Sunday, December 23, 2012

अधूरे खव्वाब......(THEATRE ARTISTE OF INDIA)


अधूरे खव्वाब......



मेरी कविताए शायद में इस को प्रकाशित न कर सकीं इसलिए इसें में THEATRE ARTISTE OF INDIA को मंचन के लिये देता हूं मुझे लगता है वो मेरी कविताओं के साथ इंसाफ करेगें
शान

अब नही रहा जाता खामोश
दरिया भर गया है ..
तूफान बस रूका है
बरस जाए गा बादल
गिर जाएगी बिजली
छलक जाएगा पैमाना
बंद जंबा खुलने वाली है
शायद प्रलय आने वाली ..
क्यों सहूं ज़िल्लत
क्यों सुनु उसकी
इस पेट के खातिर
ये भी अब मुझ को समझ गया है..
बस बुहत हुआ अब खामोश नही रहा जाता ....






2
लो फिर बात चली
एक हल्की हवा फिर चली
लो तेरी बात फिर चली ।।
हर झोका एक एहसास जगाता है
हर बार एक तमन्ना फिर जग जाती है
कोई कुछ कहता है
पर मन तेरे बारे मे ही सोचता है।।
चलता हूं गुज़रता हूं
जब उन बीते रास्तों से
हर तरफ वो पल नज़र आता है।।
सादगी थी, मसूमियत थी
हम में न जाने कौन सी रौनक थी ..।।
वो ही तारीख वो ही दिन, पर साल बदलते देखे
हमने वक्त के साथ सारे, रिश्ते बदलते देखते ..।।
फिर जब भी कोई ज़िक्र हो जाता है ...
एक एहसास फिर उठ जाता है...
शायद तू भी वो ही सोचता होगा
शायद तुझ को भी वो ही याद आता होगा...।।
लो फिर बात चली
एक हल्की हवा फिर चली
लो तेरी बात फिर चली ....।।

  
3
मां.....
क्यों चली गई
बहुत याद आती है
आंख अक्सर भर जाती है
कुछ कहूं ,कुछ करूं
तेरी शबी नज़र आती है
आज मलाल है तेरे जाने का
तेरे लिए कुछ न कर पाने का
मैं नाकारा रहा निक्मा रहा
फिर भी तेरा दुलारा रहा..
वो शब्द अब भी गूंजते है
मैं चली जाऊंगी जब पता चलेगा
वो शायद तब मज़ाक था पर
उस हकीक़त का एहसास अब हो रहा है...
सच मैं मां बहुत याद आती है


4
तेरे जाने के बाद
बदल गए हम
बदल दी हर तस्वीर
बदल दी हर याद
बदल दी हर बात
बदल दिए रास्ते
बदल दिए चौहराए
बदल दी हर गली
बदल दिए हर नुक्कड
बदल दी हर पसंद
बदल दिए जो थे संग
बदल दिया अपना रंग
बदल दिया अपना ढंग
बदल दी महफिल
बदल दिए उसूल
बदल दिया इमान
बदल दिया फरमान
बदल दिया माकान
बदल दिया भगवान
फिर भी रहे गया अरमान
काश तुम होते
तो मै न बदलता
तेरे जाने के बाद


5
कुछ अधूरे काम बचें...

उम्र साठ साल ..
नौकरी से मुक्त
बच्चों की ज़िम्मेदारियों से रिहा..
न कर्ज़ न कोई फर्ज़..
जी लूं तो ठीक..
न रहूं तो भी सही..
कोई आए तो अच्छा
न मिले तो बेहतर..
भगवान की शरण में
तीर्थ स्थानों में
मंदिर में, दरगाहों में
इस से, उस से
जहा और जिससे वक्त गुज़र जाए
वो बेहतर
पर कुछ पूरा करने की चाहत में
कुछ हसरतों के एहसास में
उम्र के कुछ दिन बचें हैं..
कुछ अधूरे काम बचें हैं..
कभी किसी का दिल तोड़ा
कभी कोई रिश्ता छोड़ा
कभी इस फिराक में
कभी उस जुगाड़ में
इससे लिया उसको दिया
वहां अच्छा बना तो वहां बुरा बना
किसी का भला किया तो किसी की भुला दिय़ा ..
ज़िन्दगी के इस मुकाम पर
कुछ अधूरे काम पड़े हैं...
मां की गोद से कब ज़मी पर चला
बाप की उंगली से कब छूट गया
जाने किस रिश्तो से घीरा
किस बंधन में बंधा ..
सोचता हूं मैं
क्या मैने सब कुछ पूरा किया ..
सागर की लहरों में मोतियों की खोज से
ज़िन्दगी के इस पल में कुछ
अधूरे काम बचें है.......


