Tuesday, March 30, 2010

सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....

सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....

आज न जाने समाज में अकसर कही जाने वाली बात ज़हन में आ रही है कि लड़किया तो पराई होती हैं ।उनको तो चला ही जाना है पर बदलते समाज के साथ लोगों की सोच भी बदली इस मुद्दे पर बहस हुई..और सबने कहा नहीं लड़कियां पराई नहीं होती ।पर जब से ये खबर आई कि सानिया और शौऐब मलिक की शादी हो रही तब से फिर यही बात ज़हन में कौंध रही है ...
सानिया हमारे मुल्क की है इस लिए पहले बात उनकी और उनके इस फैसले की क्या सानिया का ये फैसला सही है?
क्या सानिया की शादी सफल रहेगी?
अब तक के उदाहरण को देखते हुए समाजिक और इंसान के हावभाव को समझने वाले मानते है कि ये शादी सफल नही हो पाएगी ..एक दो या ज्यादा से ज्यादा तीन साल में ये रिश्ता टूट जाएगा और रिश्ता तोड़ने में सानिया को ज़रा सा भी कोई एहसास नही होगा क्योंकि उनके लिए हर रिश्तों को निभाने से ऊपर वो खुद हैं..मतलब वो हर चीज़ में अपने को ज्यादा तरीज़ह देती है बनिस्बत दूसरों कि भावनाओ को.. आप को अगर याद हो पाकिस्तानी औपनर मोहसिन खान रीना रॉय की शादी ..बड़ी धूम धाम से हुई थी पर नतीजा आप लोगो के सामने ,इमरान खान की शादी को देख लिजिए.. नहीं चल पाई और भी कितने उदाहरण है ..क्योकि कुछ वक्त काटना अलग बात है कुछ देर किसी की बातों से मन बहलाना अलग बात है कुछ देर किसी के कंधे पर सर रखना अलग बात है कुछ देर के लिए मुस्कुराना अलग है पर जब शादी होती है तो उसको निभाने के लिए उसके पीछे एक पूरी परंम्परा होती है और परम्परा निभाने के लिए रिश्तों में सब्र की ज़रूरत पड़ती है .चांद औऱ फिज़ा टीवी पर अच्छे लगते हैं पर जब फिज़ा बदलती है तो चांद कहां गायब हो जाता है पता भी नहीं चलता ...
शौऐब मलिक तो वैसे ही बहुत कमज़ोर आदमी है ..वो अपना देश अपना घर ज्यादा देर नहीं छोड़ सकता उस जैसे लड़के आपको दिल्ली के जामा मस्जिद सीलमपुर लखनऊ के चौक बरेली के बाज़ार और हैदराबाद के चार मिनार पर रोज़ खड़े मिल जायेगें.. बस कुछ किसमत शौऐब की अच्छी रही कि खिलाड़ी बन गया और बाद में कप्तान अभी तो बैन है आगे देखिए क्या होता है । इस देश ने सानिया को सब कुछ दिया खुला वातावरण हर चीज़ में इज्ज़त हर बात में साथ हर वक्त मौका । आपको याद होगा हैदराबाद की मस्जिद पर जब सानिया कोई ऐड कर रही तो विवाद हो गया उस वक्त पूरा देश उनके साथ हो गया क्या जब वो पाकिस्तान की बहू बनेगी तो क्या उन्हे इतनी आज़ादी मिले गी.शायद बहुत मुश्किल है सानिया अभी समझ नही रही होगी छोटी छोटी बाते कितना बड़ा फासला खड़ा कर सकती है शायद वो नहीं जानती और वो भी तब जब जिससे वो शादी कर रही है उसमें हिम्मत ही न हो साथ देने की। दुआ तो हम ये ही करेगें कि दोनो की शादी सफल रहे पर उम्मीद कम है ।अंत में ये ही सानिया मिर्ज़ा ने सब कुछ पा कर भी क्या किया....शादी वो भी शौऐब से

Saturday, March 27, 2010

एक कहानी हू मैं

एक कहानी हू मैं

ये कविता मेरे प्रिय मित्र ज्योति त्रिपाठी जी ने भेजी है जिन्हे हम बाबा कहते है॥ अगर पंसद आए तो बाबा के नाम से संदेश भेजें....
अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....
सबको प्यार देने की आदत है हमें,
अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई,
उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
इस अजनबी दुनिया में अकेला ख्वाब हूँ मैं,
सवालो से खफा छोटा सा जवाब हूँ मैं,
जो समझ न सके मुझे,
उनके लिए "कौन"
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं,
आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं,,,,,
"अगर रख सको तो निशानी,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं"....
ज्योति

