हर दिन
हर दिन एक नई शुरूआत है
हर दिन एक नई ज़िन्दगी का साथ है
हर दिन कुछ खोना है
हर दिन एक नया मुकाम है
हर दिन एक झगड़ा है
हर दिन एक समझौता है
हर दिन एक तमन्ना है
हर दिन का रोना है
हर दिन सोना है
और हर दिन एक दिन का इंतज़ार है
Saturday, September 4, 2010
टेडी बियर
टेडी बियर
एक बड़ी सी एमएनसी बिल्डिंग के सामने एक छोटी सी सिगरेट की दुकान से नरेश ने सिगरेट जलाई और धुआं आसमान में छोड़ते हुए गौतम से बोला ..”यार क्या होगा ज़िन्दगी का ... दोनो के बीच की खामोशी सिगरेट के कश की आवाज से पूरी हो रही थी । रात के करीब 11.30 बज चुके थे, नरेश अपनी शिफ्त खत्म कर चुका था और गौतम की शिफ्त खत्म होने में दो घंटे थे। दोनो एक दूसरे को देख रहे थे पर बोलने की हिम्मत कोई नही कर पा रहा था। सिगरेट का दम टूटने में कुछ ही पल बाकी थे कि तभी तेज़ रफ्तार से एक होंडा सिटी उनके बगल से गुज़री। गाडी में म्यूजिक बज रहा था बोल थे इट्स माई लाईफ.....दोनो ने एक दूसरे को देखा मुस्कुराहट ठहाकों में बदल गई , गौतम ने नरेश की पीठ पर हाथ मारा और बोला चलता हूं बॉस अभी बहुत काम है, और कल घर पर भी कुछ काम है....नरेश ने भी सहमती जताई, गौतम मुड़ कर बिल्डिंग की तरफ चला और नरेश गाड़ी की तरफ बढ़ गया...नरेश अपनी गाड़ी की दरवाज़ा खोल ही रहा था कि वंही होंडा सिटी फिर बगल से गुज़री उसमें अब भी वही गना बज रहा था इट्स माई लाईफ ...नरेश ज़ोर से चिल्लाया इट्स फक.....नरेश के मुंह से ये शब्द निकलते निकलते उसकी आंखे नम हो गई...आंसू पोछते हुए वो जल्दी से गाड़ी में बैठा ...गाडी स्टार्ट की और तेज़ी से निकल पड़ा...पर क्हा जा रहा था कुछ पता नहीं ....रियर व्यू मिरर पर लटका टैडी बियर हंस रहा था....उसे देख कर नरेश को भी हंसी आ गई....साथ ही याद आ गया इस टैडी बियर को खरीदते और लगाते वक्त उसका और ज़रीन का झगड़ा
गाड़ी ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी हैं एक बच्चा गंदे से कपडे पहने ज़रीन की खिड़की पर आया और एक टैडी बियर दिखाया...ज़रीन ने झिड़क कर कहा गेट लॉस्ट , नरेश मुस्कुरा दिया..बच्चे को इशारा से अपने तरफ बुलाया और हाथ हिलाकर दाम पूछा ..बच्चे ने भी इशारे से 10 रुपए बताए...नरेश ने पैसे देकर टैडी बियर ले लिया ...रेड लाईट ग्रीन हो गई थी और गाडी आगे चल दी...पर नरेश को मालूम नही था कि वो एक ऐसे स्पीड ब्रेकर से गुज़र गया है जिस्से उसकी जिंदगी का एलाईंमैंट बिगड़ चुका है।
ये ज़रूरी नही कि बात शुरु शुरने के लिए कोई बात हो बात तो बस यूं ही शुरू हो जाती हें उस दिन नरेश को अपनी बहन से मिलने जाना था ।भांजी का जन्मदिन था ।बडी मुश्किल से ज़रीन को मनाया था ।बहन का घर छोटा और वहा कई रिश्तेदार मौजूद थे किसी ने ज़रीन से पूछ लिया ..बडे दिनों के बाद आई..ज़रीन के गुस्से में इज़ाफा हो गया ..दूसरी तरफ नरेश गौतम और अपने जीजा के साथ हंस बोल रहा था लेकिन उसकी नज़र ज़रीन पर ही थी ..और वो ज़रीन के बदलते मूड और हाव भाव को बराबर देख रहा था ।कुछ कुछ समझने की कोशिश कर रहा था और बहुत कुछ उसे समझ आ रहा था ।
तभी ज़रीन के मोबाइल की घंटी बजती और वो उठ कर बाहर निकल जाती है ।पार्टी में कौन आया कौन गया उसे कोई खबर नहीं... .खैर पार्टी खत्म हो गई नरेश बाहर आया और ज़रीन से बोला चलें...ज़रीन ने हां में अपना सिर हिला दिया और इशारे से अपना पर्स मंगवाया..नरेश अंदर जा कर पर्स ले आता है और दोनो बिना किसी को बताए चल दिये...
