगी ..सिगेरिट का एक कश लेने के बाद उन्होने दुकानदार को पांच रूपये दिए ..तो दुकान दार बोला ...एक रूपया और छह की हो गई है..माजिद मियां ने एक रूपया तो दे दिया पर आपा खो बैठे .. तू तू मैं मैं शुरू हो गई... दुकानदार भी कुछ कम नही था ,,पहुचा हुआ था ...बहुत तेज़ तेज़ बोलने लगा ... माजिद मियां जानते थे वो झूठ बोल रहा .पर क्या करते ... कहां तुम्हे पैसे चाहिए थे ऐसे ही मांग लेते ..पर वो हाथापाई में उतारू हो गया..क्लासिक का नया रेट के बारें में बताने लगे .. भीड जमा हो गई ... माजिद मियां ने कहा अल्लाह तुम्हे बरकत दे औऱ य़े.कहे कर घर के लिए चल दिये ..पर उन्हे याद आया.अपने दोस्त .की बात जिसने कहा था....मस्जिद और दरगाहों के आसपास ही बसते हैं सब से ज्यादा फरेबी लोग.....

71 साल

71 साल
(भाग-5)
सब कुछ जल्दी जल्दी हुआ ... रामनरेश ने अपनी इज्ज़त बचाने के लिए अपनी बड़ी बेटी की शादी की तैयारी शुरू कर दी ..पर ज़िन्दगी इतनी आसान होती तो ... भगवान और अल्लहा की दुकानों पर इतनी रौनक कभी नहीं होती ,,,,,।

आज रिश्तेवालों को आना हैं रामनरेश के बड़े भाई ने रिश्ता करवाया है ..रामनरेश की बीवी को जब रात मे रामनरेश ने ये बात बताई थी ..तभी से वो बहुत परेशान थी।.क्योकि जिस भाई से कभी न बनी जिसने ..रात ही रात को अपना माकान खाली करा लिया वो इतना कैसे मेहरबान की अपने भाई की बेटी के लिए कोई अच्छा रिश्ता लाए...।
पर घर का माहौल ऐसा था की कोई कुछ नही बोल रहा था .. खामोश ज़बा..आंखे नम , दिल भारी .. पर हो रही थी मेहमानों के आने की तैयारी ...।
पैसे जो़ड़ जोड़ कर अपने बच्चों का पेट काट काट कर रामनरेश की पत्नी ने घर की चीज़े जोडी और बनाई थी .. नई चादरें ,पर्दे.खाने के बर्तन ... और भी मेहमानो की खातीर दारी के लिए बाकी सामान....।
नाशते और खाने का प्रबंध किया गया था ...बाथरूम और टायलेट को भी अच्छी तरह से साफ कर दिया गया, नया तौलिया, नया साबुन... शीशे से लेकर फर्श और खिड़की दरवाज़े सब चमक रहे थे...
सुबह के दस बजे तक सब कुछ तैयार ... अब हो रहा था मेहमानों का इंतज़ार ..बड़ी बेटी को भी तैयार कर दिया गया था ..छोटी बेटी और लड़के को भी खामोश रहने की हिदायत दे दी गई....न जाने कौन सा डर सब को सता रहा था ... पर किसी की हिम्मत नही थी की कोई कुछ बोले ..
तभी बाहर के दरवाज़े से आवाज़ आती है ,,,रामनरेश... ये आवाज़ रामनरेश के भाई थी ..उनके साथ कुछ लोग थे .दो औरते ..तीन मर्द और एक बच्चा...
क्या होगा आगे बताउंगा ..अगले अंक में तब तक अपने विचार भेजते रहिए. जो नए पाठको के लिए बाकी अंक इस के नीचे पोस्ट कर रहा हूं.......