Monday, March 22, 2010

महिला आरक्षण बिल से लेखक समूह परेशान

महिला आरक्षण बिल से लेखक समूह परेशान

महिला आरक्षण बिल क्या आया और क्या राज्यसभा में पास हुआ कि हिन्दुस्तान में सब की पेशानी पर पसीना आने लगा ..जगह जगह और अलग अलग वर्ग से प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई.. धोती वाले बोले दाढ़ी वाले बोले जवान बोले और अपने को जवान कहलवाने वाले बोले ,,सब ने राग अलापा किसी ने पक्ष में तो किसी विपक्ष में .. कुछ हितों की बात करने लगे और कुछ अहितों .किसको क्या मिलेगा और किससे क्या छिनेगा इस पर देश में बहस गर्म है ...

अब बात करते हैं कि भला लेखकों राईटरों को इससे क्यों हो रही है परेशानी ॥कल शाम कॉफी हाऊस में बैठा था तभी मेरा एक दोस्त आया जो टीवी और फिल्मों में कहानी और संवाद लिखता है ..ब़ड़ा परेशान दिखा मैंने कहा क्या हुआ भाई क्यों इतना दुखी हो वो बोला
यार ये महिला बिल पास नहीं होना चाहिए ...
मैनें कहा क्यों भला तुम क्या परेशानी तुम्हे क्या चुनाव लड़ना है

वो बोला भाई चुनाव नहीं हमें तो लिखना है लिखने से रोटी चलती है हमारी ..
मैने पुछा लिखने का और बिल का क्या संबध॥

उसे गुस्सा आ गया कहने लगा यार टीवी और फिल्मे करैक्टर से आगे चलती है यानी पात्रों से और फिल्म में एक पात्र होता है नेताजी ..जो सफेद लिबास में होगा रंग काला होगा माथे पर टीका लगा कर जनता का खून चूसेगा और अपने क्षेत्र की औरतों और लड़की को अपने घर बुलाएगा .. उनके काम के एवज़ में उनका शारीरिक शोषण करेगा या फिर बलत्कार ही कर देगा फिर उस औरत का बेटा पति या भाई उस नेता कि हत्या करने की कसंम खाएगे देश को इस तरह के नेताओं से आज़ाद करायेगे..और कहानी आगे बढ़ कर खत्म हो जाएगी नेताजी को विदेशी लोगो कुछ नंगी लड़कियों के साथ बेड पर या डांस करते हुए दिखाने से दर्शक सीटी बजाते और फिल्म या सीरीयल चल देता ...पर अब क्या करें अभी तो नेता को सोचे तो बेईमान सफेद लिबास में हैवान देश के गद्दार चोर हरामखोर जैसे शब्दों को आसानी से लिखा जाता रहा है पर आरक्षण के बाद आने वाली जनरेशन को नेता के रूप में औरत ही दिखेगी उसको डायन के रूप में दिखाएगें तो औरत पर बहस करने वाले आगे आ जाएगें और फिर बहस शुरू हो जाएगी कि भई औऱतों का संसद होना भी औरत की दिशा और दशा नहीं बदल पाई ..टीवी और सीरीयल में आज भी औरतो का शोषण जारी है ..बंद करो लिखना मारो लेखक को जला दो उसका लिखा हुआ पोस्टर फाड़ो और सिनेमा हॉल जला दो अब क्या करे लेखक वो तो फंस गया, लग गई वॉट भाई

अभी नहीं समझ रहे लोग जब लिखना पड़ेगा तो कितना सती-सवित्री दिखा सकते हैं लोग औरतो को सतीसावित्री और वो नेता को अच्छे इंसान के रूप में देखना ही पंसद नही करते लोगो के लिए नेता का मतलब ही चोर और बईमान है ...बताओ क्या करें...

मैने कॉफी खत्म की इधर उधर देखा और कहा भई इस पर मैं क्या कहू मैं तो तुम्हारे विचार लोगों तक पहुचा सकता हूं और देखता हूं लोग क्या कहते हैं....