ज़रीन की फोन पर बात खत्म हो चुकी थी पर दोनो के बीच की खामोशी रात के अंधेरे के साथ और गहरी हो चुकी थी । दोनो घर पहुचें कपड़े बदल कर ज़रीन ने पुछा क्या चाय पियोगे...नरेश ने इशारे से मना किया और सोने के लिए बेडरूम में चला गया।
ज़रीन ड्राईंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी नरेश बेडरूम में सोने की कोशिश कर रहा था .तभी टीवी एक चैनल में गाना शुरू हुआ ..हम न समझे थे बात इतनी सी खव्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की ..। नरेश को कब नींद आई पता नहीं ..कब ज़रीन आई मालुम नहीं ..अचानक ज़रीन का पैर नरेश को लगा और नरेश ने बुरी तरह से पैर झिड़क दिया ..।दोनो ने दूसरी करवट ले ली ....
दोनो की आंखो मे आंसू थे जिससे उनका तकिया गिला हो रहा था ..और ये ख्याल ज़हन में आ रहा था क्या ऐसी रातों के लिए ही दोनो एक हुए थे ...इस तरह की ज़िन्दगी क्या चाही थी ...नरेश की आंखे बंद थी पर आंसू थे ..और ज़रीन ने भी अपनी नम आंखे बंद कर ली....।
पहाड़ो में एक माकान .। उस माकान के कमरे में एक 15-16 साल की लड़की ने अपने को बंद कर लिया था और रो रही थी ..। हाथ में एक आदमी की तस्वीर थी ।बाहर से एक औऱत आवाज़ लगा रही थी ..ज़रीन बेटा ,बाहर आओ.चलो खाना खा लो ....पर ज़रीन को न आना था और न ही वो आई।वो बस रो रही थी और उसे याद आ रहा था वो दिन जब उसने ये खबर सुनी थी की अब उसके पापा अब नहीं आया करेगें ..मतलब..? क्यों? किसलिए? ऐसे कई सवाल उसके नन्हे से मन में आये पर किसी से पुछने की हिम्मत नहीं हुई...
अपनी मां से पहले से ही बात नहीं करती थी न जाने क्यो उनसे बात करना उसे अच्छा नही लगता था वो उसे अच्छी नहीं लगती थी ।उनकी बाते उनका तौर तरीका उसको कुछ भी पसंद नही था और जब वो पापा की बुराई करती थी तो वो उसे और बुरी लगने लगती थी ।
जब उस के ऱिश्तेदारों के लड़को को ज्यादा तरज़ीह दी जाती ज़रीन अकसर नाराज़ हो जाती थी । उसे सब से चिढ़ हो गई थी इसलिए वो किसी से भी सख्ती और रूखे तरीके से जवाब देने लगी थी ।और से हर बार सुनने को मिलता बदतामिज़ बदमिज़ाज कैसे होगी इसकी गुज़र ।एक दिन भी इस गुज़र कहीं नही हो पाएगी ।बस हमारी दौलत के मारे ही इसके सुसरालवालों और इसके शौहर का मुहं बंद होगा ..उस वक्त ज़रीन वोलती तो कुछ नहीं थी मन ही मन में कहती थी ..मुझे नही चाहिए तुम्हारी दौलत और तुम्हारा लाया हुआ शौहर ..।।
ज़रीन ने फैसला ले लिया था ..हालात भी कुछ ऐसे हो चुके थे की उसके फैसले को सब ने मंज़ूरी दे दी ...बस फिर क्या था ...।ज़रीन ने कुछ सोचा न समझा बस चल दी ।पहाड़ो की ऊंची ऊंची चोटियों से उतरते वक्त बस के हिचकोले सहते हुए वो यही सोच रही थी की उसे इन उचाइयों से भी ऊपर जाना है .अपनी ज़मीन और अपना आकाश उसे खुद बनाना है ।
अच्छी तालिम और बाप के रूतबे के कारण उसे नौकरी और रहने के लिए जगह मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई । यही सोच कर बाप एहसान ले लिया चलो आखिरी बार ही सही अब आगे कहा ज़रूरत पडेगी इनकी ।।
लेकिन नरेश की ज़िन्दगी ऐसी नहीं थी । वो जो सोचता था वो ही करता था ।हर कोई उसे पसंद करता था अपना धर्म अपना परिवार उसके वो बहुत करीब था ।पर हां वो किसी भी चीज़ को अपने पर हावी नहीं होने देता था । बहुत समझदारी के साथ वो आगे बढ़ रहा था ।एक आम मध्यम वर्गिय परिवार में जन्म होने के कारण मेहनतकश ज्यादा था .कभी कभी दोस्त यारे के साथ पीने पिलाने का दौर भी लगा रहता था ।
इसी बीच नरेश की कंपनी का करार एक फ्रेंच कंपनी के साथ हो गया जिसके चलते कंपनी ने कुछ गिने चुने लोगो को फ्रेंच सिखने के लिए कहा गया ।
ज़रीन को भी किसी ने सलाह दी थी की ट्रेव्लस इंडस्ट्री में आगे बढ़ना है तो किसी विदेशी भाषा का आना ज़रूरी है इसलिए उसने भी फ्रेंच सिखने के लिए दाखिला ले लिया ..कहते हैं जिसे मिलना होता है वो मिलकर ही रहता है और उनके मिलने का रास्ता अपने आप बन जाता है ।
क्लास का पहला दिन हर कोई व्यस्त ..एक तो दिन भर दफतर में काम ऊपर से भाषा सिखने का चोचला ।एक ही क्लास में कुछ प्रोफैशनल , कुछ कालेज के छात्र एक अलग ही माहौल ।
सब क्लास में पहुच चुके थे लेकिन ज़रीन आटो वाले से झगड़ा कर रही थी ..इतने पैसे कहा लगते हैं इतने पैसे मैं नहीं दूगीं इतने में चलना है चलो आटो वाले कहा मानने वाले ।थक कर ज़रीन को बस से ही आना पड़ा नतीजा ये हुआ की क्लास तक पहुचते पहुचते क्लास खत्म हो चुकी थी ... लोग पढ़ कर बाहर निकल रहे थे ..नरेश भी बाहर निकला तो बाहर खड़ी ज़रीन ने उससे पुछ लिया आप क्लास में थे क्या पढ़ाया आज..नरेश ने कहा कुछ नही बस इतना कहा की आज आप अपने पाटनर चुन ले और कल सब को उनके बारे में बताइएगा..
