Friday, March 12, 2010

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी

तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी
शरद जोशी की कहानी पर फिल्म बनी आईये आपको कहानी पढ़ाते हैं।तुम कब जाओगे अतिथि –अजयदेवगन या शरदजोशी शरद जोशी की मशहूर कहानी ....

आज तुम्हारे आगमन के चुतर्थ दिवस पर यह प्रशन बार बार मन में घुमड़ रहा है –तुम कब जाओगे.अतिथि...
तुम जहां बैठे निस्संकोच सिगरेट का धुआं फेंक रहे हो ,उसके ठीक सामने एक कलैंडर है देख रहे हो न तुम..इसकी तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से फड़फड़ाती रहती हैं विगत दो दिन से मैं तुम्हे दिखाकर तारीखें बदल रहा हूं तुम जानते हो ,अगर तुम्हे हिसाब लगाना आता है कि यह चौथा दिन है ,तुम्हारे सतत अतिथ्य का चौथा भारी दिन पर तुम्हारे जाने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती लाखों मील लंबी यात्रा करने के बाद वो दोनो एस्ट्रॉनाट्स भी इतने समय चांद पर नहीं रूके थे,जितने समय तुम एक छोटी सी यात्रा कर मेरे घर आए हो . तुम अपने भारी चरण कमलों की छाप मेरी ज़मीन पर अंकीत कर चुके ,तुमने एक अंतरंग निजी संबधं मुझसे स्थापित कर लिया , तुमने मेरी आर्थिक सीमाओं की बैंजनी चट्टान देख ली , तुम मेरी काफी मिट्टी खोद चुके . अब तुम लौट जाओ,अतिथि तुम्हारे जाने के लिए यह उच्च समय अर्थात हाईटाइम है । क्या तुम्हे तुम्हारी पृथ्ती नहीं पुकारती
उस दिन तुम आए थे मेरा हृदय अज्ञात आशंका से धडक उठा था .... अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ कांप गया उसके बावजूद एक स्नेह भीगी मुस्कुराहट के साथ मैं तुमसे गले मिला था और मेरी पत्नी ने तुम्हे सादर नम्सते किया था ...तुम्हारे सम्मान में ओ अतिथि हमने रात के भोजन को एका एक उच्च मध्यम वर्ग के डिनर में बदल दिया था...तुम्हे स्मरण होगा कि दो सब्जियों और रायते के अलावा हमने मीठा भी बनाया था इस सारे उत्साह और लगन के मूल मे एक आशा थी । आशा थी कि दूसरे दिन किसी रेल से एक शानदार मेहमान नवाज़ी की छाप अपने हृदय मे ले तुम चले जाओगे। हम तुम से रुकने के लिए आग्रह करेंगे लेकिन तुम नहीं मानोगे औऱ एक अच्छे अतिथी की तरह चले जाओगे...पर ऐसा नही हुआ। दूसरे दिन भी तुम अपनी अतिथी सुलभ मुस्कान लिए घर मे ही बने रहे । हमने अपनी पीड़ा पी ली। और प्रसन्न बने रहे । स्वागत सत्कार कि जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हे ले जा चुके थे..वहां से नीचे उतर हमने फिर दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की और रात्रि को तुम्हे सिनेमा दिखाया । हमारा सतकार का ये आखिरी छोर है जिससे आगे हम किसी के लिए नही बढ़े । इसके तुरंत बाद भावभीनी विदाई का वह भीगा हुआ क्षण आ जाना चाहिए था जब तुम विदा होते और हम तुम्हे स्टेशन तक छोड़ने जाते पर तुमने ऐसा नहीं किया।
तीसरे दिन की सुबह तुमने मुझ से कहा मै धोबी को कपड़े देना चाहता हूं। ये आघात अप्रत्याशित था और इसकी चोट मार्मिक थी। तुम्हारे सामिप्य की वेला एकाएक यूं रबड़ की तरह खिंच जाएगी इसका मुझे अनुमान ना था। पहली बार मुझे लगा कि अतिथी सदैव देवता नहीं होता . वह मानव और थोडे़ अंशो में राक्षस भी हो सकता हैं।
