Monday, February 21, 2011

मौला का घोड़ा...





मौला का घोड़ा...

मास्टर हुसैन साहब जब फतेहपुर से दिल्ली आये तो नौकरी के साथ मौला हुसैन की अज़ादारी का भी बंदोबस्त लेकर आये अपनी बिरादरी के लोगों को खोजा और रहने की जगह ली और एक इमामबाड़ा तामिर कराया।हर साल मोहर्रम के बाद सफर के महिने में एक जुलूस निकालते जिसमें अलमओं के साथ ज़ुलजुना भी होता ।
वक्त के साथ आबादी और आस्था भी बढ़ती गई और साथ में बढ़ती गई रंजीश और नफरत। उन्ही के बिरादरी के लोगों की उन्ही के लिए। इसकी वजह भी इमामबाड़ा और जुलूस ही था । साल भर सब ठीक ठाक चलता लेकिन जैसे ही मोहर्रम का चांद निकलता उसके के साथ नफरत की और जलन की दिवारें खिंच जाती ।ग़मे हुसैन के आंसू के साथ न जाने असद ने कहां से जगह बना ली ये किसी को नहीं मालुम। सब से अच्छा और दूसरे से बेहतर हमारे मौला, इसकी होड़ सी लग जाती।
मुझे लगता है धर्म का इस्तेमाल सब अपनी सुविधा और सहुलियत के हिसाब से करते हैं ।अल्लाह की किताब अल्लाह के लोगों और खुद अल्लाह मात्र बातों और आदर्शो की तरह हो गया वैसे ही जैसे आज की हर राजनीतिक पार्टीओं ने अपने पुराने लोगों और विचारकों को दिवारों और पुण्यतिथी तक महदूद कर के छोड़ दिया है ।
कहते हैं लखनऊ में दूसरे विचारों के लोग नहीं चाहते है मौला का जुलूस निकले इसलिए वो हर साल कुछ न कुछ ऐसा करते हैं जिससे जुलूस और मजलिस मातम में रूकावट आये, हर साल दंगा नही तो दंगे जैसे हालात हो ही जाते हैं ।
भले ही हम वहां दूसरों पर इल्ज़ाम लगा कर अपना दामन बचा ले लेकिन जिसकी फितरत में डंक मारना लिखा हो वो डंक मार ही देता है हर साल कोई न कोई किसी तरह की रूकावट खड़ी ही कर देता है। नहीं नहीं जी, सफर बहुत लंबा ,नहीं नही जी, रास्ता बहुत खराब है वहां पर कोई सुविधा ही नही है आचानक से पूरी बिरादरी के कद्दावर लोग एक हो जाते अकेले रहे जाते तो मास्टर हुसैन और ग़रीब, हुसैन को मानने वाले सच्चे लोग। लेकिन अपने दम और मौला की मोहब्बत के सहारे वो जुलूस को निकालते और कामयाब बनाते पुलिस बंदोबस्त से लेकर तबरूक हर चीज़ का इंतज़ाम किया जाता ।
इन्ही हालातों के बीच में जुलुस हर साल निकाला गया बीच में सरकारी ऑडर भी आया की दिल्ली में सन 1978 और बिना आज्ञा वाले जुलूसों को बंद किया जायेगा जिसमें सरदारों के कई जुलूस बंद हुए ।लोगों ने सोचा इस साल मास्टर हुसैन के घर आने वाला जुलूस भी बंद होगा लेकिन सच्चाई और इमानदारी कभी बेकार नहीं जाती मास्टर हुसैन के पास सन 1977 से परमीशन की कॉपी थी । जिससे सब का मुहं बंद हो गया ।
34 साल से लगातार उस चीज़ की सरदर्दी जो सिर्फ उनका नहीं सब का है अपने हौसले की बदौलत या मौला से सच्ची मोहब्बत की खातिर लगातार अपने जुनून को कायम किये हुए ।यही जज्बा उनके बच्चों में भी गया..। मोहर्रम के अलावा भी जिंदगी में कई बार ग़म आते हैं मास्टर हुसैन की पत्नी दुनिया से रूख्स्त हो गयी। बेटे ने दूसरे मज़हब में शादी कर ली। तो लोगों को यकीन हो गया कि अब तो मास्टर साहब के घर आने वाला जुलूस बंद । पडोस में रहने वाले जिन्हें कभी मास्टर हुसैन ने ही बसाया था । वो ही उनके सब से बड़े दुश्मन के रूप में नज़र आने लगे । उन्होने गुप चुप कहना शुरू कर दिया कि मास्टर साहब अपनी औलादों से परेशान हैं और इस बार जुलज़ुना हमारे घर आयेगा... बात निकली तो सारे दुश्मन एक हो गये मीटिंग हुई पहले तय हुआ कि दो जुलज़ुना निकाले जायेगें फिर मसले और मसायल का ज़िक्र हुआ और नये नये मुल्लाओ और नेताओं ने कहा कि मास्टर साहब का जुलज़ुना को ही आपके घर में बढ़ाया जायेगा.. सब कुछ इधर तय हो रहा था और उधर मास्टर साहब मौला के घोड़े का इंतज़ार कर रहे थे .. इस बार किसी दूसरी जगह से दुलदुल आया था काफी लंबाचौड़ा और बहुत ही रौनक और रौबिला .. तैयार किया गया सजाया गया ।