6
कहा गये प्यार के शब्द
एक ऐसा गीत जिसमें प्यार भरे शब्द हों
एक ऐसा गीत जो सब के लब पर चढ जाये
एक ऐसा गीत जो सारे भेद भाव मिटाये
एक ऐसा गीत जो अपना बनाये
एक ऐसा गीत जिसे सब गुनगुनाये
एक ऐसा गीत जिसे तो भी सुने और वो भी सुने
एक ऐसा गीत जिसमें अपना सा एहसास हो
एक ऐसा गीत जिसमें खुशग़वार माहौल हो
एक ऐसा गीत जिसमें हमसफर ही हमराज़ हो
एक ऐसा गीत जिसमे लहरों और वादीयों का साथ हो
एक ऐसा गीत जो चंदा औऱ तारों पर चलाये
एक ऐसा गीत जो हर मुशकिल दूर भगाये
एक ऐसा गीत जो फिक्र को मात दे
एक ऐसा गीत जो गुलामी से निजात दे।।
पर क्या करूं
मिल नहीं रहे मुझे शब्द
लिखना तो चाहता हूं
सूझ नहीं रहे बोल ...
कितना वक्त बीत गया
सूने हुये प्यार के शब्द ..
.
कहां से खोजूं
कहां से लाऊ,
ढ़ूढ़ कर प्यार वाला अक्षर
किधर जाऊं, किससे मांगू..दो ,चार शब्द ।..
न हिले लब..न चले ज़हन .।
कैसे लिखूं एक प्यार भरा गीत...।।




7
धीरे-धीरे
धीरे धीरे तुम होये मेरे
धीरे धीरे चंदा ढलहे
धीरे धीरे तारा चले
धीरे धीरे आसू बहे
धीरे धीरे लब हिले
धीरे धीरे नज़रों ने देखा
धीरे धीरे अपने हुये
धीरे धीरे पास आये
धीरे धीरे मुस्कुराये
धीरे धीरे और नज़दीकियां बढ़ी
धीरे धीरे धर्य टूटा
धीरे धीरे कुछ हुआ
धीरे धीरे फिर दूर हुये
धीरे धीर और दूर हूये
धीरे धीरे यादे आई
धीरे धीरे यादे रहीं
धीरे धीरे यादे उझल हुई
धीरे धीरे बस अब यूहीं
और अब यू भी नहीं....
धीरे धीरे अब कुछ नहीं होता
धीरे धीरे अब कुछ नही होगा
धीरे धीरे बहुत हुआ
धीरे धीरे अब खत्म
अब जो होगा तेज़ होगा
ज़बरदस्त होगा

  


8
आज मैं दुखी हूं
क्या फिर से तुम दुखी हो
हां फिर से
उफ इस बार क्या हो गया
पता नहीं
पता नहीं ,फिर क्यों दुखी हो
क्या दुख हो तो उसके पीछे कुछ होना ज़रूरी होता
हां जरूरी है ..बहुत ज़रूरी है
बे बात के दुखी होना बेवाकूफों की निशानी है
तो मैं बेवाकूफ ही सही
पर कोई तो वजह होगी
तुम वजह जान कर क्या करोगे
कुछ नहीं पर जानना चाहता हूं
क्यों
मेरी आदत है मेरा शौक है
क्यों क्या करते हो जान कर
मै क्या कर सकता हूं
कुछ नहीं तो ..तो फिर
हां बस तुम दुखी हो ये बात मैं दूसरों को बता दूगां
दूसरों को तुम मेरा दुख ,दूसरों क्यों बताओ गे
मैं तो यही करता हूं
दूसरे क्या जवाब देते हैं
कुछ नहीं वो कहे देते है
अरे वो तो बस दुखी ही रहता है