भाग -1रामनरेश अपने बेटे के साथ कार में बैठे एक रशितेदार के घर जा रहे थे..तभी बराबर से गुज़रते हुए एक ऑटो पर उनकी नज़र पड़ी, एक विवाहित जोड़ा उनके पास से गुज़रा .. और रामनरेश खो गये अतित में.. जब उनकी नई नई शादी हुई थी ।बहुत बड़ा कदम था .क्योकि वो अपने खानदान में पहले ऐसे शख्स थे जिन्होने अपने खानदान से अलग शादी की थी सब ने साथ छोड़ दिया था सिर्फ एक बहनोई ही उनके साथ थे ..इंगलिश में एम.ए किया था इस लिये अमरोह के मुस्लिम स्कूल में उन्हे नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नही हुई।प्रिसिपलसाहब अच्छे थे और उनको अच्छी सलाह दी और बीएड करने को कहा, मुरादाबाद के हिन्दू कालेज से बीएड किया ...उसी दौरान उनके घर में एक रोशनी आई बेटी के रूप में कहते हैं लड़की लक्ष्मी का रूप होती है ... पर रामनेरश के घर में खर्च बढ़ गया जिसके कारण उन्हे और मेहनत करनी पड़ी । देर रात तक टूयशन पढ़ाने पड़ रहे थे जिसकी वजह वो स्कूल रोज़ देर से पहुच रहे थे ।पसंद करने वाले प्रिंसिपल भी अमरोह छोड़ कर दिल्ली बस गये थे । इसलिये पहले उन्हे नोटिस मिला लेकिन पैसे की ज़रूरत ने नोटिस के डर को भगा दिया ..वो टूयशन बन्द न कर पाये और नौकरी खो बैठे ।बीबी ने कहा क्यो नहीं दिल्ली जा कर प्रिसिपल से बात करते छोटे शहर से बड़े शहर में आना एक आम आदमी में वैसे ही खौफ पैदा कर देता ,लेकिन परिवार चलाने के लिए अपनी औलाद को पालने के लिए इंसान हर कदम उठाने को तैयार हो जाता है । रामनरेश भी दिल्ली आ गए सच सच प्रिंसिपल साहब को बताया ..उनके सरल स्वभाव से वो पहले से प्रभावित थे ....इसलिए कहा की देखता हूं रामनरेश ने कहा उनके पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि वो वापस जा सके ... प्रिसिपल साहब ने पैसे दिये और कहा जल्दी सूचित करेगें.. घर में टूयशन से जो पैसे आते वो इतने नहीं थे कि ज़िन्दगी चल सके... घर का किराया ,राशन, बच्ची का दूघ..ज़िन्दगी में दुख भरने के लिए काफी थे ।...और जब दुख शुरू होते है ...तो वो बस आने शुरू ही हो जाते है ... पत्नी को ब्लड प्रेशर हो गया लो दवाई का खर्च और ..साथ ही मदद करने वाले जीजा ने अपने बच्चे भी भेज दिये, एक खत के साथ भाई रामनरेश ये यहां पढ़ नही पा रहे कृप्या कर के साथ रख लो .तुम्हारे साथ रहे कर पढ़ लेगें ... पढ़ तो लेगे पर खायेगे क्या ...रामनरेश ने सोचा.....लेकिन अगर आपकी नियत सही है तो अल्लाह भगवान आपकी मदद ज़रूर करता है ...दिल्ली से प्रिसिपल साहब ने सूचना भेज दी ..जल्दी से दिल्ली पहुचे एक सरकारी ऐडीड स्कूल मे नौकरी मिली अमरोह मे काफी कर्ज़दार हो गए थे ...शुरू की पगार उसी में चली गई...दिल्ली में एक भाई भी आ गया..मिल कर एक माकान ले लिया.. काफी समय गुज़र गया था इस दौरान रामनरेश के घर दो और बेटियों ने जन्म ले लिया था ... ज़िन्दगी तो बहुत कुछ दिखाती है ,सपनो से आस, गैरों से उम्मीद ,खून से दगा और घर में औरतो का झगड़ा ..आये दिन रामनरेश की बीबी और भाभी का झगड़ा होने लगा ..हर बात से बात बढ़ने लगी ... अंदर इतनी खटास भर गई की दोनो को एक दूसरे की शक्ल देखना भी गवारा न रहा ।..बीच बचाव के लिए बिरादरी को बुलाया गया भाई के पास पैसा था, मकान भी उसी के नाम पर था भले ही उसमें पैसे रामनरेश के लगे थे पर मकान रामनरेश को ही खाली करना पड़ा ...साथ ही खाली हो गया विश्वास ... यहीं से शुरू हुई राम नरेश की एक नई जंग...ये बात 1974 की है.....इस जंग से कैसे जीते राम नरेश ..और क्या हाल है राम नरेश का बताऊंगा दूसरी पोस्ट में.. तब तक अपने विचार भेजते रहिए...