ज़रीन ने कहा ये क्या बेकार की चीज़ है ..ज़रीन जल्दी से प्रोफेसर के पास दौड़ी ..न जाने उससे क्या बात की और वापस नरेश के पास आकर बोली आप मेरे पाटनर मै ज़रीन भट्ट श्रीनगर से अब आप अपने बारे में बताइये..। नरेश हड़बड़ा गया और बोला मैं नरेश चोपड़ा इसी शहर से बस यही दोनो का परिचय था ।
दोनो ने अपनी अपनी राह पकड़ी । घर पहुचते पहुचते ज़रीन को काफी देर हो चुकी थी । रास्ते मे तीन बार उसकी मां का फोन आ चुका था जिससे उसका मूड और खराब हो चुका था ।न जाने क्यों इतना परेशान कर रही हैं नहीं रखना है मुझे इनसे कोई वास्ता ..। घर पहुची तो माकान मालकिन भी नाराज़ थी बोली..देखो कशमीर से कुछ लड़के तुम से मिलने आए थे हमे ये सब पसंद नहीं है माकान लेते वक्त तुमने कहा था तुम्हारा यहां पर कोई नहीं देखो वैसे भी तुम मुस्लमान हो और कश्मिरी भई बहुत डर लगता है ..और भी न जाने क्या क्या बड़बड़ाती रही ।
लड़के जो नंबर देकर गए उस पर फोन किया तो पता चला की . नंबर नशीद है जो उसकी खाला का लड़का है ..जिसको ज़रीन की मां ने जरीन का हाल चाल जानने के लिए भेजा था ...बस इतना सुनते ही जरीन आगबबुला हो गई । उसी वक्त अपने घर वक्त फोन मिलाया और अपनी मां पर बरस पड़ी ... न जाने क्या क्या बक डाला ..
फिर फोन काट कर रोने लगी रोते रोते कब सोई पता नहीं सुबह काफी देर से उठी ..देर से दफतर पहुचीं देर तक काम किया क्लास कब मिस हो गई पता नहीं चला..।
दूसरी तरफ क्लास में सब एक दूसरे का परिचय दे रहे थे और नरेश दरवाज़े पर नज़र टिकाए ज़रीन का इंतज़ार कर रहा था .तभी उसका नाम पुकारा जाता है .वो उठता है और बोलना शुरू कर देता है .. मै जिनके बारे में आपको बताने जा रहा हूं वो इस वक्त यहां मौजूद नहीं है लेकिन अगर मैं उनके बारे में नहीं बताऊंगा तो आप लोग बहुत कुछ मिस कर जाएगे ..इसके बाद नरेश जो बोलना शुरू किया तो बोलता ही गया ..जब रूका तो हॉल तालियों से गूंज रहा था ...
क्लास के बाद हर कोई नरेश को मुबारकबाद दे रहा था और कहे रहा था हमे भी मिलवाना वादियों की उस दिलकश हवा से .नरेश को उस रात नींद नहीं आई न जाने कैसे कैसे खव्वाब वो देख रहा था ..उधर जॉरीन इन सब बातों से बेखबर अपनी परेशानियों मे मुबतिला थी...।
दूसरे दिन ज़रीन को अपने दफतर के काम से एक दूसरी कम्पनी में जाना था । जैसे ही रिस्पशन पर पहुची तो वहां उसे गौतम मिल गया .। गौतम न देखते ही कहा भई वहा कल ही तारीफ की और आज मुलाकात करने आ गई...।ज़रीन कुछ समझ नहीं पाई उसने कहा जी... गौतम को एहसास हो गया की शायद इन्हे कुछ मालुम नहीं तो उसने बात संभाली और पुछा बताए कैसे आना हुआ क्या काम है .ज़रीन ने आने का मकसद बताया तो गौतम ने उसे आदमी के पास मिलने भेज दिया जिसके हाथ में काम था .. और अंदर आ कर नरेश को बताया ..।
जब ज़रीन वापस आई तो देखा गौतम और नरेश दोनो इंतज़ार कर रहे हैं ..ज़रीन नरेश को पहचानती थी देखते ही बोली अरे आप ..तब दोनो ने अपने बारे में बताया तीनो ने काफी पी ..गौतम ने कल की घटना को बताया तीनो खूब हंसे और शाम को क्लास में आने का वादा कर के अपने अपने काम पर चले गए।
जॉरीन का दिन अच्छा बीता और क्लास में बी वक्त पर पहुची ..और हां इसबार आटो वाले ने भी सही पैसे मांगे..क्लास में पहुच कर वो खुद को खास बहुत खास महसूस कर रही थी जो एहसास इससे पहले उसे कभी नहीं हुआ था । और इसी की उसे चाहत थी की लोग उसको जाने उसकी कद्र हो औऱ ये महत्व किसी और ने नहीं नरेश ने दिलाया था ...खुश थी ज़रीन नहीं बहुत ज्यादा खुश थी ...आज माकान मालिकन की बाते भी अच्छी लग रही थी और आज ही अपनी मां का हाल भी फोन कर के पुछा ...।
हमारे समाज में जब कोई बात न हो तब इतिहास रच दिया जाता है और फिर जब बात हो तो ..कोई ग्रंथ से कम क्या लिखा जाएगा..लेकिन अगर आप खुश हैं तो सब कुछ ठीक है और आपको ठीक ही लगता है और ज़रीन कब किसकी फिक्र की है जो उसे अब किसी बात की चिंता सताए गी ।
उसने दोस्ती के आगे कुछ नहीं सोचा अभी उसे अपने काम में बहुत आगे जाना है ।कई नये किलाइंट नये दोस्त और बहुत सारा प्यार क्या चाहिए ज़रीन को और .।
क्लासिस खत्म हो गई पर दोस्ती बढ़ गई..नरेश से रोज़ मुलाकात .साथ में काफी ..फिर घर तक ड्रापिंग और रात भर मुबाइल पर बातें ..बस दोनो की जिन्दगी यहीं तक सिमट कर रहे गई थी .....।
पर कल्पनाओं और वास्तविकता में बहुत फर्क होता है और हकीक़त हमेशा सबसे आगे रहती है ..।घुमना फिरना काम काज तो सही पर कब तक....