  

9
देखो उसने मुझे देखा
अच्छा लगा
फिर देखा तो
मैने कुछ सोचा
जब फिर देखा तो
कुछ अटपटा लगा
अब वो फिर देख रहा
और मुझसे बर्दाशत नही हो रहा
क्यो ये मुझे बार बार देखा रहा
देखने की भी हद होती है
हिम्मत कर के मैने भी उसे देखा
पर कुछ देर के बाद मैं न देख पाई
पर वो देखता जा रहा है
मुझे तो अब घबराहट हो रही है
कौन है ..क्यों देख रहा है
क्या कोई जान पहचान का है
आस पडोस का
कोई रिश्तेदार या कोई रिश्ते लाने वाला
पर ऐसे कैसे मुझे ये देख सकता है
पास जाऊं..नही नहीं बेकार की बात है
क्यों बात को बढ़ाऊं
पर अब भी मुझे वो देख रहा है
अब मुझे डर लगा रहा
क्या चाहता है
क्यों इस तरह..
बार-बार मेरी तरफ
मेरी तरफ मेरी तरफ
क्या मंशा है
क्या करूं ..क्या न करू
शोर करूं..ज़ोर से
नहीं नहीं नहीं
यहां से भागों पर कहा
क्या इन नज़रों से बच सकती हूं
या ये नज़र मेरा पीछा छोड़ सकती हैं
मुझे तो इन आंखों के साथ ही जीना है
इन्ही के साथ रहना
जहा भी पहुचना है वहां इन्ही को पाना
शक्ले बदलेगीं पर नज़रे नहीं
लोग बदलेगे पर सोच नहीं





10
तलाश में किस की भटक रहे हैं हम ...
किस के लिये तरस रहे हम
न जाने खुदा को क्यों ढ़ूढ़ रहे हम ...
मौला मौला, आका आका, रब्बा रब्बा याद आ रहा है क्यों..
चाहिये एक ज़मीन.. .चाहिये एक नगर
गली गली इधर उधर क्यों मुड़ रहे हैं हम ..
देखो वो देख रहा है..
वो सब जान रहा है
उस को सब पता है
वो ही तुम्हारा है
वो ही तुम को लाया है
वो ही तुम को लेकर जायेगा
तुम अकेले नही हो
वो तुम्हारे साथ है
क्यो डर रहे हो
किससे डर रहे हो
उसे सब मालुम
वो किसी को कुछ नहीं बतायेगा
बस तुम को समझायेगा
दिलासा देगा
सहारा बनेगा
रास्ता दिखायेगा...
तुम को उससे मिल कर अच्छा लगेगा..
अरे वो तुम्हारे बारे में सब जानता है ..
तुम किससे मिलते हो
किससे मिलना चाहते तो
उसको पता है....
देखो कुछ दिन की तो बात है
फिर सब ठीक हो जायेगा
सब पहले जैसा
बिल्कुल पहले जैसा..
हां वो भी मिलेगे
और वो भी मिलेगा...
क्या चाहिये और..
कुछ बचा है क्या
अरे जो बच गया वो भी मिल जाये गा..
बस एक या दो दिन..
क्यों नही होगा अरे
सब कुछ तो हुआ है वो भी हो जायेगा..
देखो देखो सब भूल जाऊ..
अरे कर के तो देखो .
.
मानो तो...बस यही है
बात नहीं मानते
मान जाते तो आज ये नहीं होता .
पर तुम क्यों मानोगे
आज तक कुछ माना है जो अब..
बस यार रहने दो
तुम्हारा कुछ नही हो सकता है
बस यूंही कूढ़ते रहो ..सड़ते रहों
अरे तुम्हारे लिये कितना किया
और कोई क्या करेगा ...
बस बहुत हुआ अब ताकत नही है
तुम्हारी जिन्दगी है तुम जानो
हम तो समझा सकते थे
समझा दिया ...
आगे अल्ला मालिक..
पर क्या करे दिल दुखता है
भई ग़लती हो गई माफ कर दो..
अच्छा जी चलें
ठीक .. देखो..सुनो ..चलो छोडो
तुम्हारी मर्जी़ ..जो दिल में आये करो.....






