Tuesday, August 25, 2015

आगा हशर

तुम और फरेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से
तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से
गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है
होता है पहारों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से
बरबाद-ए-दिल का आखरी सरमाया थी उम्मीद
वो भी तो तुम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से
धुंधला चली निगाह दम-ए-वापसी है अब
आ पास आ के देख लूँ तुझ को क़रीब से
-आगा हशर

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