Saturday, March 20, 2010

प्रेम पत्र -5


प्रेम पत्र -5

प्रिय आज फिर तुम को पत्र लिख रहा हूं.. जब भी मन भाव से भर जाता है । शब्द गायब होने लगते हैं ।हलक़ से वाणी नहीं निकल पाती कोई आसपास नहीं होता ।हृदय कि गति तेज़ होने लगती ..आंखों में पानी बहने लगता ..नज़रें कभी इधर कभी उधर घुमने लगती किसी का सामना करने की हिम्मत नही जुटा पाता तब फिर तुम्हारी याद आने लगती है। तुम्हारे दूर जाने का एहसास होने लगता ..मन चिढ़ चिढा हो जाता बार बार झुंझूलाहट होने लगती है। तब किसी अँधेरे कमरे में बैठ कर बड़ा सुकून मिलता ..और उस पल सच कहू तुम्हारे सिवा कोई और नहीं दिखता .. और मन तुम्हे ढ़ूढने के लिए निकल पड़ता ...पर तुम न मिलती, तो ये मन वापस आकर अपना हाल बयान करता ... और उस हाल को शब्द देकर मैं एक पत्र का रूप दे देता ।
मेरी हालत तुम जानो
तुम ही मुझको पहचानो
हर डगर हर पथ
तुम को चाहूं मै
नैनों में
सांसों मे
मेरे रक्त और
रिक्त स्थानों में
तुम्हारी ही तलाश है
तुम्हे पाने की आस है।।

शायद तुम नही हो तभी ये एहसास है अगर तुम होती ..... क्या तब कोई दूसरी बात होती या तब भी मैं अंधेरे कमरो में अपने आप को खोजता रहता है । आज तो तुम्हार बहाना है ..जिससे दुनिया मुहब्बत कहती है वो फसाना है .. पर ठीक है जो है वो मेरा अपना है ..उसी के साथ जी लूंगा तुम को पत्र लिख कर खुश हो लूंगा ... इस उम्मीद के साथ कि पत्र पढ़ कर तुम्हारी आंखे फिर नम होगीं.. तुम फिर थोड़ा ग़मगीन होगी कलम उठाओगी कुछ लिखोगी पर कभी मुझ तक तुम्हारे शब्द तुम्हारे एहसास नही पहुचेगें... पर मैं फिर भी खुश रहूंगा कि तुमने मुझे पढ़ा तो सही ..मुझे समझा तो सही ... फिर कभी दर्द आएगा तो फिर वो एहसास शब्दों में गढ़ दिए जाएंगे अब मन कुछ हल्का हुआ तुम से बात कर के अच्छा लगा ...
तुम्हारा
शान

Saturday, March 13, 2010

मुसलमान औरते सिर्फ बच्चे पैदा करे ..कहने वाले धर्म गुरू को जानिए..



मुसलमान औरते सिर्फ बच्चे पैदा करे ..कहने वाले धर्म गुरू को जानिए..
ये बात कही मौलाना कल्बे जव्वाद ने..
कल्बे जव्वाद लखनऊ में रहते है ।महिला आरक्षण के बाद से उनके औरतों के विरोध में बयान आना शुरू हुए। पहले एक टीवी चैनल पर उन्होने कहा औरतों को चुनाव के दौरान लोगों से मिलना होगा भीड़ में जाना होगा जिसकी इस्लाम इजाज़त नहीं देता इसलिए राजनीति में आना इस्लाम के खिलाफ है । इस पर यूपी सरकार और मुलायम सिंह ने उनकी पीट थपथपाई तो उनमें और हिम्मत आ गई और कहे डाला औरतों का काम सिर्फ बच्चे पैदा करना है वो वही करें ..राजनीति में आ कर क्या करें गी।
मौलाना सहाब अभी तो मुस्लमान औरतों को आरक्षण मिले गा या नहीं इस पर ही बहस हो रही है उस पर आप इस्लाम की दुहाई देकर उन लोगों का हाथ मज़बूत कर रहे हैं जो चाहते ही नहीं कि आपकी कौम आगे बढ़े.. और हमे लगता है आप भी नहीं चाहते कि कौम आगे बढ़े..तभी तो आपकी दुकान भी चलती रहे गी ..विदेशों से गरीब कम पढ़े लिखे लोगों के लिए पैसा आता रहे गा और आपकी तोंद मोटी होती रहे गी ।जिस प्रदेश में आप रहते हैं वहां तो वैसे ही इस बिल का पास होना मुश्किल है और लगता है आपको भी मोटी रकम पहुंच चुकी है तभी इस्लाम की आड़ लेकर आप अपनी राजनीति की ज़मीन तैयार कर रहे हैं.।
जी ये मौलाना साहब खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं और अपनी पार्टी भी बनाने की फिराक में है या फिर बना भी ली होगी ऐसे में जिसकी खुद की राजनीतिक ज़मीन कमज़ोर हो वो कैसे बर्दाशत कर सकता है कि उसकी कौम की औरत राजनीति में आगे आए।
आपके के घर की औरते कहां कहां है वो भी आप लोगों को बताए तो शायद आपकी मंशा साफ दिखे कि ये किसी धर्मगुरू का बयान नहीं किसी राजनीतिज्ञ का बयान है ।
लोगो को बताता चलू अभिषेक की शादी में एक औरत ने सबकी नाक में दम कर दिया था हाथ काटना और अभिषेक से शादी करने में आमादा थी ये घटना आप लोगो के ज़हन में होगी ..वो औरत कोई और नही मौलाना साहब कि रिश्तेदार ही थी ... मौलाना साहब के खानदान की औऱते हिन्दुस्तान मे काफी ऊंचे और महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं । इससे ये बात तो साफ होती है कि मौलाना साहब की अपने घर में तो चलती नहीं ..हां राजनीति में अपने को चलाने के लिए इस तरह के छोटे बयान देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ।
मौलाना साहब आप इस्लाम को ज्यादा जानते हैं तारीखों को भी ..मैं आपको राजिया सुलतान और बेगम हजरत महल का उदाहरण नहीं दूंगा ।