11
देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम...
अब जली है वो लौ
जिसको बुझने न देगें हम.
भुगत रहे कई बरसों से
तुम्हारे गुनाहों की सज़ा हम
हर पल हर दम
हिन्दू मुस्लमां बनाये गए हम.
खून बहा हमारा ही
घर जले हमारे ही
सुबक सुबक कर
सहम सहम कर
क्यों जीये अब हम
देखो बहुत हुआ
अब न होने देगें हम
जब चाहा तुमने
जैसे चाहा तुमने
मारा हमको
रूलाया हमको
कभी बंदी तो कभी बंधक बनाया हमको
कभी मुसलमां भगवान तो
कभी हिन्दू अल्लाह याद दिलाया हमको
खुद सोये चैन से हमको खूब जगाया तुमने
देखो बहुत हुआ अब न होने देगे हम
हर बार लाशों के ढ़ेर से
सत्ता की सीढी चढ़ी तुमने
खुद पहना सफेद कुर्ता
हमको सफेद कफ़न पहनाया तुमने
जशन बनाया तुमने जीत का
जीत दिलाने वाले को खूब दुत्तकारा तुमने
पहुचें शहीद पर नोटों की सुगात लेकर
कोई एक लाख़ तो कोई एक करोड़ लेकर
पर अब न चलेगा तुम्हारा ये पडयंत्र
देखो बहुत हुआ.....




12
वो
वो मर गया मै इसलिये उदास नहीं हूं...
क्योकि मृत्यु तो मुक्ति है
और मुक्ति तो स्वंतत्रता होती है ।
स्वतत्रता के लिये उदास होना विद्रोह...
और मैं विद्रोही नही....

धरती तो बंधक है कर्म और कर्तव्य की ..
जो उसे जितना नोकों से कुरेदेगा ....
उसी को तो उसे फल देना है ...
नित दिन पीडा सहने के बाद भी
उसको तो मुसकराना है
मैं भी तो उसका एक कार्यकर्ता हूं
वो मर गया.. मैं इसलिये उदास नहीं हूं ।

अंबर भी तो सुचालक है आशाओं और कल्पनाओं का ..
दूर से ही सिमट आये आंखों मे हमारी ।
हर दिन हमको नये सपनो मे ले जाता है...
उसकी महानता और ऊचाई हमको कितनी छोटी लगती है ।
मैं भी तो उस छोटे से अंबर पर चढ़ना चाहता हूं..
वो मर गया... मै इसलिये उदास नहीं हूं...

कौन था वो... अपना था , पराया था या फिर मेरा अपना ही साया था
छटी उंगली ही सही, था वो मेरे शरीर का ही अंग
वो कटगया या मर गया ,मैने कितनी सरलता से बखान किया...

क्योकि देखता हूं मैं सुनता हूं, मैं हर तरफ अजीवित इंसानों को
मैं भी तो इन शवो के भंडार में एक शव हूं..

वो मर गया मैं इस लिये उदास नहीं हूं......











13
बचपन

अंबा का आचल छूटा
अंबरूह से अंबू रूठा...
उजबक बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

उछल कूद सब हो गये दूर
अकधक-अकबक छूटे यूं
अक्रिय बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा

कुप्रवति से मैं हूं भरपूर
ओछापन है मुझ में यूं
कठपुतली बन कर रहे गया मै
जब से मेरा बचपन छूटा

दोस्त यार अभी भी हैं साथ
अब न उनमे है वो प्यार
बेगाना बन कर रहे गया मैं
जब से मेरा बचपन छूटा..


