Saturday, December 10, 2011

कब कहां और कैसे

कब कहां और कैसे
काग़ज़ की एक कश्ती
पानी में कुछ यूं चली
लोगों ने कहा
क्या खूब बढ़ी..
फिर न जाने किस सैलाब में
बह गई
कब कहां और कैसे..
एक छोटा दीया था
कुटिया को रोशन किया करता था
अपनो के लिए जीया करता था
फिर न जाने किस तूफान में बुझ गया
कब कहा और कैसे
एक नन्हा बूटा था
अपने बगीचे में रहता था
खूब खुशबू देता था
सब को अच्छा लगता था
फिर न जाने किस आंधी मे टूट गया
कब कहा और कैसे
एक प्रेमी जोड़ा था
बहुत खुश रहता था
एक दूसरे के साथ चल था
फिर न जाने किस मोड़ पे मुड़ गया
कब कहा और कैसे...

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