Saturday, December 25, 2010

साल खत्म हो रहा है -2010

साल खत्म हो रहा है
लो 2010 भी खत्म हो रहा है पांच दिन बाद 2011 का आगमन हो जायेगा...दिसंबर आते आते बीते महीनों की बातें धुधली होने लगती और बीते सालों की यादे तो मानो खत्म हो जाती है बस रहे जाता है अच्छे और बुरे अनुभवों के निशान। इस साल न कोई नये दोस्त बने और न कोई नये दुशमन ऐसा मैं मानता हूं हां इंक्रीमेंट 13000 का जरूर हआ था पर आज की तारीख़ में मेरे बैंक खाते में सिर्फ 25,000 रूपये ही बचे हैं सारे पैसे कहां गये उसका भी कोई अता पता नहीं एक रिश्ते के भाई की शादी हो गई और कई दोस्त भी निपट गये। टेलीविज़न के ऑवर्ड मिले कई ऑवर्ड में बेस्ट कैटेगरी में शामिल हुए.. पुराने प्रोग्राम ले लिये गये नये कार्यक्रम दे दिये गए.सिर के कुछ और बाल खत्म हो गए।लखनऊ,सहारनपुर पंजाब उडीसा धूम भी आये । पत्नी से कई बार झगड़े हुए और कई बार समझौते विदेशी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का स्वागत किया और देसी नेताओं के ब्रष्ट्र चेहरे देखने को मिले तबीयत बिगड़ी तो कभी संभली डेंगू चिकनगूनिया और नये किस्म के बुखारों का सामना किया तेल मंहगा प्याज़ मंहगी मंहगा टमाटर खरीदा । नई जगह नौकरी की तलाश की पर नतीजा सिफर ही निकला।ईद बकरीद मोहरर्म भी मनाया नए कपड़े नये जूते भी खरीद लिए। नौकर गया लौट आया ज़िंदगी उसी रफतार से चलती रही। कॉमनवेल्थ या सचिन के 50शतक सभी मैने देख लिए पर 35 साल में ही जीने की हसरत न जाने क्यों खत्म हो रही है दूसरों के पैसे देख कर अपनी ज़िन्दगी बड़ी हीन लगती है। 2011 एक नया महमान आयेगा अपने साथ अपनी किसमत और शायद हमारी बुलंदी लाये या फिर उसकी जिन्दगी भी हमारी तरह ही कष्टों बातों और सपनो में बीत जायेगी और वो भी हमारी तरह साल दर साल अपनी नकामी के किस्से ग़लत सही शब्दों मे लिखकर आप लोगों का वक्त ज़ाया करेगा ।..साल खत्म हो रहा 2011 न जाने अपने साथ क्या क्या लाये ..अल्लाह खैर करे ।।

Saturday, December 11, 2010

बिन नाम के लोग

बिन नाम के लोग
(news production crew)

पर्दा और पर्दे पर दिखने वाले लोगों और उनको पर्दे पर लाने वाले लोगों के बारे में जाने अंजाने सब लोग कुछ न कुछ जान ही जाते हैं । फिल्मी दुनिया के बारे में सब को काफी उत्सुकता होती है इसलिए उनके बारे में लोग पता लगा लेते हैं बहुत लोगों की कमाई सिर्फ उनके बारे में लिखने से होती है इसलिए आये दिन उनके बारे में लिखा ही जाता है ..और दुनिया को उनके बारे में पता चल ही जाता है ।
यही हाल टीवी के मनोरंजन चैनल में काम करने वाले लोगों का होता है उनके नाम से भी ज्यादतर लोग वाकिफ होते हैं । क्योंकि एक लंबा क्रेडीट रोल उन सब लोगो के नाम का वर्णन कर देता है जिन का सहयोग पेश किये कार्यक्रम में होता है । जिसमें आम लोगों को भले ही रूचि न हो पर हां उस क्षेत्र में काम करने वाले लोग उनके काम की प्रशंसा करते है और उनके काम को सराहा जाता है ।
जब बात टीवी के न्यूज़ चैनल की आती है तो लोगों की जुंबा पर स्क्रिन पर दिखने वाले चंद लोग ही होते हैं। रिपोर्टर या कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ता को सारा श्रेय चला जाता है ज्यादा से ज्यादा कैमरा मेन का नाम ले लिया जाता है । और इसका सबूत भी ये है कि अबतक किसी न्यूज़ चैनल के आर्वडों मे प्रोडक्शन की कोई कैटेगरी ही नहीं डाली गई है । कारण ये है कि किसी को जानकारी ही नहीं है कि न्यूज़ चैनल में प्रोडक्शन करता क्या है । तबकि हकीक़त ये है कि न्यूज़ चैनल में प्रोडक्शन ही है जो चैनल की रूप रेखा तय करता है और उसे दिशा देता है ।
रिपोर्टर, एंकर और लिखने वाले लोगों के काम को चमक प्रदान करता है । शायद ही लोगों को मालूम हो जिन रिपोर्टरो की रिपोर्टिंग की दुनिया वाह वाही करती है वो असल में कैसे कैसे कार्य और रिपोर्टिंग कर के वापस और स्टोरी को टेप में रिकॉर्ड करके ले लाते हैं .. जिन्हे प्रोडक्शन के लोग उनके लाये हुए शॉटस में अपने अनुभवों से जान डाल देते है बिना किसी श्रेय या पुरस्कार के ।
क्या आप ने कभी ये सोचा है कि हर न्यूज़ चैनल में एक तरह की रिपोर्ट होने के बावजूद वो जो एक दूसरे से अलग दिखता है उसके पीछे प्रोडक्शन का ही हाथ होता है । एक रिपोर्ट किस तरह लोगों तक पहुचनी चाहिए और लोगो पर कैसे इसका प्रभाव पड़ेगा मूयिज़क से लेकर ग्राफिक्स तक रिपोर्टर नहीं बताता ये काम प्रोडक्शन का ही होता यहां तक रिपोर्टर को कहा किस जगह क्या और किस तरह बोलना और चलना है इस का खांचा भी प्रोडक्शन ही तय करता है ।
कोई कार्यक्रम कितने बजे चलना और उसका प्रोमो कैसे बनना है ये काम भी प्रोडक्शन की ही जिम्मेदारी होती रिपोर्टर अपनी स्क्रिप्ट लिखवा कर चल देता है उस रिपोर्ट को फाइनल रूप प्रोडक्शन ही देता है ।
कई चैनल तो केवल प्रोडक्शन के ही दम से चलते हैं और सही में चैनल वो ही चल पा रहा है जिसमें कनटेंट के साथ प्रोडक्शन की जानकारी है चाहे आजतक हो इंडिया टीवी हो या फिर स्टार न्यूज़ । इनको चलाने वालों को शॉटस और शॉटस के ट्रीटमेंट की पूरी जानकारी है शायद आप को लगे न्यूज़ नही है पर कहानी ज़रूर है जिससे लोग उसे देखने के लिए रूक जाते हैं। इसलिए अगर अब कभी आप कोई अच्छा कार्यक्रम देखें तो प्रोडक्शन टीम की भी तारीफ ज़रूर करें।

Friday, December 3, 2010

सलमान ख़ान ने निकलवाया मनोज तिवारी को – बिग बॉस

सलमान ख़ान ने निकलवाया मनोज तिवारी को – बिग बॉस

जैसा की हमेशा लोग जानना चाहते हैं कि बिग बॉस में सब कुछ पहले से तय होता है या सब असलियत होती है । कुछ हिस्सा तो बनावटी होता है जिसे टीवी की भाषा में स्क्रिप्टिड कहा जाता है ...पर वोटिग और लोगों का जाना लगभग सही होता रहा है पर जब से सलमान ख़ान बिग बॉस को होस्ट कर रहे हैं तब से लोगों का जाना भी वो ही तय करते हैं और उनकी इच्छा के अनुसार ही लोग निकलते हैं ।
मनोज तिवारी का जाना जनता का आदेश नहीं सलमान ख़ान का फरमान रहा है ..मनोज तकरीबन एक लाख से ज्यादा वोटों से अशमित से आगे थे पर सलमान को ये पंसद नहीं था इसलिए रातों रात स्क्रिप्ट बदलली गई और मनोज तिवारी को एक झूठे आदमी के तोर पर दिखाया गया.. इसलिए अगर आपने कार्यक्रम देखा होगा तो पहली बार सलमान ने मनोज को एक गंदे आदमी के रूप में दिखाया और इस तरह से बोला जिससे से साफ जाहिर था कि वो मनोज को पसंद नही कर रहे । वहां बैठे प्रतियोगी को भी इस का यकीन नहीं था ।
सुत्रो का कहना है कि सलमान के इस फैसले की वजह वीना और अशमित पटेल के बीच चल रही प्रेम कहानी है जिस से चैनल को बॉल्ड (अशलील) सीन देखने को मिलते हैं ..यही वजह रही गोस्वामी के जाने की भी ..
मनोज तिवारी का फैसला बहुत ग़लत और नाइंसाफी भरा कदम है .. पर सलाम ख़ान तो असली दबंग है उनके फैसले को कौन चैलेंज कर सकता है ।

Sunday, November 28, 2010

कहां गये ब्लॉग वाले

ब्लागवाणी का कोई विकल्प
2007 साथ में जब ब्लाग लिखना शुरू किया तो बहुत लोग पढ़ते अपनी राय और सलाह देते थे । ब्लागवाणी से पता भी चल जाता था कि तकरीबन कितने लोगों ने आपकी पोस्ट को पढ़ा ।
लेकिन जब से ब्लॉगवाणी बंद हुई उससे रोज़ लिखने वाला साधारण सा ब्लॉगर तो बस मानो खत्म हो गया ।या फिर ये कहे आचानक लोगों में पढ़ने का शौक और अपनी प्रतिक्रिया देने की चाहत खत्म हो गई।
बड़ी कंपनियों की वेब साइट और बड़े नामचिन लोगों के ब्लॉग या फेसबुक और ट्वीटर ने आम ब्लॉगरों को खत्म सा कर दिया ।
लेकिन शायद सब से बड़ी वजह ये लगती है कि खाली पेट भजन नहीं होता हमने ब्लॉग तो शुरू किया उसके पीछे भले ही तर्क ये दिया हो हम आज़ाद है लिखने के लिए अपने लिए जगह चाहिए अपनी पहचान चाहिए थी औप ब्लॉग ने हमें सब दे दिया और कुछ छोटे गुर्प भी बन गये थे जो आपस में अपनी तारीफ करते रहते थे लेकिन जो भी था अच्छा था कहीं कुछ लिखा तो जा रहा था लेकिन एक और दो साल में हिन्दी ब्लॉगजगत के आम और साधारण ब्लॉगर मानो नदारद हो गए इस के पीछे की शायद य़े हकीकत है की सब को पैसा चाहिए था पैसा ही लोगों की ज़रूरत है और अपने वक्त का इंवेस्टमेंट कर के अपना ही खर्च कर के केवल वाह वाही से काम नहीं चल सकता शायद ये लोगों ने जान लिया है ..
काश आप लिखते रहिए जो कुछ दिन में गुज़रा उसको ही बता दें ..शायद आप की ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी से मेल खाती हो ।और हमारा ब्लाग जगत फिर से हरा भरा हो ।

Sunday, November 14, 2010

अलकायदा कर सकता है हाजियों पर हमला

अलकायदा कर सकता है हाजियों पर हमला
अलकायदा के हमलों का खतरा यूरोप पर ही नहीं सऊदी अरब पर भी है ..इस बार जब दुनिया भर को जायरीन इकट्टा होगें तो उनकी हिफाज़त के ख़ास इंतज़ाम किये हैं सऊदी सरकार ने क्योंकि अलकायदा इन दिनो सऊदी अरब से नाराज़ चल रहा ..क्योकि सऊदी अरब के ही सुराग देने के कारण उसके की पार्सल बम पकड़े गए..और उसके कई आंतकी हमले बेकार चले गए.इस के अलावा अलकायदा पहले से ही सऊदी अरब के शाह का तख्ता पलटना चाहता है ।
वैसे इससे पहले भी मक्का और मदीने पर हमले हो चुके हैं ..30 साल पहले इस्लामिक दहशतगर्द मक्का की बड़ी मस्जिद पर हमला कर चुके है
20 नंवबर 1979 को हशियारबंद आतंकवादियों ने मक्का में अल मस्जिद अल हरम पर कब्ज़ा कर लिया था
इस हमले में ओसामा के सौतेले भाई को गिरफ्तार किया गया था ..पर बाद में उसे छोड़ दिया गया..तब से सऊदी सरकार के इंतज़ाम काफी सख्त होते हैं ..और हम उम्मीद कर करते हैं कि अल्ला के घर में किसी का खून नहीं बहे गा...