71 साल
भाग -2

रात ही रात में घर खाली कर दिया ।पहले किसी जान पहचान वाले के यहां रहे फिर एक कमरा किराये पर ले लिया।रामनेरश ने अपनी तीन बेटियो और पत्नी के साथ ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू किया ।स्कूल दूर था सुबह जल्दी निकलते रात को देर तक टूयशन पढ़ा कर घर वापस आते ।अभी बहुत कुछ करना है बच्चियों की पढ़ाई एक अपना घर ... यही उनका सपना था ।न अपने खाने की फिक्र न पहने का होश दो जोडी कपड़े, एक जोड़ी रबड़ की चप्पल और एक साइकिल.. यही था रामनरेश के पास ..बीवी की भी कमोबोश ऐसी ही हालत थी।
जहां टूयशन पढ़ाने जाते थे उन बच्चों के पिता प्रॉपर्टि डिलर थे ।उन्होने कहा मास्टर साहब एक जगह ज़मीन कट रही है एक प्लाट ले लो । रामनेरश ने कहा भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं की ज़मीन ले सकूं.. प्रॉपर्टि डिलर ने कहा चलिए कुछ दे दिये गा और बाकि बाद में दे देना ...शारीफ आदमी पैसे बाद में दे पर देगा ज़रूर ये बात डिलर जानता था ।
आज रामनरेश जल्दी जल्दी घर पहुचें पत्नी को ख़बर दी ।पत्नी भी खुश हो गयी । मां बाप के खिले हुए चेहेरे देख कर बच्चो में खुशियों की लहर दौड़ गई । और क्यो न हो आखिर कुछ अपना हां अपना घर होने वाला है उनका वो भी देश की राजधानी में । घर में दाल के साथ आजएक सब्ज़ी भी बनी और मीठे में खीर भी थी ..यही इनकी खुशी और पार्टी थी ।
कुछ पैसे दे दिये कुछ देने का वादा कर लिया .. लो रामनरेश को एक दो सौ गज का प्लाट मिल गया ।तब दिल्ली बस रही थी चारों तरफ जंगल थे या फिर खेत थे ।बिजली के लिए लकड़ी के पोल लगाए जाते थे और दूर से लाइन खीची जाती थी ।पानी के लिए हैंडपंम्प प्रयोग में आता था जिसमें मटमैला और बदबूदार पानी आया करता था ।सीवर तो बहुत दूर की बात है नाली तक नहीं होती थी .घरों आगे गड्डे खोदे जाते थे जिसमें पानी जमा होता था ।
रामनरेश और उनकी पत्नी ने जब जगह देखी तो एक दसरे का मुंह देखने लगे पर कुछ कहने की हिम्मत दोनो जुटा नहीं पाये... कैसे ,किस तरह से ,क्या होगा अभी तो चल जायेगा बच्चियां छोटी हैं पर जब बड़ी होगीं .कहां पढ़ेगी,कैसे वक्त कटेगा दोनो यही सोच रहे थे ।पर ये अपनी ज़मीन है हमारा अपना माकान बनेगा इस खुशी के आगे दोनो सब कुछ भूल गये थे ।
