Tuesday, June 22, 2010

असगर नदींम सरवर की नज्म

असगर नदींम सरवर की नज्म
भारत पाक रिश्ते पर
मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर रास्ते की घास में अपनी जड़ों की खोज में
तारीख़ के घर का पता मालूम करते हैं
मगर तारीख़ तो बरगद का ऐसा पेड़ है जिसकी
जड़ें तो सरहदों को चीर कर अपने लिए रस्ता बनाती हैं
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं...
मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे
कहीं पर भी नहीं पहुँचे.
कि सुबहे-नीम वादा में धुंधलका ही धुंधलका है
कि शामे-दर्दे-फ़ितरत में कहीं पर एक रस्ता है
नहीं मालूम वो किस सम्त को जाकर निकलता है
मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं.

1 comment:

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

Sanjay kumar
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com