Tuesday, June 1, 2010

शहज़ादा गुलरेज़ की नज्म

शहज़ादा गुलरेज़ की नज्म
कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बांहों में पा कर।
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में कसमसा-कसमसा कर
सरहाने से तकिया गिराती तो होगी
वही ख्वाब दिन की मंडेरों पर आकर
उसे दिल ही दिल में लुभाते तो होगें
कई तार सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होगें
कभी चौक पर सोचते सोचते कुछ
चलो खत लिखे दिल में आता तो होगा
मगर उंगलियां कांप जाती तो होगीं
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
कलम फिर उठा लेती होंगी उमंगे
कि धड़कन कोई गीत गाती तो होगी
कोई वहम उसको सताता तो होगा
वो लोगों की नज़रों से छुपती तो होगी
मेरे वास्ते फूल कढ़ते तो होगें
मगर सुई उंगली में चुभती तो होगी
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होगें
मसहरी से आंचल उलझता तो होगा
प्लेटें कभी टूट जाती तो होंगी
कभी दूध चूल्हे पे जलता तो होगा
गरज़ अपनी मासूम नादानियों पर
वह नाज़ुक बदन झेंप जाती तो होगीं
शहज़ादा गुलरेज़....

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