जब आप बाहर निकलते हैं तो दस तरह के लोग आप को देखते हैं और दस तरह की बाते करते हैं ..और फिर एक लड़की वो लड़के साथ धुमे तो बाते बनना लाज़मी है ..।नशीद ने भी ज़रीन को नरेश के साथ धूमते देख लिया ..एक बार तो वो मिलने भी आ गया ..ज़रीन ने नरेश का परिचय भी कराया पर उसका फर्ज़ था घरवालों को बताना तो उसने बता दिया ...फिर क्या होना था ..वो ही शोर शराबा रोना पीटना कोसने गाली सब फिर से शुरू हो गया..।यानि ज़रीन की ज़िन्दगी फिर उसी उलझनो और परेशीनियों से घिर गई..
आप ये मत सोचिए की नरेश के घर में कुछ नहीं हुआ उसे भी वो सब सुनने को मिला जो ज़रीन ने अपने घरवालों से सुना ..।जब उसने अपने और ज़री रिश्ते के बारे में बताया पर वो लड़का था कमाता था इसलिए घर वाले चुप हो गए..दिन गुज़रते गए सब को लगा बात खत्म हो गई ...पर तूफान शांत होते हैं खत्म नहीं होते ..।
आचानक दोनो ने फैसला लिया की अब बस अब शादी करेगें.. पर एक तरफ जरीन की शर्ते थी और नरेश के पास कई सवाल ..दोनो एक तो हो रहे थे मगर क्यों ..जिस समाज की इन्होने कभी परवाह नहीं की आज वो ही समाज इन्हे एक कर रहा है ।दोनो ने कई बार सोचा पर एक दूसरे को बताने की हिम्मत नही जुटा पाए..बस कई विवादों .समझौतों कुछ हां कुछ न के चलते दोनो की शादी हो गई..हां दोनो ने एक दूसरे के लिए कितना बड़ा एहसान किया कितना सैकरिफाइज़ यही इनके रिशते की बुनियाद थी ..और जब ऐसी किसी भी रिश्तों की नीव हो तो बात बात पर झगड़ा क्यो नहीं होगा ..जहां पहले एक दूसरे के बिना दिन नहीं कटते थे वहीं अब एक दूसरे के साथ एक पल भी काटना मुशकिल होता जा रहा है इतना तनाव इतना खिचाऊ की बस फट जाए आदमी दोनो का अहम दोनो के प्यार से कहीं आगे ..क्यो हर बार शिकायत क्यों इतने शिकवे ...हर बार मैं ही झुकूं...
क्या मेरी गलती है ..चलती गाड़ी मे हिलते हुए टेडी बियर से नरेश ने पुछा ..बोल ..बोल बोल बता ..बस आज सब खत्म ..नहीं रहना मुझे उसके साथ ..इतनी ज़िद बस बहुत हुआ..
तभी नरेश के फोन की घंटी बजती है दूसरी तरफ बिल्डिंग का चौकीदार है ..साहब ज़रीन साहब का एकसीडेंट हो गया सोसाइटी में आ ही रही थी की तभी तेज़ रफतार होंडा सिटी ने टक्कर मार दी ..ये सुनते हा नरेश क होश उड़ गए .गाड़ी अस्पताल की तऱफ मोड़ दी । गौतम को भी फोन कर दिया ..।
हास्पिटल में ज़रीन आईसीयू में थी पुलिस पुछताछ कर रही थी ..नरेश थक कर कुर्सी में बैठा ...तभी एक लाश उसके सामने से गुज़री उसके पीछे एक 60-65 साल की औरत रो रही थी और बोल रही थी अरे जिससे प्यार करते हैं उसी से तो झगडा करते है ज़िद करते हैं ..तुम्ही तो मेरे हो तुम्हारे सिवा कौन है मेरा ..बस आ जाओ एक बार आजाओ.माफ कर दो मुझे ...यूं न जाओ...
