Monday, February 15, 2010

अब क्या देखें राह तुम्हारी (फैज़ अहमद फैज़)

अब क्या देखें राह तुम्हारी (फैज़ अहमद फैज़)

अब क्या देखे राह तुम्हारी
बीत चली है रात
छोड़ो
छोड़ो ग़म की बात
थम गये आंसू
थक गई अंखियां
गुज़र गई बरसात
बीत चली है रात

छोड़ो
छोड़ो ग़म की बात
कब से आस लगी दर्शन की
कोई न जाने बात
बीत चली है रात

छोड़ो गम की बात
तुम आओ तो मन मे उतरे
फूलो की बारात
बीत चली है रात


अब क्या देखे राह तुम्हारी
बीत चली है रात

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सुन्दर नज्म पढ़वाने के लिये धन्यवाद.

Kaviraaj said...

बहुत अच्छा ।

अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानियां, नाटक मुफ्त डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया किताबघर से डाउनलोड करें । इसका पता है:

http://Kitabghar.tk

Dr.R.Ramkumar said...

अब क्या देखे राह तुम्हारी
बीत चली है रात
छोड़ो
छोड़ो ग़म की बात
थम गये आंसू
थक गई अंखियां
गुज़र गई बरसात
बीत चली है रात


बेहद अवसाद और किंकर्तव्यविमूढावस्था भी घेरती है शायरों को ,क्या करें इंसान जो ठहरे...