14


दर्पण....
उस दर्पण पर सर्मपित मैं
जो है हर भाव से परिचित
देखे जो खिलखिलाते चेहेरे
जाने कितने किस के मन हैं मैले
क्या राजा ..... क्या रंक.......
बदल न पाये कोई भी दर्पण के ढ़ंग
मैं भी दर्पण बनना चाहू
सब को उनका रूप दिखांऊ
फिर ये विचार अपने मन मैं लाऊं
बोले सभी कि दर्पण...कभी झूठ न बोले
पर अब तक उसके सच से कौन भला डोले..









15
आस

वो जो खुशियों का एक दीपक बन कर
मेरी ज़िन्दगी में आया था ।
शायद कल्पनाओं का एक साया था
भूल गया था मैं जिन्दगी के ....
हर दुख़ ,हर ग़म ,हर तंनहाई....
अंजान कर दिया था ....
उसने मुझे ग़मों से, परिचित कर दिया था
उसने मुझे गैरो से
कितना खुशनुमा झोका बन कर आया था ......

लेकिन जीवन केवल सुखों का पल थोड़ी है
जब चाहा मैने अपनाना उसे ....
मन के एक कोने चाहा बिठाना उसे
दूर बहुत दूर चला गया वो ....
मुस्कुराहट भी मेरी साथ ले गया वो ...
कितना रोया कितना छटपटाया था मैं...
शायद कभी तो हाथ आयेगा वो ...

लेकिन उसे न आना था न ही वो आया था
वो तो एक साया था ... हां वो तो एक साया था ....

मेरा मन ही पागल था जो उसे पकड़ने को भरमाया था
क्या कभी समुद्र की लहरों से रेत के घरौंदे बचे
या फिर कभी सपने भी हक़ीक़त हुये हैं
तो फिर साया कैसे हाथ आता ...
हां वो सिर्फ साया था .. सिर्फ साया था ... साया ही था



पर ज़िन्दगी नहीं मानती हम नहीं रुकते हम साये के साथ ही जीते है सपनों मे ही रहते हैं ... जानते हुये भी उसी ओर चलते है जिस तरफ मंज़िल का कोई नामोनिशान नहीं ... क्यो ...भला क्यों ....

शायद एक आस के लिये ... आस हां उम्मीद... यही ज़िन्दगी है ....
आज बस इतना ही .... कल शुरू करेगें एक नई कहानी.....













16

मुझे कुछ और समय़ दो , मुझे कुछ और समय दो
मेरे जीवन की लौ को य़ूं न बुझने दो मुझे कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरी आँख के आसू
आँख मे ही अटके हैं
उसको धरती पर तो गिरने दो
मुझे अभी कुछ और समय दो
कुछ और समय़ दो
अभी तो मेरे कानो में आज़ान भी नही गई है
अभी तो मेरे मुंह से राम का नाम भी नही निकला है
मुझे राम और रहीम का कुछ तो जान ने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो
अभी तो मुझे ममता की बांहे भी नही मिली हैं
अभी तो मैंने माँ के दूध का स्वाद भी नही लिया है
मुझे ममता की आगोश में कुछ पल तो रहने दो
मुझे कुछ और समय दो
मुझे कुछ और समय दो






17
कलयुग
थंब था मैं फिर भी थल पर न रूक सका।
दिनकर था मैं फिर भी दाह से न बच सका मैं।।
दुष्कर हो गया जीवन मेरा इन द्विधार्थक बातों से।
इस कलयुग के अंधकार में इन रण की रातों से।।

दृष्टी पहुचीं जिस जगह पर ह्रदयों को जलता पाया ।
तन तो मिले मनुष्य के पर प्रतों की आत्मओं को पाया।।
छन्नी हो गया धर्य मेरा इन दारण क्रियाओं से ।
इस कलयुग के अंधकार से इन रण की रातों से।।

गांधारी की तरह पट्टी बांधी सब ने आंखो मे।
बढ़ जाए ब्रहष्टाचार हम तो सोए हैं सुखद सपनों में।।
दुखित हो गया मैं इन दुखातिका के पात्रों से ।
इस कलयुग के अँधकार में इन रण की रातों से।।