ये सुनते ही नरेश फूट फूट कर ज़ोर से रोने लगा......
( ये कहानी लेखक से बिना अनुमति के इस्तेमाल न करें)
एक बड़ी सी एमएनसी बिल्डिंग के सामने एक छोटी सी सिगरेट की दुकान से नरेश ने सिगरेट जलाई और धुआं आसमान में छोड़ते हुए गौतम से बोला ..”यार क्या होगा ज़िन्दगी का ... दोनो के बीच की खामोशी सिगरेट के कश की आवाज से पूरी हो रही थी । रात के करीब 11.30 बज चुके थे, नरेश अपनी शिफ्त खत्म कर चुका था और गौतम की शिफ्त खत्म होने में दो घंटे थे। दोनो एक दूसरे को देख रहे थे पर बोलने की हिम्मत कोई नही कर पा रहा था। सिगरेट का दम टूटने में कुछ ही पल बाकी थे कि तभी तेज़ रफ्तार से एक होंडा सिटी उनके बगल से गुज़री। गाडी में म्यूजिक बज रहा था बोल थे इट्स माई लाईफ.....दोनो ने एक दूसरे को देखा मुस्कुराहट ठहाकों में बदल गई , गौतम ने नरेश की पीठ पर हाथ मारा और बोला चलता हूं बॉस अभी बहुत काम है, और कल घर पर भी कुछ काम है....नरेश ने भी सहमती जताई, गौतम मुड़ कर बिल्डिंग की तरफ चला और नरेश गाड़ी की तरफ बढ़ गया...नरेश अपनी गाड़ी की दरवाज़ा खोल ही रहा था कि वंही होंडा सिटी फिर बगल से गुज़री उसमें अब भी वही गना बज रहा था इट्स माई लाईफ ...नरेश ज़ोर से चिल्लाया इट्स फक.....नरेश के मुंह से ये शब्द निकलते निकलते उसकी आंखे नम हो गई...आंसू पोछते हुए वो जल्दी से गाड़ी में बैठा ...गाडी स्टार्ट की और तेज़ी से निकल पड़ा...पर क्हा जा रहा था कुछ पता नहीं ....रियर व्यू मिरर पर लटका टैडी बियर हंस रहा था....उसे देख कर नरेश को भी हंसी आ गई....साथ ही याद आ गया इस टैडी बियर को खरीदते और लगाते वक्त उसका और ज़रीन का झगड़ा
गाड़ी ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी हैं एक बच्चा गंदे से कपडे पहने ज़रीन की खिड़की पर आया और एक टैडी बियर दिखाया...ज़रीन ने झिड़क कर कहा गेट लॉस्ट , नरेश मुस्कुरा दिया..बच्चे को इशारा से अपने तरफ बुलाया और हाथ हिलाकर दाम पूछा ..बच्चे ने भी इशारे से 10 रुपए बताए...नरेश ने पैसे देकर टैडी बियर ले लिया ...रेड लाईट ग्रीन हो गई थी और गाडी आगे चल दी...पर नरेश को मालूम नही था कि वो एक ऐसे स्पीड ब्रेकर से गुज़र गया है जिस्से उसकी जिंदगी का एलाईंमैंट बिगड़ चुका है।
ये ज़रूरी नही कि बात शुरु शुरने के लिए कोई बात हो बात तो बस यूं ही शुरू हो जाती हें उस दिन नरेश को अपनी बहन से मिलने जाना था ।भांजी का जन्मदिन था ।बडी मुश्किल से ज़रीन को मनाया था ।बहन का घर छोटा और वहा कई रिश्तेदार मौजूद थे किसी ने ज़रीन से पूछ लिया ..बडे दिनों के बाद आई..ज़रीन के गुस्से में इज़ाफा हो गया ..दूसरी तरफ नरेश गौतम और अपने जीजा के साथ हंस बोल रहा था लेकिन उसकी नज़र ज़रीन पर ही थी ..और वो ज़रीन के बदलते मूड और हाव भाव को बराबर देख रहा था ।कुछ कुछ समझने की कोशिश कर रहा था और बहुत कुछ उसे समझ आ रहा था ।
तभी ज़रीन के मोबाइल की घंटी बजती और वो उठ कर बाहर निकल जाती है ।पार्टी में कौन आया कौन गया उसे कोई खबर नहीं... .खैर पार्टी खत्म हो गई नरेश बाहर आया और ज़रीन से बोला चलें...ज़रीन ने हां में अपना सिर हिला दिया और इशारे से अपना पर्स मंगवाया..नरेश अंदर जा कर पर्स ले आता है और दोनो बिना किसी को बताए चल दिये...
ज़रीन की फोन पर बात खत्म हो चुकी थी पर दोनो के बीच की खामोशी रात के अंधेरे के साथ और गहरी हो चुकी थी । दोनो घर पहुचें कपड़े बदल कर ज़रीन ने पुछा क्या चाय पियोगे...नरेश ने इशारे से मना किया और सोने के लिए बेडरूम में चला गया।
ज़रीन ड्राईंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी नरेश बेडरूम में सोने की कोशिश कर रहा था .तभी टीवी एक चैनल में गाना शुरू हुआ ..हम न समझे थे बात इतनी सी खव्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की ..। नरेश को कब नींद आई पता नहीं ..कब ज़रीन आई मालुम नहीं ..अचानक ज़रीन का पैर नरेश को लगा और नरेश ने बुरी तरह से पैर झिड़क दिया ..।दोनो ने दूसरी करवट ले ली ....
दोनो की आंखो मे आंसू थे जिससे उनका तकिया गिला हो रहा था ..और ये ख्याल ज़हन में आ रहा था क्या ऐसी रातों के लिए ही दोनो एक हुए थे ...इस तरह की ज़िन्दगी क्या चाही थी ...नरेश की आंखे बंद थी पर आंसू थे ..और ज़रीन ने भी अपनी नम आंखे बंद कर ली....।
पहाड़ो में एक माकान .। उस माकान के कमरे में एक 15-16 साल की लड़की ने अपने को बंद कर लिया था और रो रही थी ..। हाथ में एक आदमी की तस्वीर थी ।बाहर से एक औऱत आवाज़ लगा रही थी ..ज़रीन बेटा ,बाहर आओ.चलो खाना खा लो ....पर ज़रीन को न आना था और न ही वो आई।वो बस रो रही थी और उसे याद आ रहा था वो दिन जब उसने ये खबर सुनी थी की अब उसके पापा अब नहीं आया करेगें ..मतलब..? क्यों? किसलिए? ऐसे कई सवाल उसके नन्हे से मन में आये पर किसी से पुछने की हिम्मत नहीं हुई...
अपनी मां से पहले से ही बात नहीं करती थी न जाने क्यो उनसे बात करना उसे अच्छा नही लगता था वो उसे अच्छी नहीं लगती थी ।उनकी बाते उनका तौर तरीका उसको कुछ भी पसंद नही था और जब वो पापा की बुराई करती थी तो वो उसे और बुरी लगने लगती थी ।
जब उस के ऱिश्तेदारों के लड़को को ज्यादा तरज़ीह दी जाती ज़रीन अकसर नाराज़ हो जाती थी । उसे सब से चिढ़ हो गई थी इसलिए वो किसी से भी सख्ती और रूखे तरीके से जवाब देने लगी थी ।और से हर बार सुनने को मिलता बदतामिज़ बदमिज़ाज कैसे होगी इसकी गुज़र ।एक दिन भी इस गुज़र कहीं नही हो पाएगी ।बस हमारी दौलत के मारे ही इसके सुसरालवालों और इसके शौहर का मुहं बंद होगा ..उस वक्त ज़रीन वोलती तो कुछ नहीं थी मन ही मन में कहती थी ..मुझे नही चाहिए तुम्हारी दौलत और तुम्हारा लाया हुआ शौहर ..।।
ज़रीन ने फैसला ले लिया था ..हालात भी कुछ ऐसे हो चुके थे की उसके फैसले को सब ने मंज़ूरी दे दी ...बस फिर क्या था ...।ज़रीन ने कुछ सोचा न समझा बस चल दी ।पहाड़ो की ऊंची ऊंची चोटियों से उतरते वक्त बस के हिचकोले सहते हुए वो यही सोच रही थी की उसे इन उचाइयों से भी ऊपर जाना है .अपनी ज़मीन और अपना आकाश उसे खुद बनाना है ।
अच्छी तालिम और बाप के रूतबे के कारण उसे नौकरी और रहने के लिए जगह मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई । यही सोच कर बाप एहसान ले लिया चलो आखिरी बार ही सही अब आगे कहा ज़रूरत पडेगी इनकी ।।
लेकिन नरेश की ज़िन्दगी ऐसी नहीं थी । वो जो सोचता था वो ही करता था ।हर कोई उसे पसंद करता था अपना धर्म अपना परिवार उसके वो बहुत करीब था ।पर हां वो किसी भी चीज़ को अपने पर हावी नहीं होने देता था । बहुत समझदारी के साथ वो आगे बढ़ रहा था ।एक आम मध्यम वर्गिय परिवार में जन्म होने के कारण मेहनतकश ज्यादा था .कभी कभी दोस्त यारे के साथ पीने पिलाने का दौर भी लगा रहता था ।
इसी बीच नरेश की कंपनी का करार एक फ्रेंच कंपनी के साथ हो गया जिसके चलते कंपनी ने कुछ गिने चुने लोगो को फ्रेंच सिखने के लिए कहा गया ।
ज़रीन को भी किसी ने सलाह दी थी की ट्रेव्लस इंडस्ट्री में आगे बढ़ना है तो किसी विदेशी भाषा का आना ज़रूरी है इसलिए उसने भी फ्रेंच सिखने के लिए दाखिला ले लिया ..कहते हैं जिसे मिलना होता है वो मिलकर ही रहता है और उनके मिलने का रास्ता अपने आप बन जाता है ।
क्लास का पहला दिन हर कोई व्यस्त ..एक तो दिन भर दफतर में काम ऊपर से भाषा सिखने का चोचला ।एक ही क्लास में कुछ प्रोफैशनल , कुछ कालेज के छात्र एक अलग ही माहौल ।
सब क्लास में पहुच चुके थे लेकिन ज़रीन आटो वाले से झगड़ा कर रही थी ..इतने पैसे कहा लगते हैं इतने पैसे मैं नहीं दूगीं इतने में चलना है चलो आटो वाले कहा मानने वाले ।थक कर ज़रीन को बस से ही आना पड़ा नतीजा ये हुआ की क्लास तक पहुचते पहुचते क्लास खत्म हो चुकी थी ... लोग पढ़ कर बाहर निकल रहे थे ..नरेश भी बाहर निकला तो बाहर खड़ी ज़रीन ने उससे पुछ लिया आप क्लास में थे क्या पढ़ाया आज..नरेश ने कहा कुछ नही बस इतना कहा की आज आप अपने पाटनर चुन ले और कल सब को उनके बारे में बताइएगा..
