Friday, October 15, 2010

पीछे छूटती खुशी

पीछे छूटती खुशी
कहां से शुरू करूं ..क्या शब्द सही हैं ,अक्षर ग़लत तो नहीं ।भागती हुई भीड़ में कहीं में पीछे तो नहीं ....कई साल बाद हरीश अपनी बालकनी में बैठा यही सोच रहा था ।31 साल की उसकी उम्र हो गई थी 32 साल का इस महीने वो हो जायेगा।
लम्बे लम्बे उसके बाल कम हो गए थे ..जिन लटों को वो संवारता रहता था आज वहां खाली चमक रहे गई थी ...उसका दबा हुआ पेट आजकल काफी बाहर की तरफ बढ़ता जा रहा था ।
दोस्तों के साथ शराब और दूसरी आदतें भी छूट चुकीं थी । चार महीने पहले उसकी शादी हुई थी ...
ज़ाहिर है जिस सोच को लेकर वो ज़िन्दगी को समझ रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था वहां परिवार की रज़ामंदी की कोई जगह नहीं थी ..
हां इस दौर में हर युवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना चाहता है ..उसे इस आज़ाद देश में और आज़ादी की चाहत है ... किसी की बात और सलाह मानना तो दूर उसे सुनना भी गंवारा नहीं ...
रेशमा एक सैय्यद मुस्लमानों के घर की लड़की थी । अच्छा खूबसूरत नैन नक्श काले बाल और गोरा रंग ... और उसके नैन किसी को भी अपनी तरफ आकृषित कर लें ...
कई चीज़ों की तलाश और कई हसरतें और खुवाहीशें..पर मकसद क्या शायद उसे भी नहीं मालूम..
बस फोन खड़का दिया अपने घर की उसे एक लड़का पसंद है ..कौन है कैसा है क्या है घर कैसा है लोग किस तरह के हैं .. दूसरी तरफ से एक साथ इतने सवाल उठे पर रेशमा का एक ही जवाब था कि मुझे पसंद है मुझे शादी करनी है .और फोन काट दिया.
उधर रिसिवर पकड़े सैय्यद सिराज अहमद की आंखे नम हो गई ...लखनऊ की उनकी हवेली जो तीन पीढ़ियों से अपनी शान और शौकत के लिए जानी जाती है आज उन्हे घूर कर देख रही है ..और सिराज मियां की नम आंखों को देख कर खुद भी रूलासी हो गई है .. शायद चुपचाप रो भी ले ..
सिराज अहमद सरकार के बड़े मुलाज़िम थे फक्र था उन्हे अपने कुन्बे पर अपने बुर्ज़गों पर ... अकसर शहर की महफिलों में वो ये कहते हुए नहीं थकते थे कि हम ही है अवध में जिसने अपने बाप दादा के कमाए हुए रूतबे को अभी तक बचाया हुआ है नहीं तो नवाबों और सैय्यदों की इज्ज़त तो कोठों और चौकों पर निलाम हो रही हैं ..लोग तो एक पुशत के बाद बरबाद हो जाते हैं हम तो न जाने कितनी नस्लों से ऐसे ही बरकरार हैं .. पर आज जो ज़िल्लत का दर्द और ग़म का अहसास उन्हे हुआ तो बस चीख ही निकल गई ... उनकी हालत और आवाज़ सुन कर शबनम बेगम भी बैठक में आ गईं
शबनम बेगम भी बराबंकी के नवाब की साहबज़ादी हैं.. सिराज अहमद जितने पढ़े लिखे और समझदार थे वो उनसे एकदम अलग ..बात सुनते ,कुछ हल ढूढ़ते इससे पहले की कुछ समझ पाते .तौहमतों का दौर शुरू हो गया और हवेली की तहज़ीब चूल्हे की लकड़ी की तरह जल गई.... और घर की खुशियां कहीं पीछे छूट गईं थीं...इन्हे दुख पहुचाने का मैं जो जिम्मेदार तो नहीं ...हरीश ने लिखना बंद कर दिया था बालकनी में आती चांद की रोशनी अब उसे बोझिल लग रहीं अपने निर्णय पर आज चिंता के भाव थे ... कहीं कभी उसकी खुशियां पीछे छूट जाएं तो वो क्या करेगा....

1 comment:

Udan Tashtari said...

काफी हद तक तो बदलाव आ गया है...भविष्य भी शायद इन से उपर ही उठे..अच्छी लेखनी.