करण बन गया है हर एक व्यक्ति आज का ।
करना चाहे जो वघ सिर्फ अपनो का ।।
ज़िबहा हो गई आत्मा मेरी ,इस जुनून के नशे से।
इस कलयुग के अंधकार में इन रण की रातों से ।।

दिखे मुझे इस युग में भी धित्तराष्ट्र बैठा शासन पे।
करे जो सहयोग दुर्योधन का आज भी हर हालत में।।
कैसे बचाऊं मैं अपने जीवन को इन शकनुई की चालों से ।
इस कलयुग के अंधकार में इन रण की रातों से ।।

ढुड़ रहे नैन मेरे फिर उसी सार्थी को..
दिखाए जो फिर मार्ग इस निहथ्थे अजुर्न को
तोड़ दे जो इस चक्रव्यू के बंधन को अपने बाणों से
इस कलयुग के अंधकार में इस रण की रातों से।।






18
सब को खामोश पाएगें...

इस रंग बिरंगी दुनिया के कितने बिखरे रंग पाएंगें
पूछेगें जब हम राज़ इनका तो सब को खामोश पाएंगे।।

अतीत का परिणाम देखा हमने
कल से बहुत कुछ सीखा हमने .
अपनी अज्ञानता और मुर्खता को
जब हम माप पाएगे.
तो सब को खामोश पाएगे।।

मानवता के वक्ता हम
मानवतावाद से वंचित हम
अपनी मलिनता को जब हम पहचान जाएगे
तो सब को खामोश पाएगें।।




हंसवाहिनी के पुजारी हम ।
चिंतन से कितनी दूर हम
अपने सिद्धातों को जब हम जान जाएगे
तो सब को खामोश पाएगें ।।






कल्पानो के अभिकल्पक हम ।
वास्तविकता के तमाशबीन हम
अपने अस्तिव को जब हम समझ जाएगें
तो सब को खामोश पाएगें।।




19
मनुष्य
इस अतिजवि संसार में
मात्र अतिथि रहे गया है मनुष्य
पहुचं जाता है महिधर तक
फिर भी कितना तुच्छ है मनुष्य।।

सफर तय करता है यह
माननीय महोदय आदरणीय सुन सुन कर
इस मानोपाधि के जाल में
कितना मानी हो गया है मनुष्य।।

न इस को विशवास है रिश्तों में
न ही ये ग्रस्त है बंधनो में।
इस दुनिया के रीति रिवाज से
कितना दूर हो गया है मुनष्य

युद्ध नीतियों से भी गंभीर है
इस के जीवन की रीति
लू़ट खासोट मुआवज़ा ही है इसकी नीति
इस झिलमिल दुनिया में डकैत हो गया है मनुष्य।।

हर चीज़ को पाने की लालसा इसे
हर जगह पहुचने का लक्षय इसका
चांद पर पहुचने के बाद भी
ह्रदय से कितना दूर है मनुष्य।।

अंत तो हर चीज़ का अनिवार्य़ है
फिर मौत तो मनुष्य से भी महान है ।
अपने अंत काल में कितना बेबस होता है मुनष्य।।







20
हम
न हम अंबर के तारे
न हम सागर के मोती
हम तो वे दीपक हैं
जो दे कुटिया में ज्योति
न हमको चाहिए शौर्य
न हमको चाहिए दौलत
बनना चाहे हम हर ह्रदय के निवासी
न मांगे हम कोई सिंधासन
न मांगे हम राज- पाठ
मिले जहां शाति ढूंढ रहे वो स्थान ।।
न हम कोई महात्मा न हम कोई अवतार
हम तो वो सार्थी जो दिखाए जो सब को मार्ग
न दे रहे हम उपदेश है
न ही है ये कोई संदेश
ये खुद को सुधारने का है हमारा उद्देश्य।।