किसी लॉंड्री पर दे देते हैं जल्दी धुल जाएंगे .. मैने क्हा, मन ही मन एक विश्वास पल रहा था कि तुम्हे जल्दी जाना है। क्हा हैं लॉंड्री चलो चलते हैं मैने कहां और अपनी सहज बनियान पर औपचारिक कुर्ता डालने लगा. कहा जा रहे हो पत्नी ने पूछा। इनके कपड़े लॉंड्री पर देने हैं मैने क्हा। मेरी पत्नी की आंखे एकाएक बड़ी बड़ी हो गई. आजसे कुछ बरस पूर्व उनकी आंखे देख मैने अपने अकेलेपन की य़ात्रा समाप्त कर बिस्तर खोल दिय़ा था पर अब जब वे ही आंखे बड़ी होती हैं तो मन छोटा होने लगता हैं। वे इस आशंका और भय से बड़ी होती थी कि अतिथी अधिक दिन ठहरेगा। और आशंका निर्मूल नहीं थी अतिथी तुम जा नही रहे लॉंड्री पर दिए कपड़े धुल कर आ गए और तुम यही हो। तु्म्हारे भरकम शरीर से सलवटें पड़ी चादर बदली जा चुकी और तुम यही हों. तुम्हे देख कर फूट पड़ने वाली मुस्कुराहट धीरे धीरे फीकी पड़ कर अब लुप्त हो गई हैं.ठहाकों के रंगीन गुब्बारे, जो कल तक इस कमरे के आकाश में उड़ते थे, अब दिखाई नहीं पड़ते बातचीत की उछलती हुई गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनलों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुप पड़ी है अब इसे न तुम हिला रहे हो ,न मैं कल से मैं उपन्यास पढ़ रहा हूं और तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो .शब्दों का लेन देन मिट गया और चर्चा के विषय चुक गए परिवार बच्चे नौकरी फिल्म राजनीति रिश्तेदारी तबादले पुराने दोस्त परिवार नियोजन मंहगाई,साहित्य और यहां तक कि आंख मार-मारकर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया और अब एक चुप्पी है सौहार्द अब शनै-शनै बोरियत में रूपांतरित हो रहा है . भावनाए गालियों का स्वरूप ग्रहण कर रही है पर तुम जा नहीं रहे किस अदृश्य गोंद से तुम्हारा व्यक्तित्व यहां चिपक गया है मैं इस भेद को सपरिवार नहीं समझ पा रहा हूं बार बार यह प्रशन उठ रहा है – तुम कब जाओगे,अतिथि कल पत्नी ने धीरे से पूछा था ,कब तक चिकेंगे ये मैंने कंधे उचका दिए,क्या कह सकता हूं
मैं तो आज खिचड़ी बना रही हूं हलकी रहे गी बनाओ
सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी डिनर से चले थे खिचड़ी पर आ गए अब भी अगर तुम अपने बिस्तर को गोलाकार रूप नहीं प्रदान करते तो हमे उपवास तक जाना होगा । तुम्हारे संबंध एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं ।तुम्हारे जाने का यह चरम क्षण है तुम जाओ न अतिथि
तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है न मैं जानता हूं दूसरों के यहां अच्छा लगता है । अगर बस चलता तो सभी लोग दूसरों के यहां रहते पर ऐसा नहीं हो सकता । अपने घर की महत्ता के गीत इसी कारण गाए गए हैं ।होम को इसी कारण स्वीट होम कहा गया है कि लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस की काटने न दौड़े तुम्हे यहां अच्छा लग रहा है सोचो प्रिय कि शराफ़त भी कोई चीज़ होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है ,जो बोला जा सकता है ।
अपने खर्राटों से एक और रात गुंजायमान करने के बाद कल जो किरण तुम्हारे बिस्तर पर आएगी वह तुम्हारे यहां आगमन के बाद पांचवें सूर्य़ की परिचित किरण होगी ही।आशा है , वह तुम्हे चूमेगी और तुम घर लौटने का सम्मनापूर्ण निर्णय ले लोगे मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी । उसके बाद मैं स्टैंड़ नहीं कर सकूंगा और लड़खड़ा जाऊंगा । मेरे अतिथि ,मैं जानता हूं कि अतिथि देवता होता है ,पर आखिर मैं भी मनुष्य हूं । मैं कोई तुमारी तरह देवता नहीं ।एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते ।देवता दर्शन देकर लौट जाता है । तुम लौट जाओ अतिथि इसी में तुम्हारा देवत्व सुरक्षित रहेगा ।ये मनुष्य अपनी वाली पर उतरे उसके पूर्व तुम लौट जाओ उफ तुम कब जाओगे अतिथि .....

शरद जोशी (१९३१-१९९१)

1 comment:

राजीव तनेजा said...

फिल्म की शुरुआत में लिखा गया है कि शरद जोशी जी की रचना से प्रेरित और उनकी सुपुत्री नेहा शरद जी का आभार भी व्यक्त किया गया है ...
वैसे इस उम्दा रचना को एक बार फिर से पढवाने के लिए आभार