Friday, September 2, 2011

मुंह चिढ़ाते गांधी जी

मुंह चिढ़ाते गांधी जी
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मन बार बार और ज़ार ज़ार रो रहा है । बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा पर ऐसा लिखूंगा और क्या लिखूंगा कुछ पता नहीं ..पर वो ही ज़िंदगी के ऊतार चढ़ाव ..दुख दर्द का सिलसिला और खुशी के बस कुछ पल जो न जाने कब आते हैं और कब चले जाते हैं कुछ पता ही नहीं चलता ..ज़िन्दगी की एक सच्चाई एक हकीक़त ..पैसा ..न जाने ज़िन्दगी में कहां से आया और इतना महत्वपूर्ण हो गया कि कुछ भी और कोई भी इसके आगे सोचता ही नहीं ..तकलीफ होती है किसी के दर्द को देख कर और दुख होता है उस दर्द को कम न कर पाने का । क्यों इस दुनिया में लोग परेशान है क्यों लोग तकलीफ में हैं..जब जानने की कोशिश करते हैं तो अंत में काग़ज़ में छपे गांधी जी ही कारण दिखते हैं ..क्या बापू ने कभी सोचा होगा कि जो उन्होने सारे आंदोलन जिन गरीबों के लिए किये उन्ही गरीबों को नोटो में छपी उनकी शक्ल देखना नसीब भी न होगी ।।

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