Saturday, November 13, 2010

बस ऐसे ही

बस ऐसे ही

क्या खबर कैसे मौसम बदलते रहे ।
धूप में हमको चलना था चलते रहे ।
शमा तो सिर्फ रातों में जलती रही ।
और हम हैं दिन रात जलते रहे ।।
( डॉ सागर आज़मी)

कली की आंख में,फूलों की गोद में आंसू
खुदा न दिखलाये ऐसी बहा की सूरत।।
तेरी तलाश में ये हाल हो गया मेरा ।
न दिन में चैन है, न शब में करार की सूरत।।

Friday, October 15, 2010

पीछे छूटती खुशी

पीछे छूटती खुशी
कहां से शुरू करूं ..क्या शब्द सही हैं ,अक्षर ग़लत तो नहीं ।भागती हुई भीड़ में कहीं में पीछे तो नहीं ....कई साल बाद हरीश अपनी बालकनी में बैठा यही सोच रहा था ।31 साल की उसकी उम्र हो गई थी 32 साल का इस महीने वो हो जायेगा।
लम्बे लम्बे उसके बाल कम हो गए थे ..जिन लटों को वो संवारता रहता था आज वहां खाली चमक रहे गई थी ...उसका दबा हुआ पेट आजकल काफी बाहर की तरफ बढ़ता जा रहा था ।
दोस्तों के साथ शराब और दूसरी आदतें भी छूट चुकीं थी । चार महीने पहले उसकी शादी हुई थी ...
ज़ाहिर है जिस सोच को लेकर वो ज़िन्दगी को समझ रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था वहां परिवार की रज़ामंदी की कोई जगह नहीं थी ..
हां इस दौर में हर युवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना चाहता है ..उसे इस आज़ाद देश में और आज़ादी की चाहत है ... किसी की बात और सलाह मानना तो दूर उसे सुनना भी गंवारा नहीं ...
रेशमा एक सैय्यद मुस्लमानों के घर की लड़की थी । अच्छा खूबसूरत नैन नक्श काले बाल और गोरा रंग ... और उसके नैन किसी को भी अपनी तरफ आकृषित कर लें ...
कई चीज़ों की तलाश और कई हसरतें और खुवाहीशें..पर मकसद क्या शायद उसे भी नहीं मालूम..
बस फोन खड़का दिया अपने घर की उसे एक लड़का पसंद है ..कौन है कैसा है क्या है घर कैसा है लोग किस तरह के हैं .. दूसरी तरफ से एक साथ इतने सवाल उठे पर रेशमा का एक ही जवाब था कि मुझे पसंद है मुझे शादी करनी है .और फोन काट दिया.
उधर रिसिवर पकड़े सैय्यद सिराज अहमद की आंखे नम हो गई ...लखनऊ की उनकी हवेली जो तीन पीढ़ियों से अपनी शान और शौकत के लिए जानी जाती है आज उन्हे घूर कर देख रही है ..और सिराज मियां की नम आंखों को देख कर खुद भी रूलासी हो गई है .. शायद चुपचाप रो भी ले ..
सिराज अहमद सरकार के बड़े मुलाज़िम थे फक्र था उन्हे अपने कुन्बे पर अपने बुर्ज़गों पर ... अकसर शहर की महफिलों में वो ये कहते हुए नहीं थकते थे कि हम ही है अवध में जिसने अपने बाप दादा के कमाए हुए रूतबे को अभी तक बचाया हुआ है नहीं तो नवाबों और सैय्यदों की इज्ज़त तो कोठों और चौकों पर निलाम हो रही हैं ..लोग तो एक पुशत के बाद बरबाद हो जाते हैं हम तो न जाने कितनी नस्लों से ऐसे ही बरकरार हैं .. पर आज जो ज़िल्लत का दर्द और ग़म का अहसास उन्हे हुआ तो बस चीख ही निकल गई ... उनकी हालत और आवाज़ सुन कर शबनम बेगम भी बैठक में आ गईं
शबनम बेगम भी बराबंकी के नवाब की साहबज़ादी हैं.. सिराज अहमद जितने पढ़े लिखे और समझदार थे वो उनसे एकदम अलग ..बात सुनते ,कुछ हल ढूढ़ते इससे पहले की कुछ समझ पाते .तौहमतों का दौर शुरू हो गया और हवेली की तहज़ीब चूल्हे की लकड़ी की तरह जल गई.... और घर की खुशियां कहीं पीछे छूट गईं थीं...इन्हे दुख पहुचाने का मैं जो जिम्मेदार तो नहीं ...हरीश ने लिखना बंद कर दिया था बालकनी में आती चांद की रोशनी अब उसे बोझिल लग रहीं अपने निर्णय पर आज चिंता के भाव थे ... कहीं कभी उसकी खुशियां पीछे छूट जाएं तो वो क्या करेगा....

Thursday, October 7, 2010

MEDIUM MULTI ROLE COMBAT AIRCRAFT(MMRC)





भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम पुराने हैं
एयर चीफ मार्शल पीवी नायक का कहना है कि हमारे 50 फीसदी हथियार और एयरकार्फट पुराने है जो कभी भी धोखा दे सकते हैं ..ज्यादतर मिसाइलों ने अपनी मियाद पूरी कर ली है ...यानि जब दुशमन पाकिस्तान और चीन जैसे हों ऐसे में हमारे एयरबेस और कई महत्वपूर्ण इमारतों की सुरक्षा कड़ी चुनौती है मौजूदी हालत में उनको बचा पाना आसान नहीं होगा...
मिग-21 को रिटायर करने के बारे में पिछले 15 साल से सोचा जा रहा है ..लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ नतीजा आए दिन आप सुनते होगें की मिग -21 दुर्घटनाग्रस्त हो गया
अब 126 मल्टीरोल फाईटर की तलाश है .. ऐसी डील पर बात कई सालों से चल रही है पर अभी तक डील हुई नहीं है..
6 medium multi role combat aircraft(mmrc) के ट्रायल्स चल रहे हैं अभी इन्हें खरीदने का इंतज़ार हैं..
इन अमेरीका के एफ-16,एफ-18
यूरोप के यूरो फाईटर
स्वीडन --- ग्रिपन
फ्रांस--- राफेल
रशिया का मिग 35..
अब आपको दिखाते हैं इनकी तस्वीरें.. पहली बार किसी ब्लाग पर

Saturday, October 2, 2010

उस जैसा

उस जैसा
सकल चराचर में उस जैसा
रत्न नहीं रे,
भार वहन कर उसके यश का
पवन बही रे
उसकी छवि को अंकित कर दे
ऐसा कहां चितेरा
उसके मुख को भूल जाए जो
ऐसा कहीं नहीं रे...
( जैसा तुम चाहो..शेक्सपियर)

Saturday, September 4, 2010

हर दिन

हर दिन
हर दिन एक नई शुरूआत है
हर दिन एक नई ज़िन्दगी का साथ है
हर दिन कुछ खोना है
हर दिन एक नया मुकाम है
हर दिन एक झगड़ा है
हर दिन एक समझौता है
हर दिन एक तमन्ना है
हर दिन का रोना है
हर दिन सोना है
और हर दिन एक दिन का इंतज़ार है

Saturday, August 21, 2010

खुशी अपनो के साथ

खुशी अपनो के साथ

सुबोत ज़िन्दगी की रफतार से तेज़ चल रहा है ...वक्त से पहले सब कुछ हासिल करने की कोशिश..और इसमें ग़लत क्या है । दुनिया का ये दस्तुर है कि अगर आप वक्त के साथ और वक्त के आगे नहीं चलेंगे तो आप पीछे छूट जाएगें... कई लोग ये सोच कर संतुष्ठ हो जाते हैं कि भई हमने तो सब कुछ पा लिया ।हम तो अपने मुकाम पर पहुच गए..शायद यहीं से उनकी भूल होती है ..इसलिए आज जो, मैं जिस मुकाम पर पहुचां हूं। मुझे उससे आगे जाना है और अपनी कम्पनी को भी आगे लेकर जाना है .और आप सब जो काम कर रहे हैं उनको भी ... सुबोत ने जैसे ही अपनी बात खत्म की .वैसे ही सारा हॉल तालियों की आवाज़ से गूंज उठा कैमरे की रोशनी और रिपोर्टरों के सवाल ..सब एक साथ टूट पड़े ....

किसी पत्रकार ने पुछ ही लिया इतनी जल्दी इतना सबकुछ ..क्या कुछ छुटा नही, क्या कुछ रहे तो नहीं गया ...किसी का साथ किसी का प्यार... सुबोत मुस्कुरा दिया पर पहली बार उसकी मुस्कुराहट में चिता छलक रही थी ।

आज उसका न जाने क्यों मन जल्दी घर जाने के लिए करने लगा ..आज न जाने कितने बरसों बाद वो शाम को घर की तरफ जा रहा था ...उसे अपना शहर कितना बदला बदला दिख रहा था ...पंछी, चिडियां, बच्चपन और जवानी की यादें.. फिर किस तरह सुमन से मुलाकात हुई.. शादी फिर दो नन्हे फूल, मम्मी पापा और छोटी बहन किसी से भी उसने इतना वक्त हो गया बात तक नहीं की कोई कैसा उसे कुछ पता नहीं अपने आप में वो कितना व्यस्त हो गया की उसे कुछ और दिखा ही नहीं ..तभी रेड लाईट पर ब्रेक लगती और वो हकीकत में वापस आता है तो देखता है अपने परिवार के साथ लोग कितना खुश हैं बाप ने बच्चे को गोद में बैठा रखा है और उसे अपने हाथ से कुछ खिला रहा है ..पास मे बैठी पत्नी ने भी उसकी बांह पकड रखी है और पूरा परिवार कितना खुश लग रहा है..

सुबोत को जल्दी घर पर देखकर सुमन घबरा सी गई ... सुबोत मुस्कुराया और पुछा मम्मी पापा कहां है ..सुमन ने इशारे से कमरे को दिखाया मा बाप थोड़े परेशान हो गए..क्या हुआ जो आज इतनी जल्दी और हमारे पास उन सब की शक्ल देख कर सुबोत को हंसी आ गई और वो बोला spent time with family…भई..हा spent time with family ये भी सफलता का हिस्सा होना चाहिए ..सब ज़ोर से हंसते है..

आज न जाने कितने वक्त के बाद पूरा परिवार एक साथ था ...सब एक साथ खा रहे हंस रहे थे ..साथ में खुशियों को बांट रहे थे ..बच्चे भी सुबोत के पास जा कर किसी और के पास नहीं जा रहे ..सुबोत को लग रहा था कि उसने इस भाग दौड़ में कितना कुछ सच में मिस किया.. फिर रात हुई और सब लोग सोने चले गए सुबह जब सुबोत उठा तो उसमें नई उर्जा थी नई शक्ति ..और एक नया एहसास .जो उसके काम में भी फायदेमंद रहा....।

Friday, August 13, 2010

एड्सवाली औरत.. सच्ची घटना....

राजस्थान के शहर अजमेर से लगभग 35km दूर बसा एक छोटा सा गाव नंदलाला.जहां काली और उसके परिवार की ज़िन्दगी हमेशा के लिये अचानक बदल गई। 42साल की काली पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब उसे पता चला की उसका, एचआईवी टेस्ट पॉज़िटिव है ,इससे साल भर पहले ही काली के पति की एचआईवी की वज़ह से मौत हुई थी ।काली का पति ट्रक ड्राईवर था और अपने काम के सिलसिले मे ज्यादातर बाहर रहता था ।

गांव के ज्यादातर आदमी ट्रक ड्राइवरी के पेशे से जूडे हुये हैं और हाईवे ही उनका घर है ।गांव में करीव 300 परिवार हैं और हर परिवार से एक आदमी ट्रक ड्राइवरी से जुड़ा हुआ है ।

ट्रक चालक अपने लंबे सफर के दौरान कई जगह खाने पीने और आराम के लिये रुकते हैं । इसी दौरान इनमे से कुछ कि नज़दीकियां वैश्याओं से भी हो जाती हैं और इस संभावना से इंकार नही किया जा सकता कि काली का पति अपने ऐसे ही किसी संम्बध की वजह से एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हुआ।.और उसी से ये संक्रमण काली में आ गये।

काली के पति की मौत को दो साल हो गये हैं । एचआईवी से झूझ रही काली अपने दो बच्चों के साथ बमुशकिल अपनी ज़िन्दगी थोड़ी बहुत आमदानी के ज़रिये गुज़ार रही है ।

काली दो बच्चों की मां है । बच्चों को नहीं मालुम की , मां को कौन सी बिमारी हैं।उसकी 16 साल की लड़की है, जिसने बस छठी तक पढ़ाई की ,अब वो घर के छोटे मोटे काम मे अपनी मां का हाथ बटाती है

विधवा पेंशन स्कीम के तहत मिलने वाले 200 रुपये महीना ही काली की आमदनी का अकेला ज़रिया है।और ये मिलना तब शुरू हुआ जब काली ने ग्राम पंचायत जा कर अपनी परेशानी पंचायत और वहां मौजूद सरंपंच बनावारी देवी को बताई।

उसने सरपंच से ये भी कहा कि वो गांव वालो से एचआईवी के बारे में बात करे और बताये कि इससे कैसे बचा जाये।

सरपंच को इसके बारे में खुद ज्यादा जानकारी नहीं थी ।वो उसकी इतनी ही मदद कर पाई की उसे महीने की विधवा पेशन दिलवा दी और राष्ट्रीय ग्रामिण रोज़गार गारंटी एक्ट के तहत 100 दिन का रोज़गार दिला दिया ।

हलाकि इससे काली को थोड़ी आर्थिक मदद ज़रूर मिली पर ये बहुत कम है उसकी रोज़ की ज़रूरात को पूरा करने के लिये ।दो बच्चों की देखभाल खाना पीना रोज़ के खर्च ... अभी बहुत कुछ करना है उसे ..

गांव वाले उसे चिढाते हुये कहते है एडस वाली औरत ।काली को बहुत दुख होता है जब गांव की औरते उसे पागल और चरित्रहीन कहती हैं।

ज्यादतर एचआईवी सक्रमण असुरक्षित शारीरिक संबधों से फैलता हैं।शादीशुदा पतिव्रता औरतो को ये सक्रमण अपने पति से होता है जिन्होने शादी के बाहर कई जगह असुरिक्षत शारीरिक संबध बनाए हुए होते हैं । लड़के और लड़की में भेद भाव की पंरमपरा और कम उम्र मे शादी कुछ मुख्य़ कारण है जिसकी के चलते औरते और जवान लड़किया अंजान ही रहती है एचआईवी से और अपने आपको बचा नहीं पाती यौन संबध से फैलने वाली इस बिमारी और अंचाहे गर्भ से

एचआईवी उन युवा ,ग्रामिण और औरते मे तेज़ी से फैल रहा है, जहा गरीबी अज्ञानता और लिंग भेद है। वहा लोग स्त्री पुरूष के संबधों की बात करना गलत और गंदा मानते है ..यौन संबध का ज़िक्र करना पाप समझा जाता है और यौन सेहत और यौन अधिकार पर शायद ही बात होती हो । एच आई वी के बारे में जागरुक करने में जो सबसे बड़ी परेशानी सामने आती है वो एचआईवी के बारे में फैली हुई अफवाये और जो लोग इस वाइरस से ग्रस्त हैं उनके साथ समाज में बुरा बरताव ।

एचआईवी के प्रति अज्ञानता और डर के मारे हमारा समाज उस परिवार से सारे नाते तोड़ लेता है जिसके घर में कोई एचआईवी का व्यक्ति हो ..जिसके कारण उन्हे कभी नौकरी से हाथ धोना पड़ता कभी अकेले रहना पड़ता और कभी कभी तो उनका हुक्का पानी भी बंद कर दिया जाता है ।

अजमेर ज़िले के पास के एक गांव नारवार में 22 साल की संजू रहती है ।उसका ब्याह जल्दी हो गया था पर उसकी विदाई 18 साल पूरे होने पर ही हुई।दूसरी लड़कियों की तरह उसने भी सपने सजोये एक अच्छी शादीशुदा ज़िन्दगी के, आगन में खेलते हुये बच्चों के ..पर ..उसके सपनों की उम्र बहुत छोटी थी और मुकदर उससे मुह मोड़ चुका था ..