सब कुछ ठीक था दुश्मन भी और दोस्त भी सब अपने अपने मंसुबों को पूरा करने की ताक में थे । पर अल्लाह की मसलयहत कुछ और ही थी तैयार होने के बाद ज़ुलज़ुना शांत हो जाता है या अगर आधुनिकता की बात करें तो ये भी कहे सकते है कि उनको ट्रेनिंग एसी मिलती है कि वो खामोशी से चलते रहते हैं क्योंकि उसे इमाम हुसैन के घोड़े की शबी के रूप में देखा जाता है मान्यता है जब इमाम हुसैन का यज़ीद की फौज ने कत्ल कर दिया तो उनका घोड़ा जिसे ज़ुलज़ुना कहते हैं खेमे में आया था बिना सवार के खाली ज़ुलज़ने को देख कर औरते समझ गई थी कि इमाम हुसैन इस्लाम की राह पर शहीद हो गये और औरतों ने घोड़े से लिपट कर गिरया किया कि तू क्यों हुसैन को छोड़ कर आ गया ... ।घोड़े को पूजा नहीं जाता ब्लकि उस वक्त को याद किया जाता है ।
हां इसबार न जाने दुलदुल को क्या हो गया जैसे ही जुलूस निकला। घोड़ा किसी के काबू में न आये ..इस पर लोगों ने अपने आइडिये फेंके शुरू कर दिये कि ...कोई नजिस चीज़ और नापाक कपड़ा उसपर डाल दिया गया होगा। दुआएं पढ़ी गई हर तरह के हथकंड़े अपनाए गये पर दुलदुल संभलने को तैयार नहीं .। लोगों को तो मौका मिल गया उन्होने कहना शुरू कर दिया बस मास्टर साहब के घर नहीं बस यहीं पर ही बढ़ा दिया जाए.. लेकिन जो शख्स दुलदुल लाए थे और मास्टर साहब का भतीजा जिसने ज़ुलज़ुने को पकड़ा हुआ था उसने कहे दिया दुलदुल जायेगा तो चाचा के घर ही जायेगा और पूरी कौम एक तरफ वो अकेला एक तरफ .. और ज़ुलज़ुना लेकर चल दिया । जब बात फैली की मास्टर हुसैन का भतीजा रज़ा ज़ुलज़ुना लेकर चल दिया है तो पड़ोस में रहने वाले जो सारी रणनीति के रचता थे घबरा गये और दौड़ लगाई ज़ुलज़ुने तक। कहने लगे मीटिंग हुई थी हमसे पैसे लिये गये पाच हज़ार रूपये लिये की ज़ुलज़ुना आपके घर में रूके गया । रज़ा ने कहां पांच मिनट के लिए ज़ियारत करने के लिए रोक लिया जायेगा पर वो अकड़ गये बात बढ़ गई मौला का घोड़ा न जाने क्या सोच रहा होगा । रज़ा ने कहा भई जिसने मीटिंग की थी और जिन्होने पैसे लिये है फिर वो ही ज़ुलज़ुने को ले जायेगें.. क्योंकि ज़ुलज़ुना संभल नहीं रहा और ये मास्टर हुसैन के घर पर ही बढ़ाया जाएगा और कहीं नहीं जायेगा। ये कहे कर उसने दुलदुल का रूख़ मास्टर हुसैन के घर की तरफ कर लिया । न जाने क्यों बेकाबू घोड़ा उनके घर पर कदम रखते ही ही शांत हो गया औरतों ने जैसे ही नौहा शुरू किया उतने में वो पड़ोस की औरत घर मे घुस आईं जिनकी साज़िश थी दुलदुल को अपने घर ले जाने की और आते ही मास्टर हुसैन के बच्चों को कोसने देना शुरू कर दिया और उनके भतीजे को जिसने घोड़ा पकड़ा था ..मास्टर हुसैन की औलादें रोने लगी कि अण्टी हमारी तो मां भी मर गई आप हम लोगों को क्यो कोस रही हैं ... पर वो न रूकी औरतों ने उन्हे पकड़ कर बाहर निकाला मास्टर हुसैन और उनके बच्चे ज़ुलज़ुने से लिपट कर खूब रोए न संभलने वाले घोड़े ने न जान कैसे पूरे परिवार को संभाल लिया सब ज़ोरो कतार से रो रहे थे ..और बच्चों ने कहा मौला न जाने अगले साल हम इस हालात में आपको ला पायेगें या नहीं कुछ मालुम नहीं .. इन बातों के बाद जब ज़ुलज़ुने पर नज़र गई तो देखा मौला के घोड़े की आंखों में भी आंसू थे...।।

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