Tuesday, February 16, 2010

सिर्फ 1411 .... हम शर्मिदा है...

सिर्फ 1411 .... हम शर्मिदा है...

वो गरजता था तो बिजली चमकती थी
वो चलता था तो हवा रूक जाती थी
उसके रंग से रोशनी शर्माती थी
उसकी धारियों से घटा को रशक होता था
उसकी आंखो से डर भी डरता था
उसके दांतो में धार थी
उसके नाखूनो में पकड़ थी
इसकी जकड़ से बच पाना मुश्किल था
पर वो ज़ालिम नहीं था
वो मश्कत करना जानता था
अपना पेट भरना जानता था
इस दुनिया को बनाने वाले के नियम जानता था
अपने घर में रहना जानता था
इस का बहुत बड़ा कुनबा था
खुश थे सब जब साथ थे
लेकिन न जाने किसकी इनको नज़र लग गई
एक दिन एक बड़े हैवान ने देख लिया
जिसे इंसान कहते हैं उस शैतान ने देख लिया
घर उजाडना शुरू कर दिया
कुनबे को खत्म करना शुरू कर दिया
एक एक को मारना शुरू कर दिया
इनको मार कर वाह वाही लूटी
आलीशान बंगलो में लटका कर शान समझी
आगे की नस्लो को क्या बताएगे ये बात न समझी
अभी भी वक्त है
संभल जाना चाहिए
1411 सिर्फ बचे है
इन्हे संभालना चाहिए

हे बाघ हम शर्मिदा है
अपनी भूल को हम सुधारेगे
1411 से और आगे ले जाएगे...
हम इस प्रयास को ज़रूर सफल बनाएगे।।
शान

7 comments:

अमित जैन (जोक्पीडिया ) said...

बहुत बदिया

Udan Tashtari said...

बाघ एवं अन्य विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण जरुरी है.

RAJNISH PARIHAR said...

बाघों के सरंक्षण हेतु ठोस प्रयास अब जरूरी है....बहुत बदिया!!

aruna kapoor 'jayaka' said...

kavita ke maadhyam se sachchaai ujaagar ki gai hai!...Dhanyawaad!

rahul pandit said...

achchha kam kar rahe ho

Yusuf Kirmani said...

इससे ज्यादा बेहतर ढंग से इस मुद्दे को नहीं उठाया जा सकता था। आपको बधाई। क्या आपने पुणे ब्लॉस्ट पर द हिंदू अखबार की सनसनीखेज रिपोर्ट देखी...अगर नहीं देखी है तो कृपया मेरे ब्लॉग पर वह पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

Manish said...

Very good, Keep it up!!