8महीने पहले उसके पति धनपत का एचआईवी टेस्ट + निकला था ।

धनपत अपने काम के सिलसिले ज्यादातर दूसरे शहरों मे जाता था ।उसके शरीर में खरोचों के निशान बनने लगे और उसे अकसर बुखार भी रहने लगा । इसको देखते हुये संजू उसे नज़दीक के चिकित्सा केन्द्र में जांच के लिये ले गई।

धनपत बराबर अपनी शारीर की जांच के लिये सरकारी एचआईवी केन्द्र अजमेर मे जाता है । वही की एक स्थानीय संस्था ने उसका मुफ्त में बस पास बनवा दिया जिससे अजमेर जाने का उस पर कोई खर्च न पडे...पर कभी कबार बस में मौजूद यात्रियों और स्टाफ उसके साथ बुरा बर्ताव करते। जिससे उसकी परेशानी और बढ़ जाती है ।

अपनी सेहत के कारण वो काम पर रोज़ नही जा पाता जिसकी वजह से उसका परिवार गांव का सबसे गरीब परिवारों मे से एक हो गया है । इसे देख कर गाव के सरपंच संजू को खुद लेकर गये और उसे काम दिलाया .संजू 12वी तक पढी हुई है और टेस्ट के बाद पता चला की उसे एचआईवी भी नहीं है ।

संजू को नरेगा के दिये गये काम से वो 100 रु हर महीने कमा लेती है । पति की कमाई में और सहारा देने के लिए नहीं है जिसे और रूपये आ जाए वो गांव की औरतों के कपड़े सिलती है ।पति पत्नी अपनी ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये सारी कोशिशे करते हैं ।

बहिष्कार,ज़लालत.बदसूलकी , परिवार के सदस्यों और समाज के बुरे रवैय्यए से एचआईवी से ग्रस्त, लोग मजबूर हो जाते हैं कि वो कहीं गायब हो जाये या फिर खुदकुशी कर ले।

एचआईवी के साथ जो अफवाए और गलतफमी जूड़ी हुई हैं ,जैसे...

कैसे ये एक से दूसरे व्यक्ति को होता है । और किस तरह इसकी देखभाल और इलाज कराया जाए ।

42 साल की कोमा कि जिन्दगी भी उदास और ठंडी होकर कर रहे गई ।जबसे उसे पता चला कि वो एचआईवी+है अभी ज्यादा वक्त नहीं गुज़रा जब उसका पति जो खानाबदोश मज़दूर था और मज़दूरी के सिलसिले में उड़ीसा के गानजांम ज़िले गया था ..उसकी मौत कि वजह एचआईवी से जूडी हुई बिमारी निकली ।

जब वो मरा तो गांव के किसी भी आदमी ने उसके अंतिम संस्कार में भी मदद नहीं की,इसलिये कि कहीं उन्हे भी एचआईवी न हो जाए...अपने पति के मौत के बाद से कोमा संधर्ष कर रही है एक न जीतने वाली लड़ाई लड़ रही है बस इसलिये कि उसे समाज स्वीकार कर ले ।

उसको और उसके तीन बच्चों को उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया था । कोमा के भाई ने उसे अपने घर में जगह दे ऱखी है ।

कुछ दिन पहले उसका बड़ा बेटे का शव आम के बाग में लटका मिला ... उसने खुदकुशी कर ली ..जब्कि उसका एचआईवी टेस्ट नगेटिव था ..पर गांव वालों ने उसका जीना दुष्वार कर दिया था ..ये कहे कहे कर कि उसे भी अपने बाप वाली बिमारी है ।

बेटी गिरिजानंदनी और बेटा निरंजन को पहले स्कूल में अलग बिठाया गया और बाद में बाहर निकाल दिया गया ये सब इसलिये हुआ क्योकि स्कूल प्रशासन को लगा कि इनकी वजह से दूसरे बच्चों की सेहत पर असर पड़ेगा।

समाजिक कार्यकर्ता ,स्कूल के हेडमास्टर और उसके पड़ोसी जो अब गांव के सरपंच भी है इन लोगों ने कोमा को बराबर समझाया सहारा दिया और निरंतर प्रयास किया जिसके कारण कोमा कोई ग़लत कदम उठाने बच गई । नहीं तो वो.......भी

इसी संदर्भ में स्थानीय सरकार कि पहल से पंचायती राज संस्थापन की भूमिका काफी अहम हो जाती है ..एचआईवी के प्रति लोगो की रूची को मुख्य विचारधारा में लाने के लिये।

स्थानीय चुने हुए नेता को इस ओर काफी मज़बूती के साथ कदम उठाने चाहिये ।अपने क्षेत्र औऱ ज़िले में लोगों की सोच को बदलने का प्रयास करना चाहिये ।और ये तभी संभव है जब कोई सोचे की भारत गांव मे बसता है और ग्रामीण क्षेत्र में हज़ारों - लाखों लोगों का घर है । जो यौन से जूडे मसलों पर बहुत कम बात करते हैं।

वार्ड और ज़िले के स्तर पर चुने गये नेताओं को प्रोत्साहित किया जा रहा कि वो अपने क्षेत्र को एचआईवी नगेटिव बनाये औऱ हर स्तर की योजनाओ में एचआईवी से जूडे लोगों को मुख्यधारा मे लाये ,स्थानीय स्तर पर इसे किस तरह रोका जा सकता है और जो लोग इससे झूझ रहे हैं वो कैसे अपनी देखभाल करे और उन्हे क्या सहायता कि ज़रूरत हो सकती है ।इन सब बातों का ध्यान रखा जाए ।

पंचायत के सदस्य इस मसले पर कुछ इस तरह मदद कर सकते हैं।

1) अफवाए और भेदभाव के विरोध मे बोले।

2) गाव के लोगों को बताना कि वो एचआईवी के बारे में कहा बातचीत कर सकते है कहां उन्हे जानकारी मिल सकती है और वो भी... एकदम मुफ्त..

3) लोगों को प्रोत्साहित करना कि वो ये सारी सुविधाओं का लाभ उठाए ।

4) एचआईवी से जुडे सारे भ्रम तोड़ना।

5) उन लोगों की मदद करना जो एचआईवी का शिकार हैं उन्हे राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा मिली सुविधाओ के बारें बताना।

भारत के विभन्न गांव में चुने हुए स्थानीय नेता गांव के लोगों को एक साथ लेकर उन्हे एचआईवी की जानकारी देते हैं।

32 साल की ममता माई राना दोरा ग्राम पंचायत,बी ब्लाक रेनगिलुंडा गंजमान ज़िले उडीसा की सरपंच है ।

वो अपनी ग्राम पंचायत मे होने वाले कामो का जायज़ा लेती है उनकी पंचायत के तहत 7 गांव आते हैं जिसकी तकरीबन 4,000 की आबादी है ।

वो जब गांव के लोगों से बात करती है तो उस दौरान वो एचआईवी का ज़िक्र करना नहीं भूलती ।उन्होने एचआईवी को अपनी योजनाओं में मुख्य स्थान दे ऱखा है वो एचआईवी से ज़ुडी सारी आशंकाओं को मिटाने का प्रत्यन करती हैं।लोगों की समस्याओं को सुनती और उन्हे उसका हल बताती हैं ।

ममता माई एचआईवी जागरूक सभाओं का आयोजन के साथ नेतृत्व भी करती है । दूसरे गांव औऱ स्कूलो में जा कर इस विष्य पर बोलती भी हैं औऱ स्वयं सहायता संगठन में ,जो केन्द्रित है उन घरेलू औरतों पर जिनके पति दूसरे शहरों मे मज़दूरी के लिये आते जाते रहते हैं ।

वो एचआईवी के प्रति जागरूकता लाने के लिये और लोगों में इसका भ्रम दूर करने के लिये सहारा लेती है नुकड्ड नाटकों ,रंगमंच और प्रतियोगिताओं का ।

स्पष्टा और खुलापन एचआईवी के प्रति सरकारी चुने हुये नुमाइदों मे एक अच्छा उदाहरण पेश करता है ।

लोगों को आगे आने की ज़रूरत है तभी इसे कामयाबी मिले गी जब हम बाहर निकल कर इसके बारे में बात करें .

खामोशी न तो समस्या को खत्म करती है न ही एचआईवी के सच को झूठला सकती है पर हां देरी तुरन्त एचआईवी के वाइरस को रोकने में रूकावट ला सकती है और ये देरी एचआईवी से ग्रस्त लोगों के लिये एक समस्या बन जाती है न की समाधान ।चुने हुए जनप्रतिनिधि एचआईवी ग्रस्त लोगों के समक्ष जा कर उन्हे शिक्षित करते हैं समान्य जीवन जीने के लिये उत्साह बढाते

एचआईवी से हमारे समाज और परिवार का कोई भी सदस्य ग्रस्त हो सकता है ।पर इसका बचाव तभी संभव है जब कि हम इसके बारे में खुल कर बात करें उन तरीकों की जिससे इससे बचा जा सकता है अगर सब सही जानकारी दे आफवाओं और ग़लतफमी को न फैलने दे..और हम सब तैयार हों इस संकल्प के लिये कि अगर हमारे गांव कस्बे में कोई एचआईवी + से ग्रस्त है तो हम उसको कभी भी छोटा और अकेला महसूस नहीं होने देगें।

ये तभी मुमकिन है जब हम यौन संबधों के बारें में खुल कर बात करें और स्त्री पुरूष और युवाओं को उत्साहित करे यौन सुरक्षाओं के बारे में यहीं एक मात्र कुंजी है एक स्वस्थ समाज की ।

लोगों द्वारा चुने गये जन प्रतिनिधियों औऱ पंचायती राज संस्थानों के नेताओ का ये कर्तव्य हो जाता कि वो इस बात की पुष्टी करें की गांव में कोडम को सही जगह पहुचाआ गया है हम को ये बात सब को बतानी चाहिये कि एचआईवी टेस्ट अपनी शक्ति और अपनी देखभाल का प्रतिक है ।

जो लोग एचआईवी से पीडित है कानून में उनके अधिकार है ।उनको हर संभव सहायता दिलाई जाती है विभन्न सरकारी योजनाओं के तहत ..भारत के गांव में इसका ज़िम्मा पंचायत को दिया हुआ है वो इस बात को पक्का करे कि किसी स्कूल मे किसी भी ऐसे बच्चे के साथ भेदभाव न करे जिसके मां-बाप एचआईवी (+) से ग्रस्त है ।

सरकार वादा करती कि एचआईवी से जूडे सारे मुद्दो का वो हर स्तर पर लोगों को जवाब दे सकती है और इस विशाल कार्य को पूरा करने में भारत की पंचयातों का मुख्य योगदान है

Friday, July 23, 2010

शाह को मात

शाह को मात

गुजरात सरकार के गृहमंत्री अमित शाह को मात मिल चुकी है ..कोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी खारीज कर दी है ।गुजरात हमेशा से बीजेपी के दिल से जुड़ा हुआ है । मोदी हो या फिर उनका कोई भी मंत्री बात जब गुजरात की उठती है तो दिल्ली तक पहुंच ही जाती है..

और दिल्ली में बैठे मोदी के एजेंट मामले को अलग राह पर मोड़ देते हैं और केन्द्र को दोषी करार देने में जुट जाते हैं... हर किसी की चार्जशीट पर बवाल करने वाली बीजेपी को अब वातावरण इतना प्रदुषित लग रहा है कि उन्होने प्रधानमंत्री के दिए भोज में भी जाने से इंकार कर दिया..

सही है मोदी से ही यहां बैठे बीजेपी के लोगो की रोटी चल रही है तो मोदी या फिर मोदी की सरकार पर कोई भी आंच आए तो खाना खाने से इंकार कर दिया जाता है .. मनमोहन सिंह तो पराए हैं मोदी के चक्कर में तो अपने सहयोगी नितिश के भी भोजन को मना कर चुके हैं...जब नितिश ने कहा था मोदी को छोड़ कर सब भोजन में आ सकते हैं... पर मोदी को कैसे छोड़े बीजेपी

कब तक पाप और मोदी के बोझ को बीजेपी उठाएगी.. इस प्रदुषित हुए वातावरण को किसी को तो साफ करना ही होगा...

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल

हालत देश की हुई बुरी
ग़रीबी मंहगाई खूब बढ़ी।।
चर्चा हो गया ये आम
मेहनत का मिलता नहीं कोई दाम ।।
चापलूसों ने किया देश का बंटाधार
निकम्मो के सिर पर पहना कर ताज।।
समझ में नहीं आता ये सारा खेल
क्यों लगता है हमेशा
छछुंदर के सर पर चमेली का तेल।।

Wednesday, June 23, 2010

आंधी

एक आंधी कुछ इस तरह से आती है
साथ अपने गर्द और राख लाती है
पीछे अपने अंधकार और मातम छोड़ जाती है
जिसने देखा वो थर्ऱा गया
जिसने सुना वो कांप गया
जो गया वो लौट कर न आया
जो बचा वो लौट कर जा न सका
उस मंज़र को शब्दों मे बयां कैसे करूं
उस रात को कलम से कैसे लिखूं
रोने की आवाज़े शोर में खो गईं
चीख पुकारे हवाओं मे उड गई
वो आंधी इस बार सब कुछ ले गई

Tuesday, June 22, 2010

असगर नदींम सरवर की नज्म

असगर नदींम सरवर की नज्म
भारत पाक रिश्ते पर
मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर रास्ते की घास में अपनी जड़ों की खोज में
तारीख़ के घर का पता मालूम करते हैं
मगर तारीख़ तो बरगद का ऐसा पेड़ है जिसकी
जड़ें तो सरहदों को चीर कर अपने लिए रस्ता बनाती हैं
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं...
मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर भी नहीं पहुँचे.
कि सुबहे-नीम वादा में धुंधलका ही धुंधलका है
कि शामे-दर्दे-फ़ितरत में कहीं पर एक रस्ता है
नहीं मालूम वो किस सम्त को जाकर निकलता है
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं.

Saturday, June 12, 2010

बरसात कुछ लाती है

बरसात कुछ लाती है
अकसर बरसात में वो घड़ी याद आती है
एक मां अपने बेटे के साथ जाल लेकर आती हैं
सुमंद्र के किनारे लहरों में वो जाल फेंके खड़े रहते हैं
गिरती बूंदों से अपनी किस्मत की दुआ करते हैं
इस बरसात में झोली अपनी भर जाएगी
ये बारिश मेरे दुख, बहा ले जाएगी
लहरें भी झूम के मस्त होती है
हर बहाव में कुछ न कुछ भेजती है..
कोई बचता है कोई गीत गाता है
कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।।
मुझे एक और घड़ी याद आती है
कड़ी- बल्ली ,पत्थर की छत टपकती है
घर की बिल्ली दुबक कर कहीं बैठती है
कमरो में हर वक्त छतरी खुली रहती है
मेरी चप्पल अकेले ही सैर पर निकल जाती है
कोई बचता है कोई गीत गाता है
कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।।
मुझे एक और घड़ी याद आती है
हाथों मे हाथ डाले कोई चलता है
कोई इधर चलता है कोई उधर चलता है
पायचें उठाए ,जूते लिए बचकर कोई निकलता
फिर भी मोटर गाड़ी छीटे मार कर भाग जाती है
न जाने तब गाली कहां से मुंह में आती है
हर बार बरसात कुछ लाती है
कोई बचता है कोई गीत गाता है
कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।।

Tuesday, June 1, 2010

शहज़ादा गुलरेज़ की नज्म

शहज़ादा गुलरेज़ की नज्म
कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बांहों में पा कर।
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में कसमसा-कसमसा कर
सरहाने से तकिया गिराती तो होगी
वही ख्वाब दिन की मंडेरों पर आकर
उसे दिल ही दिल में लुभाते तो होगें
कई तार सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होगें
कभी चौक पर सोचते सोचते कुछ
चलो खत लिखे दिल में आता तो होगा
मगर उंगलियां कांप जाती तो होगीं
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
कलम फिर उठा लेती होंगी उमंगे
कि धड़कन कोई गीत गाती तो होगी
कोई वहम उसको सताता तो होगा
वो लोगों की नज़रों से छुपती तो होगी
मेरे वास्ते फूल कढ़ते तो होगें
मगर सुई उंगली में चुभती तो होगी
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होगें
मसहरी से आंचल उलझता तो होगा
प्लेटें कभी टूट जाती तो होंगी
कभी दूध चूल्हे पे जलता तो होगा
गरज़ अपनी मासूम नादानियों पर
वह नाज़ुक बदन झेंप जाती तो होगीं
शहज़ादा गुलरेज़....

Saturday, May 8, 2010

मर्दर डे-मा

मर्दर डे
मां.....क्यों चली गई
बहुत याद आती है
आंख अक्सर भर जाती है
कुछ कहूं ,कुछ करूंतेरी शबी नज़र आती है
आज मलाल है तेरे जाने
आज मलाल है तेरे जाने का
तेरे लिए कुछ न कर पाने का
मैं नाकारा रहा निक्मा रहा
फिर भी तेरा दुलारा रहा॥
वो शब्द अब भी गूंजते है
मैं चली जाऊंगी जब पता चलेगा
वो शायद तब मज़ाक था पर
उस हकीक़त का एहसास अब हो रहा है...
सच मैं मां बहुत याद आती है


Friday, May 7, 2010

संजीव श्रीवास्तव का जाना कोई हैरानी की बात नहीं...

संजीव श्रीवास्तव का जाना कोई हैरानी की बात नहीं...
जी हां संजीव श्रीवास्तव चले गए... सहारा छोड़ा या सहारा ने उन्हे छोड़ दिया अब इस बात को भूल जाना चाहिए.जब उन्होने सहारा ज्वाइन किया था तो लोगों ने उन्हे मुबारकबाद और सहारा को सही पटरी और सही दिशा में लाने का संकेत माना था ..पर 16 जनवरी 2010 को हमने अपने ब्लाग वक्त है पर लिखा था कि संजीव कुछ बदलाव नहीं कर पाएगे और खुद बदल जाएगें...किसी को इस बात पर यकीन नहीं था ..पर हम कायम थे अपने मीडिया के अनुभवों और चैनल के नज़रिये को समझते हुए... जिस तरह का घ़टनाक्रम हमने अपने ब्लाग पर लिखा ..जिसका लिंक नीचे है वैसा ही हुआ..और संजीव को सहारा को खुदा हाफिज़ बोलना पड़ा
waqt: क्या सहारा टीवी का बदलाव कुछ रंग लाएगा...
http://waqthai.blogspot.com/2010/01/blog-post.html
ख़बर अब ये नहीं है कि संजीव चलेगे खबर अब ये है कि उपेन्द्र राय का नंबर कब आएगा ..वो भी हम आपको बता दे ..जल्द इस साल के खत्म होते होते वो भी बाहर का रास्ता देख लेगे या फिर एचआर में बेठने लगेगे..तो उपन्द्रेजी को यही सलाह है कि बदले की भावना से काम न करते हुए .सिर्फ और सिर्फ काम पर ध्यान दे... चैनल जो बीच मे 6 तक रेटिग पर पहुच गया था आप लोगों के आने के बाद 2 और तीन पर अटक गया उसे सुधारे खबरो पर काम करे खुद खबर न बने...
वक्त है ब्लाग ने हमेशा टीवी की सही तस्वीर पेश की है .हमने ही कहा था कि इलैक्शन कवरेज न्यूज़ 24 का घटिया था .. अंजीत अंजुम एंकरिंग में काफी मेहनत करनी चाहिए..शायद तब वो और उनके बहुत से समर्थक नाराज़ ..लेकिन ये बात कितनी ज्यादा दुरस्त है..ये सब जानते है और मान भी गए होगें ।..
हमने कहा कि हिन्दी न्यूज़ चैनल कुमारों का चैनल बनता जा रहा ..बात सही थी कई चैनलों में कुमारों का कद कम हुआ और चैनल सही पटरी पर लौटा
जब हमने कहा आरकेबी अच्छा शो है तो लोगो ने काफी मज़ाक बनाया पर आज आप देखते होगे हर चेनल में एक घंटे का प्राइम टाइम उसी फोरमेट पर आने लगे जिस फोरमेट का हमने ज़िक्र किया था .
हमने लिखा यूसुफअंसारी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ..इसमे क्या ग़लत था य़ूसुफमिया ने कौम के लिया क्या किया .शायद किसी को नहीं मालुम..
हमारा मकसद खुद नाम कमाना नही लोगो को सही जानकरी देना है ..जो हम देते रहेगे.. आगे भी वक्त के साथ रहना है तो वक्तहै पढ़ना ही पढ़ेगा...
शुक्रिया

Tuesday, May 4, 2010

ऐसी किस्मत हर किसी को नहीं मिलती ......

ऐसी किस्मत हर किसी को नहीं मिलती ......


आई याद मुझको शवण कुमार की गाथा
कैसे फिरता था वो लेकर अपने नेत्रहीन माता-पिता
न अपनी सुध...बस एक धुन
कैसे करूं उनकी सेवा जो हैं मेरे जन्मदाता
पर हो गई ये बात पुरानी
शवण तो है बस एक कहानी ...
इस युग की कहानी बदली है
नाम तो है शवण पर
फितरत कुछ हट के है
बोझ समझता है वो उनको
जिनके बाज़ूओं मे वो पला है
झिड़क देता है वो उनको
जिसने उसको जन्म दिया हे
छोड कर चल देता है उनको
जिसने उसके लिए सब छोड़ा
उनकी खांसी उनकी बीमारी
आज सब खलती है उसको
जिसके लिए उन्होने अपनी कितनी नींदों को तोड़ा है
रोते है वो शवण..
फिर भी तेरे लिए दुआ करते हैं..
सोच... क्या तुझ को जन्म देकर उन्होने कुछ ग़लत किया
ये वो नियामत है जो हर किसी को नहीं मिलती
इनके कदमो तले जनन्त है जो हर किसी को नहीं मिलती
मां बाप की खिदमत की तौफीक हर किसी को नहीं मिलती
हां ये सच है... शवण की तरह किस्मत हर किसी को नहीं मिलती ।।
आई याद मुझको शवण कुमार की गाथा
कैसे फिरता था वो लेकर अपने नेत्रहीन माता-पिता
न अपनी सुध...बस एक धुन
कैसे करूं उनकी सेवा जो हैं मेरे जन्मदाता... जो है मेरे जन्मदाता...
शान...

Sunday, May 2, 2010

शौहरत और दौलत

शौहरत और दौलत
अक्सर सोचता हूं ..जिन्दगी जो हम जी रहे हैं किस लिए...उसमें क्या क्या महत्वपूर्ण हैं.. जिससे पूछा ,सब ने कहा एक खुशहाल जीवन के लिए जिन्दगी में खुशियां होनी ज़रूरी हैं ,,और खुशियों को कैसे परिभाषित किया जाए..तो कहा सब ठीक ठाक हो...सब स्वस्थ रहे , एक अच्छा घर हो कामकाज चलता हो दुनिया में अपनी पहचान हो..बस और क्या चाहिए...
फिर मुझे ध्यान आया की वो लोग कितने महान है जो जीवन में इन सब को त्याग कर के अलग रहते हैं .दौलत शौहरत से दूर .सहेत की न परवाह न अपने हाल की चिंता..वो भी तो जीवन जी रहे हैं...पर हममें से शायद ही कोई उस तरह का जीवन वितित करना चाहता हो.. क्यों...
दुनिया में दौलत औऱ शौहरत इसकी प्यास सब को है.. हर शाम,हर रोज़ हर सुबह मां बाप, अम्मी अब्बू अपने लख्तेजिगर को दौलत और शौहरत से धनी लोगों का ज़िक्र करते नहीं थकते ..देखो उसने ये कर लिया वो विदेश में बस गया उसका कितना नाम है ..आज उसके पास हर चीज़ है..
बात को आगे बढ़ाने के लिए आपको दो सधारण लोगो के बारे में बताता चलू.. पहले सम्मान जाति का होता था ..यानि जो उच्च जाति का है उसको समाज में सम्मानजनक नज़रों से देखा जाता था ..छोटे शहरों में अभी भी है .. दिल्ली जब बस रही थी ..लोग छोटे-छोटे शहरों से आ कर दिल्ली के इलाकों में रहने लग रहे थे..हर समाज की अलग अलग बिरादरी के लोग एक साथ जुड़ रहे थे ..तभी दो शख्स आए एक बढ़ई दूसरा कबाड़ी.।रियासत और नवाब ..छोटा धंधा है इसलिए लाज़मी है इसको करने वाले लोग भी छोटे तबके के होगें..उंची जाति के लोगों ने उनके साथ न अच्छा बरताव किया न बुरा हां सलाम दुआ रखा क्योंकि वो परदेश की ज़रूरत थी ..और हां किसी ने अपने बच्चों को उनकी तरह बनने की नसीहत भी नहीं दी..
वक्त बदला नौकरी पेशा लोग वही रहे गए..और रियासत सच में रियासतों का मालिक हो गया..और नवाब सच में नवाब बन गया..और पैतीस साल बाद हालत और हालात बदल गए। आज ऊंची बिरादरी के लड़के उनके यहां काम कर रहे और उनकी तरह बनने की कोशिश..यानि दौलत ने सारी परंपरा और सारा नज़रिया बदल दिया...
धोनी ,युसूफ पठान ..इनको शायद इनका शहर न जानता .पर ..आज इनका शहर इनसे जाना जा रहा है ... तो क्या ये सच है कि जीवन में जो है वो दौलत औऱ शौहरत ही है.. जिसके पीछे दुनिया दौड़ रही है ..और क्यों न दौड़े जब ये सत्य है औऱ सत्य को पाना, हासिल करना ,हर इंसान को सीखाया जाता है...
एक सवाल और कि पहले दौलत या शौहरत.. ये मुर्गी और अंडे की पेचीदा सवाल नही हैं ... शौहरत के लिए दौलत का होना ज़रूरी है जब आपका चहेरा चमकदार होगा तभी उसकी तस्वीर ली जाएगी..खाली शौहरत न मिलती है और न ही किसी काम की होती है .. काम का अर्थ है ज़िन्दगी को रफतार देना..
मेरा दोस्त प्रोफेसर मैं पहले भी उसका ज़िक्र कर चूका हू कि कई काम और कई जगह नौकरी करने के बाद भी उसे सफलता नहीं मिल सकी हम सबसे उधार लेकर हम सबको नराज़ कर चुका था वो ..पर कल किसी ने कहा यार प्रोफेसर तो प्रॉपर्टी के काम में बहुत पैसा कमा रहा है ..इतना सुनते ही न जाने कहां से मेरे मन में उसकी इज्ज़त बढ गई..तुरंत अपने दूसरे दोस्त को फोन कर के खबर दी ..और यकीन मानिये हमने तकरीबन 20मिनट उसकी यानि प्रोफेसर की तारीफ की......और आज एक लेख उस पर लिख रहा हूं....

Saturday, May 1, 2010

जसबीर कलरवि की ...तलाश

जसबीर कलरवि की ...तलाश


आज उसको किसी की तलाश थी

क्योंकि वो पहली बार गुम हुआ था

अजनबी चहेरे भी उसको अपने लगते थे

पर वो अपनापन उसके अंदुरूनी परतों से

बाहर न आ सका

खुद से घबराकर आखिर उसने आवाज़ दी

सभी अजनबी चहेरे उसकी तरफ दौड़े

अपना अपना रास्ता पूछने
. ।

Saturday, April 24, 2010

प्रार्थना के लिए हाथ उठते हैं

प्रार्थना के लिए हाथ उठते हैं
आज बाज़ार गया तो दुकान पर देखा एक बच्चा अपनी मां की साड़ी को हिला हिला कर किसी चीज़ की ज़िद कर रहा था । मां ने उसे देखा और फिर नज़रअंदाज़ कर दिया । फिर देखा तो गुस्से से घुर दिया ..बच्चा नहीं माना रोने लगा ... मां भी नहीं मानी बच्चे के तमाचा जड़ दिया ..बच्चा और ज़ोर से रोया ..मां को तरस आया कहा क्या चाहिए चलो ले लो... बच्चा खुश था ..उसे वो चीज़ मिल गई थी जिसकी उसने चाहत की थी ।... मां भी संतुष्ठ थी चलो उसका बच्चा खुश तो हुआ... दोनो खुशी खुशी चले गए..
पर मेरे मन में बड़े विचित्र से सवाल उठने लगे मैने सोचा ये मां और बच्चे के बीच क्या कोई तीसरा भी था ...जिसे दुनिया भगवान औऱ अल्लाह कहती दिन रात सजदे और दीये जलाती है क्या वो भी मौजूद था ... बच्चे ने मां से क्यों मांगा भगवान से क्यों नहीं ..जब इस दुनिया का नियम है कि जो कुछ है भगवान का है जो देता है वो भगवान देता है तो बीच में ये मां कहां से आ गई... और मां ने खुद क्यों दिया .भगवान ने क्यों नहीं दिया.उसने भी तो बच्चे को रोता देखा तिलमिलता देखा ..पर नहीं बात मां बच्चे में ही निपट गई..
अब लौटते हैं अपने विषय पर प्रार्थना के लिए उठते हाथ.. रोज़ पांच वक्त ,सुबह शाम, मज़ारों ,दरगाहों ,मंदिर ,तीर्थस्थानों सब जगह हर आदमी कुछ न कुछ मांगता दिख जाएगा.. पर हमें मालुम हैं कि हमको क्या चाहिए?..जी आप कहेगे हां..गाड़ी ,बगला, पैसा, दौलत शौहरत ,औलाद। किसी परीक्षा मे पास होना, कहीं दाखिला मिल जाना ,किसी बीमारी से निजात पाना, परेशानियों का खातमा..और कुछ... हां मरने के बाद जन्नत या स्वर्ग... बस दो पंक्तियों में हमारी सारी इच्छाए वो सारी कमनाए निपट गई जिसे हम ताउम्र मांगते रहते हैं ।और मांगते मांगते इस दुनिया को छोड़ कर चले जाते है कहां? ...उस भगवान उस अल्लाह के पास जिससे हम इस दुनिया में गिड़गिड़ाते रहे, रोते रहे, बिलकते रहे कभी ये मांगते कभी वो चाहते ..अंत में उसी के पास पहुच गए.... वो भी खाली हाथ ...
मेरे पिताजी की उम्र 73 साल की हैं सारी उम्र वो बहुत धार्मिक रहे ..पूजा पाठ नमाज़ रोज़ा, मजलिस मातम सब करते रहे ... पर पिछले दो साल से उनका मन इन सब से उखड़ सा गया ..एक दिन वो मुझे बताने लगे जब वो छोटे थे तकरीबन 5-6 साल के तब उनके दादा उन्हे बताते थे कि दुनिया में इतना अपराध, पाप बड़ गया है कि बस अब तो कयामत आने वाली है दुनिया खत्म होने वाली है । बस दुआ करो प्रार्थना के लिए हाथ उठाओ.. भगवान सब अच्छा करेगा..पर... अल्लाह ने सब कुछ अच्छा तो किया लेकिन भारतीय कोर्ट की तरह मामला ब़ड़ता ही गया ..पाप भी बड़ता गया...औऱ दुनिया चलती रही ।हमने फिर भगवान को पाने का और सरल तरीका खोजा छ संत, गुरूओं ,मौलवियों के आगे हाथ उठा कर प्रार्थना करना शुरू कर दिया ये तो हमारी बात ज़रूर पहुचाएगे पर नतीजा रहा..वो ही..सिफर..
अब सवाल वो ही कि हम दुआ क्यों मांगते हैं .. जब हम किसी के आगे हाथ जोड़ते हैं तो हम ये मानते हैं कि हम इससे छोटे हैं..ये हम से बड़ा है .. हाथ उठाने की नौबत तब आती है जब हर जगह से हम खाली हाथ वापस आते हैं। शायद इससे मनुष्य के अंहकार को कम होता है ..दुनिया को ठीक से चलाने के लिए अंहकार का मिटना ज़रूरी होता है ..बच्चा मां से मांगता है वो चाटा मारती है फिर भी मांगता है अगर वो उस वक्त न दिलाती तो कल फिर से मांगता ... ज़िन्दगी भी बच्चे के तरह आसान होती .थोडी ज़िद थोडे नखरे और काम हो जाए...
पर हमारा हाथ तो उठता ...उठ उठ कर थक जाता है ..साल महीने बरसों हो जाते पर धीरे धीरे जो होना होता या वक्त के साथ जो होना चाहिए वो होता रहता ... दुआ मांगने में कोई परहेज़ नही न ही मैं किसी से किसी चीज़ के लिए मना कर रहा हूं... पर मैने तो न जाने कब से कोई दुआ ही नहीं मांगी ।
पर अब मन करता है की.... उस भगवान उस अल्लाह से मांगू जिससे ललित मोदी मागता है विजया माल्या बिल गेस्टस अरब के शेख. साहारा श्री मांगते है ...अगर आप जानते हो इनके भगवान इनके अल्लाह को तो मुझे ज़रूर बताइए.. आपके मारे ही इस गरीब का भला हो जाए..और ये हाथ प्रार्थना के लिए उठ पड़े...

Wednesday, April 21, 2010

ललित मोदी होगें फरार..

ललित मोदी होगें फरार..
मीडिया के शुरूआती दौर में जब पेज थ्री की पार्टी में जाना होता तो कहीं नहीं लगता था कि मेरा भारत गरीब है ..यहा लोग नंगे और खाली पेट सोते हैं... सब झूठ लगता था ... साथी पत्रकार कहते थे सब दो नंबर का पैसा जो रोशनी दिख रही है वो अंधेरे से ही आ रही है ... कहीं न कहीं इन में से हर कोई किसी ग़लत काम किसी गैर कानूनी धंधे और किसी गहरे राज़ में कैद है ..एक दिन हर किसी का पर्दा हटेगा और हम पायेंगें कि ये सब नंगे तो हैं साथ ही शरीर में कितने दाग और कितनी बीमारी लिए हुए हैं...
ललित मोदी ने जो आईपीएल की दुकान खोली तो उसका रास्ता ऐसा बनाया कि आम आदमी अपने पैरों से उस पर नहीं चल कर जा सकता ..इस दुकान पर पहुचने और माल खरीदने के लिए आपके पास करोड़ों का अंबार होना चाहिए ये करोड़ो रूपए आप के पास किस तरह और कहां से आए ये कोई नहीं पुछेगा क्योंकि कोठे पर आने वाले ग्राहक से उसकी कमाई का स्त्रोत नहीं जाना जाता .. और अगर कोई जानता भी है तो कहने की हिम्मत कोई नहीं करता ,,
यही आईपीएल है और इस कोठे के हेड हैं ललित मोदी ..तो जिनको माल चाहिए उन्हे मोदी को सलाम करना ही होगा ...
लेकिन किस्मत कब साथ छोड़ दे दलालों के हाथ कब डोर लग जाए पता नहीं होता ..क्योंकि सब को खुश तो भगवान भी नहीं कर पाए तो मोदी क्या करते पर अपने को पाक साफ दिखाने के चक्कर में ऐसा कर गए की जिसने भी दुकान से माल खरीदा उस की आफत आ गई ...
ये सब मोदी से ज्यादा धुरंधर हैं मोदी इन्ही के पैसों पर ही तो ऐश कर रहा है ...अगर सफेद लिबास में दाग लगेगा तो लोग क्या कहेगे .. मोदी का खेल तो खत्म है .. पर मोदी बहुत नीच है जिसे कमीना कहते हैं वो ..उसके पास सबके राज़ ज़रूर होगें अगर वो डूबेगा तो दूसरों के लिए कुछ न कुछ बाण तो ज़रूर छोड़ेगा बात प्रधानमंत्री तक पहुच चुकी है ...कुछ कार्यवाई तो ज़रूर की जायेगी ।
आसान रास्ता है कि मोदी को देश से भगा दिया जाए ..फिर जब वो आएगा पकड़ा जाएगा तब की तब देखेंगे...अभी अगर ललित मोदी कहीं गायब हो जाए तो आप लोग ताज्जुब मत करना..।। क्योंकि मोदी को फरार होना ही है.इतिहास तो ये ही कहता है।

Sunday, April 11, 2010

सानिया शोएब की शादी और sms

सानिया और शोएब की शादी और sms
15 अप्रैल को सानिया मिर्ज़ा और शोएब मलिक की शादी है ..पर भारत वर्ष में क्रोध की लहर है ..हर तरफ गुस्सा है ..विद्रोह है ..सानिया के प्रति नाराज़गी.. देश के सम्मान को लेकर लोगों ने एसएमएस का प्रयोग करना शुरू कर दिया है ..जिसमें सानिया शोएब को गालिया गंदी गंदी भाषा नीचले स्तर के चुटकले और न जाने कितनी अशलील हरकते और किस्से लिख कर भेजे जा रहे है. और कहा जा रहा है अगर आप भारतीय है तो इसको अपने दोस्तों को भेजें ..क्या हिन्दु क्या मुस्लमान क्या पंडित क्या मौलाना सब सानिया के खिलाफ है शादी पर सब को एतराज़ है ।
अब सवाल उठता है क्यों .....क्या ये पहली शादी है हिन्दुस्तान और पाकितान के बीच ।ऐसा नही है हर साल कई शादियां होती हैं... क्या ये किसी स्टार का निकाह है इस लिए बवाल मच रहा है तो ऐसा भी नही है ..इससे पहले भी कई सितारे एक दूसरे के हो चुके हैं ..तो फिर ये माजरा है क्या...
आईये इसके लिए एक छोटा सा किस्सा सुनाते हैं ..शायद ये मंज़र सब ने देखा हो ..किसी मौहल्ले में मीना नाम की खूबसूरत लड़की थी ... खूबसूरत थी तो आशिकों की कमी भी न थी ..मौहल्ले का हर एक दिवाना उससे नज़र मिलने का इंतज़ार करता रहता है . .और कई बार तो आपस में लड़ भी पड़ते पर मीना अपने में मस्त पढ़ने लिखने में मशगूल और तरक्की की राह पर... लड़के ...लड़के देख आह भर कर रहे जाते पर मीना किसी को कोई भाव नहीं देती.. और मौहल्ले के आशिक सोचते शायद हमारी किसमत ही ऐसी है ...पर अचानक एक मोटरसाइकिल मौहल्ले में आकर रूकने लगी उससे मीना उतरने लगी मोटरसाइकिल वाले से घंटों बाते करने लगी ..फिर क्या था सारे मौहल्ले के सारे दिल के मारे आशिक एक हो गए .. मीना पर गलत गलत आरोप लगाना शुरू हो गया ... घरवालो को मीना के परेशान करना शुरू कर दिया उस मोटरसाइकिल वाले के भी एक दो हाथ मार दिया वो ऐसा क्यों कर हैं पूछा तो कहा वो यानि मीना किसी बाहर वाले के साथ क्या हम मर गए.. हममे क्या कमी .. सच आपमे कोई कमी नही पर मीना आपको पसंद करे ऐसा भी कहीं लिखा नहीं... मीना को उस गैर की होना था हो गई ..आशिक यूंही तड़प कर रहे गए ..बात में सब कुछ भूल गए..
सानिया लड़की है इसलिए ये बवाल है अगर शोएब हिन्दुस्तानी होता और सानिया पाकिस्तानी तो किस्सा अलग होता तो पाकिस्तान में ये सब हो रहा होता और हिन्दुस्तान शोएब के साथ होता।
तो क्या दुनिया बदल गई क्या हमारी सोच अलग हो गई...सानिया और शोएब की शादी को लेकर जिस तरह के बाण चल रहे हैं उससे तो लगता है कि आज भी कॉलेज और मौहल्ले में होने वाले रोज़ के हादसों से आगे हम नही बढ़ पाए हैं...
दोस्तों सानिया और शोएब की शादी है ..सानिया शोएब की पत्नी है इसे स्वीकार करों.. इस तरह के एसएमएस और प्रचार बंद करों जो होगा अच्छा या बुरा उससे वो निपटेंगें ... हमें बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दिवाना बन कर क्या करना है
सानिया शोएब और एसएमएस

Friday, April 9, 2010

जसबीर कलरवि की कविता- कवि.....

जसबीर कलरवि की कविता- कवि.....

कवि ------------

यह अपने आप में अनहोनी घटना

है के वो सारी उमर लिखता रहा

कभी नज़्म ,कभी ग़ज़ल और कभी कभी ख़त कोई ...

पर यह सच है उसकी कोई भी लिखत

ना किसी किताब ने संभाली न किसी हसीना के थरकते होठों ने ... ।

वो लिखता क्या था मैं आज आपको बताता हूँ

वो लिखता था एक कथा जो जन्म से पहले पिता के लिंग का मादा

था और फ़िर अपने बेटे के जिस्म में बसा ख़ुद वो ... ।

यह हंसती हुई गंभीर घटना तब शुरू

हुई जब उसने पहली बार पीड़ित देखा

अपने माथे पर चमकते चाँद के दाग का खौफ़ खौफ़ क्या था ?

बस यूँ ही जीए जाने की आदत का एहसास ... ।

वो बर्दाश्त नही करता था

अपनी सांस में उठती पीड़ा की हर नगन हँसी का

मजाक वो स्वीकार नही करता था इतिहास के किसी सफ़े पर अपने पिछले जन्म का पाप ... ।

उसका नित-नेम कोई कोरा -कागज़ था

और रोज़-मररा की

जरूरत हाथ में पकड़ी हादसाओं की कलम वो

बड़ी टेडी जिंदगी जी रहा था बे-मंजिल सफर सर कर रहा था

पर फिर भी वो जी रहा था लिख रहा था

और हर पल तैर रहा था शब्दों के बीचों -बीच आंखों के समंदर में ।

Wednesday, April 7, 2010

कौन समझेगा इन का दर्द-सीआरपीएफ के शहीद जवानो के परिवार..दंतवाड़ा मे शहीद 76 जवानो के परिवार को सलाम

दंतवाड़ा मे शहीद 76 जवानो के परिवार को सलाम

चीन के हत्यारों से लेस नक्सलियों ने 2 दिन के थके हुए भारतीय सीआरपीएफ के जवानो को मार डाला ..जवानो की मौत गोलियों से कम हुई प्रेशरबंम और आईडी के इस्तेमाल से ज्यादा हुई...जंगल के चप्पे चप्पे से वाकिफ नक्सलियों ने 76 जवानो को घेर लिया 1000 की तादाद में आए नक्सली पेड़ों और पहाड़ो की होड़ से हमला कर रहे थे ।जवानो के पास पोज़िशन लेने का भी वक्त नही था .वो भाग कर किसी जगह पर पहुने की कोशिश करते की ज़मीन पर छुपे प्रेशर बम का शिकार बनते ।प्रेशर बम दो तरह के होते हैं एक वो जिस पर आप पैर ऱखेगें तो वो फटेगा दूसरा वो कि जिससे आप पैर हटाएगे तब वो फटेगा..सीआरपीएफ की बस तो आईडी से उड़ाई गी..चारों तरफ से घीरे होने के बावजूद हमारे जवान साढ़े चार घंटे लड़े हमला सुबह पौने चार बजे हुआ..जो ज़ख्मी है उनके जज्बे को सलाम करते हैं क्योंकि वो फिर वहा पर जाकर लड़ने के लिए तैयार है ..और नक्सली का खातमा करेने पर ऊतारू..पर जो नही रहे उनके पीछे दर्द के रिश्ते बच गए। घायल जवान अली हसन ने ज़ख्मी होने के बाद अपने परिवार से बात की पर अल्लाह ने शाय़द बात करने तक की ही उसे महौलत दी ,,उसके बाद उसकी मौत हो गई।
पर रामपुर के माजरा गांव का कांस्टेबल श्यामलाल का परिवार इतना भी किस्समतवाला नही कि श्यामलाल से बात कर सकता उन्हे तो श्यामलाल का शव ही मिला तीन बेटियां और एक बेटा अपने बाप के शव को फक्र और नम आंखों से देखते रहे .
.ऐसी 76 कहानी जिसमें 42 उत्तर प्रदेश की ही हैं ..न जाने किन किन की कौन कौन सी खुशियों को उड़ा चुके हैं नक्सलियों के बम और गोलियां..
क्या कोई देगा इन गरीब परिवार को हमदर्दी क्या कोई बैठेगा इनके लिए भी किसी धरने पर .. शायद नही क्योकि ये जवान है इनका जन्म ही मरने के लिए हुआ देश की गोली हो या विदेश की सीना तो इनका ही होता है ।

Tuesday, April 6, 2010

शर्म आनी चाहिए जेएनयू के लोगो को

शर्म आनी चाहिए जेएनयू के लोगो को
मंगलवार की खौफनाक सुबह किसी भी भारतीय के लिए भूल पाना आसान न होगा । जब हमारे सीआरपीएफ के जवान छतीसगढ़ के दंतवाड़ा के जंगलों में गश्त लगा रहे थे तभी नक्सलियों का बर्बरता से भरा असली चेहरा सामने आया ।तकरीबन 75 जवानों को लगभग 1000 से ज्यादा नक्सलियों ने गौरिल्ला तरीके से घेर कर गोलियों से भून दिया... न जाने कितने परिवार का सुहाग बेटा भाई पिता को मार डाला.।इससे पहले भी मलकानगिरी में सीआरपीएफ की बस को निशाना बनाया गया उसमे तकरीबन 20 जवानो की मौत हुई.. ये एक दुखद घटना है जिसके सीने में दिल होगा।उसे दर्द ज़रूर होगा ।
लेकिन ऐसा नहीं है दिल्ली का एक तपका जो अपने को पढ़ा लिखा मानता है देश में होने वाले अत्याचारों के लिए धरना प्रदर्शन करता फिरता है ..गांजा चरस से चूर रहता मोटी मोटी लाल किताबे लाल फरेरे से बहुत प्यार करता है ..देश के शोषित पीड़ितों का मसीहा बनता है ..जब सत्ता मिलती है तो मलाईदर पदों पर बैठ जाता औरतो का बखौबी सेक्स के लिए इस्तेमाल करता ये कहते हुए कि ये तो शरीर की ज़रूरत है ।उस तो ये भी बर्दाशत नही जहा वो रहता है उससे नेहरू का नाम क्यों जुड़ा है ..
जी उसने मंगलवार को कनॉटपलैस के अंदर वाले पार्क में ग्रिनहंट के विरोध में प्रर्दशन किया जहा प्रर्दशन किया वहा प्रर्दशन करना मना है फिर भी इन पढे लिखे लोगो ने किया । और सुनिय़े जवानों की मौत और नक्सली हमले को सही बताया तर्क दिया कि अगर पी चिदेबरम उनकी 72 घंटों के सीज़फायर की बात मान जाते तो ये न होता ..सीज़फायर का मतलब की नक्सलियों को भागने और छुपने का मौका दे दिया जाता तो ठीक था सब की रोटी चलती रहती ।
न जाने यहां बैठ कर ये किस विकास और किस शौषण की बात करते हैं अगर सरकारी तंत्र में कमी है तो नक्सली कौन सा उन गरीब आदिवासियों के लिए मसीहा का काम करते वो उनसे टैक्स लेते है बदमाशो की तरह रात को आसरा और रात में बहू बेटियों के साथ शरीरिक संतुष्ठी ..ये कोई लेख लिखने के लिये नही मैं खुद नक्सलप्रभावी क्षेत्रों मे जा कर उनकी करतूत को देखा और सुना है ..सरकार को एक हुव्वा बना कर नक्सली अपना मकसद पूरा कर रहें है अपनी रोटी सेख रहे हैं ..उनके साथ जो अपने आपको ज्याद पढ़ा लिखा समझते है वो मज़े लूट रहे हैं विकास सरकार ही करेगी उससी से ही होगा न की बंद कमरों में सिगरेट के धुंए और गांजे के नशे से और बेबात की बात पर धरना प्रर्दशन और हर बात पर सरकार को गाली देने से । देश में सब का विकास हो सब को हक मिले सब चाहते पर जो सही बात हो उसके साथ रहना चाहिए..वो ही हमारी विचारधारा होनी चाहिए।

Sunday, April 4, 2010

देश में दो महत्वपूर्ण काम शुरू..

देश में दो महत्वपूर्ण काम शुरू..

देश में सब को मिले शिक्षा हर बच्चा पढ़े लिखे अगर ये काम सफल हो जाए तो भारत में समाजिक बराबरी हासिल होने के लिए समझो पथ बन जायेगा । इस कानून के तहत 6 से 14 साल के बच्चों लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार होगा । मान्यता प्राप्त हर प्राईवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें रिर्ज़व होंगी।देश में अभी तकरीबन एक करोड़ से ज्यादा ऐसे बच्चे है जो स्कूल नहीं जाते । इतनी बड़ी तादाद में बच्चों के लिए नए स्कूलों और शिक्षकों की ज़रूरत पडेगी ।इन सब का इंतज़ाम केन्द्र और राज्य सरकारों को करना होगा एक उज्जवल भविष्य के लिए।
केन्द्र सरकार ने नए स्कूल खोलने के लिए डेढ़ लाख करोड़ रूपए देने के लिए कहा है अगले तीन साल में में ये स्कूल खोले जाएगें।
अगले पांच लाख में 15लाख नए टिचरों को ट्रेनिंग दी जाएगी।इसमें होने वाले खर्च में केन्द्र औऱ राज्य सरकार की 65 और 35 फीसदी भागीदारी होगी। इस कानून की राह मुश्किल बहुत हैं..पहली मुश्किल तो उत्तरप्रदेश की मख्यमंत्री मायावति उन्होने कहे दिया कि राज्य सरकार के पास पैसा नही है अपने हिस्सा का पैसा देने के लिए। निजी स्कूल इसमे काफी अड़चने पैदा कर रहे हैं। महत्वपूर्ण बात ये भी है कि मौजूदा स्कूलों की बद से बदतर हालत है तो नए स्कूलों का क्या होगा..पर हर बच्चो के लिए उम्मीद का एक दरवाज़ा खुला है .. दुआ करते हैं जब बच्चे इस के अंदर जाए।
शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने काफी प्रभावी कदम उठाए हैं।
दूसरा कार्य जो देश में शुरू हुआ 15वीं जणगनणा। पहले दौर में घरों की गिनती की जाएगी ।और दूसरे दौर में लोगों की .इस बार लोगों की समाजिक आर्थिक हैसियत का भी जायज़ा लिया जाएगा-हर इस्तमाल करने वाली चीज़ो के प्रशन पुछे जाएगे..जैसे मोबाइल फोन ,इंटरनेट आदि..पहले 6 राज्यों में गिनती की जाएगी । 640 जिलो की 5757 तहसीले तकरीबन 7742 शहर 24 करोड़ घरों की सूची तैयार की जाएगी।
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में हर भारतीय का ब्योरा होगा। जनसंख्या रजिस्टर के लिए हर नागरिक की तस्वीर ली जाएगी .उसके दसों उंगलियों के बायोमेट्रिक निशान लिए जाएगे और फिर बनेगा हर नागरिक का यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड यानि विशेष पहचान पत्र .। इसमें नाम पते के अलावा और 15 तरह की सूचना होगीं ।15 साल के उपर हर व्यक्ति का नाम शामिल किया जाएगा..ये पहचान पत्र आने वाली सरकारी योजनाओ और सेवाओं के काम आएगा..जिससे काफी हद तक फर्जीवाड़े कम हो सकते हैं.. इसी सफलता की हम उम्मीद करते है।

Saturday, April 3, 2010

भीष्म की मौत एक नपुंसक के हाथ

भीष्म की मौत एक नपुंसक के हाथ

कोई अंग नही बचा है जिसमें बाण न लगे हों। अंग अंग भिदा है ।प्रेयत्क रोम कूप में भिदे बाण रोम से खड़े हैं । उन्ही पर लेटे हैं भीष्म।
भीष्म जिनका देवव्रत भी नाम है ... और देवव्रत का अर्थ है देवाताओं जैसा व्रत ..दृढ़ निश्चय करने वाला व्यक्ति..सब जानते हैं कि भीष्म ने अपने पिता का दूसरा विवाह करने के लिए खुद विवाह न करने का व्रत लिया था । कई बार ऐसे हालात पैदा हुए जब भीष्म अपना ये व्रत तोड़ सकते थे ...पर उन्होने ऐसा नहीं किया । जो राजा हो सकता था ,उसने अर्थदास जैसा जीवन जिया...लेकिन अपने व्रत को भंग होने नही दिया।
हस्तिनापुर राज्य की सेवा का व्रत उनकी कमज़ोरी बन गया था.अपने युग के महान विद्वान ,धनधुर .धर्मात्मा समाजवेत्ता होकर भी कमज़ोर ही रहे । उन्होने कौरवों के सेनापति के रूप में दस दिनों तक महाभारत युद्द किया ।भीष्म मन से पाडवों और तन से कौरवों के साथ थे ।
भीष्म सर्वसमर्थ होकर भी युग की सत्ता बदलने में असमर्थ रहे । इस विशाल व्यक्तित्व वाले योद्दा की मौत एक नपुसंक के हाथों से हुई..शायद इसलिए कि उन्होने अन्याय का साथ दिया.. इसलिए उनकी मौत इतनी तकलीफ दय रही... वो भी शिखंडी के रूप में
आज की राजनिति भी ऐसी है ..पर याद रहे जो भी भीष्म बनने की कोशिश कर रहा है उसे उसके नतीजे के लिए तैयार रहना चाहिए..।।

Thursday, April 1, 2010

आज भी इंतज़ार है....

आज भी इंतज़ार है....

किनारों पर बैठ के लहरों का इंतज़ार है
रूठे हुए दोस्त के मुस्कुराने का इंतज़ार है
पंछियों ने भरी अपनी आखिरी उड़ान है
हमको भी अपने घौसले का इंतज़ार है।।

देखो कही उनके सितम कम न हो जाए
हौसले हमारे कहीं पस्त न पड़ जाए
हर के बात पर हर बात का ख्याल है
सपनो की नगरी में सौदागर का इंतज़ार है।।

अब तो हुई देर, अब तो आजाओ
देखो ये कौन सा है देश अब तो आजाओ
यहां पर एक अजब सी ही बात है
हर एक को किसी का इंतज़ार है ।।

लो ये लौ भी बुझा दी
ज़िन्दगी में अपनी अंधेरों को जगह दी
आखें जो झपके कसम तुम्हारी है
किसी बात का शिकवा करूं कसम तुम्हारी है
ये आखिरी पन्ना है कहानी आखिरी है
शान की ज़िन्दगी का ये ही हाल है
सच कहूं तुम्हारा आज भी इंतज़ार है ।।

शान...

Tuesday, March 30, 2010

सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....

सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....

आज न जाने समाज में अकसर कही जाने वाली बात ज़हन में आ रही है कि लड़किया तो पराई होती हैं ।उनको तो चला ही जाना है पर बदलते समाज के साथ लोगों की सोच भी बदली इस मुद्दे पर बहस हुई..और सबने कहा नहीं लड़कियां पराई नहीं होती ।पर जब से ये खबर आई कि सानिया और शौऐब मलिक की शादी हो रही तब से फिर यही बात ज़हन में कौंध रही है ...
सानिया हमारे मुल्क की है इस लिए पहले बात उनकी और उनके इस फैसले की क्या सानिया का ये फैसला सही है?
क्या सानिया की शादी सफल रहेगी?
अब तक के उदाहरण को देखते हुए समाजिक और इंसान के हावभाव को समझने वाले मानते है कि ये शादी सफल नही हो पाएगी ..एक दो या ज्यादा से ज्यादा तीन साल में ये रिश्ता टूट जाएगा और रिश्ता तोड़ने में सानिया को ज़रा सा भी कोई एहसास नही होगा क्योंकि उनके लिए हर रिश्तों को निभाने से ऊपर वो खुद हैं..मतलब वो हर चीज़ में अपने को ज्यादा तरीज़ह देती है बनिस्बत दूसरों कि भावनाओ को.. आप को अगर याद हो पाकिस्तानी औपनर मोहसिन खान रीना रॉय की शादी ..बड़ी धूम धाम से हुई थी पर नतीजा आप लोगो के सामने ,इमरान खान की शादी को देख लिजिए.. नहीं चल पाई और भी कितने उदाहरण है ..क्योकि कुछ वक्त काटना अलग बात है कुछ देर किसी की बातों से मन बहलाना अलग बात है कुछ देर किसी के कंधे पर सर रखना अलग बात है कुछ देर के लिए मुस्कुराना अलग है पर जब शादी होती है तो उसको निभाने के लिए उसके पीछे एक पूरी परंम्परा होती है और परम्परा निभाने के लिए रिश्तों में सब्र की ज़रूरत पड़ती है .चांद औऱ फिज़ा टीवी पर अच्छे लगते हैं पर जब फिज़ा बदलती है तो चांद कहां गायब हो जाता है पता भी नहीं चलता ...
शौऐब मलिक तो वैसे ही बहुत कमज़ोर आदमी है ..वो अपना देश अपना घर ज्यादा देर नहीं छोड़ सकता उस जैसे लड़के आपको दिल्ली के जामा मस्जिद सीलमपुर लखनऊ के चौक बरेली के बाज़ार और हैदराबाद के चार मिनार पर रोज़ खड़े मिल जायेगें.. बस कुछ किसमत शौऐब की अच्छी रही कि खिलाड़ी बन गया और बाद में कप्तान अभी तो बैन है आगे देखिए क्या होता है । इस देश ने सानिया को सब कुछ दिया खुला वातावरण हर चीज़ में इज्ज़त हर बात में साथ हर वक्त मौका । आपको याद होगा हैदराबाद की मस्जिद पर जब सानिया कोई ऐड कर रही तो विवाद हो गया उस वक्त पूरा देश उनके साथ हो गया क्या जब वो पाकिस्तान की बहू बनेगी तो क्या उन्हे इतनी आज़ादी मिले गी.शायद बहुत मुश्किल है सानिया अभी समझ नही रही होगी छोटी छोटी बाते कितना बड़ा फासला खड़ा कर सकती है शायद वो नहीं जानती और वो भी तब जब जिससे वो शादी कर रही है उसमें हिम्मत ही न हो साथ देने की। दुआ तो हम ये ही करेगें कि दोनो की शादी सफल रहे पर उम्मीद कम है ।अंत में ये ही सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....शादी वो भी शौऐब से

Saturday, March 27, 2010

एक कहानी हू मैं

एक कहानी हू मैं

ये कविता मेरे प्रिय मित्र ज्योति त्रिपाठी जी ने भेजी है जिन्हे हम बाबा कहते है॥ अगर पंसद आए तो बाबा के नाम से संदेश भेजें....
अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....
सबको प्यार देने की आदत है हमें,
अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई,
उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
इस अजनबी दुनिया में अकेला ख्वाब हूँ मैं,
सवालो से खफा छोटा सा जवाब हूँ मैं,
जो समझ न सके मुझे,
उनके लिए "कौन"
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं,
आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं,,,,,
"अगर रख सको तो निशानी,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं"....
ज्योति

Monday, March 22, 2010

महिला आरक्षण बिल से लेखक समूह परेशान

महिला आरक्षण बिल से लेखक समूह परेशान

महिला आरक्षण बिल क्या आया और क्या राज्यसभा में पास हुआ कि हिन्दुस्तान में सब की पेशानी पर पसीना आने लगा ..जगह जगह और अलग अलग वर्ग से प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई.. धोती वाले बोले दाढ़ी वाले बोले जवान बोले और अपने को जवान कहलवाने वाले बोले ,,सब ने राग अलापा किसी ने पक्ष में तो किसी विपक्ष में .. कुछ हितों की बात करने लगे और कुछ अहितों .किसको क्या मिलेगा और किससे क्या छिनेगा इस पर देश में बहस गर्म है ...

अब बात करते हैं कि भला लेखकों राईटरों को इससे क्यों हो रही है परेशानी ॥कल शाम कॉफी हाऊस में बैठा था तभी मेरा एक दोस्त आया जो टीवी और फिल्मों में कहानी और संवाद लिखता है ..ब़ड़ा परेशान दिखा मैंने कहा क्या हुआ भाई क्यों इतना दुखी हो वो बोला
यार ये महिला बिल पास नहीं होना चाहिए ...
मैनें कहा क्यों भला तुम क्या परेशानी तुम्हे क्या चुनाव लड़ना है

वो बोला भाई चुनाव नहीं हमें तो लिखना है लिखने से रोटी चलती है हमारी ..
मैने पुछा लिखने का और बिल का क्या संबध॥

उसे गुस्सा आ गया कहने लगा यार टीवी और फिल्मे करैक्टर से आगे चलती है यानी पात्रों से और फिल्म में एक पात्र होता है नेताजी ..जो सफेद लिबास में होगा रंग काला होगा माथे पर टीका लगा कर जनता का खून चूसेगा और अपने क्षेत्र की औरतों और लड़की को अपने घर बुलाएगा .. उनके काम के एवज़ में उनका शारीरिक शोषण करेगा या फिर बलत्कार ही कर देगा फिर उस औरत का बेटा पति या भाई उस नेता कि हत्या करने की कसंम खाएगे देश को इस तरह के नेताओं से आज़ाद करायेगे..और कहानी आगे बढ़ कर खत्म हो जाएगी नेताजी को विदेशी लोगो कुछ नंगी लड़कियों के साथ बेड पर या डांस करते हुए दिखाने से दर्शक सीटी बजाते और फिल्म या सीरीयल चल देता ...पर अब क्या करें अभी तो नेता को सोचे तो बेईमान सफेद लिबास में हैवान देश के गद्दार चोर हरामखोर जैसे शब्दों को आसानी से लिखा जाता रहा है पर आरक्षण के बाद आने वाली जनरेशन को नेता के रूप में औरत ही दिखेगी उसको डायन के रूप में दिखाएगें तो औरत पर बहस करने वाले आगे आ जाएगें और फिर बहस शुरू हो जाएगी कि भई औऱतों का संसद होना भी औरत की दिशा और दशा नहीं बदल पाई ..टीवी और सीरीयल में आज भी औरतो का शोषण जारी है ..बंद करो लिखना मारो लेखक को जला दो उसका लिखा हुआ पोस्टर फाड़ो और सिनेमा हॉल जला दो अब क्या करे लेखक वो तो फंस गया, लग गई वॉट भाई

अभी नहीं समझ रहे लोग जब लिखना पड़ेगा तो कितना सती-सवित्री दिखा सकते हैं लोग औरतो को सतीसावित्री और वो नेता को अच्छे इंसान के रूप में देखना ही पंसद नही करते लोगो के लिए नेता का मतलब ही चोर और बईमान है ...बताओ क्या करें...

मैने कॉफी खत्म की इधर उधर देखा और कहा भई इस पर मैं क्या कहू मैं तो तुम्हारे विचार लोगों तक पहुचा सकता हूं और देखता हूं लोग क्या कहते हैं....

Saturday, March 20, 2010

प्रेम पत्र -5


प्रेम पत्र -5

प्रिय आज फिर तुम को पत्र लिख रहा हूं.. जब भी मन भाव से भर जाता है । शब्द गायब होने लगते हैं ।हलक़ से वाणी नहीं निकल पाती कोई आसपास नहीं होता ।हृदय कि गति तेज़ होने लगती ..आंखों में पानी बहने लगता ..नज़रें कभी इधर कभी उधर घुमने लगती किसी का सामना करने की हिम्मत नही जुटा पाता तब फिर तुम्हारी याद आने लगती है। तुम्हारे दूर जाने का एहसास होने लगता ..मन चिढ़ चिढा हो जाता बार बार झुंझूलाहट होने लगती है। तब किसी अँधेरे कमरे में बैठ कर बड़ा सुकून मिलता ..और उस पल सच कहू तुम्हारे सिवा कोई और नहीं दिखता .. और मन तुम्हे ढ़ूढने के लिए निकल पड़ता ...पर तुम न मिलती, तो ये मन वापस आकर अपना हाल बयान करता ... और उस हाल को शब्द देकर मैं एक पत्र का रूप दे देता ।
मेरी हालत तुम जानो
तुम ही मुझको पहचानो
हर डगर हर पथ
तुम को चाहूं मै
नैनों में
सांसों मे
मेरे रक्त और
रिक्त स्थानों में
तुम्हारी ही तलाश है
तुम्हे पाने की आस है।।

शायद तुम नही हो तभी ये एहसास है अगर तुम होती ..... क्या तब कोई दूसरी बात होती या तब भी मैं अंधेरे कमरो में अपने आप को खोजता रहता है । आज तो तुम्हार बहाना है ..जिससे दुनिया मुहब्बत कहती है वो फसाना है .. पर ठीक है जो है वो मेरा अपना है ..उसी के साथ जी लूंगा तुम को पत्र लिख कर खुश हो लूंगा ... इस उम्मीद के साथ कि पत्र पढ़ कर तुम्हारी आंखे फिर नम होगीं.. तुम फिर थोड़ा ग़मगीन होगी कलम उठाओगी कुछ लिखोगी पर कभी मुझ तक तुम्हारे शब्द तुम्हारे एहसास नही पहुचेगें... पर मैं फिर भी खुश रहूंगा कि तुमने मुझे पढ़ा तो सही ..मुझे समझा तो सही ... फिर कभी दर्द आएगा तो फिर वो एहसास शब्दों में गढ़ दिए जाएंगे अब मन कुछ हल्का हुआ तुम से बात कर के अच्छा लगा ...
तुम्हारा
शान

Saturday, March 13, 2010

मुसलमान औरते सिर्फ बच्चे पैदा करे ..कहने वाले धर्म गुरू को जानिए..



मुसलमान औरते सिर्फ बच्चे पैदा करे ..कहने वाले धर्म गुरू को जानिए..
ये बात कही मौलाना कल्बे जव्वाद ने..
कल्बे जव्वाद लखनऊ में रहते है ।महिला आरक्षण के बाद से उनके औरतों के विरोध में बयान आना शुरू हुए। पहले एक टीवी चैनल पर उन्होने कहा औरतों को चुनाव के दौरान लोगों से मिलना होगा भीड़ में जाना होगा जिसकी इस्लाम इजाज़त नहीं देता इसलिए राजनीति में आना इस्लाम के खिलाफ है । इस पर यूपी सरकार और मुलायम सिंह ने उनकी पीट थपथपाई तो उनमें और हिम्मत आ गई और कहे डाला औरतों का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना है वो वही करें ..राजनीति में आ कर क्या करें गी।
मौलाना सहाब अभी तो मुस्लमान औरतों को आरक्षण मिले गा या नहीं इस पर ही बहस हो रही है उस पर आप इस्लाम की दुहाई देकर उन लोगों का हाथ मज़बूत कर रहे हैं जो चाहते ही नहीं कि आपकी कौम आगे बढ़े.. और हमे लगता है आप भी नहीं चाहते कि कौम आगे बढ़े..तभी तो आपकी दुकान भी चलती रहे गी ..विदेशों से गरीब कम पढ़े लिखे लोगों के लिए पैसा आता रहे गा और आपकी तोंद मोटी होती रहे गी ।जिस प्रदेश में आप रहते हैं वहां तो वैसे ही इस बिल का पास होना मुश्किल है और लगता है आपको भी मोटी रकम पहुंच चुकी है तभी इस्लाम की आड़ लेकर आप अपनी राजनीति की ज़मीन तैयार कर रहे हैं.।
जी ये मौलाना साहब खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं और अपनी पार्टी भी बनाने की फिराक में है या फिर बना भी ली होगी ऐसे में जिसकी खुद की राजनीतिक ज़मीन कमज़ोर हो वो कैसे बर्दाशत कर सकता है कि उसकी कौम की औरत राजनीति में आगे आए।
आपके के घर की औरते कहां कहां है वो भी आप लोगों को बताए तो शायद आपकी मंशा साफ दिखे कि ये किसी धर्मगुरू का बयान नहीं किसी राजनीतिज्ञ का बयान है ।
लोगो को बताता चलू अभिषेक की शादी में एक औरत ने सबकी नाक में दम कर दिया था हाथ काटना और अभिषेक से शादी करने में आमादा थी ये घटना आप लोगो के ज़हन में होगी ..वो औरत कोई और नही मौलाना साहब कि रिश्तेदार ही थी ... मौलाना साहब के खानदान की औऱते हिन्दुस्तान मे काफी ऊंचे और महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं । इससे ये बात तो साफ होती है कि मौलाना साहब की अपने घर में तो चलती नहीं ..हां राजनीति में अपने को चलाने के लिए इस तरह के छोटे बयान देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ।
मौलाना साहब आप इस्लाम को ज्यादा जानते हैं तारीखों को भी ..मैं आपको राजिया सुलतान और बेगम हजरत महल का उदाहरण नहीं दूंगा ।

मैं आपसे जानना चाहूगां मौहम्मद साहब(स.व) की बीवी क्या तीजारत नहीं करती थी उस वक्त की बिज़नेस वुमैन नहीं थी ..तो बिज़नेस बिना लोगों से मिले होता है । शायद बीबी आय़शा की जंग को आप न माने पर कर्बला में इमाम हुसैन(स.व) के बाद इस्लाम का परचम बीबी जैनब ने ही उठाया था और आज जो इस्लाम है ज़िदा है वो बीवी जैनब के बयानो की बदौलत ही । आप जैसे मुलानाओ ने हमेशा से तारीखों को अपने हिसाब से सुनाया और बताया है । और इरान में क्या क्या होता है अगर इसकी आप बात न करें तो बेहतर होगा ।
हिन्दुस्तान में कौंम बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है ..मुस्लमान आदमियों को अपने हक अपनी पहचान के लिए संधर्ष करना पड रहा है औरतों के हक और हूकूक की बात तो बहुत दूर है ।आपको राजनीति दलों की चमचागिरी करनी है तो किसी और तरीके से करें ।कौंम आपकी शुक्रगुज़ार होगी कि आप कौम के उलेमा ही रहे नेता न बने।।

Friday, March 12, 2010

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी
शरद जोशी की कहानी पर फिल्म बनी आईये आपको कहानी पढ़ाते हैं।तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी शरद जोशी की मशहूर कहानी ....

आज तुम्हारे आगमन के चुतर्थ दिवस पर यह प्रशन बार बार मन में घुमड़ रहा है –तुम कब जाओगे.अतिथि...
तुम जहां बैठे निस्संकोच सिगरेट का धुआं फेंक रहे हो ,उसके ठीक सामने एक कलैंडर है देख रहे हो न तुम..इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ाती रहती हैं विगत दो दिन से मैं तुम्हे दिखाकर तारीखें बदल रहा हूं तुम जानते हो ,अगर तुम्हे हिसाब लगाना आता है कि यह चौथा दिन है ,तुम्हारे सतत अतिथ्य का चौथा भारी दिन पर तुम्हारे जाने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वो दोनो एस्ट्रॉनाट्स भी इतने समय चांद पर नहीं रूके थे,जितने समय तुम एक छोटी सी यात्रा कर मेरे घर आए हो . तुम अपने भारी चरण कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकीत कर चुके ,तुमने एक अंतरंग निजी संबधं मुझसे स्थापित कर लिया , तुमने मेरी आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान देख ली , तुम मेरी काफी मिट्टी खोद चुके . अब तुम लौट जाओ,अतिथि तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है । क्या तुम्हे तुम्हारी पृथ्ती नहीं पुकारती
उस दिन तुम आए थे मेरा हृदय अज्ञात आशंका से धडक उठा था .... अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ कांप गया उसके बावजूद एक स्नेह भीगी मुस्कुराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला था और मेरी पत्नी ने तुम्हे सादर नम्सते किया था ...तुम्हारे सम्मान में ओ अतिथि हमने रात के भोजन को एका एक उच्च मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया था...तुम्हे स्मरण होगा कि दो सब्जियों और रायते के अलावा हमने मीठा भी बनाया था इस सारे उत्साह और लगन के मूल मे एक आशा थी । आशा थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमान नवाज़ी की छाप अपने हृदय मे ले तुम चले जाओगे। हम तुम से रुकने के लिए आग्रह करेंगे लेकिन तुम नहीं मानोगे औऱ एक अच्छे अतिथी की तरह चले जाओगे...पर ऐसा नही हुआ। दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथी सुलभ मुस्कान लिए घर मे ही बने रहे । हमने अपनी पीड़ा पी ली। और प्रसन्न बने रहे । स्वागत सत्कार कि जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हे ले जा चुके थे..वहां से नीचे उतर हमने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को तुम्हे सिनेमा दिखाया । हमारा सतकार का ये आखिरी छोर है जिससे आगे हम किसी के लिए नही बढ़े । इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाई का वह भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था जब तुम विदा होते और हम तुम्हे स्टेशन तक छोड़ने जाते पर तुमने ऐसा नहीं किया।
तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझ से कहा मै धोबी को कपड़े देना चाहता हूं। ये आघात अप्रत्याशित था और इसकी चोट मार्मिक थी। तुम्हारे सामिप्य की वेला एकाएक यूं रबड़ की तरह खिंच जाएगी इसका मुझे अनुमान ना था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथी सदैव देवता नहीं होता . वह मानव और थोडे़ अंशो में राक्षस भी हो सकता हैं।
किसी लॉंड्री पर दे देते हैं जल्दी धुल जाएंगे .. मैने क्हा, मन ही मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हे जल्दी जाना है। क्हा हैं लॉंड्री चलो चलते हैं मैने कहां और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक कुर्ता डालने लगा. कहा जा रहे हो पत्नी ने पूछा। इनके कपड़े लॉंड्री पर देने हैं मैने क्हा। मेरी पत्नी की आंखे एकाएक बड़ी बड़ी हो गई. आजसे कुछ बरस पूर्व उनकी आंखे देख मैने अपने अकेलेपन की य़ात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिय़ा था पर अब जब वे ही आंखे बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता हैं। वे इस आशंका और भय से बड़ी होती थी कि अतिथी अधिक दिन ठहरेगा। और आशंका निर्मूल नहीं थी अतिथी तुम जा नही रहे लॉंड्री पर दिए कपड़े धुल कर आ गए और तुम यही हो। तु्म्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यही हों. तुम्हे देख कर फूट पड़ने वाली मुस्कुराहट धीरे धीरे फीकी पड़ कर अब लुप्त हो गई हैं.ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते बातचीत की उछलती हुई गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनलों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुप पड़ी है अब इसे न तुम हिला रहे हो ,न मैं कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूं और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो .शब्दों का लेन देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए परिवार बच्चे नौकरी फिल्म राजनीति रिश्तेदारी तबादले पुराने दोस्त परिवार नियोजन मंहगाई,साहित्य और यहां तक कि आंख मार-मारकर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है सौहार्द अब शनै-शनै बोरियत में रूपांतरित हो रहा है . भावनाए गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही है पर तुम जा नहीं रहे किस अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्तित्व यहां चिपक गया है मैं इस भेद को सपरिवार नहीं समझ पा रहा हूं बार बार यह प्रशन उठ रहा है – तुम कब जाओगे,अतिथि कल पत्नी ने धीरे से पूछा था ,कब तक चिकेंगे ये मैंने कंधे उचका दिए,क्या कह सकता हूं
मैं तो आज खिचड़ी बना रही हूं हलकी रहे गी बनाओ
सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी डिनर से चले थे खिचड़ी पर आ गए अब भी अगर तुम अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमे उपवास तक जाना होगा । तुम्हारे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं ।तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है तुम जाओ न अतिथि
तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है न मैं जानता हूं दूसरों के यहां अच्छा लगता है । अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहां रहते पर ऐसा नहीं हो सकता । अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं ।होम को इसी कारण स्वीट होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस की काटने न दौड़े तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है सोचो प्रिय कि शराफ़त भी कोई चीज़ होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है ,जो बोला जा सकता है ।
अपने खर्राटों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी वह तुम्हारे यहां आगमन के बाद पांचवें सूर्य़ की परिचित किरण होगी ही।आशा है , वह तुम्हे चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मनापूर्ण निर्णय ले लोगे मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी । उसके बाद मैं स्टैंड़ नहीं कर सकूंगा और लड़खड़ा जाऊंगा । मेरे अतिथि ,मैं जानता हूं कि अतिथि देवता होता है ,पर आखिर मैं भी मनुष्य हूं । मैं कोई तुमारी तरह देवता नहीं ।एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते ।देवता दर्शन देकर लौट जाता है । तुम लौट जाओ अतिथि इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा ।ये मनुष्य अपनी वाली पर उतरे उसके पूर्व तुम लौट जाओ उफ तुम कब जाओगे अतिथि .....

शरद जोशी (१९३१-१९९१)

Wednesday, March 10, 2010

33 प्रतिक्षत में आम मुस्लमान औरतों के हिस्से क्या... कुछ नहीं..

33 प्रतिक्षत में आम मुस्लमान औरतों के हिस्से क्या... कुछ नहीं..

सहारनपुर के पास गांव कैलाशपुर की रहने वाली नसीमा रोज़ अपने शौहर नसीम से पिटती है ..कारण नसीमा को नेता बनने का शौक था ..कहीं कुछ होता खड़ी हो जाती हर बात में हर एक से उलझ पड़ती ..बड़े बड़े अफसर से लौहा लेने में पीछे नहीं रहती नसीम जब शहर से लौटता तो पुलिया पर ही कोई न कोई मिल कर कहे ही देता आज तेरी लुगाई ने ये किया भई इंदीरा बने गई वो तो,...नसीम को बात गवारा नही होती घर में कदम रखते ही बस नसींमा की कुटाई शुरू.. मारते मारते कहता अरे तुझे कोई टिकट न देगा..बस हमारी रूसवाई ही कराती रहे ..नसींमा सोचती देश बदल रहा औरते आगे आ रही हैं हमारी कौम की औरतों के लिए भी आवाज़ उठेगी कोई उनके लिए भी बोलेगा हमारे देश की सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्ष, सभापति नेताविपक्ष,राष्ट्रपति सब तो औरते हैं फिर मैं क्यों नही.. नसीमा की बात सही थी वो क्यों नहीं.. पर वो जिनका उसने नाम लिया उनमे से कोई आम औरत नहीं है और कोई मुस्लमान नहीं है जो वो है .. नसीमा औऱ उसकी कौम की औरतों की आखिरी उम्मीद, महिला आरक्षण बील में उनके लिए कुछ नहीं है..और ये सच है

15वीं लोकसभा के 543 सांसदो में से केवल तीन मुस्लिम औरतें हैं मौसम नूर, कैसर जहां और तबस्सुम बेगम
62 साल के इतिहास है कि 3 से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं को कभी जगह नही मिली है बल्कि 5 लोकसभा में तो एक भी मुस्लिम औरत को जगह नही मिल पाई जबकि तीन लोकसभा में एक ही मुस्लिम औऱत सासद बनी। तीन बार ही केवल दो दो मुस्लिम महिला सांसद चुनी गई और तीन बार ही तीन मुस्लिम औरते संसद पहुची हैं।
और क्या आप जानते हैं 15 लोकसभा में सिर्फ और सिर्फ दो बार ही ऐसा हुआ है जब 50 से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं ने चुनाव लड़ा ।
इस बार 556 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा जिनमें से मात्र 59 मुस्लिम औरते थी और एक बात आप को और बता दे जिनमे से 13 सीटे बीजेपी ने दी है और 23 काग्रेस ने मुलायम और लालू ने अपने घर की औरतों को ही टिकट दिया है ज्यादातर।
एक और चौकाने वाला आकड़ा जिन भी औरतो को टिकट दिया गया उनमे से कोई भी आम सधारण मुस्लमान परिवार से नहीं है ज्यादातरों का सियासी और पूजीपति परिवारों से रिशता है।

तो आम रोज़ त़ड़पने और मरने वाली मुस्लमान औरते केवल गुडिया, शाहबानो के नाम से ही पैदा होगीं जीये गई और वैसे ही किसी बदनामी के साथ इस दुनिया से रूखस्त हो जाएगी .. और जबतक आम मुस्लमान औरत को विकास और मुख्यधारा में शरीक नहीं किया जाएगा तब तक मुस्लिम समुदाय पिछड़ा ही रहेगा ।
क्यो इतना भेदभाव है और कब तक ये भेदभाव रहेगा .. आज सोनिया गांधी खुश है औऱतो के हक के लिए पर वो हक केवल एक जाति कि औरतो के लिए ही क्यों ....
कहा जा रहा किस पार्टी को मना किया गया है कि वो मुस्लमान औरतों को टिकट न दे। शायद वो भूल गई देश के वोट समीकरण को । भले यहां सब एकजुटता की बात करे पर वोट जाति और धर्म के नाम पर ही पड़ते हैं.. और जब दिल्ली जैसे शहर में कोई मुस्लिम पुरूष सांसद नही जीतता .जीतने की बात दूर टिकट ही नहीं मिलता तो मुस्लिम महिला हिन्दु बहुल इलाके और हिन्दू विरोधी से जीते गी ये सोचना भी बइमानी है.. इस 33 प्रतिक्षत में आम मुसलमान औरतों के लिए कुछ नहीं है.
नसीमा का सपना टूट गया कलावती केवल कविता के लिए है उसकी ज़िन्दगी की कहानी बन सकती है सहानुभति मिल सकती है पर कल को खुद वो किसी के लिए कुछ करे ये इस समाज को मंजूर नहीं.. नसीमा समझ जाएगी और अपनी दूसरी बहनो को भी समझा देगी ..संसद न पहुच सकी खुद तो क्या सांसदो की रैलियों में भीड तो जुटा ही देगी जो इस देश में मुस्लमानो की असली जगह है और उनकी पहचान भी ,केवल भीड भीड़ और बस भीड़ .... ।।