मैं आपसे जानना चाहूगां मौहम्मद साहब(स.व) की बीवी क्या तीजारत नहीं करती थी उस वक्त की बिज़नेस वुमैन नहीं थी ..तो बिज़नेस बिना लोगों से मिले होता है । शायद बीबी आय़शा की जंग को आप न माने पर कर्बला में इमाम हुसैन(स.व) के बाद इस्लाम का परचम बीबी जैनब ने ही उठाया था और आज जो इस्लाम है ज़िदा है वो बीवी जैनब के बयानो की बदौलत ही । आप जैसे मुलानाओ ने हमेशा से तारीखों को अपने हिसाब से सुनाया और बताया है । और इरान में क्या क्या होता है अगर इसकी आप बात न करें तो बेहतर होगा ।
हिन्दुस्तान में कौंम बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है ..मुस्लमान आदमियों को अपने हक अपनी पहचान के लिए संधर्ष करना पड रहा है औरतों के हक और हूकूक की बात तो बहुत दूर है ।आपको राजनीति दलों की चमचागिरी करनी है तो किसी और तरीके से करें ।कौंम आपकी शुक्रगुज़ार होगी कि आप कौम के उलेमा ही रहे नेता न बने।।

Friday, March 12, 2010

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी
शरद जोशी की कहानी पर फिल्म बनी आईये आपको कहानी पढ़ाते हैं।तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी शरद जोशी की मशहूर कहानी ....

आज तुम्हारे आगमन के चुतर्थ दिवस पर यह प्रशन बार बार मन में घुमड़ रहा है –तुम कब जाओगे.अतिथि...
तुम जहां बैठे निस्संकोच सिगरेट का धुआं फेंक रहे हो ,उसके ठीक सामने एक कलैंडर है देख रहे हो न तुम..इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ाती रहती हैं विगत दो दिन से मैं तुम्हे दिखाकर तारीखें बदल रहा हूं तुम जानते हो ,अगर तुम्हे हिसाब लगाना आता है कि यह चौथा दिन है ,तुम्हारे सतत अतिथ्य का चौथा भारी दिन पर तुम्हारे जाने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वो दोनो एस्ट्रॉनाट्स भी इतने समय चांद पर नहीं रूके थे,जितने समय तुम एक छोटी सी यात्रा कर मेरे घर आए हो . तुम अपने भारी चरण कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकीत कर चुके ,तुमने एक अंतरंग निजी संबधं मुझसे स्थापित कर लिया , तुमने मेरी आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान देख ली , तुम मेरी काफी मिट्टी खोद चुके . अब तुम लौट जाओ,अतिथि तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है । क्या तुम्हे तुम्हारी पृथ्ती नहीं पुकारती
उस दिन तुम आए थे मेरा हृदय अज्ञात आशंका से धडक उठा था .... अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ कांप गया उसके बावजूद एक स्नेह भीगी मुस्कुराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला था और मेरी पत्नी ने तुम्हे सादर नम्सते किया था ...तुम्हारे सम्मान में ओ अतिथि हमने रात के भोजन को एका एक उच्च मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया था...तुम्हे स्मरण होगा कि दो सब्जियों और रायते के अलावा हमने मीठा भी बनाया था इस सारे उत्साह और लगन के मूल मे एक आशा थी । आशा थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमान नवाज़ी की छाप अपने हृदय मे ले तुम चले जाओगे। हम तुम से रुकने के लिए आग्रह करेंगे लेकिन तुम नहीं मानोगे औऱ एक अच्छे अतिथी की तरह चले जाओगे...पर ऐसा नही हुआ। दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथी सुलभ मुस्कान लिए घर मे ही बने रहे । हमने अपनी पीड़ा पी ली। और प्रसन्न बने रहे । स्वागत सत्कार कि जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हे ले जा चुके थे..वहां से नीचे उतर हमने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को तुम्हे सिनेमा दिखाया । हमारा सतकार का ये आखिरी छोर है जिससे आगे हम किसी के लिए नही बढ़े । इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाई का वह भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था जब तुम विदा होते और हम तुम्हे स्टेशन तक छोड़ने जाते पर तुमने ऐसा नहीं किया।
तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझ से कहा मै धोबी को कपड़े देना चाहता हूं। ये आघात अप्रत्याशित था और इसकी चोट मार्मिक थी। तुम्हारे सामिप्य की वेला एकाएक यूं रबड़ की तरह खिंच जाएगी इसका मुझे अनुमान ना था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथी सदैव देवता नहीं होता . वह मानव और थोडे़ अंशो में राक्षस भी हो सकता हैं।
किसी लॉंड्री पर दे देते हैं जल्दी धुल जाएंगे .. मैने क्हा, मन ही मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हे जल्दी जाना है। क्हा हैं लॉंड्री चलो चलते हैं मैने कहां और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक कुर्ता डालने लगा. कहा जा रहे हो पत्नी ने पूछा। इनके कपड़े लॉंड्री पर देने हैं मैने क्हा। मेरी पत्नी की आंखे एकाएक बड़ी बड़ी हो गई. आजसे कुछ बरस पूर्व उनकी आंखे देख मैने अपने अकेलेपन की य़ात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिय़ा था पर अब जब वे ही आंखे बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता हैं। वे इस आशंका और भय से बड़ी होती थी कि अतिथी अधिक दिन ठहरेगा। और आशंका निर्मूल नहीं थी अतिथी तुम जा नही रहे लॉंड्री पर दिए कपड़े धुल कर आ गए और तुम यही हो। तु्म्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यही हों. तुम्हे देख कर फूट पड़ने वाली मुस्कुराहट धीरे धीरे फीकी पड़ कर अब लुप्त हो गई हैं.ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते बातचीत की उछलती हुई गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनलों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुप पड़ी है अब इसे न तुम हिला रहे हो ,न मैं कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूं और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो .शब्दों का लेन देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए परिवार बच्चे नौकरी फिल्म राजनीति रिश्तेदारी तबादले पुराने दोस्त परिवार नियोजन मंहगाई,साहित्य और यहां तक कि आंख मार-मारकर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है सौहार्द अब शनै-शनै बोरियत में रूपांतरित हो रहा है . भावनाए गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही है पर तुम जा नहीं रहे किस अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्तित्व यहां चिपक गया है मैं इस भेद को सपरिवार नहीं समझ पा रहा हूं बार बार यह प्रशन उठ रहा है – तुम कब जाओगे,अतिथि कल पत्नी ने धीरे से पूछा था ,कब तक चिकेंगे ये मैंने कंधे उचका दिए,क्या कह सकता हूं
मैं तो आज खिचड़ी बना रही हूं हलकी रहे गी बनाओ
सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी डिनर से चले थे खिचड़ी पर आ गए अब भी अगर तुम अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमे उपवास तक जाना होगा । तुम्हारे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं ।तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है तुम जाओ न अतिथि
तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है न मैं जानता हूं दूसरों के यहां अच्छा लगता है । अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहां रहते पर ऐसा नहीं हो सकता । अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं ।होम को इसी कारण स्वीट होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस की काटने न दौड़े तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है सोचो प्रिय कि शराफ़त भी कोई चीज़ होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है ,जो बोला जा सकता है ।
अपने खर्राटों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी वह तुम्हारे यहां आगमन के बाद पांचवें सूर्य़ की परिचित किरण होगी ही।आशा है , वह तुम्हे चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मनापूर्ण निर्णय ले लोगे मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी । उसके बाद मैं स्टैंड़ नहीं कर सकूंगा और लड़खड़ा जाऊंगा । मेरे अतिथि ,मैं जानता हूं कि अतिथि देवता होता है ,पर आखिर मैं भी मनुष्य हूं । मैं कोई तुमारी तरह देवता नहीं ।एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते ।देवता दर्शन देकर लौट जाता है । तुम लौट जाओ अतिथि इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा ।ये मनुष्य अपनी वाली पर उतरे उसके पूर्व तुम लौट जाओ उफ तुम कब जाओगे अतिथि .....

शरद जोशी (१९३१-१९९१)

Wednesday, March 10, 2010

33 प्रतिक्षत में आम मुस्लमान औरतों के हिस्से क्या... कुछ नहीं..

33 प्रतिक्षत में आम मुस्लमान औरतों के हिस्से क्या... कुछ नहीं..

सहारनपुर के पास गांव कैलाशपुर की रहने वाली नसीमा रोज़ अपने शौहर नसीम से पिटती है ..कारण नसीमा को नेता बनने का शौक था ..कहीं कुछ होता खड़ी हो जाती हर बात में हर एक से उलझ पड़ती ..बड़े बड़े अफसर से लौहा लेने में पीछे नहीं रहती नसीम जब शहर से लौटता तो पुलिया पर ही कोई न कोई मिल कर कहे ही देता आज तेरी लुगाई ने ये किया भई इंदीरा बने गई वो तो,...नसीम को बात गवारा नही होती घर में कदम रखते ही बस नसींमा की कुटाई शुरू.. मारते मारते कहता अरे तुझे कोई टिकट न देगा..बस हमारी रूसवाई ही कराती रहे ..नसींमा सोचती देश बदल रहा औरते आगे आ रही हैं हमारी कौम की औरतों के लिए भी आवाज़ उठेगी कोई उनके लिए भी बोलेगा हमारे देश की सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्ष, सभापति नेताविपक्ष,राष्ट्रपति सब तो औरते हैं फिर मैं क्यों नही.. नसीमा की बात सही थी वो क्यों नहीं.. पर वो जिनका उसने नाम लिया उनमे से कोई आम औरत नहीं है और कोई मुस्लमान नहीं है जो वो है .. नसीमा औऱ उसकी कौम की औरतों की आखिरी उम्मीद, महिला आरक्षण बील में उनके लिए कुछ नहीं है..और ये सच है

15वीं लोकसभा के 543 सांसदो में से केवल तीन मुस्लिम औरतें हैं मौसम नूर, कैसर जहां और तबस्सुम बेगम
62 साल के इतिहास है कि 3 से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं को कभी जगह नही मिली है बल्कि 5 लोकसभा में तो एक भी मुस्लिम औरत को जगह नही मिल पाई जबकि तीन लोकसभा में एक ही मुस्लिम औऱत सासद बनी। तीन बार ही केवल दो दो मुस्लिम महिला सांसद चुनी गई और तीन बार ही तीन मुस्लिम औरते संसद पहुची हैं।
और क्या आप जानते हैं 15 लोकसभा में सिर्फ और सिर्फ दो बार ही ऐसा हुआ है जब 50 से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं ने चुनाव लड़ा ।
इस बार 556 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा जिनमें से मात्र 59 मुस्लिम औरते थी और एक बात आप को और बता दे जिनमे से 13 सीटे बीजेपी ने दी है और 23 काग्रेस ने मुलायम और लालू ने अपने घर की औरतों को ही टिकट दिया है ज्यादातर।
एक और चौकाने वाला आकड़ा जिन भी औरतो को टिकट दिया गया उनमे से कोई भी आम सधारण मुस्लमान परिवार से नहीं है ज्यादातरों का सियासी और पूजीपति परिवारों से रिशता है।

