Saturday, December 19, 2009

71साल (भाग-८)8

71साल (भाग-8)

घर में खामोशी का माहौल था ...रामनरेश दिल पर हाथ रखे बैठे थे... पास में दोनो लड़कियां मां..बेटा थे। बड़ी लड़की दूसरे कमरे की चौखट पर खड़ी थी .उस जगह जहां से उस कमरे की सारी आवाज़े आसानी से सुनी जा सके जहा परिवारवाले बैठे थे।

कुछ देर तक घर मे सांसे, जलती बुझती टूयब लाइट और पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था... किसी की हिम्मत नही हो रही थी की रामनरेश से कुछ पुछें...धीरे से रामनरेश की पत्नी बोली अरे बताऊ क्या कहा भाई ने ... कुछ देर तक रामनरेश चुप रहे फिर बोले लड़के वालों ने मना कर दिया .... सब के मुंह से एक साथ निकला मना कर दिया ....पर क्यों.... रामनरेश से सारी बात बताई....

शादी हमारे समाज मे कितनी अहमियत रखती है ..हर एक संबध जोडने के लिए हम कितने उतावले होते हैं ..हर खुशी हमारी उसी के आसपास रहती है ..हर पल हम उसी सपने के साथ जीते है... औऱ लडकी का ब्याह मानो एक पहाड अपने सिर में लादे हुए हो ... फिर रिश्ता टूट जाना तो किसी अपऱाध से कम नही.. वो सज़ा जिसमें आंसू और मातम से ही पुरसा दिया जा सके..

न आसू और न ही मातम रामनरेश के घर वालों के लिए नये नहीं थे ..क्यों कुछ पल की खुशी औऱ ज़रा सी हंसी भगवान को मंज़ूर नहीं ।कहते हैं अगर आपने किसी के साथ बुरा नहीं किया तो भगवान आपके साथ कभी बुरा नहीं करेगे..पर ये सब सिर्फ कहावतें हैं..जिनका असल जीवन से कोई सरोकार नहीं.. कोई लेना देना नही...

मुझे तो लगता भगवान ने ग़म और दुख के लिए कुछ लोगों को चुन लिया है ..जिन्हे उसे पीडा ,दर्द, तकलीफ सज़ा देनी ही है ..जैसे कुछ लोगों को सुख सुविधा धन दौलत देना ही है .. और रामनरेश पहले क्रम मे आते है..जहा खुशी और खुशी का पल वो अधूरा खव्वाब है जो पूरा होने से पहले हमारी आंख खोल जाती है नींद टूट जाती है ..और हम पाते है अपने शरीर पर फटी हुई रज़ाई के सिवा कुछ नहीं...

सब उदास थे ज़ाहीर है आप सोच रहे होगे ..की बड़ी लडकी पर पहाड टूट पडा होगा ..कोई खाना नहीं खायेगा..हां किसी ने खाना नहीं खाया ..पर बड़ी लडकी जिसका रिशता टूटा वो किचन में गई और आज उसने रोटी में खूब घी लगाया चीनी डाली और आंसू पोछती हुई ..दिल में कोई निर्णय लेती हुई रोटी चबा रही थी....

आंखे गीली थी पर दिमाग कहीं चल रहा था .. हर चीज़ तो उसने वो ही की जो उसके घरवालो ने कहा..किसी के साथ ज़रा बात क्या कर ली की बात का बतंगड बन गया ।
उसका रिश्ता करवाया जाने लगा..उसके लिए भी उसने मना नहीं किया ..ताया जिन्होने अपने भतीजी भतीजे को कभी प्यार नहीं किया हमेशा उनका अपमान किया उन्होने तो और बुराई का मौका मिल गया ..हममे किढे निकालने और हमारा अपमान करने का।
हर बात तो सुनी अपने पिता की ,,मां की घर की .ऐसा नही ऐसा करो ये सही है ये गलत है .. यूं न करो यूं करो....क्या मतलब क्या फायदा ..नतीजा क्या निकला ..मना कर गए लडके वाले... निकाल गए मुझ में कमी ..अब मैं वो ही करूगी जो मुझे सही लगे लगा ..जो मेरे लिए सही है...
सुष्मा रामनरेश की बड़ी बेटी ..आज कोई फैसला ले रही..इस फैसले से कहां खत्म होगी इसकी मंजिल ..बताऊंगा अगली पोस्ट में तब तक अपने विचार भेजते रहिए...

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