21
जब मिल जाए तब....
बिखरे हुए पल और टूटे हुए सपने जब मिल जाते हैं।
तो एक नई कहानी सुनाई जाती है ....
जिसमें में न कोई राजा होता है न कोई रानी .
सब सुनते हैं अपनी ज़ुबानी अपनी कहानी ।।
चलो आओ तुम को लेकर चलूं...
मैं अपनी दुनिया में...
पडयंत्र ,शोषण,और उपदेशों से दूर
दूर बहुत दूर इस धरती की करूणा और पीड़ा से दूर।।
चलो....क्यों रूक गए तुम ...या फिर
तुम्हे तुम्हारे बीते हुए अनुभवों ने रूक दिया ।।
नहीं, नहीं इस लिए रूका मैं ..
क्योंकि मैने दर्णन देख लिया
देख लिया मैने अपना अस्ली चेहरा ..
बंधा हुआ मैं कई बंधनों से ...
जितना चाहों जितना प्रयास करूं...
नहीं पा सकता मुक्ति मैं इनसे ...
बीमार मां , लाचार भाई ,
शादी लायक बहन ,डिग्री लेकर धूमता भाई..
कैसे छोड़ सकता मैं इन्हे...
मैं ही तो इनकी डोर हूं..
मेरे साथ जाएगी ..
बाप की अर्थी ,मां ज्योति
बहन की बोली ,भाई की आस...
नहीं ,नही..दे पाऊंगा मैं इतना बलिदान ...
कमज़ोर हूं ...निराश हूं.... लाचार हूं... मैं....

लाचार ,निराश ,कमज़ोर... बंधनो से बंधे..बेबस...
फिर क्यों देखते हो सपने ...
क्यो कोसते हो अपने को ...
क्यों गालियां देते हो अपनो और दूसरों को....

उठने दो बाप की अर्थी ...
जाने दो मां की ज्योति..
बंद होने दो बहन की बोली ...
मिटने दो भाई की आस....

चलो तुम्हे लेकर चलूं.. मैं...
उस दुनिया में जहां बेटे ने बाप का गला घूटा
भाई ने भाई से नाता तोड़ा ...
मां बहन की कभी न बनी ...
ऐसी है वहां की जिन्दगी ...

रिश्ते नाते बस तुम जैसे लोगों के पास है..
इनसे भी बढ़ कर है यहां बहुत सी हस्ती ..
तु्म मुक्त नहीं हो पाते वो ग्रस्त नही हो सकते ..
चादनी के पीछे की अमावस को देख सको गे..

नहीं दोस्त .. नहीं...

जो तुम्हारे पास है उसको देखो..
उसे संभालो..
बाप को बोझ
मां को कर्ज़
बहन को फर्ज़
भाई पर एहसान
न समझो...
जो हे कहीं वो तुम्हारे हाथ से न निकल जाए...
कहीं उंची उडान तुम्हे अपाहीज न कर दे....
और तुम रहे न जाऊ अकेले...
जिन आंसूओं से तुम भागते रहे ..
वो ही उम्र भर के साथी हो लेगें...
जिन्दगी में बस रोना और बिलखना रहे जाएगा...
ऐसा बना देगें ये झूठे सपने ...
... मैं तो पल हूं..
जब चाहो गे जब आओंगां...
जब बुलाओगे तब पाओगे
और तुम को मधुर सपनों में ले जाऊं गा....

22
अधूरे खव्वाब....
हर पल मेरे साथ रहे मेरे अधूरे खव्वाब
टूटे बिखरे शब्दों से खड़ा किया मैने संस्सार
सही ,ग़लत ,अच्छे बुरे की नहीं मुझे पहचान
मैने सुना अपने मन की और लिख दिया सारा हाल..

भाषा परिभाषा की खोज में
व्याख्या और पंक्तियों की होड़..
क्यों लिखूं वो मैं..
जो चाहे आप....
मेरी तो बस ये दुनिया है..
छोटी सी नदी में छोटी सी नइया ..
इसका मैं प्यारा और मेरी ये प्यारी कविता...
इसने साथ दिया मेरा तब जब मै था अकेला ..
मां की तरह चाहा इसने
बाप की तरह दुलारा इसने..
जब भूख लगी तब विचार दिये..
जब दर्द हुआ तो एहसास किया
मेरे अधूरे खव्वाबों को
इसने नया  नाम दिया..

इसी के सहारे तो
हर पल मेरे साथ रहे मेरे अधूरे खव्वाब......




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