ज़रीन ने कहा ये क्या बेकार की चीज़ है ..ज़रीन जल्दी से प्रोफेसर के पास दौड़ी ..न जाने उससे क्या बात की और वापस नरेश के पास आकर बोली आप मेरे पाटनर मै ज़रीन भट्ट श्रीनगर से अब आप अपने बारे में बताइये..। नरेश हड़बड़ा गया और बोला मैं नरेश चोपड़ा इसी शहर से बस यही दोनो का परिचय था ।
दोनो ने अपनी अपनी राह पकड़ी । घर पहुचते पहुचते ज़रीन को काफी देर हो चुकी थी । रास्ते मे तीन बार उसकी मां का फोन आ चुका था जिससे उसका मूड और खराब हो चुका था ।न जाने क्यों इतना परेशान कर रही हैं नहीं रखना है मुझे इनसे कोई वास्ता ..। घर पहुची तो माकान मालकिन भी नाराज़ थी बोली..देखो कशमीर से कुछ लड़के तुम से मिलने आए थे हमे ये सब पसंद नहीं है माकान लेते वक्त तुमने कहा था तुम्हारा यहां पर कोई नहीं देखो वैसे भी तुम मुस्लमान हो और कश्मिरी भई बहुत डर लगता है ..और भी न जाने क्या क्या बड़बड़ाती रही ।
लड़के जो नंबर देकर गए उस पर फोन किया तो पता चला की . नंबर नशीद है जो उसकी खाला का लड़का है ..जिसको ज़रीन की मां ने जरीन का हाल चाल जानने के लिए भेजा था ...बस इतना सुनते ही जरीन आगबबुला हो गई । उसी वक्त अपने घर वक्त फोन मिलाया और अपनी मां पर बरस पड़ी ... न जाने क्या क्या बक डाला ..
फिर फोन काट कर रोने लगी रोते रोते कब सोई पता नहीं सुबह काफी देर से उठी ..देर से दफतर पहुचीं देर तक काम किया क्लास कब मिस हो गई पता नहीं चला..।
दूसरी तरफ क्लास में सब एक दूसरे का परिचय दे रहे थे और नरेश दरवाज़े पर नज़र टिकाए ज़रीन का इंतज़ार कर रहा था .तभी उसका नाम पुकारा जाता है .वो उठता है और बोलना शुरू कर देता है .. मै जिनके बारे में आपको बताने जा रहा हूं वो इस वक्त यहां मौजूद नहीं है लेकिन अगर मैं उनके बारे में नहीं बताऊंगा तो आप लोग बहुत कुछ मिस कर जाएगे ..इसके बाद नरेश जो बोलना शुरू किया तो बोलता ही गया ..जब रूका तो हॉल तालियों से गूंज रहा था ...
क्लास के बाद हर कोई नरेश को मुबारकबाद दे रहा था और कहे रहा था हमे भी मिलवाना वादियों की उस दिलकश हवा से .नरेश को उस रात नींद नहीं आई न जाने कैसे कैसे खव्वाब वो देख रहा था ..उधर जॉरीन इन सब बातों से बेखबर अपनी परेशानियों मे मुबतिला थी...।
दूसरे दिन ज़रीन को अपने दफतर के काम से एक दूसरी कम्पनी में जाना था । जैसे ही रिस्पशन पर पहुची तो वहां उसे गौतम मिल गया .। गौतम न देखते ही कहा भई वहा कल ही तारीफ की और आज मुलाकात करने आ गई...।ज़रीन कुछ समझ नहीं पाई उसने कहा जी... गौतम को एहसास हो गया की शायद इन्हे कुछ मालुम नहीं तो उसने बात संभाली और पुछा बताए कैसे आना हुआ क्या काम है .ज़रीन ने आने का मकसद बताया तो गौतम ने उसे आदमी के पास मिलने भेज दिया जिसके हाथ में काम था .. और अंदर आ कर नरेश को बताया ..।
जब ज़रीन वापस आई तो देखा गौतम और नरेश दोनो इंतज़ार कर रहे हैं ..ज़रीन नरेश को पहचानती थी देखते ही बोली अरे आप ..तब दोनो ने अपने बारे में बताया तीनो ने काफी पी ..गौतम ने कल की घटना को बताया तीनो खूब हंसे और शाम को क्लास में आने का वादा कर के अपने अपने काम पर चले गए।
जॉरीन का दिन अच्छा बीता और क्लास में बी वक्त पर पहुची ..और हां इसबार आटो वाले ने भी सही पैसे मांगे..क्लास में पहुच कर वो खुद को खास बहुत खास महसूस कर रही थी जो एहसास इससे पहले उसे कभी नहीं हुआ था । और इसी की उसे चाहत थी की लोग उसको जाने उसकी कद्र हो औऱ ये महत्व किसी और ने नहीं नरेश ने दिलाया था ...खुश थी ज़रीन नहीं बहुत ज्यादा खुश थी ...आज माकान मालिकन की बाते भी अच्छी लग रही थी और आज ही अपनी मां का हाल भी फोन कर के पुछा ...।
हमारे समाज में जब कोई बात न हो तब इतिहास रच दिया जाता है और फिर जब बात हो तो ..कोई ग्रंथ से कम क्या लिखा जाएगा..लेकिन अगर आप खुश हैं तो सब कुछ ठीक है और आपको ठीक ही लगता है और ज़रीन कब किसकी फिक्र की है जो उसे अब किसी बात की चिंता सताए गी ।
उसने दोस्ती के आगे कुछ नहीं सोचा अभी उसे अपने काम में बहुत आगे जाना है ।कई नये किलाइंट नये दोस्त और बहुत सारा प्यार क्या चाहिए ज़रीन को और .।
क्लासिस खत्म हो गई पर दोस्ती बढ़ गई..नरेश से रोज़ मुलाकात .साथ में काफी ..फिर घर तक ड्रापिंग और रात भर मुबाइल पर बातें ..बस दोनो की जिन्दगी यहीं तक सिमट कर रहे गई थी .....।
पर कल्पनाओं और वास्तविकता में बहुत फर्क होता है और हकीक़त हमेशा सबसे आगे रहती है ..।घुमना फिरना काम काज तो सही पर कब तक....
