Monday, May 16, 2011

जसबीर कलरवि

हमें आता है अब इस ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कहना

यहाँ मिल जाये कुछ मस्ती उसे ही मयकदा कहना



चला हूँ मैं तो बस इक बूँद लेकिर मापने सागर

तू अब सारे किनारों को ही मेरी अलविदा कहना



जो दरिया गुनगुनाता है नदी जब राग सा छेड़े,

उसे जा के समुन्दर की ज़रा आबो-हवा कहना।



वो तेरी मंजिलों के सब पते ही तुम को देता है,

मगर उसकी ये किस्मत तेरा उसको ला-पता कहना।



जो उस-से मागते हो तुम वो कुदरत दे ही देती है,

इसे अपनी दुआ समझो या फिर उसकी अदा कहना।



मैं अपने हर जनम में ही मरा अपनी वफ़ा करके,

मुझे कहना नहीं आया किसी को बे-वफ़ा कहना।



लकीरें फिर मेरे माथे की अक्सर फट ही जाती है,

मेरा जब भी किसी पत्थर को अपना आईना कहना।

No comments: