Saturday, March 6, 2010

कब से ऐसी शाम न देखी

कब से ऐसी शाम न देखी

सूरज जब ढलता
गगन पर लाली होती
चिडियां घोंसले कि ओर चलती
गर्मी गायब होने को होती
कब से ऐसी शाम न देखी।।
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आगन में पानी का छिड़कॉव होता
चारपाईयों को बिछाया जाता
हल्के रंग की चादर उनपर डाली जाती
फिर बैठ कर मौसम की बात होती
कब से ऐसी शाम न देखी।।

पिताजी के आने का वक्त होता
शर्माजी का आना भी लाज़मी होता
चांद मियां के चाय समोसे के साथ
बातो बातों मे सबकी चुटकी ले ली जाती
कब से ऐसी शाम न देखी ।।

क्या किया क्या न किया
दिनभर का हिसाब लिया जाता
लालू राजू को डाट पड़ती
शिकायतों की लम्बी फेरिस्त होती
कब से ऐसी शाम न देखी ।।

तू तू मै मै
हां हां न न
हंसते मुस्कुराते
अचानक कूकर की सीटी बज जाती
सबकी भूख जग जाती
कब से ऐसी शाम न देखी।।

ताज़ी सब्ज़ी के साथ
गर्म गर्म रोटी खाई जाती
थोड़ा टहल कर लम्बी डकार आती
एक अंगडाई के साथ नींद आ जाती
कब से ऐसी शाम न देखी ।.

शान।।।

8 comments:

संगीता पुरी said...

अब ऐसी शाम का तो इंतजार भी नहीं कर सकती !!

Udan Tashtari said...

वाकई, ऐसी शामें स्वप्न सी हो गई हैं.

बेचैन आत्मा said...

आज को नहीं पता होता कि भविष्य में ये शामें कितनी याद आने वाली हैं. यादें अनमोल होती हैं.

Anonymous said...

super !!

शरद कोकास said...

क्या करते हो भाई..बचपन की कितनी ही शामो की याद दिलादी ।

Manish said...

धुंधली यादों पर वक़्त के मैल की परत
आँखों के आंसू धीरे धीरे धोते हैं
सीने में अब भी मचलते हैं अरमान
हम भीड़ में भी अकेले होते हैं
फुर्सत के पलों का गुजर गया ज़माना
शाम का फ़साना बन के रह गया अफसाना

TIME said...

waahh !!!
WWAaaaaaaaahhhhh!!!!!!

VIJAY said...

achha likha hai