जब आप बाहर निकलते हैं तो दस तरह के लोग आप को देखते हैं और दस तरह की बाते करते हैं ..और फिर एक लड़की वो लड़के साथ धुमे तो बाते बनना लाज़मी है ..।नशीद ने भी ज़रीन को नरेश के साथ धूमते देख लिया ..एक बार तो वो मिलने भी आ गया ..ज़रीन ने नरेश का परिचय भी कराया पर उसका फर्ज़ था घरवालों को बताना तो उसने बता दिया ...फिर क्या होना था ..वो ही शोर शराबा रोना पीटना कोसने गाली सब फिर से शुरू हो गया..।यानि ज़रीन की ज़िन्दगी फिर उसी उलझनो और परेशीनियों से घिर गई..
आप ये मत सोचिए की नरेश के घर में कुछ नहीं हुआ उसे भी वो सब सुनने को मिला जो ज़रीन ने अपने घरवालों से सुना ..।जब उसने अपने और ज़री रिश्ते के बारे में बताया पर वो लड़का था कमाता था इसलिए घर वाले चुप हो गए..दिन गुज़रते गए सब को लगा बात खत्म हो गई ...पर तूफान शांत होते हैं खत्म नहीं होते ..।
आचानक दोनो ने फैसला लिया की अब बस अब शादी करेगें.. पर एक तरफ जरीन की शर्ते थी और नरेश के पास कई सवाल ..दोनो एक तो हो रहे थे मगर क्यों ..जिस समाज की इन्होने कभी परवाह नहीं की आज वो ही समाज इन्हे एक कर रहा है ।दोनो ने कई बार सोचा पर एक दूसरे को बताने की हिम्मत नही जुटा पाए..बस कई विवादों .समझौतों कुछ हां कुछ न के चलते दोनो की शादी हो गई..हां दोनो ने एक दूसरे के लिए कितना बड़ा एहसान किया कितना सैकरिफाइज़ यही इनके रिशते की बुनियाद थी ..और जब ऐसी किसी भी रिश्तों की नीव हो तो बात बात पर झगड़ा क्यो नहीं होगा ..जहां पहले एक दूसरे के बिना दिन नहीं कटते थे वहीं अब एक दूसरे के साथ एक पल भी काटना मुशकिल होता जा रहा है इतना तनाव इतना खिचाऊ की बस फट जाए आदमी दोनो का अहम दोनो के प्यार से कहीं आगे ..क्यो हर बार शिकायत क्यों इतने शिकवे ...हर बार मैं ही झुकूं...
क्या मेरी गलती है ..चलती गाड़ी मे हिलते हुए टेडी बियर से नरेश ने पुछा ..बोल ..बोल बोल बता ..बस आज सब खत्म ..नहीं रहना मुझे उसके साथ ..इतनी ज़िद बस बहुत हुआ..
तभी नरेश के फोन की घंटी बजती है दूसरी तरफ बिल्डिंग का चौकीदार है ..साहब ज़रीन साहब का एकसीडेंट हो गया सोसाइटी में आ ही रही थी की तभी तेज़ रफतार होंडा सिटी ने टक्कर मार दी ..ये सुनते हा नरेश क होश उड़ गए .गाड़ी अस्पताल की तऱफ मोड़ दी । गौतम को भी फोन कर दिया ..।
हास्पिटल में ज़रीन आईसीयू में थी पुलिस पुछताछ कर रही थी ..नरेश थक कर कुर्सी में बैठा ...तभी एक लाश उसके सामने से गुज़री उसके पीछे एक 60-65 साल की औरत रो रही थी और बोल रही थी अरे जिससे प्यार करते हैं उसी से तो झगडा करते है ज़िद करते हैं ..तुम्ही तो मेरे हो तुम्हारे सिवा कौन है मेरा ..बस आ जाओ एक बार आजाओ.माफ कर दो मुझे ...यूं न जाओ...
ये सुनते ही नरेश फूट फूट कर ज़ोर से रोने लगा......
( ये कहानी लेखक से बिना अनुमति के इस्तेमाल न करें)
Subscribe to:
Posts (Atom)