माकान बनना शुरू हुआ...भाई तक भी किसी ने ख़बर पहुचाई ..भई तु्म्हारे भाई रामनरेश ने ज़मीन ले ली अब माकान बनवा रहे हैं.. भाई से सुना न गया एकदम से ताना मारा ..अरे पागल हो गया है ..किसके लिये कर रहा है ..बनाने दो साले को इसके कौन सा लड़का है .. तीन तीन लड़कियां है सब कुछ मिलेगा तो हमारे ही लड़को को ...सुनने वाले ने सुना और कहने वाले ने रामनरेश को भी तबा दिया..बात रामनरेश और उनकी बीवी के दिल पर लग गयी ।दोनो खामोश हो गये पर बेटियों ने देखा उस रात मां बाप दोनो को अकेले में रोते हुए ।
माकान बनना शुरू हो गया उन दिनों सिमेंट ब्लैक में मिलती थी ।..इसलिये लोग सिमेंट का कम इस्तमाल करते थे ज्यादा काम गारे यानि मिट्टी से ही होता था चुनाई गारे की ही कराई जाती थी । बड़ी दोनो लड़किया स्कूल जाने लगी थी रामनरेश दोनो को स्कूल छोड़ने के बाद खुद भी पढ़ाने चले जाते थे और उनकी पत्नी अपनी छोटी बेटी के साथ अपनी ज़मीन पर चली आती थी ... पर उनके ज़हन में हर बार अपने जेट की बात ध्यान आ जाती ..आंखे भर जाती है ..मन में कहती ऐ भगवान तुम ही इनको जवाब दो....
एक कमरा लैटरीन बाथरूम तैयार हो गया था। रामनरेश अपने घर शिफ्ट कर गये थे ।इस बीच इनकी बीवी भी गर्भवती हो गई थी । रामनरेश की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई थी ..घर, बच्चे,नौकरी,टूयशन और अब अस्पताल भी ।रामनरेश ने अपनी बहन की बेटी को बुलाना चाहा पर बड़े भाई का रौब ज्यादा था इसलिये बहन ने साफ साफ मना कर दिया ..पर रामनरेश को थोड़ी राहत ज़रूर मिली जब उनकी बीवी की बहन रहने आ गयी ।.चलो बच्चों को तो देख ही ले गी ।
मकान बनाने में काफी कर्ज़ चढ़ गया था । सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में ही बीवी को भर्ती कराया गया था ।सर्दी के दिन थे घर में इतनी ही रज़ाई थी की बच्चों को उढ़ाया जा सके ।इसलिये रामनरेश की पत्नी अस्पताल में बिछने वाली चादर से ही काम चला रही थी । नर्स ने उनको बात भी सुनाई क्यों बहन जब पैसे नही थे तो ये सब क्यो... रामनरेश की बीबी कुछ नहीं बोली बस चुप होकर रहे गयी और एक दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ ऊपर की तरफ देखा .. कुछ दिन के बाद उनके घर में एक लड़का हुआ जिसका नाम रखा नाम ...विजय... जो कभी भी न हारे....

क्या रामनरेश के ग़म विजय के बाद कुछ कम होगे.. कैसे कटेगी आगे की ज़िन्दगी.बताऊंगा ..अगले भाग मे.....तब तक अपने विचार भेजते रहिये.....