तो आम रोज़ त़ड़पने और मरने वाली मुस्लमान औरते केवल गुडिया, शाहबानो के नाम से ही पैदा होगीं जीये गई और वैसे ही किसी बदनामी के साथ इस दुनिया से रूखस्त हो जाएगी .. और जबतक आम मुस्लमान औरत को विकास और मुख्यधारा में शरीक नहीं किया जाएगा तब तक मुस्लिम समुदाय पिछड़ा ही रहेगा ।
क्यो इतना भेदभाव है और कब तक ये भेदभाव रहेगा .. आज सोनिया गांधी खुश है औऱतो के हक के लिए पर वो हक केवल एक जाति कि औरतो के लिए ही क्यों ....
कहा जा रहा किस पार्टी को मना किया गया है कि वो मुस्लमान औरतों को टिकट न दे। शायद वो भूल गई देश के वोट समीकरण को । भले यहां सब एकजुटता की बात करे पर वोट जाति और धर्म के नाम पर ही पड़ते हैं.. और जब दिल्ली जैसे शहर में कोई मुस्लिम पुरूष सांसद नही जीतता .जीतने की बात दूर टिकट ही नहीं मिलता तो मुस्लिम महिला हिन्दु बहुल इलाके और हिन्दू विरोधी से जीते गी ये सोचना भी बइमानी है.. इस 33 प्रतिक्षत में आम मुसलमान औरतों के लिए कुछ नहीं है.
नसीमा का सपना टूट गया कलावती केवल कविता के लिए है उसकी ज़िन्दगी की कहानी बन सकती है सहानुभति मिल सकती है पर कल को खुद वो किसी के लिए कुछ करे ये इस समाज को मंजूर नहीं.. नसीमा समझ जाएगी और अपनी दूसरी बहनो को भी समझा देगी ..संसद न पहुच सकी खुद तो क्या सांसदो की रैलियों में भीड तो जुटा ही देगी जो इस देश में मुस्लमानो की असली जगह है और उनकी पहचान भी ,केवल भीड भीड़ और बस भीड़ .... ।।

Saturday, March 6, 2010

कब से ऐसी शाम न देखी

कब से ऐसी शाम न देखी

सूरज जब ढलता
गगन पर लाली होती
चिडियां घोंसले कि ओर चलती
गर्मी गायब होने को होती
कब से ऐसी शाम न देखी।।
.
आगन में पानी का छिड़कॉव होता
चारपाईयों को बिछाया जाता
हल्के रंग की चादर उनपर डाली जाती
फिर बैठ कर मौसम की बात होती
कब से ऐसी शाम न देखी।।

पिताजी के आने का वक्त होता
शर्माजी का आना भी लाज़मी होता
चांद मियां के चाय समोसे के साथ
बातो बातों मे सबकी चुटकी ले ली जाती
कब से ऐसी शाम न देखी ।।

क्या किया क्या न किया
दिनभर का हिसाब लिया जाता
लालू राजू को डाट पड़ती
शिकायतों की लम्बी फेरिस्त होती
कब से ऐसी शाम न देखी ।।

तू तू मै मै
हां हां न न
हंसते मुस्कुराते
अचानक कूकर की सीटी बज जाती
सबकी भूख जग जाती
कब से ऐसी शाम न देखी।।

ताज़ी सब्ज़ी के साथ
गर्म गर्म रोटी खाई जाती
थोड़ा टहल कर लम्बी डकार आती
एक अंगडाई के साथ नींद आ जाती
कब से ऐसी शाम न देखी ।.

शान।।।

Monday, March 1, 2010

खुशियों का रंग भर डाले

खुशियों का रंग भर डाले

विद्या की देवी सरस्वती को प्रणाम करता हूं
बंसत के इस मौसम में आप का अभिनंदन करता हूं
सर्दी ने रूखस्त ली
रज़ाई कोटी सब मां ने बन्द की
खेतों में फसल लहलहा उठी
पीले रंग की चादर लो ओढ़ ली
नई कलियां, नए फूल
हर तरफ नए कंवल खिलते हैं
बंसत ऋतु का स्वागत हम सब करते हैं
रंगों के इस मौसम में
सब पर प्यार रंग का चढ़ता है
देखो राम रहीम यहां गले मिलते हैं
मेरे देश में बंसत का क्या कहना
कहीं झूले
कहीं नगाडे
कहीं ढ़ोल तमाशे दिखते हैं
राधे राधे
शिव शंभू सब एक ही रंग में फिरते हैं।
आओ इस बंसत ऋतु को
हर एक के जीवन में ले जायें
सब की झोली में खुशियों का रंग भर डाले।।
सब की झोली में खुशियों का रंग भर डाले।।