Saturday, October 2, 2010

उस जैसा

उस जैसा
सकल चराचर में उस जैसा
रत्न नहीं रे,
भार वहन कर उसके यश का
पवन बही रे
उसकी छवि को अंकित कर दे
ऐसा कहां चितेरा
उसके मुख को भूल जाए जो
ऐसा कहीं नहीं रे...
( जैसा तुम चाहो..शेक्सपियर)

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