भाग -3रामनरेश खुश था भले ही हम जितना कहते रहें कि लड़के लड़कियों में कोई फर्क नहीं होता सब बराबर होते हैं.. पर लड़के के जन्म से खुशी और लड़की के जन्म से दुख होना स्वभाविक है..जिसे नकारा नहीं जा सकता .. पर हां रामनरेश एक समझदार और अच्छे व्यक्ति थे उन्होने कभी भी अपनें बच्चों मे भेदभाव नही किया .ब्लकि अपनी लड़कियों को ज्यादा प्यार दिया.. एक बात याद दिला दूं ये फिल्म नहीं है ज़िन्दगी है तीनो बहनो को भी अपने भाई से बहुत प्यार था।छहों की जिन्दगी बढ़ियां न सही ठीक से गुज़र रही थी घर में एक के बाद एक ईंट लगती जा रही थी एक कमरे से दो ,दो से तीन ,तीन से चार .. और इसी के साथ तन्खाह ,कर्ज़ और जिम्मेदारी भी बढ़ रही थी ...बच्चों को पढाना,खिलाना आसान न था .. बच्चे जब बाहर निकलते हैं बाहर की दुनिया देखते हैं और दुनिया के साथ अपने को देखते हैं फिर उनको ये एहसास होने लगता है कि वो दुनिया मे कितने पीछे हैं .. फिर बच्चो को ये याद नहीं रहता कि उनके मां बाप ने अपनी और उनकी ज़िन्दगी के लिये कितनी मेहनत की ..वो अपने सपनो में खो जाते हैं ..वो ग़लत नहीं है पर हां नादान है .. ये ही हुआ रामनरेश के बच्चों के साथ वो अपने मां बाप से प्यार तो करते थे प्यार के साथ एक दूरी भी बनने लगी .. उनकी कुछ पाने की इच्छा होती उसे वो अपने पिता माता से कहते वो उनसे कुछ बहाना बना देते कोई परेशानी गिना देते बच्चे समझदार थे ..धीरे धीरे हसरतों को दिल में दबाना सीख गये मां बाप से कहना छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी का नया रास्ता ढूढना शुरू कर दिया...किस रास्ते पर चले रामनरेश के बच्चे बताउंगा अगली बारी तब तक अपने विचार भेजते रहिये...

71 साल.भाग-4आप लोग सोच रहेगें होगे कि इतने दिनों के बाद 71 साल की कैसे आई याद .. ज़हन में कहानी पूरी है पर लिखने के लिये वक्त और शब्द तलाश कर रहा था ...बात रामनरेश के बच्चो की..ज़िन्दगी हमारी धूमती है समाज औऱ उसके इर्द गिर्द.. और जब हम अपने दायरे से बाहर निकलते हैं तभी कहानी दूसरा मोड़ ले लेती..ये मोड़ या तो आपकी ज़िन्दगी को किसी मुकाम तक पहुचा देता हैं या फिर आपकी ज़िन्दगी मंजिल तलाशती रहती है ..ऐसे ही रामनरेश के बच्चों के साथ हुआ ।हर चीज़ का अभाव ज़िन्दगी को भावहीन कर देते हैं और हम हर चमक की तरफ दौड पड़ते हैं जो हमे दिख रही होती है ...जिन्दगी में रोशनी की लालसा हमें अकसर अंधेरे की तरफ ले जाती है ... और जब तक हम समझ पाते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है ..राम नरेश को , पड़ोसी ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी एक लड़के के साथ अकसर घूमती देखी गई ..बाप की गैरत करवट पलटती है ..और पुरूष का पौरूष बाहर आजाता है ..पहली बार हां पहली बार रामनरेश की दिवारों ने राम नरेश की शयाद इतनी भंयकर आवाज़ सुनी थी .. घर में मौजूद सब लोग थर्रा गये.. राम नरेश अपने गुस्से को ज्यादा देर तक नहीं रख पाये और फूट फूट कर रोने लगे ..रामनरेश के साथ सब रोये .मां..दोनो छोटी बेटी और बेटा .. सब को देख कर बड़ी बेटी भी रो पड़ी और बोली पापा मैने ऐसा कुछ नहीं किया ..बस कुछ वक्त उसके साथ बिताया .. रामनरेश के आंसू नहीं रोके ..रोते- रोते बोले .बेटा जानता हूं.. मेरे अंदर कमी है ..तुम्हारा जो हक है शायद मैं वो नहीं दे पा रहा.. पर रहे रहा के एक इज्ज़त है वो अगर बची रहे ..तो तुम लोगों की बड़ी महरबानी ..उस रात रामनरेश के घर में किसी के आंसू रूक नहीं रहे थे .कुछ खाना नहीं बना ..रात को रामनरेश ने अपनी पत्नी से कहा अपने भाई से बात करो ..बड़ी बिटिया के रिशते की ...रामनरेश और उनके परिवार का जीवन किस राह चलेगा बताउंगा अगली पोस्ट में ..तब तक अपने विचार लिखते रहिये....